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आर्थिक असमानता: पूंजीवाद बनाम समाजवाद

पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के चलते पैदा हुई असमानता मानव इतिहास में अब तक पैदा हुई किसी भी असमानता के मुकाबले सबसे अधिक गहरी असमानता है।
Inequality

पिछले कुछ अर्से में आर्थिक असमानता में हुई भारी बढ़ोतरी के संबंध में काफी कुछ लिखा गया है और ऑक्सफैम जैसी संस्थाओं ने अनेकानेक, हैरत में डाल देने वाले आंकड़े प्रस्तुत किए हैं। ये आंकड़े इनीक्वेलिटी किल्स शीर्षक की रिपोर्ट में पेश किए गए हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि महामारी के आने के बाद से, दस सबसे धनवानों की संपदा दोगुनी हो गयी है, जबकि दुनिया की 99 फीसद आबादी की आय अब, महामारी से पहले की स्थिति के मुकाबले नीचे खिसक गयी है। दुनिया की आबादी के सिर्फ 0.027 की कुल संपदा, 2020 में 450 खरब डालर थी यानी भारत के वर्तमान सकल घरेलू उत्पाद के 15 गुने से ज्यादा पूंजीवाद में बढ़ती है।

आर्थिक असमानता

कुछ लोगों का दावा तो यह भी है कि आज की दुनिया की खासियत यह है कि इसमें ‘आर्थिक असमानता, मानवीय इतिहास के अपने शीर्ष पर पहुंच गयी है।’(एमआर ऑनलाइन,12 फरवरी) यह दावा असंभव तो हर्गिज नहीं है।चूंकि हरेक सामाजिक व्यवस्था को चलते रहने के लिए उत्पादन की जरूरत होती है और चूंकि उत्पादन जारी रखने के लिए उत्पादनकर्ताओं के लिए एक न्यूनतम स्तर पर गुजर-बसर करने की स्थिति जरूरी होती है, एक न्यूनतम स्तर पर गुजारे के साधनों तक तो सबसे गरीबों की भी पहुंच होती ही है, भले ही उनकी श्रम उत्पादकता का स्तर कितना ही नीचा क्यों न हो। और यह नियम पहले की समाज व्यवस्थाओं पर भी लागू होता था।

दूसरी ओर, आर्थिक अतिरिक्त उत्पाद का हिस्सा, जो श्रम उत्पादकता तथा उत्पादक मजदूरों की मजदूरी की दर के बीच के अंतर को दिखाता है, उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ, श्रम की उत्पादकता में बढऩे के साथ बढ़ता रह सकता है।

चूंकि पूंजीवाद में उत्पादक शक्तियों का अब तक का सर्वोच्च विकास हुआ है, इसमें किसी को अचरज नहीं होना चाहिए कि पूंजीवाद के अंतर्गत आर्थिक असमानता यानी उत्पाद में आर्थिक अतिरिक्त मूल्य का हिस्सा आज पहले किसी भी समय के मुकाबले ज्यादा है।

इस तरह के ख्याल के खिलाफ स्वाभाविक रूप से यह दलील दी जाएगी कि उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ, उत्पादक मजदूरों की मजदूरी की दर में भी तो बढ़ोतरी हो रही होगी और इसलिए, इसका कारण नहीं बनता है कि आर्थिक अतिरिक्त मूल्य के हिस्से तथा इसलिए, आम तौर पर इससे जुड़ी रहने वाली आर्थिक असमानता में, पूंजीवादी व्यवस्था में इससे पहले की उत्पादन पद्घतियों के दौर के मुकाबले बढ़ोतरी हो ही रही हो।

लेकिन, अगर हम पूंजीवाद को उसकी वैश्विक संस्थिति के साथ रखकर देखें, तो हम यह पाते हैं कि वह हाशियावर्ती क्षेत्रों में जो निरुद्योगीकरण पैदा करता है और इसलिए श्रम की विशाल सुरक्षित सेना पैदा करता है, उसके चलते श्रम की उत्पादकता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होने के बावजूद, वास्तविक मजदूरी बस गुजारे के स्तर के करीब ही बनी रहती है। इसका अर्थ यह होगा कि समग्रता में पूरी दुनिया के स्तर पर, अतिरिक्त मूल्य के पैमाने से परिभाषित असमानता पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत, उससे पहले की उत्पादन पद्घतियों के मुकाबले ठीक इसीलिए ज्यादा होगी कि पूंजीवादी उत्पादन पद्घति में उत्पादक शक्तियों का, उससे पहले वाली उत्पादन पद्घतियों के मुकाबले ज्यादा विकास होता है।

