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मुद्दा: ग़ज़ा पर इज़रायल के हमले का एक वैकल्पिक नज़रिया

सम्राज्यवाद की एक मुकम्मल जाँच पड़ताल इन रहस्यों को बेनकाब करती है और तब ये मूल्य ऐतिहासिक व्यख्या का आधार होने की बजाय खुद को ऐतिहासिक व्यख्या के लिए पेश करते हैं।
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फ़ोटो साभार : AP

इज़रायल द्वारा ग़ज़ा में किये जा रहे हमले और नरसंहार का मसला चर्चा में है। दुनियाभर के प्रगतीशील दायरे में आज इज़रायल की निंदा हो रही है। ‘पश्चिमी सभ्यता’ और ‘ज़िओनिज्म’ से निकलने वाले मूल्य चर्चा के केंद्र में हैं। यही वही मूल्य है जिनकी बुनियाद पर इज़रायल अपनी कार्यवाइयों को जायज करार देता है। इसलिए इन मूल्यों की आलोचनाओं की अपनी एक अहमियत है। मगर इन मूल्य आधारित आलोचनाओं में औपनिवेशिक प्रकिया की छानबीन सिरे से गायब है।

ऐसे में मेरी नजर एक ऐसे लेख पर गयी है जो इसी प्रक्रिया को केंद्र में रख कर लिखा गया है। यह लेख 2015 में साल के शुरुवात में टॉमडिस्पैच में ‘ग्रेट गेम इन होली लैंड’ के नाम से लिखा गया था। मगर यह आज और भी ज्यादा प्रसांगिक है।

एक ही कहानी हर जगह हर बार

यह बात लोगों से छुपी नहीं है कि पश्चिम एशिया में अमेरिकी हमले वहां के तेल और प्राकृतिक गैस पर कब्ज़ा ज़माने के मकसद से किये गाए हैं। और इसे उसी व्यापक नीति की एक मिसाल माना जाएगा जिसे उपनिवेशवाद कहा जाता है।

“बेशक, संसाधनों के लिए युद्ध कोई नई बात नहीं है। दरअसल पश्चिमी उपनिवेशवाद और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की वैश्वीकरण का पूरा इतिहास औद्योगिक पूंजीवाद के निर्माण या रखरखाव के लिए आवश्यक कच्चे माल और बाजार को खोजने के प्रयासों से प्रेरित रहा है।”

मगर जब इज़रायल और फ़िलिस्तीन का मसला हमारे सामने आता है तो अक्सर इस मामले में सभ्यतायों के फर्क की बुनियाद पर गढ़ें गए सास्कृतिक विमर्श साम्राज्यवाद के आर्थिक विशलेषण पर भारी पड़ते नजर आतें हैं। और लगता है की पश्चिम एशिया के अन्य मामले से अलग यह एक खास मसला है। मगर लेख के शुरुआत में ही स्पष्ट कर दिया गया है की इज़रायल और फिलिस्तीन के बीच भी प्राकृतिक गैस को लेकर एक ऐसा ही मसला मौजूद है।

 “क्या आपको इस बात का अंदाज़ा है कि पश्चिम एशिया में जंग, विद्रोह और कई दूसरे कलह एक ही धागे से जुड़े हुए हैं, जो एक नए खतरे की आहट भी हैं? ये संघर्ष जीवाश्म ईंधन को खोजने, उन्हें निकालाने और बाजार तक उन्हें ले आने की बढ़ती हुई जुनूनी प्रतिस्पर्धा का हिस्सा हैं, और जिनकी खपत विनाशकारी पर्यावरणीय संकटों की गारंटी है। जीवाश्म-ईंधन को लेकर इस क्षेत्र में कई संघर्ष चल रहें हैं,  इनमे से एक के केंद्र में इज़रायल है जिसे काफी हद तक नजरंदाज किया गया है, जो कई छोटे और बड़े खतरों से लबरेज है।”
 
