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NCERT सिलेबस में बदलाव: मुग़लों के बहाने 2024 साधने की कोशिश?

NCERT की किताबों से 2023-24 के सिलेबस से मुग़लों से जुड़े कुछ चैप्टर्स हटा दिए गए हैं, इस क़दम को क्यों उठाया गया है? इससे छात्रों का क्या फायदा होगा? या फिर इतिहास के पन्नों को राजनीति का एक टूल बनाया गया है?
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सुलह-ए-कुल: 'एकीकरण का एक स्रोत'

"मुग़ल इतिवृत्त (Chronicles) साम्राज्य, हिंदुओं, जैनों, जरतुश्तियों (Zoroastrians) और मुसलमानों जैसे अनेक भिन्न-भिन्न नृजातीय (Ethnic) और धार्मिक समुदायों को समाविष्ट किए हुए साम्राज्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं। सभी तरह की शांति और स्थायित्व के स्रोत रूप में बादशाह सभी धार्मिक और नृजातीय समूहों से ऊपर होता था, इनके बीच मध्यस्थता करता था, तथा यह सुनिश्चित करता था कि न्याय और शांति बनी रहे। अबुल फ़ज़ल सुलह-ए-कुल (पूर्ण शांति) के आदर्श को प्रबुद्ध शासन की आधारशिला बताता है। सुलह-ए-कुल में यूं तो सभी धर्मों और मतों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी किंतु उसकी एक शर्त थी कि वे राज्य-सत्ता को क्षति नहीं पहुंचाएंगे अथवा आपस में नहीं लड़ेंगे।

सुलह-ए-कुल का आदर्श राज्य, नीतियों के ज़रिए लागू किया गया। मुग़लों के अधीन अभिजात-वर्ग मिश्रित किस्म का था अर्थात उसमें ईरानी, तूरानी, अफ़गानी, राजपूत दक्खनी सभी उनकी सेवा और निष्ठा पर आधारित थे। इसके अलावा, अकबर ने 1563 में तीर्थयात्रा कर तथा 1564 में जज़िया को समाप्त कर दिया क्योंकि यह दोनों कर धार्मिक पक्षपात पर आधारित थे। साम्राज्य के अधिकारियों को प्रशासन में सुलह-ए-कुल के नियम का अनुपालन करने के लिए निर्देश दे दिए गए। सभी मुग़ल बादशाहों ने उपासना स्थलों के निर्माण व रख रखाव के लिए अनुदान दिए। यहां तक कि युद्ध के दौरान जब मंदिरों को नष्ट कर दिया जाता था तो बाद में उनकी मरम्मत के लिए अनुदान जारी किए जाते थे। ऐसा हमें शाहजहां और औरंगजेब के शासन में पता चलता है।"

इतिहास के पन्नों पर लिखी गईं ये बातें अब इतिहास हो जाएंगी, राजनीति कैसे इतिहास को प्रभावित करती है, आने वाला वक़्त इसे याद रखेगा।

image12 वीं की NCERT इतिहास की किताब से हटाए गए चैप्टर की तस्वीर

इतिहास की किताब के कुछ पन्ने बन जाएंगे इतिहास!

NCERT की 12 कक्षा की इतिहास की किताब 'थीम्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री-2’ के चैप्टर 'किंग्स एंड क्रॉनिकल्स: द मुग़ल कोर्ट' में सुलह-ए-कुल की नीति के बारे में लिखी गई ये बातें अब छात्रों को नहीं पढ़ाई जाएंगी, इसी के साथ इस चैप्टर में बादशाहनामा और अकबरनामा की पढ़ाई भी अब गुज़रे ज़माने की बात होने जा रही है।

इस चैप्टर में लिखी इन बातों को पढ़कर छात्र अपनी समझ बना सकते हैं कि उस दौर में जो हो रहा था वो ग़लत था या सही या फिर मुग़ल शासन कितना सही था और कितना ग़लत लेकिन अगर हम छात्रों के सामने से एक, दो या फिर तीन सदी का इतिहास ही हटा दें तो क्या होगा?

इस सवाल का जवाब देना कितना आसान है और कितना मुश्किल? ये आप तय करें!