समाजवादी व्यवस्था में इतिहास में सबसे कम असमानता रही थी लेकिन इस अर्थ में भी असमानता पूंजीवादी उत्पादन पद्घति के चलते, मानव इतिहास के इससे पहले के किसी भी समय के मुकाबले आज इसलिए कहीं ज्यादा है क्योंकि अब से सिर्फ तीन दशक पहले ऐसे समाज मौजूद थे जहां असमानता, मानव इतिहास के उससे पहले के किसी भी समय के मुकाबले कम थी। जाहिर है कि मेरा इशारा सोवियत संघ तथा पूर्वी योरप के अन्य समाजवादी देशों की ओर है। इन देशों में समाजवाद के पराभव के बाद, इसका फैशन ही चल पड़ा है कि इन देशों की बात ऐसे की जाए, जैसे असमानता के पहलू से इन देशों और पूंजीवादी देशों में कोई अंतर ही नहीं रहा था और इन समाजों में भी जो अपरात्चिक यानी नौकरशाही थी, वह उसी तरह से अतिरिक्त उत्पाद पर पल रही थी, जैसे पूंजीपति अतिरिक्त उत्पाद पर पलते हैं। लेकिन, असमानता के पहलू से, इन दो समाज व्यवस्थाओं के बीच के अंतर को मिटा ही देने की यह कोशिश, एक बेईमानी भरी विचारधारात्मक तिकड़म है, जो तथ्यात्मक रूप से भी गलत है। उल्टे, असमानता के पहलू से इन दो व्यवस्थाओं के बीच का अंतर, सीधे-सरल शब्दों में कहें तो इतना ज्यादा था कि उसकी कल्पना तक कर पाना मुश्किल है।

ऑक्सफैम के मैक्स लॉसन ने यूगोस्लाव मूल के अर्थशास्त्री, ब्रांको मिलानोविच को उद्यृत कर यह दिखाया है कि पूर्वी योरपीय अर्थव्यवस्थाओं में असमानता (जिसके माप के लिए उन्होंने पीछे मेरे सुझाए पैमाने से भिन्न पैमाने का सहारा लिया है), उस समय में पश्चिमी जर्मनी, फ्रांस या डेन्मार्क में जितनी असमानता थी, उसके भी मुकाबले काफी कम थी, फिर अमरीका का तो जिक्र ही क्या करना, जहां जाहिर है कि असमानता और भी ज्यादा थी। मिलानोविच के अनुसार, इन समाजवादी अर्र्थव्यवस्थाओं में असमानता के कम रहने के कम से कम तीन कारण थे। इनमें पहला कारण था, बोल्शेविक क्रांति के बाद निजी तथा खासतौर पर सामंती संपत्तियों का बड़े पैमाने पर जब्त किया जाना और उसका किसानों के बीच बांटा जाना। भूमि का ऐसा ही पुनर्वितरण, दूसरे विश्व युद्घ के बाद अनेक पूर्वी योरपीय देशों में भी किया गया था। दूसरा कारक था, इन समाजों में सभी को मुफ्त शिक्षा तथा मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होना। हरेक छात्र को सिर्फ मुफ्त शिक्षा ही नहीं मिल रही थी बल्कि पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति भी दी जाती थी। और चूंकि इन देशों में कोई निजी कॉलेज या विश्वविद्यालय थे ही नहीं, सभी को समान शिक्षा हासिल होती थी और उन्नति के समान अवसर उनके लिए उपलब्ध होते थे। कथित रूप से ‘सम्पन्न’ पृष्ठïभूमि से आने के चलते, कुछ छात्रों को दूसरों से बेहतर मौके हासिल होने का कोई सवाल ही नहीं उठता था। और तीसरा कारक था, गारंटीशुदा रोजगार। सभी के लिए रोजगार सुनिश्चित किया जाता था और इसलिए इसका कोई सवाल ही नहीं उठता था कि कुछ लोग बेरोजगार बने रहें और श्रम की सुरक्षित सेना मुहैया कराएं, जैसाकि पूंजीवाद के अंतर्गत होता है।

