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...बना है शाह का मुसाहिब फिरे है इतराता

"हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे

कहते हैं कि ग़ालिब का है अन्दाज़े-बयाँ और"

उस्ताद शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की 222वीं जयंती पर विशेष
mirza ghalib
फोटो साभार : Hindustan Times

उस्ताद शायर मिर्ज़ा असद-उल्लाह ख़ां 'ग़ालिब' की आज 222वीं जयंती है। 27 दिसंबर 1797 को आगरा में उनका जन्म हुआ। आइए पढ़ते हैं उनकी एक मशहूर ग़ज़ल जो आज बेहद मौज़ूँ है :


हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है

तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है


रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल

जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है


चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन

हमारी जेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है


जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा

कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है


रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी

तो किस उम्मीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है


बना है शाह का मुसाहिब फिरे है इतराता

वगर्ना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है

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