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2000 का नोट : 2016 की नोटबंदी का एक्शन रिप्ले

इस बार भी यह आशंका जताई जा रही है कि दो हज़ार रुपए के नोट बारे में घोषणा, इस साल के अंत में होने वाले महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र की गई है।
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फ़ोटो साभार: PTI

19 मई, 2023 को, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने 2,000 रुपये के नोटों को तत्काल प्रभाव से प्रचलन से वापस लेने की घोषणा करते हुए कहा कि इन नोटों की कानूनी टेंडर के रूप में वैधता 30 सितंबर तक बरकरार रहेगी। इसका मतलब यह है कि दिए गए समय तक सभी उच्च-मूल्य वाले नोटों को बैंकों में जमा किया जा सकता है, या अन्य नोटों के साथ बदला जा सकता है या उस समय सीमा तक सामान और सेवाएं खरीदने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

2016 की नोटबंदी और इसके विनाशकारी प्रभाव

आरबीआई द्वारा इस तरह का अचानक लिया गया फैसला और कुछ नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 8 नवंबर, 2016 की शाम को राष्ट्रीय टेलीविजन पर घोषित किए गए 1,000 रुपये और 500 रुपये के नोटों की अचानक की गई नोटबंदी की पुनरावृत्ति है, उनके शब्दों में, जिसमें कहा गया था कि अर्थव्यवस्था और समाज को त्रस्त करने वाले काले धन से उपजने वाली कई समस्याओं से "दृढ़ता से" से निपटने के लिए किया गया था।

उस समय व्यापक रूप से इस बात को माना गया था कि मोदी ने सरकार के खुद के निकायों जैसे कि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड और अन्य विशेषज्ञों के साथ कोई परामर्श और विचार-विमर्श किए बिना नोटबंदी की घोषणा की थी, जिसने संभवतः अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव डाले थे, विशेष रूप से नकदी-संचालित अनौपचारिक क्षेत्र और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के बड़े हिस्से पर इसका भारी असर देखने को मिला था। 

वास्तव में, भारतीय अर्थव्यवस्था और कई क्षेत्र और घरों की अर्थव्यवस्था अचानक की गई नोटबंदी से बुरी तरह प्रभावित हुई थी, और यहां तक कि कई सरकारी रिपोर्टों में भी इसकी गवाही मिली थी। 8 नवंबर, 2016 को देश की अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र के लिए "काला दिन" बताते हुए, पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने राज्यसभा में कहा था कि विमुद्रीकरण "संगठित और कानूनी लूट" है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने 4-1 के बहुमत के फैसले से नोटबंदी को वैध बताया था

इस साल जनवरी में, सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत से, 2016 की नोटबंदी प्रक्रिया को न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना द्वारा दिए गए असहमतिपूर्ण फैसले के साथ वैध माना था, जिन्होंने इसे अवैध करार दिया था। उनके नजरिए में "...रिज़र्व बैंक ने दिमाग का कोई इस्तेमाल नहीं किया था" और नोट किया कि, "न ही बैंक के पास इस तरह के गंभीर मुद्दे पर अपना दिमाग लगाने का समय था"। उन्होंने फिर कहा, "यह अवलोकन इस तथ्य के संबंध में किया जा रहा है कि 500/- रुपये और 1000/- रुपये के बैंक नोटों की सभी श्रृंखलाओं के विमुद्रीकरण की पूरी कवायद चौबीस घंटों में की गई थी" और कहा कि ..500/- रुपये और 1000/- रुपये के सभी करेंसी नोटों की नोटबंदी की कार्रवाई गलत थी।"

नोटबंदी से काले धन की समस्या का समाधान नहीं हुआ

यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि 1,000 रुपये और 500 रुपये के नोटों की नोटबंदी के बाद, 2,000 रुपये के नोटों सहित नए नोटों को मुद्रित और परिचालित किया गया था। बढ़ते काले धन की समस्या से निपटने के लिए मोदी सरकार द्वारा 2,000 रुपये के नोट छापने के फैसले से कई विशेषज्ञ हैरान थे, तब, जब 1,000 रुपये और 500 रुपये के नोटों को वापस ले लिया गया था। क्योंकि, उच्च मूल्य वाले करेंसी नोट जैसे 2,000 रुपए के नोट आसानी से काले धन को जमा करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जिसे कई अन्य स्रोतों से पता लगाया जा सकता है, जिसमें अचल संपत्ति या जिनके पास भारी मात्रा में सोना और अन्य गहने हैं।