समाजवादी अर्थव्यवस्था में निहित है पूर्ण-रोजगार

बहरहाल, ये कारक बेशक महत्वपूर्ण हैं, फिर भी इनसे समाजवादी व्यवस्था के अंतर्गत कहीं ज्यादा समानता होने को पूरी तरह से व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है। इनके साथ ही, समाजवादी व्यवस्था के मूल तर्क को भी जोड़ना होगा, जो असमानता में किसी तरह की बढ़ोतरी होने को रोकता है। अर्थव्यवस्था में हमेशा पूर्ण रोजगार की स्थिति रहना, इन समाजवादी व्यवस्थाओं को ऐसी गतिकी मुहैया कराता था, जो पूंजीवादी व्यवस्था की गतिकी से बुनियादी तरीके से भिन्न थी।

पूंजीवादी व्यवस्था में आय का वितरण, अलग से तथा स्वतंत्र रूप से, मजदूरों और पूंजीपतियों के बीच की सौदेबाजी से तय होता है। इस सौदेबाजी में मजदूरों के हाथ, श्रम की सुरक्षित सेना या बेरोजगारों की फौज की मौजूदगी की वजह से बंधे रहते हैं। बेरोजगारों की यह फौज जितनी ज्यादा बड़ी होती है, पूंजीपतियों से सौदेबाजी में मजदूरों को मजदूरी के रूप मेें हासिल हो पाने वाला हिस्सा, उतना ही कम रहता है।

उत्पाद में से मजदूरों और पूंजीपतियों को स्वतंत्र रूप से मिलने वाले इन हिस्सों के चलते ही, पूंजीवाद के अंतर्गत अधि-उत्पादन का संकट पैदा होता है। अगर मजदूरों का सापेक्ष हिस्सा यानी उनकी वास्तविक मजदूरी तथा श्रम उत्पादकता का भाग-फल, आधा बैठता है और संबंधित अर्थव्यवस्था की कुल उत्पादन क्षमता, 100 इकाई है, तो पूरी क्षमता से उत्पादन होने की सूरत में, 50 इकाई मजदूरों का हिस्सा होगा और 50 इकाई, पूंजीपतियों का। अब मजदूर, अपने हिस्से का कमोबेश पूरी तरह से उपभोग कर लेते हैं, जबकि अगर पूंजीपतियों का उपभोग (जिसमें उनके लग्गे-भग्गों का उपभोग शामिल है) तथा निवेश, मिलकर 40 इकाई ही होता है, उस सूरत में अतिरिक्त उत्पाद में से 40 इकाई के बराबर ही अगले चक्र के लिए हासिल होगा। और चूंकि अतिरिक्त उत्पाद का हिस्सा आधा है, मजदूरों को 40 इकाई हिस्सा ही मिलेगा, न कि 50 इकाई और इससे हासिल कुल उत्पाद, 80 इकाई ही होगा। इसका अर्थ यह है कि संभव उत्पादन में से 20 इकाई उत्पाद पैदा ही नहीं हो रहा होगा और अगर श्रम उत्पादकता 1 मानी जाए तो, पूरे 100 इकाई का उत्पादन होने की सूरत में संबंधित अर्थव्यवस्था में जितने मजदूर बेरोजगार होते, उसके ऊपर से 20 मजदूर और बेरोजगार हो जाएंगे।

न अधि-उत्पादन संकट न बेकारी न असमानता

बहरहाल, अगर समाजवादी अर्थव्यवस्था में, प्रबंधकों समेत सरकारी कार्मिकों का उपभोग 40 इकाई ही रहता है (उस व्यवस्था में कोई पूंजीपति नहीं होते हैं, इसलिए पूंजीपतियों का उपभोग भी नहीं होता है) तो भी उत्पाद 100 इकाई ही यानी पूर्ण उत्पादन क्षमता के स्तर तक ही बना रहेगा और बची हुई राशि बस मजदूरों को दे दी जाएगी।  इस तरह मजदूरों का हिस्सा मूल हिस्से से बढ़ जाएगा और रुपया मजदूरी के सापेक्ष, कीमतों में कमी के जरिए उन्हें 60 इकाई के बराबर हिस्सा मिल रहा होगा। दूसरे शब्दों में समाजवादी अर्थव्यवस्था में मजदूरों का हिस्सा, स्वतंत्र रूप से तय होने के बजाए, अपने आप में लचीला होता है और हमेशा उसे समायोजित किया जाता रहता है ताकि पूर्ण क्षमता पर उत्पाद हासिल किया जा सके।