इज़रायल के ग़ज़ा पर किये गए हालिया हमले पर हो रही चर्चाओं में यह मामला गायब है। 1990 के दशक में ग़ज़ा के समुद्र तट पर गैस मिलने की संभावना थी। मगर तब तक यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं था, इसलिए ओस्लो एग्रीमेंट पर इस संभावना का कोई फर्क नहीं पड़ा। मगर साल 2000 में ब्रटिश गैस (बीजी) कंपनी की छानबीन की बुनियाद पर यह आशंका सच साबित हुई।

उदारीकरण के दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ‘उदारता’

अगर साम्राज्यवाद बुनयादी तौर पर एक सांस्कृतिक परिघटना है तो  इसका माकूल जवाब सिर्फ और सिर्फ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही हो सकता है। नवउदारवादी दौर में यह नजरिया उन सरकार के लिए काफी कारगर सिद्ध होगा जहाँ साम्राज्यवाद के विरोध की राजनीति को सिर्फ सांस्कृतिक दायरे तक सीमित कर दिया गया हो, और अपने कच्चे मालो को कौड़ियों के भाव पर लुटने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों को निवेश के लिए बुलाया जा रहा है। ऐसे में नवउदारवादी सरकारों को यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एक अदद सुविधा देता है। वे आसानी से ‘सांस्कृतिक वि-औपनिवेशीकरण’ के नारे के तहत ऐसे समझौतें कर सकते हैं जिसे उदारीकरण कहा जाता है। क्योंकि साम्रज्यवाद अब सिर्फ एक सांस्कतिक मसला है। यह जानना काफी ज्ञानवर्धक होगा की ऐसे समझौतों की शर्ते क्या होती हैं। चलिये  आइये हम जानते हैं कि फ़िलिस्तीन और खास तौर से ग़ज़ा के मसले पर समझौते के शर्त क्या थी।

“बीजी ने 90% राजस्व की हिस्सेदारी के बदले में उनके विकास को वित्तपोषित करने, उसका रख-रखाव  करने और सभी लागतों को वहन करने का वादा किया। यह एक शोषणकारी मगर  "लाभ के बंटवारें" के खास प्रचलन के तहत किया गया समझौता था। मिस्र जिसके पास पहले से ही प्राकृतिक गैस से जुड़े हुए उद्योग मौजूद थे, गैस के लिए तट पर एक हब और पारगमन बिंदु (ऐसी जगह जहाँ से सारी पाइप लाइन गुजरेंगी) बनने के लिए सहमत हुआ। सौदे के मुताबिक फ़िलिस्तीनियों को राजस्व का 10% (कुल अनुमान के मुताबिक लगभग एक अरब डॉलर) दिया जाना था और उनकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें पर्याप्त गैस देने की गारंटी की गयी थी।”
 
ओस्लो एग्रीमेंट का ख़ात्मा 
 
लेकिन फ़िलिस्तीनी जनता पर जुल्मों का मामला यहाँ ख़त्म नहीं होता। इज़रायल अब तक ग़ज़ा के प्राकृतिक गैस से बेपरवाह था “क्योंकि तब कीमतें काफी कम और आपूर्ति बहुत ज्यादा थी”।  मगर समय के साथ चीज़े बदला गयी। इज़रायल अब ऊर्जा संसाधनों की तंगी से जूझ रहा मुल्क था।  इसलिए अब वह ग़ज़ा के गैस का नया दावेदार बनकर सामने आया। 
 
“उन्होंने (एहूद बराक सरकार) ग़ज़ा के तटीय जल पर इज़राइली नौसैना का नियंत्रण कायम किया और बीजी के साथ समझौता रद्द कर दिया। इसके बजाय, उन्होंने मांग की कि इजराइल, न कि मिस्र , ग़ज़ा के गैस का हिस्सेदार रहेगा और वह फिलिस्तीनियों के लिए तय सभी राजस्व को भी नियंत्रित करेगा- ताकि इस पैसे से "आतंकवाद को वित्त पोषित करने" के किसी भी कोशिश को नाकाम किया जा सके।”
 
