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रात 10 बजे टीवी पर सांप्रदायिक चर्चा सुबह 9 बजे की कक्षाओं में मुसलमानों के लिए बन रही आफ़त

एक शिक्षिका छात्रों से अपने मुस्लिम सहपाठी को पीटने के लिए कहती है और साथ ही वह उसकी धार्मिक आस्था को लेकर टिप्पणी भी करती है, जो दर्शाता है कि नफ़रत कितनी दूर तक फैल गई है।
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फ़ोटो साभार : एमाज़ॉन

2017 के अंत में, लेखिका नाज़िया इरम की पहली पुस्तक, 'मदरिंग ए मुस्लिम', जिसे जगरनॉट ने प्रकाशित किया है, ने देश भर के इलीट स्कूलों में मुस्लिम छात्रों के ख़िलाफ़ व्यवस्थागत दुर्व्यवहार और भेदभाव को उजागर करने के मामले में काफी चर्चा छेड़ दी थी। फिर पिछले हफ्ते, जब एक शिक्षिका ने कक्षा के छात्रों से अपने सात या आठ वर्षीय मुस्लिम सहपाठी को "ज़ोर से" थप्पड़ मारने के लिए उकसाया और जिसका वीडियो वायरल हुआ, इसने भी ध्रुवीकरण की राजनीति से बच्चों को होने वाले नुकसान पर बहस फिर से शुरू कर दी है। वीडियो में, उत्तर प्रदेश के एक ग्रामीण स्कूल में यह शिक्षिका अपने छात्र के समुदाय के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी भी करती हैं। न्यूज़क्लिक ने नाज़िया इरम से भारतीय स्कूलों में भेदभाव की प्रकृति और छात्रों, शिक्षकों और देश पर इसके प्रभाव के बारे में उनकी पुस्तक के शोध के दौरान जो कुछ खोजा, उसे साझा करने का आग्रह किया। पेश हैं फ़ोन पर लिए गए साक्षात्कार के अंश।

प्रज्ञा सिंह: आपकी पुस्तक में मुस्लिम बच्चों, उनके शिक्षकों, अभिभावकों और विशेषज्ञों के अनुभवों के माध्यम से इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि इलीट भारतीय स्कूलों में सामुदायिक दुर्व्यवहार व्यवस्थागत है। मुज़फ़्फ़रनगर के एक स्कूल का वीडियो देखने के बाद क्या आपको लगता है कि इसे रोका जा सकता था? शिक्षिका की शत्रुता क्या बताती है?

नाज़िया इरम: अपनी किताब लिखते समय मैंने जो चीजें खोजीं उनमें से एक यह थी कि ज़्यादातर, दुर्व्यवहार झेलने वाले बच्चों के माता-पिता को पता होता है कि उनके बच्चे स्कूलों में क्या झेल रहे हैं, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। दूसरा, मैंने पाया कि स्कूल और शिक्षक भी इस तरह के व्यवहार के व्यापक प्रभाव को भी पूरी तरह से नहीं समझ पाए हैं और अक्सर इसे एक बदमाशी घटना के रूप में वर्णित कर दिया जाता है। कई बार कुछ नहीं कहा जाता है और मामलों को रफा-दफ़ा कर दिया जाता है। माता-पिता अक्सर स्कूल में अपने बच्चों के सामने आने वाली चुनौती का जवाब देने के तरीके खोजने के लिए संघर्ष करते हैं। कुछ छात्र घर पर जो सुनते हैं, उसे नियंत्रित करना भी एक कठिन लड़ाई है, जिसे वे फिर अपने साथ स्कूल ले जाते हैं।