लेकिन NCERT की किताब से 'ग़ायब' किए जा रहे इतिहास के बारे में बीजेपी नेता कपिल मिश्रा जैसे नेताओं की क्या राय है ज़रा इस ट्वीट में देखें।

वो लिखते हैं कि:

"मुग़लों का झूठ इतिहास से हटाया जा रहा है अब अगले चरण में उनका सच बताया जाएगा"

इसे भी पढ़ें : NCERT ने कक्षा 12वीं की इतिहास की पुस्तकों में बदलाव किया, मुगल साम्राज्य पर अध्यायों को हटाया

इससे पहले बात को आगे बढ़ाया जाए समझ लेते हैं कि आख़िर मामला क्या है?

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने मुग़ल साम्राज्य से संबंधित अध्यायों को हटाकर कक्षा 12वीं के इतिहास के पाठ्यक्रम में संशोधन किया है। इसके परिणामस्वरूप CBSE के पाठ्यक्रम का पालन करने वाले राज्य बोर्ड में भी बदलाव होगा। संशोधित पाठ्यक्रम 2023-24 शैक्षणिक वर्ष के लिए लागू किया जाएगा।

NCERT ने शैक्षिक सत्र 2023-24 से इंटरमीडिएट में चलने वाली इतिहास की पुस्तक 'भारतीय इतिहास के कुछ विषय-II' से शासक और इतिवृत्त-मुग़ल दरबार (लगभग सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी) को हटा दिया है।

इसके तहत बच्चों को अकबरनामा और बादशाहनामा, मुग़ल शासक और उनका साम्राज्य, पांडुलिपियों की रचना, रंगीन चित्र, आदर्श राज्य, राजधानियां और दरबार, पदवियां, उपहार और भेंट, शाही परिवार, शाही नौकरशाही, मुग़ल अभिजात वर्ग, सूचना तथा साम्राज्य, सीमाओं के परे, औपचारिक धर्म पर प्रश्न उठाना जैसे बिंदुओं को पढ़ाया जाता था। इसी प्रकार 11वीं की किताब से 'इस्लाम का उदय’, 'संस्कृतियों में टकराव’, 'औद्योगिक क्रांति के समय की शुरुआत' जैसे पाठ हटाए गए हैं।

image12 वीं की NCERT इतिहास की किताब से हटाए गए चैप्टर में से तस्वीर

इस फैसले के बारे में पता चलते ही सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गईं जिसके बाद से NCERT और ताजमहल जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। सोशल मीडिया पर जहां एक तरफ़ एक पक्ष की ओर से फैसले को सही साबित करने को कोशिश होती दिखी तो वहीं दूसरी तरफ़ इस फैसले को लॉजिक से कोसों दूर बताया गया।

इस फैसले के बाद कुछ सवाल उठने लाज़मी हैं :

* कोई छात्र 12वीं के बाद अगर ग्रेजुएशन में हिस्ट्री सब्जेक्ट लेता है तो उसकी समझ कैसी होगी?

* अगर वे छूटी हुई जानकारी को पढ़ने की कोशिश करेगा तो कहां से पढ़ेगा?

* बहुत से छात्र जो कई तरह की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं और अपनी बेसिक जानकारी को दुरुस्त करने के लिए NCERT की किताबों को पढ़ते हैं, अब उन्हें मुश्किल का सामना करना पड़ेगा।

image12 वीं की NCERT इतिहास की किताब से हटाए गए चैप्टर में से तस्वीर

''समझने की बजाए रटने को बढ़ावा मिलेगा''

हमने ऐसे ही कुछ UPSC Aspirants से बात की, एक Aspirant ने सवाल खड़े करते हुए पूछा कि, "क्या UPSC भी हटाए गए महत्वपूर्ण चैप्टर से जुड़े सवाल हटाएगा? उस वक़्त छात्र क्या करेंगे जब उन्हें बीच के 200 साल के बारे में पता नहीं होगा और फिर वे पढ़ते वक़्त कनेक्ट कैसे करेंगे? इब्राहिम लोदी के बाद सीधा ईस्ट इंडिया कंपनी से शुरू करेंगे? और फिर ब्रिटिश शासनकाल में जो बादशाह होंगे उन्हें कैसे कनेक्ट करेंगे कि आख़िर वे कौन हैं और कहां से आ गए ?