और इस दावेदारी का एक ही मतलब था।
 
“इसके साथ ही ओस्लो समझौता आधिकारिक तौर पर ख़त्म हो गया। गैस के राजस्व पर फ़िलिस्तीनी नियंत्रण को नामंजूर करके, पूर्ण संप्रभुता तो दूर की बात थी इज़रायली सरकार ने खुद को इस बात के लिए प्रतिबद्ध कर लिया कि वह फ़िलिस्तीनी बजटीय स्वायत्तता के सबसे सीमित रूप को भी मानने से इंकार करेगा।”

 
ब्रटिश हस्तक्षेप और इजरायली प्रस्ताव 
 
ब्रिटिश गैस कंपनी इस मामले को आगे बढ़ने की इच्छुक थी। इस लिए यह स्वाभाविक था कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेअर ने  इस मसले को सुलझाने के मकसद से अपनी तरफ से पहलकदमी की। मगर ऐसे मौके पर फ़िलिस्तीनियों की संप्रभुता के पक्ष में खड़े होने की बाजाय उन्होंने ऐसा प्रस्ताव सामने रखा जिससे फ़िलिस्तीनीयों पर आर्थिक निगरानी और कड़ी हो सके।
 
“इज़रायली वीटो की वजह से ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर को हस्तक्षेप करना पड़ा, जिन्होंने दोनों पक्षों के बीच एक ऐसा समझौता कराने का प्रयास किया जिससे इज़रायली सरकार और पलस्टीनियन अथॉरिटी दोनों को सहमत किया जा सके। इसका नतीजा: 2007 में एक ऐसे प्रस्ताव की शक्ल में सामने आया जिसके अनुसार बाजार से कम कीमतों पर गैस मिस्त्र को नहीं बल्कि इज़राइल को दी जाएगी, और आखिरकार राजस्व का 10% पीए के हिस्से में जायेगा। हालाँकि,  भविष्य में वितरण के लिए उन फंडों को पहले न्यूयॉर्क के फेडरल रिजर्व बैंक को दिया जाना था, ताकि इसे सुनिश्चित किया जा सके कि उनका उपयोग इज़राइल पर हमलों के लिए नहीं किया जाएगा।”
 
हालांकि इस प्रस्ताव में सब कुछ इज़रायल के पक्ष में था मगर इज़रायल अब भी नाखुश था।
 
“इज़रायली अब भी इस फैसले से संतुष्ट नहीं थे, उन्होंने हाल ही में हुए ग़ज़ा के चुनावों में उग्रवादी हमास पार्टी की जीत का हवाला देकर इसे डील-ब्रेकर पहल बताया। हालाँकि हमास ने फेडरल रिजर्व द्वारा सभी खर्चों की निगरानी पर अपनी सहमति व्यक्त की थी, लेकिन अब एहुद ओलमर्ट के नेतृत्व वाली इज़रायली सरकार ने जोर देकर कहा कि "फ़िलिस्तीनियों को कोई रॉयल्टी नहीं दी जाएगी।" इसके बजाय, इज़राइली सरकार "वस्तुओं और सेवाओं के रूप में" उन राशियों का भुगतान करेगी।”
 
ग़ज़ा की आर्थिक नाकाबंदी और ग़ज़ा पर हमले 
 
जाहिर है कि यह प्रस्ताव फ़िलिस्तीन के किसी भी सियासी पक्ष को मंजूर नहीं था। इज़रायल ने तब अपनी बात मनवाने के लिए एक नई रणनीति निकली।
 
