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भारत में बहुआयामी ग़रीबी में गिरावट का सच क्या है?

नेशनल इंस्टीट्यूशन फ़ॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (नीति आयोग) द्वारा जारी बहुआयामी ग़रीबी रिपोर्ट में ख़ामियां हैं और जब हम महामारी के वर्षों सहित पिछले वर्षों के कई आंकड़ों पर विचार करते हैं तो संदेह के द्वार खुलते नज़र आते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर। सोशल मीडिया

18 जुलाई, 2023 को जारी राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक- एक प्रगति समीक्षा 2023 में, नीति आयोग ने बताया है कि भारत में बहुआयामी गरीबी 2015-16 (जब यह 24.85 प्रतिशत थी) और 2019-21 (जब यह 14.96 प्रतिशत रह गई है) के बीच तेजी से गिरावट आई है। 

इससे भी अधिक खुशी इस बात पर जताई गई है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे गरीब राज्यों में बहुआयामी गरीबी में सबसे अधिक गिरावट आई है।

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में कुल मिलाकर 13 करोड़ 5 लाख लोग बहुआयामी गरीबी से उबर गए हैं।

इसके साथ, भारत अब सतत विकास लक्ष्य 1.2 को हासिल करने की राह पर है: “राष्ट्रीय परिभाषाओं के अनुसार, सन 2030 तक, सभी आयामों में गरीबी में रहने वाले सभी उम्र के पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की गरीबी का अनुपात कम से कम आधा हो जाएगा।"

यह आश्चर्यजनक है कि, इस अवधि के दौरान ग्रामीण गरीबी में तेजी से गिरावट दिखाई गई  है, भले ही 2020-21 महामारी का वर्ष वह वर्ष था जब गरीबों को गंभीर रूप से नुकसान उठाना पड़ा था और वे ग्रामीण इलाकों में वापस चले गए थे, जहां से वे बेहतर जीवन और आजीविका की तलाश में शहरी भारत में आए थे।

बहुआयामी गरीबी सूचकांक

यह अभ्यास तीन व्यापक आयामों- स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर पर आधारित बहुआयामी गरीबी सूचकांक के आकलन पर आधारित है। उनमें से प्रत्येक को समान महत्व दिया गया है। इन तीनों को 12 संकेतकों में विभाजित किया गया है- तीन स्वास्थ्य से, दो शिक्षा से और सात जीवन स्तर से जुड़े हैं।

दोहरी कट-ऑफ के इस्तेमाल के आधार पर, बहुआयामी गरीबी की पहचान करने के लिए अल्किरे-फोस्टर पद्धति का इस्तेमाल किया जाता है।

सबसे पहले, प्रत्येक संकेतक के मामले में, एक नमूने के तहत वंचित व्यक्तियों की पहचान की जाती है। प्रत्येक संकेतक के वजन का इस्तेमाल करते हुए, प्रत्येक व्यक्ति के समग्र यानि पूर्ण अभाव के स्कोर को हासिल किया जाता है। एक अन्य कटऑफ (33.3 प्रतिशत) का इस्तेमाल करके बहुआयामी गरीबी की पहचान की जाती है।

फिर पांचवें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएचएफएस5) (2019-21) के आंकड़ों की एनएचएफएस4 (2015-16) के आंकड़ों से तुलना करके बहुआयामी गरीबी में आए बदलाव को हासिल किया गया है।

एनएचएफएस5 दो वर्षों में दो सर्वेक्षणों पर आधारित है। यह अजीब है क्योंकि 2020-21 महामारी के कारण एक असामान्य वर्ष था। नीति आयोग की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि 70 प्रतिशत डेटा महामारी से ठीक पहले, 2019-20 में एकत्र किया गया था।

अगर ऐसा होता तो 2019-20 के आंकड़ों की तुलना 2015-16 के आंकड़ों से की जा सकती थी। फिर इसे एक असामान्य वर्ष के साथ क्यों मिलाया गया जिसमें अधिकांश डेटा संग्रह प्रभावित हुआ था?