वे तंज़ करते हुए आगे कहती हैं, "बीच में से इतिहास कैसे ग़ायब कर दिया...या तो पूरा इतिहास ही बदल देते प्राचीन काल से लेकर आधुनिक तक...इतनी ही दिक्कत है तो जब ईस्ट इंडिया कंपनी आई तब से ही इतिहास को पढ़ाया जाए और कह दिया जाए कि इससे पहले के बारे में हमारे पास कोई जानकारी नहीं है। ऐसे Era (युग) के इतिहास के साथ छेड़छाड़ की जा रही है जो बीच का है, मतलब प्राचीन काल, मध्य युग और आधुनिक भारत के इतिहास में से अगर मध्यकालीन इतिहास में से कुछ हटा तो इतिहास कनेक्ट कैसे होगा?

इस क़दम से बच्चों की समझ आधी-अधूरी होगी और Rote Learning System (रटना) को बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि छात्रों को ये समझ ही नहीं आएगा कि बात किस संदर्भ में कही जा रही है। हिस्ट्री को समझना और मुश्किल हो जाएगा। ये क़दम बिल्कुल ठीक नहीं है, बल्कि छात्रों को तो हर तरह की जानकारी मुहैया करानी चाहिए, लेकिन यहां तो उल्टा हो रहा है ये तो एक तरह से तानाशाही है कि 'हम जो बोलेंगे वही आपको पढ़ना होगा' ये तो ऐसा लग रहा है कि हिस्ट्री को पॉलिटिक्स का टूल बना दिया गया है।"

"जानकारी के साथ समझौता कैसे कर सकते हैं?”

वहीं एक और Aspirant ने कहा कि, "जगह के नाम बदल देना और इतिहास के कुछ हिस्सों को हटा देने का चलन अगर ऐसे ही चलता रहा तो लगता है कि कुछ दिनों बाद ब्रिटिश रूल से जुड़ा इतिहास भी हटा दिया जाएगा जबकि बहुत सी बातें, योजनाएं उसी दौर से चली आ रही हैं। उन्हें कैसे समझा जाएगा?” वो आगे कहती हैं कि, "इसको कुछ ऐसा समझा जाए कि राजस्व से जुड़ी, ओहदों से जुड़ी बहुत-सी बातें मध्यकाल से होती हुईं आधुनिक और आज के भारत तक पहुंची हैं, अगर उसे समझना है तो बीच के हिस्से के हट जाने से हम वे सब चीजें कैसे समझेंगे? मुग़लों के इतिहास का अगर कुछ हिस्सा हटा तो दिल्ली का इतिहास कैसे समझ में आएगा? ये तो हमारी जानकारी के साथ समझौता करने जैसा है जो कि बिल्कुल ग़लत है।''

1857 के विद्रोह का नेतृत्व किसने किया था?

दिल्ली यूनिवर्सिटी के भगत सिंह कॉलेज के एक छात्र ने एक सवाल किया, "जिस तरह से मुग़लों के इतिहास को हटाया जा रहा है तो क्या एक दिन इस बात को भी झुठला दिया जाएगा कि आज़ादी के लिए किए गए पहले संघर्ष (1857 का विद्रोह) के दौरान मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र को ही क्रांतिकारियों ने अपना नेता (लीडर) चुना था!"

लेकिन जिन्होंने ये क़दम उठाए हैं क्या उन्हें वाक़ई छात्रों की पढ़ाई की परवाह है? या फिर इतिहास के पन्नों पर राजनीति हो रही है? या फिर 'उन्हें' मुग़ल नाम का एक ऐसा मोहरा मिल गया है जिसे वे 2024 के चुनाव में भुनाना चाहते हैं?

ग़ौहर रज़ा साहब से ख़ास बातचीत

आख़िर दिक्कत किससे है, इतिहास के पन्नों से या फिर मुग़ल लफ्ज़ से जुड़े मुसलमान शासकों से? ये जानने का लिए हमने वैज्ञानिक और शायर ग़ौहर रज़ा से ख़ास बात की। उन्होंने कहा, "उनका कहना है कि मुग़ल बड़े बर्बर थे इसलिए उनका इतिहास नहीं पढ़ाना चाहिए, लेकिन अशोक ने भी कलिंग युद्ध लड़ा था और उसमें भी बहुत-सी जाने गईं थीं तो क्या उन्हें भी हटा देना चाहिए और हिंदू राजा भी क्या चुपचाप बैठे थे? उन्होंने भी तो युद्ध लड़े थे कल को उनके बारे में यही बात कह दें तो?”

