Skip to main content
xआप एक स्वतंत्र और सवाल पूछने वाले मीडिया के हक़दार हैं। हमें आप जैसे पाठक चाहिए। स्वतंत्र और बेबाक मीडिया का समर्थन करें।

जहांगीरपुरी— बुलडोज़र ने तो ज़िंदगी की पटरी ही ध्वस्त कर दी

अकबरी को देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था न ही ये विश्वास कि सब ठीक हो जाएगा और न ही ये कि मैं उनको मुआवज़ा दिलाने की हैसियत रखती हूं। मुझे उनकी डबडबाई आँखों से नज़र चुरा कर चले जाना था।
जहांगीरपुरी— बुलडोज़र ने तो ज़िंदगी की पटरी ही ध्वस्त कर दी

तेज़ धूप में चेहरे को ढके वो मस्जिद के बाहर बौखलाई सी लगातार रो रही थीं। मैंने पास जाकर पूछा क्यों रो रही हो तो सिसकियों का सिलसिला आंखों में उमड़ते सैलाब में तब्दील हो गया। मेरा दिल बैठा जा रहा था लेकिन उनको संभालने से पहले मुझे ख़ुद को संभालने की नौबत आ पड़ी। किसी तरह ख़ुद को संभाला और मामला जानने की कोशिश की। पता चला राजनीति के नए किरदार बुलडोज़र ने किसी की ज़िन्दगी को पूरी तरह से रौंद दिया है। ये अकबरी बेग़म थीं।

मैंने उनके बेतहाशा रोने का सबब जानना चाहा तो पता चला कि जहांगीरपुरी में हुई कार्रवाई में उनका भी क़रीब 25-30 हज़ार का सामान MCD वाले उठाकर ले गए और जिस जगह वो अपना काम करती थी वहां से उन्हें भगा दिया गया। ऐसे में वो क्या करें कहां जाए उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था।

देश की राजधानी दिल्ली में दंगे और दंगे के बाद जिस तरह से वहां बुलडोज़र चला उसने किन लोगों को और किस तरह से प्रभावित किया मैं जानना चाहती थी।

दिल्ली का जहांगीरपुरी इलाका जिसके नाम में चौथे मुग़ल बादशाह जहांगीर का नाम जुड़ा है। हाल में हुए दंगे के बाद चर्चा में है।  जहांगीर के बेटे शाहजहां ने दिल्ली को जिस तरह से संवारा उसकी गवाह पूरी दुनिया है। लेकिन इतिहास के ये पन्ने अब किताबों से हटा दिए जाएंगे। क्योंकि सुना है वो इतिहास ठीक नहीं था। और अब जो हो रहा है उसे इतिहास के पन्नों में किन अक्षरों में दर्ज किया जाएगा इसपर शायद ‘नासा’ में रिसर्च चल रही है!  मुग़ल ही नहीं फ़ैज़ की नज़्मों को भी किताबों से बर्ख़ास्तगी  मिल गई है। और मिले भी क्यों नहीं, जिन नज़्मों में सत्ता से सवाल हो वो नज़्में ठीक नहीं, जो इंक़लाबी दौर की याद दिलाती हो उनकी अब क्या ज़रूरत ? जब मैं जहांगीरपुरी की गलियों से निकल रही थी तो इसी क़ैफ़ियात में डूबी थी।

निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ

चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले

जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले

नज़र चुरा के चले जिस्म ओ जाँ बचा के चले

बिलखती अकबरी के साथ मैं भी उस इलाक़े में तवाफ़ पर निकली जहां के लोगों ने चंद रोज़ पहले इलाक़े के सोशल फ़ैब्रिक को तार-तार होते देखा, बेहद तंग गली में कैसी ज़िन्दगी छटपटाती है ये हमें जहांगीरपुरी जैसे इलाक़े में आकर देखना चाहिए। कुछ गज के घर चौड़ाई में नहीं बढ़ सकते इसलिए आसमान में घुसपैठ करने की जुगत लगाते नज़र आते हैं। जिस सी-ब्लॉक में दंगा हुआ था वहां और आस-पास के ब्लॉक में ज़िन्दगी एक बार फिर से पटरी पर लौट रही थी। तंग गलियों में मेरे क़दम रखने से मक्खियों की मजलिस में ख़लल पड़ता और उनका एक उड़ता हुआ क़ाफ़िला मेरे साथ हो लेता। आगे-आगे अकबरी, पीछे मैं और मक्खियों का कारवां। जैसे ही हम उस पेड़ के क़रीब पहुंचे जहां अकबरी अपने पति के साथ मिलकर सामान (शायद स्क्रैप) लाकर जमा करती थी वो ज़ार-ज़ार रोने लगी और हाथ के इशारे से दिखाया कि उस दिन यहीं से MCD वाले उसका सामान उठाकर ले गए उसके मुताबिक़ वो सामान 25 से 30 हज़ार के बीच का था।

गिरते अश्कों को देख मेरे क़दम भारी हो रहे थे। एक गली में दाख़िल हुई तो लाइन से खड़ी रेहड़ियों को देखकर साफ़ पता चल रहा था कि जिनके घरों का चूल्हा इनके सहारे चलता था वो अपने बच्चों को रमज़ान में रोज़े रखे जाने के सबाब गिनवा रहे होंगे।  ये दंगों के बाद का क़रीब आठवां-नौवां दिन था।  कहते हैं वक़्त के साथ हर ज़ख़्म भर जाता है लेकिन ज़ख़्मों पर अगर वक़्त पर मरहम ना लगाया जाए तो उनका नासूर बनने का भी डर लगा रहता है।

आगे बढ़ती गली ख़ुद को समेट रही थी और तभी अकबरी ने एक दरवाज़ा दिखाया जहां से हमें ऊपर चढ़ना था।  तीन-तीन, चार-चार ईंटों की बनी पायदान कभी सीधी तो कभी तिरछी सी बनी हुई थीं मैं कैसे उन पर अपने पैरों को रखूं समझ से परे था। तभी एक बच्ची की क़ुरान की तिलावत( पढ़ने) करने की आवाज़ आई मैंने झांक कर देखा क़रीब 40-41 डिग्री के तापमान में एक पंखा चल रहा था कोई नींद में डूबा फ़र्श पर पड़ा था तो बच्चे कमरे में इधर-उधर पसरे हुए कुछ ना कुछ कर रहे थे। ये राजधानी दिल्ली के जहांगीरपुरी का एक तंग-अंधेरा कमरा था। इस कमरे में रहने वाले लोग इसी देश के नागरिक हैं लेकिन क्या इनके पास बुनियादी सुविधा हैं?

बहरहाल मैं अकबरी के साथ उसके घर पहुंची कमरा तप रहा था। कमरे में पहुंचते ही अकबरी ने अपनी कहानी बयां करनी शुरू की ज़ार-ज़ार रोती अकबरी अपनी तार-तार हुई ज़िन्दगी की परेशानी बताने लगीं।

उनके मुताबिक़ उनका जहांगीरपुरी दंगों से उसका कोई लेना-देना नहीं था जिस दिन दंगा हुआ वो काम से लौटकर चुप-चाप घर में बैठी थी लेकिन उनकी ज़िन्दगी में तूफ़ान उस दिन आया जब अचानक ही रातों-रात जहांगीरपुरी में अतिक्रमण हटाने का फ़ैसला लिया गया और MCD का बुलडोज़र चला। लगातार सिसकियां लेती अकबरी बता रहीं थी कि उनका सड़क किनारे क़रीब 25-30 हज़ार का सामान था जो MCD वाले लेकर चले गए वो लगातार एक ही बात कह रही थी कि किसी के लिए हो सकता है ये रकम कम हो, लेकिन मेरे लिए ये बड़ी बात है। काम ठप हो गया तो वो घरों में बर्तन मांजने जा रही हैं। रहमत और बरकत के महीने रमज़ान में वो ऐसी बेबस हो गई हैं कि पानी से इफ़्तार (रोज़ा खोलना) कर रही हैं। बता रही है इतनी परेशान है कि कभी घर में खाना बन रहा है कभी नहीं। वे उसी दिन से इस उम्मीद में हैं कि उनको मुआवज़ा या कोई मदद मिल जाए तो किसी तरह ईद मना लें।  उदास होकर कहने लगीं— इस साल कैसे ईद मनाई जाएगी कुछ समझ नहीं आ रहा।