दो बिल्कुल अलग-अलग वर्षों का औसत कोई मायने नहीं रखता है। 2019-20 का डेटा 2020-21 की महामारी और लॉकडाउन वर्ष का प्रतिनिधित्व करने के लिए काफी नहीं है। यह आगामी वर्षों, विशेषकर 2021-22 का भी प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है, क्योंकि महामारी के कारण अर्थव्यवस्था को लगा झटका अभी भी जारी है।

आधिकारिक तौर पर, जीडीपी 2022-23 में ही 2019-20 के पूर्व-महामारी स्तर (4.8 प्रतिशत) तक पहुंच गई थी।

इस प्रकार, विकास के तीन साल नष्ट हो गए और अर्थव्यवस्था लगभग 10 प्रतिशत नीचे चली गई थी, जहां यह 2022-23 में हो सकती थी यदि महामारी नहीं आई होती।

अंततः, यह संगठित क्षेत्र है जो संकट से उबर गया जबकि असंगठित क्षेत्र, जहां ज्यादातर गरीब काम करते हैं, मुश्किल से उबर पाया है लेकिन डेटा इस हक़ीक़त को पकड़ने में नाकामयाब रहे हैं। 

2020-21 में महामारी के दौरान गरीबों की स्थिति

2020-21 के लिए डेटा जनवरी 2020 से अप्रैल 2021 तक एकत्र किया गया था। यह वह समय था जब भारत में कोरोनोवायरस की पहली और दूसरी बहुत गंभीर लहर चल रही थी। यह वह वक़्त था जब गरीब शहरों से ग्रामीण इलाकों की ओर बड़े पैमाने पर पलायन/प्रवासन कर रहे थे। क्योंकि उनके काम छूट गए थे और उनके पास कोई आय का साधन नहीं था। वे घर का किराया चुकाने या भोजन खरीदने में असमर्थ थे।

कई लोग बीमार पड़ गए और उन्हें इलाज के लिए भारी खर्च करना पड़ा, जिसके लिए उन्होंने भारी ब्याज दरों पर कर्ज़ लिया। कई लोगों की मौत हो गई, जैसा कि अस्पतालों के बाहर, एंबुलेंसों में मर रहे लोगों और नदियों में तैरते शवों की तस्वीरें बताती हैं। इनमें से कई मौतों को तो दर्ज ही नहीं किया गया था। 

वैश्विक स्तर पर, कोविड से होने वाली मौतों की संख्या गिनना एक चुनौती भरा काम था।  भारत में, जन्म और मृत्यु को पंजीकृत करने की कमजोर प्रणाली को देखते हुए यह समस्या गंभीर थी, जो कि बहुत कमजोर ग्रामीण और अर्ध-ग्रामीण स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे का परिणाम था।

लॉकडाउन के दौरान बड़ी संख्या में छोटे और सूक्ष्म व्यवसाय बंद हो गए थे, उनमें से कई स्थायी रूप से बंद हो गए थे। जो लोग बाद में खुद को पुनर्जीवित करने में कामयाब रहे, वे अनौपचारिक मुद्रा बाजारों से अत्यधिक ब्याज दरों पर लिए गए ऋणों के कारण भारी कर्जदार हो गए थे।

ऐसी इकाइयों के बंद होने का मतलब न केवल श्रमिकों के लिए बल्कि मालिकों के लिए भी काम और आय का स्थायी नुकसान था। 

अमीर हो या गरीब बच्चों की शिक्षा रुक गई थी। स्कूल बंद कर दिए गए थे। जहां संभव हुआ, ऑनलाइन कक्षाएं आयोजित की गईं थीं। इसके लिए स्मार्टफोन और लैपटॉप होना जरूरी था, जिसका मतलब था कि गरीब बच्चे अब शिक्षा का खर्च नहीं उठा सकते थे।

महामारी के दौरान जो लोग ग्रामीण इलाकों में चले गए, उनके बच्चों को स्कूल न जाने की वजह से अधिक नुकसान उठाना पड़ा था।

साथ ही, बच्चों के लिए निर्देश हासिल करने के लिए लगातार छोटे स्क्रीन के सामने लंबे समय तक बैठना कठिन होता था। न केवल भारत में, बल्कि अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी बच्चों के संज्ञानात्मक कौशल में स्थायी असफलताओं की पर्याप्त रिपोर्टें आई हैं।