समाधान ढूंढने के लिए, मैंने अपनी पुस्तक के लिए 2015 और 2016 में 12 राज्यों में 125 परिवारों से बात की थी। आश्चर्यजनक रूप से 85 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें उनके धर्म के कारण बहिष्कृत किया जाता है। जिन माता-पिता से मैं मिली उनमें से कईयों ने अपने बच्चों के प्रति दुर्व्यवहार से निपटने के लिए रणनीति भी बनाई थी। मान लीजिए कि एक बच्चा घर आया और उसने बताया कि उसके सहपाठी उससे 'पाकिस्तान चले जाने' के लिए कह रहे थे, जो कि एक बहुत ही नियमित नारा है, जिसे हम भारतीय टीवी बहसों में भी सुनते हैं। एक बच्चे के माता-पिता ने उससे कहा कि वह इसे उसी भावना से ले जैसे कि उसे पड़ोस के अन्य देशों-बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल आदि में जाने को कहा जा रहा है। इसलिए, ऐसा कर बच्चे ने उस तरह से एक आपत्तिजनक टिप्पणी को बेअसर कर दिया।

लेकिन मुझे नहीं लगता कि ऐसी 'रणनीति' आज काम करेगी क्योंकि नफ़रत अब हवा में तैर रही है।

प्रज्ञा: हवा में नफ़रत होने से आपका क्या मतलब है?

नाज़िया: कोई भी सामुदायिक दुर्व्यवहार के बारे में अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं पूछ रहा है। कोई भी समस्या के मूल कारणों पर सवाल नहीं उठा रहा है, संकट का समाधान तो दूर की बात है। हमें यह महसूस करना चाहिए कि हमारे बच्चों में जो कुछ भरा जा रहा है वह राजनीतिक खेलों का हिस्सा है और यह नफ़रत बंद होनी चाहिए। हमें समझना होगा कि यह मुस्लिम बच्चों के बारे में नहीं बल्कि सभी छोटे बच्चों के बारे में है। अब, एक स्कूल में बहुत छोटे बच्चों द्वारा एक छोटे लड़के को पीटने के इस वीडियो के बाद, हमें यह समझना चाहिए कि कैसे सभी बच्चों को नफ़रत और इससे होने वाली अराजकता का शिकार बनाया जा रहा है। यदि इसे रोका नहीं गया तो यह पहचान की परवाह किए बिना सभी बच्चों को निगल जाएगा।

प्रज्ञा: क्या आपको लगता है, जैसा कि अक्सर कहा जाता है, टीवी समाचार, विशेष रूप से इस बात के लिए ज़िम्मेदार है कि वयस्क कैसे व्यवहार करते हैं और वे बच्चों को क्या सिखाते हैं?

नाज़िया: हम टीवी पर जो देखते हैं क्या उसे समाचार कह सकते हैं? टीवी उन व्यवहारों का एक मंच बन गया है जिन्हें सभी भारतीय कभी हेय दृष्टि से देखते थे, जिसे मीडिया भी टीवी सामग्री नहीं मानता था। जिस पल आप टीवी पर इस तरह की बहस/व्यवहार की अनुमति देते हैं, आप इसे 'कूल' या सामान्य बना रहे होते हैं। जब आप टीवी बहसों में झगड़े करते हैं, तो आप लोगों से नफ़रत फैलाने का आह्वान कर रहे हैं, एक ऐसा दुष्चक्र बना रहे हैं जो कभी नहीं रुकेगा।

इस पैमाने पर गलत सूचना और दुष्प्रचार होता है कि आम नागरिक हर उदाहरण का विश्लेषण नहीं कर पाता है। कल्पना कीजिए, समाचार मीडिया ने 'जल' जिहाद जैसी चीज़ों का आविष्कार किया है। पर्याप्त सामाजिक प्रयास के बिना लोगों से इन नेरेटिवों का विरोध करने की अपेक्षा कैसे की जाती है?

प्रज्ञा: जब आपने मदरिंग ए मुस्लिम लिखी थी तो क्या आपको संदेह था कि समस्या इस हद तक बढ़ जाएगी, या कि यह ग्रामीण भारत तक पहुंच जाएगी?