गिरते अश्कों ने उनके दामन को तकरीबन भिगो दिया था। मुझसे कहती ''मैं ये सब बता रही हूं कहीं मैं फंस तो नहीं जाऊंगी? कहीं कोई मुझे परेशान तो नहीं करेगा''? दरअसल मेरे पास भी उनके इस सवाल का जवाब नहीं था क्योंकि आज की तारीख़ में कोई गारंटी नहीं है कि गोदी मीडिया से इतर जो ख़बरें सवाल उठाती हैं उनके साथ क्या सलूक किया जाता है।

अकबरी के घर में कोई ज़्यादा सामान नहीं था किचन का कुछ सामान, एक पलंग और दीवार पर  क़ुरान की कुछ आयतें, तस्बीह (दुआ पढ़ने की माला) जो उनके ऊपर वाले में यक़ीन की तस्दीक कर रही थी।

अकबरी मुझे बार-बार बता रही थी कि वो बिहार की रहने वाली हैं। शायद उन तक भी नैरेटिव सेट करने की राजनीति का वो क़िस्सा पहुंचा होगा जिसमें अब मुसलमानों को बांग्लादेशी या रोहिंग्या साबित करने की होड़ मची है। अकबरी को देखकर समझ में आया उनका मज़हब या पहचान चाहे जो हो लेकिन उनकी गिनती उन आंकड़ों में होगी जिसे हम ग़रीब कहते हैं। जो मुफ़लिसी में जीते हैं और जिनका वजूद सिर्फ़ एक वोट होता है (वो भी कितने दिन क्या पता? ) 

अकबरी को देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था न ही ये विश्वास कि सब ठीक हो जाएगा और न ही ये कि मैं उनको मुआवज़ा दिलाने की हैसियत रखती हूं। मुझे उनकी डबडबाई आँखों से नज़र चुरा कर चले जाना था।

अकबरी एक मुसलमान, आधी आबादी में अल्पसंख्यक समुदाय की वो औरत जिसकी भलाई के लिए गोदी मीडिया पर डिबेट होती हैं, बड़े-बड़े पैनलिस्ट अल्पसंख्यक महिला मामलों के जानकार बनकर ज्ञान बांचते हैं। जिन्हें तीन तलाक़ से मुक्ति दिलाने के लिए क्रांतिकारी क़दम उठाए जाते हैं लेकिन आज वो अपनी मेहनत के तीस हज़ार के लिए ज़ार-ज़ार रो रही है लेकिन दूर क्षितिज तक कोई नज़र नहीं आता।

जिस जगह पर मुझे अकबरी मिलीं थीं वहां कई और औरतें भी थीं जिनकी ज़िन्दगी की गाड़ी पटरी पर लौट ही नहीं पा रही थी। ऐसी ही एक और महिला मिलीं हनीफ़ा। हनीफ़ा एक बेवा हैं और उनके ऊपर पांच बच्चों की ज़िम्मेदारी है, जिस वक़्त मैंने हनीफ़ा को देखा वो जनवादी महिला समिति के एक डेलिगेशन को अपनी कहानी सुना रहीं थी और कुछ लिखा-पढ़ी करने में व्यस्त थीं।

हनीफ़ा जैसे ही यहां बहुत से लोग जमा थे जो अपने-अपने मोबाइल में उस दिन की कार्रवाई का वीडियो साझा कर रहे थे जिस दिन बुलडोज़र ने उनके ज़िन्दा रहने के साधनों को रौंद दिया था। हनीफ़ा ने मुझे भी अपनी उस दुकान का वीडियो और तस्वीरें दिखाई जिसमें कार्रवाई हो रही थी या ज़ुल्मपता नहीं। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि जो सरकार मुसलमान बहनों की 'भलाई' के दावों को कैश करवाती नज़र आती है उसका बुलडोज़र एक बेवा मुसलमान औरत की दुकान पर क्यों चला?