इस बात का अब अच्छी तरह से दस्तावेजीकरण कर लिया गया कि काले धन की समस्या का नोटबंदी ने मामूली रूप से भी समाधान नहीं किया था क्योंकि नवंबर 2016 में नोटबंदी के बाद 1,000 रुपये और 500 रुपये के 99.9 प्रतिशत नोट लोगों ने बैंकों में जमा कर दिए थे।

नोटबंदी और संभावित चुनावी मकसद

इसलिए, नवंबर 2016 में 500 रुपये और 1,000 रुपये के नोटों को वापस लेने की तरह, अब आरबीआई द्वारा अचानक 2,000 रुपये के नोटों को वापस लेने के निर्णय को संदेह के साथ देखा जा रहा है। कई विशेषज्ञों ने बताया था कि नोटबंदी का फैसला नवंबर 2016 में उत्तर प्रदेश में 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए लिया गया था। इसकी घोषणा कि उन नोटों की कानूनी निविदा 30 सितंबर तक मान्य होगी, को मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना में दो महीने में होने वाले विधानसभा चुनावों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

इस बार भी यह आशंका जताई जा रही है कि घोषणा चुनावी या राजनीतिक मंसूबों के आधार पर की गई होगी।

आरबीआई के स्पष्टीकरण में विश्वास की कमी है

पहले 2,000 रुपये के नोटों को पेश करने और फिर इन्हें वापस लेने का स्पष्ट उद्देश्य आरबीआई की अधिसूचना से समझा जा सकता है। इसमें कहा गया है कि, “इन बैंक नोटों के चलन का कुल मूल्य 31 मार्च, 2018 को अपने चरम पर 6.73 लाख करोड़ रुपये से गिर गया है (जो चलन में नोटों का 37.3 प्रतिशत था) और घटकर 3.62 लाख करोड़ रुपये हो गया है, जो अब कुल नोटों का केवल 10.8 प्रतिशत है। 31 मार्च, 2023 को चलन में नोटों के बारे, "कहा गया है कि "2000 रुपये के नोटों को पेश करने का उद्देश्य भी तब पूरा हो जाएगा, जब  अन्य मूल्यवर्ग के बैंक नोट अन्य मात्रा में उपलब्ध हो जाएंगे।"

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा दिया गया यह स्पष्टीकरण कि"...2000 रुपये के नोटों को पेश करने का उद्देश्य भी पूरा हो जाएगा, एक बार जब अन्य मूल्यवर्ग के बैंक नोट अन्य मात्रा में उपलब्ध हो जाएंगे" पर विश्वास नहीं होता है। केवल यह उम्मीद ही की जा सकती ती है कि ऐसे उच्च मूल्य वाले नोटों को वापस लेना का निर्णय, न्यायमूर्ति नागरत्न के शब्दों में, "विकृत" है।

जिन लोगों के पास 2,000 रुपये के नोटों में लाखों और करोड़ों रुपये हैं, उन्हें इन्हें बदलने के लिए बैंकों के कई चक्कर लगाने पड़ेंगे। यह बहुत संभव है कि केंद्रीय एजेंसियां उन लोगों या राजनीतिक दलों को जांच के दायरे में ला सकती हैं और उन पर आरोप लगा कर मुक़दमा दर्ज़ कर सकती हैं।

यह देखते हुए कि चुनाव दूर हैं, 30 सितंबर के बाद ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त उपाय किए जाएंगे ताकि उनकी चुनावी संभावनाएं तबाह हो जाएं। हमें इंतजार करना होगा और देखना होगा कि पहले की नोटबंदी की प्रक्रिया की यह पुनरावृत्ति वास्तव में इस बार कैसे खेल दिखाती है।

लेखक, भारत के पूर्व राष्ट्रपति के॰आर॰ नारायणन के ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटि रह चुके हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें।

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