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यूपी: सीएए से लेकर अग्निपथ तक, “वसूली-बुलडोज़र” से विरोध को दबाने का प्रयास

सकार ने एक नया क़ानून “यूपी रिकवरी ऑफ डैमेज टू पब्लिक एंड प्राइवेट प्रॉपर्टी क़ानून” बनाया है। अब सरकार अग्निपथ के ख़िलाफ़ इसी क़ानून के तहत वसूली की बात कर रही है, जिसके तहत वसूली का मामला ट्रिब्यूनल में जायेगा और वहां रिटायर्ड ज़िला जज चेयरमैन होंगे और मामले की सुनवाई करेंगे।
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फ़ोटो साभार: सोशल मीडिया

उत्तर प्रदेश में “अग्निपथ” योजना के ख़िलाफ़ आंदोलन करने वालों के ख़िलाफ़ योगी आदित्यनाथ सरकार शिकंजा कसने की तैयारी कर रही है। सरकार द्वारा कहा गया है कि आंदोलन में हुए सार्वजनिक और निजी सम्पत्ति के नुक़सान का “मुआवज़ा” प्रदर्शनकारियों से वसूला जायेगा।

सरकार का आरोप है कि कुछ कोचिंग संचालकों ने भी छात्रों को उकसाया, जिसकी वजह से आंदोलन और तीव्र व हिंसक हुआ है। प्रदेश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के मंत्रियों और नेताओं के अलावा पुलिस भी केंद्र सरकार की अग्निपथ योजना के क़सीदे पढ़ रही है।

सीएए आंदोलन और मुआवज़ा

योगी सरकार ने 2019-20 में नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) के प्रदर्शनकारियों से भी मुआवज़ा मांगा था। लेकिन मुआवज़ा माँगने के ढंग और उसकी क़ानूनी वैधता पर सवाल खड़े हो गये थे। प्रदेश सरकार ने सीएए आंदोलन की हिंसा में हुए नुक़सान के मुआवज़े के लिये प्रदेश भर में प्रदर्शनकारियों की तस्वीर, नाम और पते की होर्डिंग लगवा दी हैं।

होर्डिंग ऐसे समय में लगी थी जब न प्रदर्शनियों के ख़िलाफ़ मुक़दमा के फ़ैसला हुआ था और न किसी जांच की रिपोर्ट सामने आई थी। केवल पुलिस द्वारा लिखी गई एफ़आईआर के आधार पर होर्डिंग लगा दी गईं।

अदालत की नाराज़गी

सरकार की इस जल्दबाज़ी से हाई कोर्ट भी नाराज़ हुई और उस ने होर्डिंग हटाने को कहा था, लेकिन इसके ख़िलाफ़ सरकार सुप्रीम कोर्ट गई, जहाँ मामला अब भी विचाराधीन है। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट अदालत के आदेश के बाद वसूली के सारे नोटिस रद्द कर दिये गये और जिन्होंने पैसा दिया था, उनका पैसा भी लौटाया गया।

नया क़ानून: वसूली की नई प्रक्रिया 

लेकिन सकार ने इस तरह की स्थिति से निपटने के लिये एक नया क़ानून “यूपी रिकवरी ऑफ डैमेज टू पब्लिक एंड प्राइवेट प्रॉपर्टी क़ानून” बनाया है। अब सरकार अग्निपथ के ख़िलाफ़ इसी क़ानून के तहत वसूली की बात कर रही है, जिसके तहत वसूली का मामला ट्रिब्यूनल में जायेगा और वहां रिटायर्ड ज़िला जज चेयरमैन होंगे, और मामले की सुनवाई करेंगे।

वसूली और बुलडोज़र

यह बात लगातार कही जा रही है कि उत्तर प्रदेश में लगातार असहमति की आवाज़ों को दबाया जा रहा है। सीएए के विरुद्ध आंदोलन हो या फ़िर हज़रत मोहम्मद साहब के ख़िलाफ़ भाजपा नेताओं द्वारा आपत्तिजनक टिप्पणी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हो और या अग्निपथ योजना के ख़िलाफ़ छात्रों का आंदोलन, सभी में सरकार ने “वसूली और बुलडोज़र” के नाम पर सहमति की आवाज़ों पर प्रहार किया है। 

