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रुपए की रिकॉर्ड गिरावट के लिए जिम्मेदार वे कारण जिनका जिक्र सरकार नहीं करेगी

एक डॉलर के लिए तकरीबन 80  रुपये देने पड़ेंगे। जनवरी 2022 के बाद डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमतों में 7 प्रतिशत की गिरावट हुई है।  सरकार कह रही है कि इसके लिए रूस-यूक्रेन लड़ाई जिम्मेदार है, लेकिन इससे ज्यादा जिम्मेदार भारत की आर्थिक नीतियां हैं।
rupee vs dollar

एक डॉलर के लिए तकरीबन 80  रुपये देने पड़ेंगे। मतलब अगर विदेशों से कोई सामान और सेवा खरीदना होगा तो उसके लिए अस्सी रुपये का भुगतान करना पड़ेगा। ठीक इसका उल्टा भी होगा। यानि अगर कोई सामान और सेवा विदेशों को निर्यात की जायेगी तो उसके लिए पहले के मुकाबला ज्यादा पैसा मिलेगा। अब आप यहां पर कहेंगे कि यह तो अच्छी बात है। निर्यात करने पर भारत को विदेशों से ज्यादा पैसा मिलेगा।  

लेकिन यहां समझने वाली बात है कि भारत की अर्थव्यवस्था चालू खाता घाटे वाली व्यवस्था है। भारत में आयात, निर्यात से अधिक होता है। यानी भारत से कॉफी, मसाले जैसे सामान और तकनीकी सेवाओं का जितना निर्यात होता है, उससे कई गुना अधिक आयात होता है। भारत में विदेशी व्यापार हमेशा नकारात्मक रहता है। रूस यूक्रेन युद्ध की वजह से  पूरी दुनिया में कच्चे तेल की सप्लाई कम हो गयी है, लेकिन डिमांड जस की तस बन हुई है। इसलिए कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही है। कच्चे तेल की खरीददारी के लिए पहले से ज्यादा डॉलर देना पड़ रहा है। पहले से ज्यादा डॉलर देने का मतलब है विदेशी मुद्रा भंडार में पहले कमी। विदेशी मुद्रा भंडार से ज्यादा डॉलर की निकासी।  

इसलिए सरकार कह रही है कि रूस और यूक्रेन की लड़ाई वजह रुपये की गिरावट का अहम कारण है। लेकिन यहां समझने वाली बात यह है कि इस तरह के झटकों को सहने की नीति भी भारतीय नीति निर्माता नहीं बनाते है। अगर भारत अपने सभी संसाधनों का ढंग से इस्तेमाल करते हुए आगे बढ़ता तो उसका हमेशा चालू घाटे वाली अर्थव्यवस्था न रहता। आयात और निर्यात में बढ़ा अंतर ना आता।

एक गरीब मुल्क में जहाँ लोगों के पास ढंग से अपना जीवन जीने के लिए पैसा नहीं है, वहां पर आयात और निर्यात की खुली नीति को अपनाने का मतलब है आयत को बढ़ावा देना और निर्यात की संभावनाओं को कम करना। आप खुद सोचकर देखिये कि भारत में दूसरे दशों का माल ज्यादा बिकता या दूसरे देशों में भारत। नीति निर्माण के क्षेत्र में यह घनघोर कमियां भारत को चालू घाटे वाले अर्थव्यवस्था में बनाई रखती है। जहाँ पर डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरवाट की संभावना हमेशा बनी रहती है।  

अप्रैल से जून महीने में निर्यात तकरीबन 38 बिलियन डॉलर के आसपास रहा। आयात तकरीबन 63 बिलियन का डॉलर रहा। इस तरह से व्यापारिक घाटा तकरीबन 25 बिलियन डॉलर का रहा। पिछले साल अप्रैल से जून महीने के मुकाबले इस बार के निर्यात में 22 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। जबकि आयात में 47 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

रुपया कमजोर होने की वजह से कम मुनाफे की उम्मीद कर विदेशी निवेशक लगातार भारतीय बाजार से अपना निवेश किया हुआ पैसा बाहर निकाल रहे हैं। आगे और भी विदेशी निवेश की बिकवाली होगी। इसलिए डॉलर और रुपए का अंतर और अधिक बढ़ेगा। विदेशी निवेश को लेकर यहां एक बात और समझने वाली है कि भारत में ज्यादातर विदेश निवेश वित्तीय पूंजी के तौर होता है। यानी ऐसी जगहों पर पैसा निवेश किया जाता है, जहां पर पैसा से पैसा बनाने का काम चलता है। जैसे कि स्टॉक मार्केट। जब भी निवेश करने वाले को लगता है कि उसे अपने निवेश पर कम कमाई  होगी तो वह अपना पैसा निकाल लेता है।

