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मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

बढ़ती बेरोज़गारी और महंगाई से पैदा हुए असंतोष से निपटने में सरकार की विफलता का मुकाबला करने के लिए भाजपा यह बातें कर रही है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 मई 2022 को कार्यालय में आठ साल पूरे कर लिए हैं। 2014 में उन्होने तब सत्ता संभाली थी जब आम चुनाव के बाद, तत्कालीन कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने बुरी तरह से हरा दिया था, तब नरेंद्र मोदी ने पहली बार प्रधानमंत्री का पद संभाला था। 2019 में, उन्होंने फिर से आम चुनावों में गठबंधन को जीत दिलाई थी। 

चूंकि भाजपा हर चुनाव जीतने के मामले में खुद प्रतिबद्ध है, इसलिए यह स्वाभाविक है कि पार्टी 2024 के आम चुनावों के लिए पहले से ही कमर कस रही है। आने वाले महीनों में कुछ महत्वपूर्ण राज्य विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं, जिसमें इस साल के अंत में गुजरात चुनाव भी शामिल है। इसलिए, इसने आठवीं वर्षगांठ के समारोह को आगामी चुनावों की तैयारी में बदल दिया है।

19-20 मई को जयपुर में आयोजित शीर्ष भाजपा पदाधिकारियों की बैठक में, पार्टी ने न केवल पिछले आठ वर्षों में देश का नेतृत्व करने के लिए पीएम मोदी की प्रशंसा की, बल्कि आम लोगों को सशक्त बनाने वाली मोदी सरकार की नीतियों के बारे में जनता को शिक्षित करने के लिए कुछ योजनाएं भी बनाई हैं। रपट के मुताबिक, सभी केंद्रीय मंत्रियों को देश के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा करने और किसी एक 'लाभार्थी' परिवार के साथ एक रात बिताने के लिए कहा गया है, ऐसे परिवार जो केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई सरकारी योजनाओं में से किसी एक से भी लाभान्वित हुए हैं। ये योजनाएं जिनमें से कई को 'पीएम' के नाम चलाया जा रहा और जिन्हे खुद मोदी के विचारों के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। दरअसल, बैठक के बाद जारी एक बयान में इन योजनाओं के संदर्भ में प्रधानमंत्री को 'दया और करुणा का प्रतीक' बताया गया है।

पदाधिकारियों की इस बैठक में यह भी घोषणा की गई कि 8वीं वर्षगांठ समारोह "सेवा, सुशासन, गरीब कल्याण" के नारे के इर्द-गिर्द होगा, जिसका अर्थ है - सेवा, सुशासन, गरीबों का कल्याण। खबरों के अनुसार, 26 मई को, दिल्ली में भाजपा मुख्यालय में कई रणनीति बैठकें आयोजित की गईं हैं, जिसमें 8 वीं वर्षगांठ की योजना को और आगे बढ़ाने पर बात हुई है। यह अभियान 30 मई से 15 जून तक चलेगा। इस बाबत संदेश फैलाने के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेता लोकसभा क्षेत्रों का दौरा करेंगे और संभवत: अगले चुनाव का प्रचार शुरू करेंगे। भाजपा ने अपने विचार-विमर्श में पहले ही 144 निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान की है जहां वह पिछली बार वरिष्ठ नेताओं के लक्षित दौरे के बाद हार गई थी।

जहां तक भाजपा का संबंध है, यह सब प्रभावशाली और उनके पाठ्यक्रम के समान लगता है। यह एक समर्पित चुनाव मशीन है, और इसके हवाले भारी संसाधन हैं, जो चुनाव जीतने की  लंबी योजनाओं को पूरा करने की में मददगार हैं। हालांकि, क्या केवल बेदाग रणनीतियों पर ही चुनाव जीता जा सकता है?