“इस प्रस्ताव को फ़िलिस्तीनी सरकार ने अस्वीकार कर दिया। इसके तुरंत बाद, ओलमर्ट ने ग़ज़ा पर कठोर नाकाबंदी लगा दी, इज़राइल के रक्षा मंत्री के अनुसार यह "'आर्थिक युद्ध'' का ही एक रूप था, जिसका मकसद एक राजनीतिक संकट को पैदा करना था, जिससे हमास के खिलाफ एक लोकप्रिय विद्रोह हो सके। मिस्र के सहयोग से, इज़राइल ने ग़ज़ा के अंदर और बाहर सभी प्रकार के वाणिज्य पर अपना नियंत्रण कायम कर लिया, यहां तक कि उसने खाद्य पदार्थों के आयात पर भी गंभीर रूप से पाबंदी लगा दी और उनके मतस्य (मछली) उद्योग को समाप्त कर दिया। ओलमर्ट के सलाहकार डोव वीसग्लास ने इस एजेंडे को संक्षेप में बताया, जिसके मुताबिक इज़रायली सरकार फ़िलिस्तीनियों को "अल्पाहार (डाइट) " के लिए मजबूर कर रही थी (जो, रेड क्रॉस के अनुसार, जल्द ही "स्थायी कुपोषण" में तब्दील हो रहा था, खासकर ग़ज़ा के बच्चों के बीच यह तेजी से फैल रहा था)।”
 
मगर फ़िलिस्तीनी जनता इसपर भी झुकाने को तैयार नहीं थी। तब इज़रायल सरकार ने यह फैसला लिया की फ़िलिस्तीनीयों की रजामंदी के बगैर ही वह इन गैसों का दोहन करेगा। मगर यह हमास को पूरी तरह से नेस्तोनाबूद किया बिना मुमकिन नहीं था।
 
“जैसा कि पूर्व इज़राइली रक्षा बल के कमांडर और वर्तमान विदेश मंत्री मोशे या'लोन ने समझाते हुए कहा, “हमास ने… इज़रायल के रणनीतिक गैस और बिजली प्रतिष्ठानों पर बमबारी करने की अपनी क्षमता की पुष्टि की है… यह स्पष्ट है कि, एक सैन्य अभियान के तहत ग़ज़ा पर हमास के नियंत्रण को समाप्त करने से पहले कोई भी यहाँ कट्टरपंथी इस्लामी आंदोलन की सहमति के बिना ड्रिलिंग का काम नहीं कर सकता।””
 
और इसके बाद से इज़रायल के हमले का सिलसिले आज तक चल रहा है। लेख के आखिर में इस दोहराव की भविष्यवाणी की गई है।
 
“25 वर्षों और पांच असफल इज़रायली सैन्य प्रयासों के बावजूद, ग़ज़ा की प्राकृतिक गैस अभी भी पानी के नीचे है और, चार वर्षों के बाद, लगभग सभी लेवेंटाइन गैस की यही नियती है। लेकिन चीजें वैसी नहीं हैं। ऊर्जा के मामले में, इज़राइल आज और भी अधिक हताश है, भले ही वह अपनी नौसेना सहित अपनी सेना तैयारी पर वह बड़ी गंभीरता से जोड़ दे रहा है। उधर दूसरी और, अन्य दावेदारों को भी बड़े और अधिक शक्तिशाली साझेदार मिल गए हैं जो उनकी आर्थिक और सैन्य दावेदारी को मजबूती दे सकते हैं। बेशक इन सबका  मतलब है कि इस सदी के पहली एक चौथाई पूर्वी भूमध्यसागरीय प्राकृतिक गैस पर संकट एक प्रस्तावना के अलावा और कुछ नहीं है। आगे गैस के लिए बड़े युद्धों की संभावना है और उनके द्वारा मचने वाली तबाही की भी पूरी संभावना है।“
 