इस तरह, जहां पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में अपर्याप्त सकल मांग के चलते बेरोजगारी होती है, समाजवादी अर्थव्यवस्था में कभी भी अपर्याप्त सकल मांग की स्थिति पैदा नहीं होती है क्योंकि उसमें मजदूरी के हिस्से का बराबर इस तरह से समायोजन होता रहता है कि उस अर्थव्यवस्था में ऐसी नौबत कभी आती ही नहीं है। इसलिए, उत्पाद में आर्थिक अतिरिक्त उत्पाद का हिस्सा उसी सूरत में लगातार बढ़ता रह सकता है तथा उसी हिसाब से उत्पाद में मजदूरी का हिस्सा बराबर घट सकता है, जब उत्पाद के अनुपात के रूप में निवेश, लगातार बढ़ रहा हो। लेकिन, उस सूरत में भी चूंकि समाजवादी अर्थव्यवस्था में कोई निजी पूूंजीपति होते ही नहीं हैं, जिनके हाथों में उत्पादन के साधनों का स्वामित्व हो, आर्थिक अतिरिक्त मूल्य में यह पूरी की पूरी बढ़ोतरी शासन के ही हाथों में आती है और इसलिए, व्यक्तियों के बीच आय या संपदा की असमानता में कोई बढ़ोतरी नहीं होती है।

इस तरह, समाजवादी व्यवस्था की कार्यविधि का तर्क ही ऐसा है कि वह अधि-उत्पादन के किसी संकट, किसी बेरोजगारी और व्यक्तियों के बीच आय व संपदा की असमानता में बढ़ोतरी की किसी प्रवृत्ति की, गुंजाइश ही नहीं देता है। इतना ही नहीं, इससे पहले वाली भारी असमानतापूर्ण व्यवस्था से, ऐसी उल्लेखनीय रूप से समतापूर्ण व्यवस्था में संक्रमण, बहुत थोड़े से अर्से में ही हो गया था। जैसाकि लॉवसन से संवाद करने वाले एक शख्श ने बताया था: ‘ऐसा भी हुआ कि मां-बाप तो निरक्षर थे और उनके बेटे यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बन गए।’

समाजवादी अर्थव्यवस्था ही मानवीय व्यवस्था है

कुछ लोग मानते हैं कि किसी ऐसे समाज में जिसमें उल्लेखनीय हद तक समानता हो, सृजनशीलता हो ही नहीं सकती है क्योंकि ऐसी समता, सृजनशीलता के लिए प्रोत्साहन को कमजोर कर देती है। लेकिन, यह दलील दो स्वत: स्पष्टीकरण से बिल्कुल गलत है। पहली बात तो यह मानना ही अदूरदर्शितापूर्ण है कि सर्जनात्मक उद्यम का मुख्यस्रोत, आर्थिक प्रोत्साहनों में ही निहित होता है। दूसरे शब्दों में, यह दलील पूंजीवादी व्यवस्था को वैधता प्रदान करने के लिए, मानवीय प्रकृति के संबंध में ही ऐसी पूर्वधारणाओं को स्थापित करने का प्रयास करती है, जो पूंजीवादी व्यवस्था में जो हम देखते हैं, उसी तक मानवीय प्रकृति को सीमित कर देने की कोशिश करती हैं। 

दूसरे, यह दलील इसे पहचानती ही नहीं है कि एक असमानतापूर्ण व्यवस्था में, आम जनता के विशाल हिस्से को अशिक्षित, बेरोजगार, स्वास्थ्य के लिहाज से कमजोर तथा पोषण के लिहाज से वंचित रखे जाने की मनुष्यों की तकलीफों के रूप में जो कीमत अदा करनी पड़ती है उसके अलावा इसके चलते सर्जनात्मकता की भी कितनी भारी हानि होती है! 

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Wealth Inequality: Capitalism Versus Socialism

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