बुलडोज़र का इस्तेमाल

हालांकि, सरकार के इस रवैये पर आम लोगों से लेकर पूर्व जज तक ने अपना विरोध दर्ज कराया है। कानपुर में 3 जून को हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद, पुलिस के आला अधिकारियों ने अपने पहले बयान में ही “बुलडोज़र” की धमकी दे डाली थी। इसी क्रम में 10 जून को मुस्लिम समुदाय द्वारा प्रदर्शन किये गये, प्रदर्शन के बाद आनन-फ़ानन में स्थानीय प्रशासन ने प्रयागराज में एक प्रदर्शनकारी का घर गिरा भी दिया।

सरकार को हिदायत

इन सब “नाजायज़” कार्रवाइयों के लिए सरकार को नागरिक समाज की जबरदस्त आलोचना का सामना करना पड़ा है। अदालत में भी सरकार को हिदायत दी कि कार्रवाई क़ानून के दायरे में होनी चाहिये। 

पुलिस ने क्या कहा? 

पुलिस ने सोमवार को कहा कि केंद्र की नई सैन्य भर्ती योजना अग्निपथ के ख़िलाफ़ हिंसक विरोध के दौरान प्रदर्शनकारियों द्वारा सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को हुए नुकसान के लिए राज्य सरकार मुआवज़े की वसूली करेगी। प्रदेश अतिरिक्त महानिदेशक (कानून व्यवस्था) प्रशांत कुमार ने यहां ,तक कह दिया कि "हिंसा में शामिल पाए जाने वाले लोगों से वसूली की जाएगी।" 

अग्निपथ का विरोध

नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा अग्निपथ योजना की घोषणा के बाद शुक्रवार से 14 जिलों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये थे। पुलिस का आरोप है कि युवा प्रदर्शनकारियों ने ट्रेनों, बसों और वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया और कई जगहों पर आग लगा दी थी। पुलिस के अनुसार प्रदर्शन के दौरान पथराव में कई निजी और सार्वजनिक संपत्तियों को भी नुकसान पहुंचाया गया। 

गिरफ़्तारियां और मुक़दमे 

प्राप्त जानकारी के अनुसार अब तक 39 एफ़आईआर दर्ज की गई हैं और 330 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें से 145 पर शांति भंग करने का मामला दर्ज किया गया है। दूसरी तरफ़, ज़िला पुलिस प्रमुखों को मुख्यमंत्री द्वारा सैनिक कल्याण बोर्ड और पूर्व सैनिकों की मदद के ज़रिये युवा उम्मीदवारों को नई भर्ती योजना अग्निपथ के बारे में समझाने का निर्देश दिया गया है। इसका मक़सद उनकी शंकाओं को दूर करना है। 

कोचिंग संचालकों पर नज़र 

अग्निपथ के बारे में उम्मीदवारों को समझाने के लिए प्रदेश पुलिस को कोचिंग संस्थानों के निदेशकों से भी मदद लेने के लिए कहा गया है, जो सेना में शामिल होने के इच्छुक युवाओं को प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। हालांकि पुलिस का यह भी कहना है की कुछ कोचिंग मालिक उम्मीदवारों को प्रदर्शन और हिंसा के लिये भड़का रहे हैं। ऐसे कोचिंग से सख़्ती से निपटा जायेगा। 

अतिरिक्त महानिदेशक (कानून व्यवस्था) कुमार ने कहा, "यूपी पुलिस को विश्वास है कि यह योजना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है और इसे सफल बनाने के लिए हमारे द्वारा सभी प्रयास किए जा रहे हैं।"

क्या है “अग्निपथ”?