लेख वर्तमान और ग्लोबल सन्दर्भ में 
 
लेख की अपनी सीमा है। लेख के भीतर यह मान्यता मौजूद है कि इज़रायल के सारे सैन्य अभियान और आर्थिक नाकाबंदी का मकसद खुद को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्म-निर्भर बनाना है। अगर यह सच है तो जाहिर है कि हमें यह मानने के लिए मजबूर होना होगा कि ज़िओनिज्म साम्रज्यवाद से एक हद तक स्वायत परियोजना है। लेकिन बात यहीं ख़त्म नहीं होती। ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर होने की मसले पर दिया गया अत्यधिक जोड़ हमें तकनीकवादी विश्लेषण की ओर ले जाती  है और साम्रज्यवादी/ उपनिवेशवाद से जन्मी समस्या एक तकनीकी समस्या बन जाती है। लेख यह प्रस्तावित करता हुआ नजर आता है कि इज़रायल ने ऊर्जा संसाधनों की अपनी जरुरतें  को पूरा करने के लिए अन्य तकनीकों के ऊपर प्राकृतिक गैस को तरजीह दी जिसके कारण यह संकट पैदा हो रहा है, जो कि इस लेख का सबसे कमजोर पहलु है। 
 
“हालाँकि, 2000 में, एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में, जीवाश्म ईंधन की कमी और अपने तेल-समृद्ध पड़ोसियों के साथ खराब संबंधों के कारण इज़रायल ने खुद को एक पुरानी समस्या, ऊर्जा-संसाधनों की तंगी, से जूझता हुआ पाया। ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों को विकसित करने के आक्रामक लेकिन व्यवहारिक प्रयास के माध्यम से इस समस्या का समाधान करने के बजाय, प्रधानमंत्री एहुद बराक ने एक ऐसा रास्ता चुना जिसने पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में जीवाश्म ईंधन के लिए संघर्ष की एक नए युग की शुरुआत की... स्टार्ट-अप हाई-टेक फर्मों से भरे इस देश में अभी भी नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के दोहन पर गंभीरता से विचार नहीं किया जा रहा है...”
 
हालांकि इस लेख में अमेरिका, ब्रिटेन और इज़रायल की इस मसले पर साझेदारी पर जोर दिया गया है फिर भी आत्मनिर्भरता का तर्क कहीं ना कहीं मामले को स्थानीय बना देता है। ऐसे में ये सवाल वाजिब है कि आखिर यूरोप क्यों ग़ज़ा में चल रहे नरसंहार की अनदेखी करते हुए इज़रायल के साथ खड़ा खड़ा है? ऐसा लगता है कि यूरोप का इज़राइल के साथ खड़ा होना सभ्यता या संस्कृति का मसला है। इसलिए मौजूदा समय में ‘पश्चिम’ और ‘ज़िओनिज्म’ जैसी धारणाओं का चर्चा के केंद्र में होना लाजिम है। एक बार फिर हमारे सामने सांस्कृतिक/सभ्यता आधारित वर्चस्व का तर्क सर उठाने लगता है। आइये जरा इस मसले को आज के और ग्लोबल संदर्भो में उभरे हुए नए तथ्यों की रौशनी में देखा जाए।
 
आज इज़रायल प्राकृतिक गैस के मामले में न केवल आत्म-निर्भर है बल्कि वह इसका निर्यातक भी है। इसलिए सिर्फ ऊर्जा की तंगी और इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने की महत्वाकांक्षा के आधार पर इन युद्धों को नहीं समझा जा सकता। फिर यह सवाल वाजिब तौर पर उठता है कि आखिर इज़रायल ग़ज़ा पर हमले की इतनी जहमत क्यों उठा रहा है ? रूस-यूक्रेन जंग ने यूरोप के सामने प्राकृतिक गैस का एक नया संकट पैदा किया है। यूरोपीय यूनियन के देश रूस से 2021 तक 40% प्राकृतिक गैस का आयात करते थे। यूरोप रूस की चुनौती का सामना किये बिना यूरोपीय यूनियन के तहत पूर्वी यूरोप में अपना विस्तार नहीं कर सकता। मगर समस्या ये है कि यूरोपीय यूनियन के ज्यादातर देश रूस पर गैस और तेल के लिए निर्भर हैं। गैस और तेल के  मामले में अमेरिकी वर्चस्व को आज रूस से कड़ी चुनौती मिल रही है। प्राकृतिक गैस और तेल के मामले में रूस का विकल्प मुहैया कराए बिना अमेरिका रूस के खिलाफ यूरोप को अपने पक्ष में नहीं ला सकता। इस वजह से यूरोप और अमेरिका को गैस के वैकल्पिक भण्डारों की तलाश है। गैस के एक ऐसे ही विकल्प की खोज का नतीजा था इज़रायल-तुर्कीये गैस पाइप लाइन परियोजना। ग़ज़ा पर अपने इस हमले के बीच में ही इज़रायल ने छे कंपनी को भूमध्य सागर के तट पर गैसों की खोज-बीन के लिए लाइसेंस जारी किये हैं। जिसमे इटली के एनी और ब्रटिश की बीपी प्रमुख है। एक दूसरी परियोजना में इज़रायल के साथ फ़्रांस की कंपनी टोटल शामिल है। इन भिन्न-भिन्न परियोजनाओ से अलग साझे तौर पर भी यूरोपीय यूनियन ने 2020 में इज़रायल के साथ प्राकृतिक गैस की डील पर हस्ताक्षर की थी। इसलिए इस मसले पर यूरोप का इज़रायल के साथ खड़ा होना लाजिम है। 
 