संक्षेप में, 2020-21 के महामारी वर्ष के दौरान, गरीबों को आय, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य मानकों को भारी झटका लगा था।

इन हालातों में, 2015-2016 की तुलना में बहुआयामी गरीबी में इतनी तेज गिरावट दिखाने वाले आंकड़ों की विश्वसनीयता पर संदेह उठना लाजिमी है।

स्थिति लगभग उस अविश्वसनीय आधिकारिक डेटा के समान है जो 2016-17 के दौरान दशक की उच्चतम जीडीपी वृद्धि दर को दर्शाता है, जिस वर्ष हम पर नोटबंदी थोपी गई थी।

डेटा से जुड़ी समस्याएं

यहां तक कि प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्यों ने भी डेटा की विश्वसनीयता पर संदेह जताया है। उनके अनुसार, अधिकांश सर्वेक्षणों में इस्तेमाल किया गया नमूना गलत है क्योंकि इसे 2011 की जनगणना से लिया गया है।

सदस्यों का तर्क है कि 2011 की जनगणना से लिए गए नमूनों में हाल के बड़े बदलाव पकड़ में नहीं आ रहे हैं। हालाँकि, भले ही 2021 की जनगणना समय पर हुई हो, 2020-21 में एनएचएफएस सर्वेक्षण के लिए बहुत देर हो चुकी होगी। एनएचएफएस को अभी भी 2011 की जनगणना पर निर्भर रहना होगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि 2020-21 के लिए एकत्र किया गया डेटा प्रतिनिधि नहीं हो सकता, भले ही महामारी न आई होती।

सरकार जनगणना में अनावश्यक देरी क्यों कर रही है?
हाँ, 2021 में जारी महामारी के कारण जनगणना कराना कठिन था, हालाँकि जनगणना की तैयारी पहले ही शुरू कर दी गई थी।

लेकिन अगर चुनाव कराए जा सकते थे, तो जनगणना 2022 या 2023 में की जा सकती थी, जब महामारी समाप्त हो गई थी और गतिशीलता बहाल हो गई थी।

बेहतर नीति निर्माण के लिए जनगणना एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसके लिए सही डेटा की आवश्यकता होती है।

क्या ऐसा हो सकता है कि सरकार इस बात से चिंतित हो कि 2022 या 2023 में डेटा संग्रह से देश के सामाजिक-आर्थिक मापदंडों पर महामारी का प्रतिकूल प्रभाव सामने आ गया होता?

मैक्रो डेटा पहले से ही संदेह के घेरे में है क्योंकि बड़े पैमाने पर असंगठित गैर-कृषि क्षेत्र (जीडीपी का 30 प्रतिशत और कार्यबल के 48 प्रतिशत को रोजगार वाले डेटा) को स्वतंत्र रूप से मापा नहीं गया है।

बढ़ते संगठित क्षेत्र का इस्तेमाल प्रॉक्सी के रूप में किया जाता है क्योंकि यह उत्पादन और आय डेटा को ऊपर की ओर झुकाता है। इसके परिणामस्वरूप अन्य मैक्रो वैरिएबल्स- उपभोग, बचत, निवेश इत्यादि में ऊपर की ओर झुकाव होता है। ऐसे डेटा में गरीबी में गिरावट दिखाई देगी लेकिन इसका हक़ीक़त से कोई वास्ता नहीं होता है। यह केवल सरकार को वह नहीं करने का बहाना देता है जो उसे करना चाहिए।

अंत में, एनएचएफएस में व्यक्तिगत वेरियबल पर डेटा न केवल महामारी के प्रभाव के कारण संदिग्ध है, जैसा कि ऊपर तर्क दिया गया है, बल्कि इस आधार पर भी है कि आधिकारिक डेटा अक्सर सही तस्वीर पेश नहीं करता है।

उदाहरण के लिए, एक घर में बिजली और रसोई गैस आ सकती है लेकिन बिजली की आपूर्ति अनियमित हो सकती है और गैस सिलेंडर उनकी उच्च लागत के कारण नहीं भरा जा सकता है। बाल और किशोर मृत्यु दर न केवल अभाव के कारण बल्कि कई बीमारियों के कारण भी अधिक हो सकती है।