सेवा-सुशासन-गरीब कल्याण:

सबसे पहले, इनके तीन नारों पर नज़र डालते हैं। जाहिर है, बीजेपी खुद को एक ऐसी पार्टी के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रही है जो लोगों के उत्थान के लिए काम कर रही है। इसका मुख्य कारण विभिन्न योजनाएं और कार्यक्रम हैं जिन्हें इसने लॉन्च किया है या (कई मामलों में) उन्हे दोबारा से पेश किया गया है। इनमें मुफ्त गैस कनेक्शन (उज्ज्वला योजना), जनधन बैंक खाते खोलना, महामारी के वर्षों में 5 किलो मुफ्त अनाज उपलब्ध कराना (पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना) और ग्रामीण गरीबों के लिए घर बनाना (पीएम आवास योजना) आदि शामिल हैं।

यह सच है कि इनमें से कुछ योजनाओं से लोगों को लाभ हुआ है, लेकिन इस चेतवानी के साथ कि लोगों का एक बड़ा वर्ग अभी भी छूटा हुआ है। उदाहरण के लिए, मुफ्त खाद्यान्न की लोकप्रिय पीएमजीकेएवाई योजना मई 2020 में महामारी को कम करने के लिए शुरू हुई थी, और लॉकडाउन के प्रभाव से लगभग 80 करोड़ लोगों को लाभ हुआ था, लेकिन चूंकि संख्या 2011 की जनगणना पर आधारित थी, इसलिए अनुमान लगाया गया था कि लगभग दस करोड़ लोग थे जो जीवन रक्षक योजना से वंचित रह गए थे, इसके अलावा, इस साल गेहूं की खरीद में लगभग 50 प्रतिशत की कमी से, यह योजना अब विफल हो रही है। पहले से ही संकेत मिल रहे हैं कि राज्य स्तर पर सरकारें वितरण को कम करने के तरीकों पर काम कर रही हैं, जैसे कि राशन कार्डों की दोबारा से जांच के आदेश देना (जैसे उत्तर प्रदेश में हुआ)। इसी तरह, उज्ज्वला योजना में लगातार गिरावट आई है क्योंकि एलपीजी पर सब्सिडी 2018 में समाप्त हो गई थी और पिछले वर्ष सिलेंडर की कीमतों में 400 रुपये से अधिक की वृद्धि हुई है, जिससे लगभग सभी लाभार्थियों को रिफिल लेने में दिक्कत हुई है।

लेकिन अधिक प्रासंगिक सवाल यह है कि क्या ऐसी योजनाओं से लाभान्वित होने वाले सभी लोग भाजपा को वोट देते हैं? खुद भाजपा भी इस मामले में अनिश्चित है, जैसा कि इस तथ्य से पता चलता है कि वह इन योजनाओं के बारे में लोगों को शिक्षित करने के लिए खुद एक कार्यक्रम तैयार कर रही है। यदि सभी को लाभ हो रहा था, तो इस जमीनी स्तर के दृष्टिकोण की क्या आवश्यकता थी? या, यदि सभी लाभार्थी भाजपा का समर्थन करने की इच्छा रखते हैं, तो कई राज्यों में उसे सीटें क्यों गंवानी पड़ीं?

जो हमें एक और प्रश्न पर लाता है: मतदाताओं के झुकाव पर मौजूदा आर्थिक संकट का क्या प्रभाव है?

आर्थिक संकट भाजपा के समर्थन में सेंघ लगा रहा है 

यहां तक कि जो लोग, कहते हैं, कि वे एक या अधिक योजनाओं से लाभान्वित हुए हैं, वे भी आर्थिक संकट के विनाशकारी प्रभावों से प्रभावित होंगे, जो बेतहाशा बेरोजगारी, रिकॉर्ड मुद्रास्फीति, महंगाई और स्थिर या घटती कमाई से चिंतित हैं। यह संकट न केवल भाजपा के चुनावी समर्थन में सेंध लगा सकता है, बल्कि सुशासन के नारे को भी हवा में उड़ा सकता है।

जैसा कि हाल के सभी राज्य विधानसभा चुनावों ने दिखाया है, नौकरियां सबसे बड़ा आर्थिक संकट बनी हुई हैं। बेरोजगारी दर पिछले लगभग तीन वर्षों से 7-9 प्रतिशत पर मँडरा रही है और जो 2020 में पहले लॉकडाउन के दौरान अविश्वसनीय रूप से 25 प्रतिशत तक बढ़ गई थी। केंद्र सरकार में ही लगभग 10 लाख पद खाली पड़े हैं, और अन्य 30 लाख पद राज्य सरकारों के तहत खाली पड़े हैं। ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को अनिच्छा से लागू करने के अलावा, मोदी सरकार ने बुरी तरह से विफल योजनाओं को शुरू करने के अलावा, रोजगार पैदा करने के लिए बहुत कम काम किया है। इनमें उद्यमियों (मुद्रा) या कौशल विकास कार्यक्रमों को सस्ते ऋण देना शामिल है। ये विफलताएं 'सुशासन' के नारे का खोखलापन दिखाती हैं।