‘ज़िओनिज्म’ और ‘पश्चिमी सभ्यता’
 
दरअसल ऊर्जा के क्षेत्र में इज़रायल के आत्मनिर्भर होने की महत्वकांक्षा का ‘सच’ ज़िओनिज्म की साम्रज्यवाद से स्वायत्ता को साबित नहीं करता। बल्कि बात उल्टी है। यह विचार कि ज़िओनिज्म साम्रज्यवाद से एक स्वायत्ता परियोजना है, एक फेटिश विचार है, जिससे ऊर्जा के क्षेत्र में इज़रायल के आत्मनिर्भर होने की महत्वकांक्षा सारी चीजों की वजह लगने लगती है और अब इस बुनियाद पर सारी  छानबीन शुरु होती है। जिसका एक नतीजा यह होता है कि लेख इजरायल और हमास के स्थानीय विवाद का ब्यौरा बन जाती है। यह भ्रम पैदा होता है कि एक बेहतर तकनीक (ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों) इस विवाद को सुलझा सकती है। जबकि बुनयादी मसला फ़िलिस्तीनी संसाधनों पर साम्राज्यवादी ताकतों के कब्जे का है। लेख में जैसे ही इसे नजरदांज किया जाता है, हमास और उस जैसी अन्य ताकतें इजराइल और ज़िओनिज्म के विरोध तक सीमित नजर आती हैं। साम्रज्यवाद विरोधी ताकतों के रूप में उनकी शिनाख्त नहीं हो पाती। ज़िओनिज्म के मूल्यों तक सीमित आलोचना फिर से एक नई जमीन पा लेती है।  

ठीक इसी तरह पश्चिमी सभ्यता साम्रज्यवादी एकता का आधार नहीं है। बल्कि यह एकता साम्रज्यवादी हितों का नतीजा है, जो अतीत में समय के साथ बनते और बिखरते रहें है। ‘पश्चिम सभ्यता’ की बुनियाद पर की गयी व्यख्याएं भी एक फेटिश नजरिए को जन्म देती है। जहाँ पश्चिमी मीडिया में इज़रायल के तरफदार इसे लिबरल वैल्यूज बताकर महिमामंडित कर रहे होते हैं वह दूसरी और इसके आलोचक इसे पश्चिमी पूर्वाग्रह बताकर ख़ारिज कर रहे होते हैं। मगर ये मूल्य युद्ध की मूल वजह हैं, पक्ष और विपक्ष दोनो में यह साझी धारणा मौजूद होती है। एक ऐसी धारणा जो पश्चिम एशिया के हर ऐतिहासिक घमासान को समझाने की कुंजी पेश करती है। सम्राज्यवाद की एक मुकम्मल जाँच पड़ताल इन रहस्यों को बेनकाब करती है और तब ये मूल्य ऐतिहासिक व्यख्या का आधार होने की बजाय खुद को ऐतिहासिक व्यख्या के लिए पेश करते हैं।  
 
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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