नाज़िया: ऐसा न करने का कोई कारण नहीं था! हालांकि मैंने इलीट स्कूलों पर ध्यान केंद्रित किया, दुर्भाग्य से, मुझे लेखन प्रक्रिया के दौरान पता चला और डर था कि भारतीय स्कूलों, शहरी या ग्रामीण, में जो कुछ भी हो रहा है, उसका दस्तावेजीकरण नहीं किया जा रहा है।

आज भी लोग मुझे सोशल मीडिया पर दुर्व्यवहार और नफ़रत भरे हमलों वाले कमेंट्स भेजते रहते हैं। लेकिन फिर भी, रिपोर्टें 'व्यक्तिगत' बनी हुई हैं क्योंकि वे समाज में चर्चा का हिस्सा नहीं बन रही हैं। जिन व्यक्तियों ने अपने बच्चों के साथ दुर्व्यवहार का अनुभव किया है, वे समाधान की आशा करते हैं लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि कोई जादू की छड़ी या इसका त्वरित समाधान नहीं है।

प्रज्ञा: क्या आपकी पुस्तक के बाद शहर के स्कूलों और समाज में कुछ बदलाव आया है?

नाज़िया: मुझे याद है जब मैं अपनी किताब लिख रही थी तो 'इस्लामोफोबिया' को एक पश्चिमी अवधारणा के रूप में देखा जाता था। यदि किसी ने माना भी तो वे बहुत कम लोग थे कि इसकी जड़ें हमारे ड्राइंग रूम और कक्षाओं में पकड़ बना चुकी हैं। जब मैंने अपनी किताब के बारे में सोचा, तो शुरू में मेरे पति ने यह मानने से इनकार कर दिया कि स्कूलों में बच्चों के साथ दुर्व्यवहार हो रहा है। मुझे आश्चर्य हुआ कि, अगर मैं अपने परिवार को नहीं समझा सकी, तो क्या मैं किसी और को समझा पाउंगी कि बच्चे वयस्कों को घृणास्पद भाषण देते हुए सुन रहे हैं और उसे अपने साथ स्कूल ला रहे हैं? लेकिन एक बार जब मैंने लोगों पर शोध करना और जानकारी को एक साथ रखना शुरू किया, तो समस्या की गंभीरता मेरे और मेरे आस-पास के लोगों के सामने आ गई!

दूसरा, यहां नफ़रत के साथ बड़े हो रहे बच्चे दोषी नहीं हैं - उत्तर प्रदेश का वीडियो सिर्फ उस नफ़रत की अभिव्यक्ति है जो हम अपने बच्चों को सीखा रहे हैं। हालांकि, 2017 के बाद से, जिस तरह की नफ़रत हम समाज में देखते हैं वह बदल गई है। मेरे शोध से पता चला कि शिक्षक बड़े पैमाने पर मूकदर्शक बने रहते हैं – स्थिति वैसे तो पहले से ही काफी खराब थी, लेकिन अब, यह बहुत खराब हो गई है।

मेरा मानना है कि हमारे बच्चे स्कूल में जो बातें एक-दूसरे के सामने दोहराते हैं, वे वही हैं जो वे सबसे पहले रात में समाचार बुलेटिनों में सुनते हैं, वह भी अक्सर हमारे नेताओं के शब्दों में सुनते हैं। समाचार बुलेटिन बदल गए हैं, गलत सूचना और दुष्प्रचार बदल गया है, और इसी तरह नफ़रत की अभिव्यक्ति भी बदल गई है। यही बात इस स्थिति को बेहद चिंताजनक बनाती है।

ग्रामीण स्कूल मेरे शोध का क्षेत्र नहीं थे क्योंकि मैंने शहरी स्कूल जाने वाले मुस्लिम छात्रों के अनुभवों को साझा किया था। हालांकि, सभी स्कूलों में छात्रों और शिक्षकों के व्यवहार का अध्ययन किया जाना चाहिए। मुझे यह जोड़ना होगा कि यह मेरी जानकारी में आया है कि कुछ स्कूलों ने छात्रों के लिए शिकायत करने, निवारण करने, लक्षित दुरुपयोग की श्रेणी में आने वाली शिकायतों के लिए सिस्टम स्थापित किया है।

प्रज्ञा: क्या इस पर आश्चर्य करना कोई मुश्किल है कि भारत सोशल मीडिया के बिना बेहतर होता, खासकर कुछ हानिकारक परिणामों को देखते हुए?