अग्निपथ योजना में अधिकारियों से नीचे रैंक वाले व्यक्तियों के लिए रिक्रुटमेंट प्रोसेस शामिल है। इस स्कीम के तहत 75% जवानों की भर्ती महज 4 साल के लिए की जाएगी।

योजना के तहत भर्ती होने वाले सैनिकों को “अग्निवीर”कहा जाएगा। वहीं, केवल 25 फीसदी को ही अगले 15 वर्षों के लिए दोबारा सेवा में रखा जाएगा। इसमें एप्लाई करने के लिए उम्मीदवार की आयु 17.5 वर्ष से 21 वर्ष के बीच होनी चाहिए।

मुआवज़े पर बहस

हालांकि, मुआवज़े की बात आते ही नागरिक समाज और क़ानून के जानकार कई प्रश्न कर रहे हैं। क्योंकि देखा गया है कि मुआवज़े और बुलडोज़र का डर दिखाकर बोलने की स्वतंत्रता और सहमति कि आवाज़ों को दबाने की कोशिश की जाती रही है।

कोर्ट के दिशानिर्देश का पालन हो 

देश में बढ़ती बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाली संस्था “युवा मंच” का कहना है कि कोई भी कार्रवाई करने से पहले सरकार यह सुनिश्चित करे कि क़ानून का पालन किया जायेगा। मंच के संयोजक राजेश सचान कहते हैं कि प्रयागराज में क़ानून की अनदेखी कर घर गिरा दिया गया। अब दोबारा ऐसा नहीं होना चाहिए। सरकार सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश को ध्यान में रखते हुए ही अगला क़दम उठाये।

आंदोलनों को दबाने के लिये ग़ैरलोकतांत्रिक तरीक़े 

वहीं सीपीआई (एमएल) के वरिष्ठ नेता मोहम्मद सलीम ने कहा कि देखा गया है कि देशभर में भाजपा सरकारें आंदोलनों को दबाने के लिये ग़ैर-लोकतांत्रिक तरीक़े अपना रही हैं। लिहाज़ा सरकार को ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी प्रदर्शनकारी पर कोई अनावश्यक दबाव न बनाया जाये।

सलीम कहते हैं कि कार्रवाई करते समय इस बात का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसी के संवैधानिक अधिकार का हनन ना हो क्योंकि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार अकसर कार्रवाई करते समय अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ अपनी राजनीतिक शक्ति का दुरुपयोग करती है।

उन्होंने कहा कि भाजपा सरकारें संविधान के अनुसार नहीं चलना चाहती है, और वक़्त पड़ने पर क़ानून ही बदल देती हैं। 

पुलिस के कहने से कोई दोषी नहीं होता

क़ानून के जानकार मानते हैं कि मुआवज़े के मामले में इतनी जल्दी नहीं करनी चाहिए। अधिवक्ता शुभम त्रिपाठी कहते हैं कि मुआवज़ा का प्रश्न तो तब उठेगा जब “अभियुक्त-दोषी” साबित हो जायेंगे। वह कहते हैं कि केवल सरकार या पुलिस के कहने से कोई दोषी नहीं हो जाता है। कौन दोषी है और कौन निर्दोष यह अदालत तय करेगी। 

मुआवज़ा तभी जब जुर्म साबित हो जाये

वरिष्ठ अधिवक्ता फ़रमान नक़वी ने बताया कि जिस क़ानून के तहत मुआवज़े की बात हो रही है उसको अदालत में चुनौती दी गई है। लेकिन अभी अदालत ने इस पर कोई रोक नहीं लगाई है। नक़वी के अनुसार क्योंकि कोई रोक नहीं है इसलिये इस क़ानून के तहत कार्रवाई करने का अधिकार सरकार के पास है। 

हालांकि, नक़वी ने आगे कहा कि मुआवज़ा तभी वसूला जा सकता है, जब किसी अभियुक्त पर दोष अदालत में साबित हो जाये। किसी मंत्री, नेता और अधिकारी इसका फ़ैसला नहीं कर सकते हैं कि किसको मुआवज़े के लिये नोटिस देना है या किस से वसूली करनी है। 

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