बकौल हनीफ़ा ''ना बात की ना कुछ बताया बुलडोज़र लेकर आए और दुकान तोड़ दी, और जो दुकान तोड़ी उसका सामान तो छोड़ देते लेकिन वो उसे भी उठाकर ले गए आख़िर क्यों'' वो आगे कहती हैं ''कि हमारी दुकान नहीं है, कारोबार नहीं है, कैसे खाएंगे, किसे बताए कुछ पता नहीं''। जिस वक़्त हनीफ़ा मुझसे ये बातें कर रहीं थीं उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था, क्या वाक़ई इस बेवा मुसलमान औरत को अब किसी से कोई उम्मीद नहीं रही? आख़िर उन्होंने किसे अपना वोट दिया था? आख़िरी बार जब वो वोट डालने गई होगी तो क्या सोच कर?

हनीफ़ा की तरह ही एक और बेवा मुसलमान औरत मिलीं जो अपनी दो बेटियों के साथ मदद की तलाश में जनवादी महिला समिति के लोगों से बात कर रही थीं। इनका नाम था साइदा। साइदा ने अपनी दुकान किराए पर दी हुई थी उस दुकान के टूटने पर उनके सामने बड़ी आर्थिक परेशानी खड़ी हो गई है। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि अब घर कैसे चलेगा, जिस दिन से दंगा हुआ है उनकी बेटियां स्कूल नहीं गई हैं, उन्हें डर लगता है कि कहीं फिर से कुछ ना हो जाए, लेकिन जब मैंने उनकी बेटियों से बात की तो बड़े-बड़े सपनों वाली ये बच्चियां पढ़-लिखकर एयर होस्टेस बनना चाहती हैं, आसमान में उड़ने की तमन्ना रखती हैं।  अपनी अम्मी का सहारा बनकर उन तमाम परेशानियों को हल करना चाहती हैं जो ये बचपन से देखते हुए आई हैं। जब मैंने पूछा एक नागरिक के तौर पर तुम क्या चाहती हो? तो रुंधे गले से कहने लगी मैं चाहती हूं - ''ये हिंदू-मुसलमान बिल्कुल नहीं होना चाहिए, सबको मिल-जुलकर रहना चाहिए, हिन्दू मुसलमान कुछ नहीं सब इंसान ही तो हैं। हिन्दू-मुसलमान क्या चीज़ है सभी की तो आंखें-नाक एक जैसे ही तो हैं, तो ये लड़ाई नहीं होनी चाहिए। और ये भेदभाव नहीं होना चाहिए कि तुम हिंदू हो, तुम मुसलमान हो सबको मिल-जुलकर रहना चाहिए''

इस बच्ची ने मुझे 1973 में आई फ़िल्म 'गर्म हवा' की याद दिला दी ज़मीन पर खींची गई एक लकीर ने कैसे लाखों लोगों का सीना चाक कर दिया था। जिन मुसलमानों  ने भारत में रहना क़बूल किया उन्हें अपने कारोबार और ज़िन्दगी जीने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ी लेकिन बावजूद उन्होंने  पाकिस्तान जाना क़बूल नहीं किया बल्कि उम्मीद रखी की एक ना एक दिन यहां रहने वाले लोगों के दिल उनके लिए पलट जाएंगे, साझी तहज़ीब लोगों के दिलों में मोहब्बत भर देगी। पर अब लगता है

             ये दाग़-दाग़ उजाला, ये शब गज़ीदा सहर

             वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं

मैं लगातार लोगों से मिल रही थी, हर किसी के पास बताने को बहुत कुछ था लेकिन जिन्हें सुनना चाहिए वो कहां हैं? मैं कुछ आगे बढ़ी तो एक और शख़्स से टकरा गई जो धूप में एक कुर्सी पर डबडबाई आँखों के साथ बैठा था। मैंने पूछा क्या आपकी भी दुकान टूटी है तो उसने नज़र उठाकर देखा और ऐसा लगा जैसे कि वो बात नहीं करना चाहता। मैंने दोबारा पूछा तो कहने लगा क्या करेंगी जानकर? टूटे हुए उस शख़्स पर मायूसी तारी थी, फिर कुछ बोला नहीं और उठकर चलने लगा मुझे लगा शायद नाराज़ हो गया लेकिन वो चंद क़दम आगे बढ़ा और बग़ैर कुछ कहे उसने पीछे देखा तो मुझे एहसास हुआ कि वो मुझे उसके साथ जाना है।  वो भी एक घुप अंधेरी गली में घुस गया और चंद घर बाद एक कमरे में घुसा जहां से उसके साथ ही उसकी पत्नी भी निकल कर आई जब वो लौटा तो उसके हाथ में मोबाइल था और उस मोबाइल में बुलडोज़र की कहानी थी। वो कुछ नहीं कहना चाहता था उसने कहा कि मैं बात नहीं कर पाऊंगा आप मेरी पत्नी से बात करिए। वो अपनी पत्नी के बग़ल में ख़ामोश बैठ गया।