नाज़िया: किसी ने अंतरिक्ष से ली गई पृथ्वी की दो समान तस्वीरें साझा कीं और कैप्शन में लिखा कि आपके ट्वीट करने से पहले और बाद में दुनिया एक जैसी है - इसलिए आराम से रहो! निःसंदेह, मैंने सोचा कि यह हास्यास्पद है, लेकिन यह बिल्कुल सच है। ज़ाहिर है, सोशल मीडिया लोगों को एक साथ आने की इजाजत देता है और इसलिए हमें सभी को स्पेस देने के लिए और अधिक प्रयास करने की ज़रूरत है। हमें यह समझने की ज़रूरत है कि हम जो कुछ भी देखते या पढ़ते हैं वह सटीक या विश्वसनीय नहीं होता है।

अपनी किताब पर शोध करते समय मैं जिन कुछ अभिभावकों से मिली, उन्होंने मुझसे कहा कि वे अब टीवी नहीं देखते हैं, केवल कुछ ओटीटी देखते हैं। ठीक है, लेकिन जो हवा में है उससे हम एक हद तक ही दूर रह सकते हैं। हम सभी समुदायवादी प्रचार को बंद नहीं कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए, सभी परिवार उत्तर प्रदेश के वीडियो में दिखाई गई शिक्षिका जैसा ज़हर नहीं भरा हो सकता है, लेकिन कुछ में है, और ये कहानियां आपके स्कूल जाने वाले बच्चे तक पहुंचेगी, चाहे आप घर पर टीवी देखें या नहीं। आज हमें जिस बात को मानने की ज़रूरत है वह यह है कि पूरी आबादी नफ़रत भरे नेरेटिव से प्रभावित है।

प्रज्ञा: उस संदर्भ में, क्या इस वीडियो के कंटेंट ने आपको आश्चर्यचकित किया?

नाज़िया: यह निराशाजनक, दुखद था, लेकिन दुर्भाग्य से आश्चर्य की बात नहीं थी। छह साल पहले भी, हमारे समाज में क्या हो रहा है - जैसा कि यह हमारे स्कूलों में परिलक्षित होता है - के बारे में लिखना आसान नहीं था। ईमानदारी से कहूं तो यह डरावना था। लेकिन मुसलमानों और नफ़रत की राजनीति के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने और असहमति जताने का साहस करने वाले सभी लोगों को जिस तरह की प्रतिक्रियाएं मिलती हैं – उन्हे निशाना बनाना और प्रतिशोध का डर - जो आज की स्थिति को और भी बदतर बना देता है।

आप देखिए, आज समस्या यह है कि रात 10 बजे का बुलेटिन सुबह 9 बजे की कक्षाओं में दोहराया जा रहा है। शिक्षकों को यह एहसास ही नहीं है कि वे क्या कर रहे हैं। आख़िर टीवी और अन्य स्रोतों के ज़रिए नफ़रत फैलाने वालों को ये संकेत दिया जा रहा है कि ऐसा करना अच्छा है। देश के सबसे अच्छे, सबसे महत्वपूर्ण नेता, जिन्हें रोल मॉडल माना जाता है, वे भी ऐसा कर रहे हैं। ऐसे में हम क्या होने की उम्मीद कर सकते हैं?

मूल रूप से अंग्रेज़ी में प्रकाशित इंटरव्यू को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:

Sectarian 10 pm TV Debates Create Hell for Muslims in 9 am Classes

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