यही इस समय हो रहा है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था की गहरी संरचनात्मक कमियों की तरफ इशारा करता है। ज्यादातर विदेश निवेश ऐसी जगहों पर आना चाहिए जो उत्पादन के काम में लगे। बुनियादी अवसरंचना को को खड़ा करने के काम में लगे। ताकि रोजगार मिले। पूंजी का सही इस्तेमाल हो सके।  अगर  ऐसा  होता तो विदेशी निवेशक अचानक से पैसा नहीं निकालते।  डॉलर के मुकाबले रुपये में धड़धड़ाते हुए कमी नहीं दर्ज की जा जाती। जनवरी 2022 से लेकर अब तक रुपये में तकरीबन 7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की जा चुकी है।

जब सामान और सेवाओं के आयात पर पहले से ज्यादा खर्च होगा तो देश में उन सब सामन और सेवाओं की कीमतें बढ़ेंगी जिनका आयात किया जाता है। अब चूंकि पेट्रोल और डीजल दूसरे मुल्क से ही खरीदा जाता है और पेट्रोल और डीजल पर अर्थव्यवस्था का पूरा पहिया टिका है।  तो डॉलर के मुकाबले रूपये के गिरने का मतलब है कि महंगाई का पहले से ज्यादा होना। 25 हजार से कम कमाने वाले देश के 90 फीसदी कामगारों पर मार महंगाई की जमकर मार पड़ना।

साल 2013 में डॉलर के मुकाबले रुपये गिरकर 68 रुपये प्रति डॉलर हो गया था। भाजपा की तरफ से बयान आया कि डॉलर के मुकाबले रुपया तभी मजबूत होगा जब देश में मजबूत नेता आएगा। उस समय कहा जा रहा था कि यह बताना मुश्किल है कि डॉलर के मुकाबले रुपया ज्यादा गिर रहा है या कांग्रेस पार्टी? कांग्रेस पार्टी और रुपये के गिरने में होड़ लगी है।

2018, 2019, 2020 और 2021 में लगातार रुपया कमज़ोर होता गया– 2.3 प्रतिशत से लेकर 2.9 प्रतिशत तक कमज़ोर हुआ। चार साल से भारत का रुपया कमज़ोर होता जा रहा है। अब यह कमजोर होकर सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है। यानी यह बात समझने वाली है कि डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोर होने की कहानी रूस और यूक्रेन की लड़ाई के बाद ही शुरू नहीं हुई है, बल्कि यह तब से चली आ रही है जब से तथाकथित मजबूत नेता यानी नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं। तब से लेकर अब तक डॉलर के मुकाबले रुपया गिरते गया है। भाजपा के मुताबिक मजबूत नेता के आ जाने के बाद से डॉलर के मुकाबले रुपया में मजबूती होनी चाहिए थी, लेकिन यह पहले से ज्यादा मजबूत होने की बजाए कमजोर हो गया। रुपये के गिरने से जुड़े जरूरी कारणों के पड़ताल के साथ उन बातों को भी में ध्यान रखना जरूरी है कि मौजूदा वक्त की सरकार ने तब कहा था जब वह विपक्ष में थी।

एक बात और कही जा रही है कि डॉलर के मुकाबले दुनिया के कई देशों की करेंसी में गिरावट दर्ज की जा रही है।  जापान में येन और यूरोप में यूरो के गिरावट डॉलर के मुकाबले रुपये में होने वाली गिरावट से ज्यादा है।  इसलिए ज्यादा चिंता की बात नहीं।  लेकिन इन बातों को कहने वालों से पूछना चाहिए कि वह यह भी बताएं कि यूरोप और जापान जैसे देशों की अर्थव्यवस्था की स्थिति क्या है ? वहां रोजगार की हालत क्या है? लोगों की आय क्या है? क्या वहां के लोगों डॉलर से पैदा होने वाली महंगाई से ज्यादा परेशान होंगे या भारत के?

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