वे आगे कहते हैं कि, एक मंत्री का बयान है कि "अब मुग़लों का इतिहास नहीं पढ़ाया जाएगा, हम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का इतिहास पढ़ाएंगे।"

"मैं पूछता हूं कि क्या ये लोग भगत सिंह की किताब 'मैं नास्तिक क्यों हूं' स्कूलों के सिलेबस में शामिल करेंगे? लेकिन सब जानते हैं कि वे ऐसा नहीं करने वाले, मुग़ल नाम पर जो इतना हंगामा है वो इसलिए क्योंकि इसे सांप्रदायिक (Communalize) किया जा सकता है लेकिन निराला को हटाना, रघुपति सहाय फ़िराक गोरखपुरी को हटाना सांप्रदायिक नहीं हो पाएगा इसलिए उन पर कोई बात नहीं की जा रही। इस वक़्त ये पूरी एक साज़िश का हिस्सा है।"

ग़ौहर रज़ा कहते हैं, "दरअसल इनके हाथ में कुछ बचा नहीं है। देश में लगातार राइट विंग जगह-जगह दंगे करते फिर रहे हैं। नीरव मोदी से लेकर अडानी तक के घोटाले लोगों को समझ में आने लगे हैं इसलिए इन्होंने इस बीच इसे मुद्दा बना दिया, ये इनका एजेंडा है। इन्होंने इसे आज क्यों किया? इतनी जल्दी में क्यों कर रहे हैं? क्या है इसकी वजह? ये तो पिछले नौ साल से सत्ता में थे लेकिन अब तक चुप क्यों बैठे थे?”

"ये उस राजनीति का का हिस्सा है जो पहले पाकिस्तान में हो चुका है"

हमारी बातचीत में ग़ौहर रज़ा आगे कहते हैं, "मैं समझता हूं कि ये सब पहले पाकिस्तान में हो चुका है। ये उस राजनीति का, उस समझ का, उस प्लान और साज़िश का हिस्सा है जो पहले पाकिस्तान में हो चुका है।

पाकिस्तान में सिंधु घाटी सभ्यता के बाद वे सीधे मुसलमान राज की पढ़ाई पर आ जाते हैं और बीच से हिंदू पीरियड को हटा रखा है, तो देख लीजिए वहां जैसी 'जहालत' है, वही हाल होगा। एजुकेशन सिस्टम राजनीति का हिस्सा होता है और इसलिए एजुकेशन के ऊपर इतना हंगामा होता है पर यहां जो राजनीति हो रही है उसमें हमारा एजुकेशन सिस्टम फंस गया है। लेकिन हम पाकिस्तान की राजनीति को देख चुके हैं और उसका भयानक अंजाम भी। यहां पर भी जो VHP, बजरंग दल वाले हैं उनके लिए ये एजुकेशन सिस्टम बहुत अच्छा है क्योंकि उनको नफ़रत में ही जीना है और नफ़रत ही ओढ़ना और बिछाना है।"

मुग़लों की GDP!

मुग़ल काल के दौरान की GDP पर बात करते हुए ग़ौहर रज़ा कहते हैं, "लेकिन आगे चलकर ये फंस जाएंगे, परेशानी ये होगी कि जब कुछ हिस्सा हटेगा और कुछ बचेगा तो आगे चलकर छात्र ये भी पूछेंगे कि अगर मुग़ल इतने बुरे थे तो उनके काल के आख़िर वक़्त तक वे कैसे पूरी दुनिया का एक चौथाई वेल्थ प्रोड्यूस कर रहे थे? क्यों उनकी GDP इतनी 'हाई' थी? और वे इस पैसे को कहीं ले भी नहीं जा रहे थे बल्कि उसका इस्तेमाल इसी देश में हो रहा था।"

ग़ौहर रज़ा साहब आगे कहते हैं, "ये आने वाली नस्लों के लिए बहुत ख़तरनाक है। ये दिमाग को अपंग करना चाहते हैं। इसके ख़िलाफ़ छात्रों को, उनके परिवार को, नौजवानों को आगे आना होगा और बताना होगा कि इस तरह की राजनीति हमें पसंद नहीं और हम इसका विरोध करते हैं।"