यदि शिक्षक अनुपस्थित है या मुश्किल से पढ़ाता है तो एक बच्चा औपचारिक रूप से स्कूल में हो सकता है लेकिन प्रभावी ढंग से पढ़ नहीं रहा होता है। शिक्षा की वार्षिक स्थिति रिपोर्ट सीखने के एक बड़े अंतर की ओर इशारा करती है लेकिन इस पर भी ध्यान नहीं दिया जाता है।

गरीबी की रेखा 

2012 के बाद उपभोग सर्वेक्षण न होने के कारण सरकार गरीबी का सही आकलन नहीं कर पा रही है। विश्व बैंक के अनुसार, वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा क्रय शक्ति समता (पीपीपी) के संदर्भ में प्रति व्यक्ति प्रति दिन 2.15 अमेरिकी डॉलर है। इसका अर्थ है लगभग 26,500 रुपए प्रति परिवार प्रति माह। चूंकि यह पीपीपी शर्तों में है, इसलिए इसकी राशि प्रति परिवार प्रति माह लगभग 9,000 रुपए बैठती है। 

पीपीपी विभिन्न देशों में विशिष्ट वस्तुओं की कीमत का एक माप है और इसका इस्तेमाल देशों की मुद्राओं की पूर्ण क्रय शक्ति की तुलना करने के लिए किया जाता है।

ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत 28 करोड़ श्रमिकों में से 94 प्रतिशत ने मासिक आय 10,000 रुपए से कम घोषित की है। इससे पता चलता है कि असंगठित क्षेत्र के अधिकांश श्रमिक गरीबी की रेखा के करीब हैं।

दुर्भाग्य से, पीपीपी के आधार पर चीजों को मापना गरीबों पर दोहरी मार है। क्योंकि उनकी सेवाएँ सस्ती हैं, रुपये की क्रय शक्ति अधिक है। लेकिन चूँकि वे अपने द्वारा प्रदान की जाने वाली अधिकांश सेवाओं का इस्तेमाल नहीं करते हैं; उन्हें उच्च क्रय शक्ति से लाभ नहीं होता है।

इस प्रकार, गरीबों के लिए, न केवल पीपीपी शर्तें प्रासंगिक नहीं हैं, बल्कि वे उनकी वास्तविक गरीबी को छिपा देती हैं। उनके लिए 'नाममात्र डॉलर' का मीट्रिक अधिक उपयुक्त है। इस प्रकार, अधिकांश असंगठित क्षेत्र गरीबी रेखा से काफी नीचे है।

नाममात्र डॉलर (जिसे वास्तविक डॉलर भी कहा जाता है) किसी दिए गए वर्ष में खर्च या अर्जित धन की वास्तविक राशि का प्रतिनिधित्व करता है।

निष्कर्ष

संक्षेप में, नीति आयोग की बहुआयामी गरीबी रिपोर्ट, 2023 के निष्कर्षों की पुनर्व्याख्या करने की जरूरत है। उपर्युक्त कमियों के अलावा, स्वास्थ्य और शिक्षा संकेतक ही हैं जिनका बहुआयामी गरीबी सूचकांक में सबसे अधिक योगदान है, जिनका महामारी वर्ष 2020-21 में सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ा था।

एनएचएफएस5 के डेटा में अशुद्धियों के कारण सर्वेक्षण के आधार पर अभाव सूचकांक में पर्याप्त त्रुटियां हुई होंगी, जिससे नीति आयोग की रिपोर्ट के निष्कर्ष संदेह के दायरे में आ गए हैं।

प्रोफेसर अरुण कुमार जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं। वे ‘डिमोनीटाईजेशन एंड ब्लेक एकोनोमी’ (2018, पेंगुइन रैंडम हाउस) के लेखक हैं। उनका ब्लॉग http://arunkumarjnu.blogspot.com/ है। व्यक्त विचार निजी हैं।

सौजन्य: द लीफ़लेट 

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:

Is Decline in Multidimensional Poverty in India Real?

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