कीमतों में वृद्धि ने पारिवारिक बजट को भी तबाह कर दिया है, खुदरा मुद्रास्फीति आठ साल के उच्च स्तर यानि 7.8 प्रतिशत और थोक मुद्रास्फीति 15 प्रतिशत के साथ तीस साल के उच्च स्तर पर पहुँच गई है। खाना पकाने के तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं के कारण खाद्य कीमतों में और भी अधिक वृद्धि हुई है। यहां तक कि गेहूं की कीमतों में भी उछाल आया है, जबकि सुशासन का मतलब है कि पीएम मोदी उसी समय गेहूं के निर्यात को प्रोत्साहित कर रहे थे!

इससे पहले आठ साल के शासन में, मोदी सरकार ने 2016 में नोटबंदी और फिर 2017 में जीएसटी को लागू करके अर्थव्यवस्था को दो गंभीर झटके दिए थे। दोनों ने अर्थव्यवस्था को उल्ट दिया था, और दोनों ही मोदी के 'सुशासन' के उदाहरण थे!

सबसे बड़ी नीतिगत विफलता - अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने और रोजगार पैदा करने में सरकार की असमर्थता नज़र आती है - सीधे तौर पर यह उस त्रुटिपूर्ण नीति और विचार से निकली है, कि कॉर्पोरेट क्षेत्र को रियायतें दी जानी चाहिए ताकि वह अधिक निवेश करे और रोजगार पैदा करे। यह अनिवार्य रूप से एक पूर्ण विफलता साबित हुई है। सभी कॉर्पोरेट कर में कटौती और श्रमिकों को काम से निकालने के लिए श्रम संहिताओं को लागू करने से कॉर्पोरेट क्षेत्र को केवल सुपर-मुनाफा हुआ है, जबकि लोगों के जीवन स्तर में गिरावट आई है।

बढ़ते तनाव और विभाजन

भाजपा को अक्सर खुद राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने या पूरा करने के लिए धर्म का इस्तेमाल करने के लिए प्रतिबद्ध पार्टी के रूप में जाना जाता है। 2019 में मोदी 2.0 के सत्ता में आने के बाद से, भाजपा का आरएसएस समर्थित चेहरा बहुत अधिक खुले तौर पर उभरा है, जैसा कि अनुच्छेद 370 को निरस्त करने, भेदभावपूर्ण नागरिकता कानूनों को लाने, संघ परिवार से जुड़े विभिन्न संगठनों द्वारा सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा देने में छुट देने, बहुसंख्यक प्रचार और यहां तक ​​कि लव-जिहाद, हिजाब, समान नागरिक संहिता आदि जैसे मुद्दों पर टकराव पैदा करना रहा है। हालांकि यह सच है कि यह बहुसंख्यक समुदाय के मतदाताओं के एक वर्ग को अपने पीछे लाने में कामयाब हो गई है, फिर भी यह एक दोधारी हथियार है। लोगों के बड़े वर्ग के सामने, सांप्रदायिक टकराव, कमाई का नुकसान और जान-माल के नुकसान के कारण सामान्य स्थिति में व्यवधान से चिंता का कारण बनता है। वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद या मथुरा में कृष्ण जन्म स्थान-शाही ईदगाह जैसे मुद्दों को उठाना, साथ ही ताजमहल, कुतुब मीनार और अन्य ऐतिहासिक स्मारकों से संबंधित मांगों को उठाना, लोगों को, विशेष रूप से युवा लोगों को तेजी से ऐसी जहरीली राजनीति से दूर कर रहा है। 

शायद यही कारण है कि भाजपा - वर्तमान में - 8 वीं वर्षगांठ के अवसर पर कल्याणकारी योजनाओं के बारे में प्रचार करने के लिए अपने सभी नेताओं को भेजकर अपने समर्थन को पुनर्जीवित करने की कोशिश पर ध्यान केंद्रित कर रही है। यह आशा और हताशा से प्रेरित एक उपाय है - न कि कोई भव्य रणनीति है जिसे मुख्यधारा का मीडिया हर बार की तरह मास्टर स्ट्रोक बता रहा है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

[email protected]: BJP Talks of ‘Welfare’ and ‘Service’……

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