प्रोफेसर अपूर्वानंद से ख़ास बातचीत

इतिहास की किताबों से मुग़लों से जुड़े चैप्टर को हटाने के पीछे क्या राजनीति (जैसा आरोप लग रहा है) या फिर मकसद या कोशिश है, ये समझने के लिए हमने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद से बात की। उन्होंने कहा :

"एक बात तो स्पष्ट है कि ये बात सिर्फ़ आज की नहीं है बल्कि बहुत पुरानी है। 1975, 1977 से ही RSS (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) ये कोशिश करता रहा है। भारतीय जनता पार्टी की पूरी राजनीति ही भारतीय अतीत की 'उनकी परिभाषा' पर टिकी है और अब वे उसी परिभाषा को समाज में कॉमन बनाना चाहते हैं। इसमें अब तक प्रोफेशनल इतिहासकार बाधा बने हुए हैं। ये पूरी जंग इतिहास के दो इलाक़ों में लड़ी जाती है - एक प्राचीन भारतीय इतिहास और दूसरा मध्यकालीन इतिहास। मध्यकालीन इतिहास में बहुत कुछ मुग़लों का बनाया हुआ है, जिसमें मुसलमान चिन्ह आदि शामिल हैं तो भारत को आप बिना मुसलमान के समझ नहीं सकते फिर उनकी हुकूमत हो या फिर स्थापत्य कला या फिर बाक़ी चीज़ें। लेकिन जो मौजूदा राजनीति है इसमें मुग़ल इतिहास के पन्नों को हटाना इन्हें बहुत ज़रूरी लगता है। ये कहना चाहते हैं कि जो असल रंग रहा है वो हिंदू रंग रहा है और इनकी अब तक की शिकायत ये रही है कि असल चीज़ तो हिंदू थी लेकिन उसे छिपा लिया गया।

एक उदाहरण देते हुए वो समझाते हैं :

"अभी हाल ही में ICHR (Indian Council of Historical Research) ने एक बड़ी सी एग्जिबिशन की। उस एग्जिबिशन में इन्होंने कहा कि हम उन हिंदू साम्राज्य की एग्जीबिशन लगा रहे हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ किया गया है, जबकि इतिहासकारों ने कहा कि लगाई गई एग्जिबिशन में से कोई भी ऐसा हिंदू साम्राज्य नहीं है जिसे नज़रअंदाज़ किया गया हो इन सबकी चर्चा होती रही है।

दरअसल ये बार-बार लोगों के ज़हन में ये एहसास डालना चाहते हैं, ख़ासकर हिंदुओं में कि मुसलमानों को इतिहास में बढ़ा-चढ़ाकर जगह दी गई है लेकिन अब हम उनको 'उनकी जगह' पर ला देना चाहते हैं।"

इसे भी पढ़ें: इतिहास के पन्नों से मुग़लों को क्यों हटाया जा रहा है?

इसे पूरे प्रकरण के बीच, सवाल यही बना हुआ है कि अगर किताबों में ऐसा कुछ लिखा हो जिसमें सुधार की गुंजाइश हो तो उस सुधार में कोई बुराई नहीं लेकिन जब इतिहास के साथ छेड़छाड़ की जाती है तो बेहद अफसोस होता है। ये ऑर्ज ऑर्वेल की किताब 1984 की याद दिलाता है, आंखों के सामने वे लाइनें आने लगती हैं जिन्हें पढ़कर लगता है कि बदलते इतिहास इन कोशिशों को ऑर्वेल ने 1949 में ही भांप लिया था। उनकी ये लाइने बहुत कुछ बयां करती हैं :

"हर दस्तावेज को नष्ट कर दिया गया है या जालसाज़ी की गई है, हर किताब को दोबारा लिखा गया है, हर तस्वीर को फिर से रंगा गया है, हर गली, हर इमारत का नया नाम रखा गया है, हर तारीख़ बदल दी गई है और यह प्रक्रिया दिन-ब-दिन, मिनट-दर-मिनट लगातार चल रही है। इतिहास रुक गया है। कुछ भी अस्तित्व में नहीं है सिवा अनंत आज के, जहां पार्टी हमेशा सही है। बेशक, मुझे मालूम है कि अतीत की जालसाज़ी हुई है लेकिन मेरे लिए यह साबित करना असंभव है, जबकि मैंने ख़ुद जालसाज़ी की है'' 

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