उनकी पत्नी का नाम रुक़ैया था, रुक़ैया बहुत बेचैन थीं वो एक सांस में सबकुछ बता देना चाहती थीं। उन्होंने बताया कि किस तरह उनकी कबाब की रेहड़ी को तोड़ दिया गया। उन्होंने बताया कि वो लगातार अपने बच्चों का वास्ता दे रही थीं, रेहड़ी को हटा लेने की मोहलत मांग रहीं थी लेकिन लोहे की मशीन बुलडोज़र पत्थर दिल हुक्म की तामिल करते हुए किसी को रोज़ी-रोटी के लिए मोहताज करते रहे। रुक़ैया कहती हैं इधर-उधर से मांग कर खा रहे हैं। समझ नहीं आ रहा की ईद कैसे मनाई जाएगी? उन्होंने बताया कि इस रेहड़ी को लगाने के लिए उन्होंने 80 हज़ार का लोन लिया था लेकिन पहले लॉकडाउन, फिर मिनी लॉकडाउन और अब ये कार्रवाई। अब उनका क्या होगा ये बात उसे परेशान कर रही थी। शायद ये वो छोटे कारोबारी हैं जिनकी FIVE TRILLION ECONOMY में कोई ज़रूरत नहीं होगी। 

जिस वक़्त ये केस कोर्ट पहुंचा था उस वक़्त सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने कोर्ट में एक दलील दी थी जिसमें उन्होंने कहा था कि-

        There are 731 unauthorised colonies in Delhi with lakhs of people and you pick up one colony because you target one community.

कुछ ऐसा ही सवाल मेरे सामने साइदा की बेटी ने भी रखा था उसने मुझ से पूछा था कि ''अगर कार्रवाई करनी ही थी तो बहुत पहले ही ये कार्रवाई की जानी चाहिए थी, आख़िर दंगों के बाद ही ये कार्रवाई क्यों की गई''?

क्यों की गई? ये इकलौता सवाल नहीं है सवालों की फेहरिस्त है लेकिन ये फेहरिस्त किसके सामने पेश की जाए क्या कोई है सुनने वाला? क्या कोई है जो मुसलमान को इंसाफ़ दिला पाने का दिल रखता हो? ऐसा लगता है इस क़ौम को तन्हा और बेसहारा छोड़ दिया गया है। तारीख़ में ये रमज़ान अबतक का सबसे मजबूर और मोहताज बना दिए जाने की कोशिश के तौर पर दर्ज होगा।

और जो सोचते हैं कि

एक आंसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है

तुमने देखा नहीं आंखों का समंदर होना

उन्हें अपनी ग़लतफ़हमी दूर कर लेनी चाहिए, जिस दम दौर बदलेगा तब बदलेगा फ़िलहाल दूर तलक कुछ नज़र नहीं आता।

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

अपने टेलीग्राम ऐप पर जनवादी नज़रिये से ताज़ा ख़बरें, समसामयिक मामलों की चर्चा और विश्लेषण, प्रतिरोध, आंदोलन और अन्य विश्लेषणात्मक वीडियो प्राप्त करें। न्यूज़क्लिक के टेलीग्राम चैनल की सदस्यता लें और हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित हर न्यूज़ स्टोरी का रीयल-टाइम अपडेट प्राप्त करें।

टेलीग्राम पर न्यूज़क्लिक को सब्सक्राइब करें

Latest