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ग्रेनो: अथॉरिटी के ख़िलाफ़ फिर आंदोलन को तैयार किसान, घर-घर जाकर डरा रही पुलिस!

ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी के खिलाफ किसानों का आंदोलन 18 जुलाई से एक बार फिर शुरू हो रहा है। आरोप है कि इसे रोकने के लिए पुलिस किसानों के घर-घर जाकर उन्हें डराने की कोशिश कर रही है।
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अपने साथ वादाख़िलाफ़ी का दावा कर रहे किसान ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ फिर से आंदोलनरत होने जा रहे हैं। ये आंदोलन भारतीय किसान सभा की ओर से बुलाया गया है, जिसके तहत 18 जुलाई को बड़ी संख्या में किसान ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी के बाहर जमा होने वाले हैं।  

इस आंदोलन को धार देने के लिए युवा और बुज़ुर्ग किसान बढ़चढ़कर अपनी भागीदारी दिखा रहे हैं। इसमें भी महिला किसान गांव-गांव जाकर किसानों को जागरुक कर रही हैं, और अपने हक की लड़ाई के लिए आंदोलन में शामिल होने का आग्रह कर रही हैं। किसान के इस बड़े आंदोलन की तैयारी को देखते हुए पुलिस प्रशासन भी सकते में है, यही कारण है कि इस आंदोलन को रुकवाने के लिए 16 जुलाई की रात पुलिस की टीम किसानों के घर पहुंच गई।

इस बारे में पूरी जानकारी दी अखिल भारतीय किसान सभा के प्रवक्ता डॉक्टर रूपेश वर्मा ने। उन्होंने बताया कि 18 जुलाई के आंदोलन में किसानों को डराने के मकसद से पुलिस ने भागादौड़ी शुरू कर दी है। जिसके तहत 16 जुलाई को रात करीब 9 बजे ईटेड़ा गांव में सुरेंद्र यादव के घर और पतवारी गांव में गवरी मुखिया के घर बिसरख पुलिस के थाना अध्यक्ष और अन्य पुलिसकर्मी पहुंच गए। पुलिस कर्मियों ने इन दोनों से 18 जुलाई के ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के विरुद्ध आंदोलन में शामिल नहीं होने के लिए कहा और डराने की कोशिश की।

यहां ये कहना ग़लत नहीं होगा कि एक बार फिर पुलिस प्रशासन और ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी किसानों की हुंकार से भयभीत नज़र आ रही हैं। और हमेशा की तरह डरा-धमका कर आंदोलन को शुरू होने से पहले ही खत्म करना चाह रही है।

यही कारण है कि आंदोलन से एक रात पहले किसानों के घर पुलिस की टीम पहुंचकर उन्हें आंदोलन में शामिल नहीं होने को कह रही है। किसान सभा के जिन सदस्य गबरी मुखिया के घर पुलिस पहुंची थी, उन्होंने ख़ुद न्यूज़क्लिक को सारी बातें बताईं।

मुखिया के मुताबिक पुलिस की ओर से हमें दो विकल्प दिए गए, कि या तो कल आंदोलन के लिए मत जाओ या फिर आंदोलन की तारीख को आगे बढ़ा दो, क्योंकि जो नए सीईओ आए हैं पहले उनसे बात करनी पड़ेगी। मुखिया ने कहा कि पुलिस की इस बात पर हमने 10-12 लोगों की मीटिंग बुलाई और उन्हें अपने कार्यक्रम को न बदलने की बात कही। मुखिया ने बताया कि हमने अपनी मांगों को लेकर लखनऊ एक पत्र भेजा था, जिसके बाद हमें आश्वासन दिया गया था कि एक हाईपावर कमेटी का गठन किया जाएगा, लेकिन अब ये लोग बदल गए। ऐसे में हम आंदोलन करेंगे और अगर हमारे युवाओं या बच्चों पर मुचलके हुए तो इसे और बड़ा बनाएंगे।

गवरी मुखिया के बाद हमने किसान सभा के सदस्य और ईटेड़ा गांव में रहने वाले सुरेंद्र यादव से भी बात की, क्योंकि इनके घर भी पुलिस की टीम पहुंची थी। सुरेंद्र यादव ने बताया कि पहले थाने से फोन आया था कि दो-चार खास लोगों को लेकर थाने आ जाइए, एसओ साहब मीटिंग करेंगे। हालांकि हमने जाने के लिए वक्त मांगा तब तक वो लोग ख़ुद ही आ गए। इस दौरान उन्होंने कहा कि कल आंदोलन न करिए आगे बढ़ा लीजिए। और इसका तर्क उन्होंने दिया कि दिल्ली में बाढ़ आई हुई है, इसलिए सारी पुलिस वहां इंगेज है। हालांकि यहां सवाल ये उठता है कि उत्तर प्रदेश की पुलिस दिल्ली में क्यों इंगेज़ होगी?

ख़ैर... सुरेंद्र यादव ने बताया कि इससे पहले पुलिस की ओर से हमें नोटिस दिया गया था, जिसमें धारा 151 का ज़िक्र था। हालांकि हमारी ओर से ये कहा गया कि हम लोग कोई भी ग़ैर कानून काम नहीं कर रहे हैं। सिर्फ अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं।

यानी साफ तौर पर किसानों के घर-घर जाकर उन्हें डराने और आंदोलन को कमज़ोर करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन किसानों की ओर से कहा जा रहा है कि हम ये आंदोलन ज़रूर करेंगे और परमानेंट करेंगे।

डॉ. रुपेश वर्मा बताता हैं कि पुलिस नाजायज तौर पर किसानों की आवाज का दमन करना चाहती है, किसान सभा, गौतम बुद्ध नगर पुलिस की इस दमनकारी नीति और गैरकानूनी हरकत की निंदा करती है, पुलिस लोगों के जानमाल की सुरक्षा करने के बजाए, उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने के बजाए प्राधिकरण के एजेंट के तौर पर काम कर रही है। इसके अलावा रुपेश ने ये भी कहा कि पुलिस या प्रशासन की ओर से हमपर कितना भी दबाव बनाया जाए, लेकिन हम अपने आंदोलन से पीछे नहीं हटेंगे।

आपको बता दें कि किसानों का समर्थन करने के लिए इस आंदोलन में समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, राष्ट्रीय लोकदल, आज़ाद समाज पार्टी और सीपीएम की ओर से समर्थन दिया गया है, यानी आंदोलन में ये राजनीतिक दल भी प्रशासन के खिलाफ आवाज़ बुलंद करेंगे।

अखिल भारतीय किसान सभा की ओर से बुलाए गए इस आंदोलन के मुख्य उद्देश्य की बात करें तो अथॉरिटी और सरकार की वादाखिलाफी, भूमि अधिग्रहण कानून के तहत मुआवजा, 10 प्रतिशत आबादी भूखंड, 17.5 प्रतिशत कोटा, लीजबैक, प्राधिकरण की भूखंड परियोजना में शिफ्टिंग पॉलिसी, रोजगार आदि है।

किसानों का कहना ये है कि उनकी ज़मीन नए उद्योग लगाने के नाम पर ली गई थी, लेकिन अब उसे कमर्शियल रेसिडेंट के तहत बेच दिया गया है, जिसके कारण वहां रोज़गार पैदा करने की बजाय बिल्डिंग्स खड़ी कर दी गई हैं, और उसमें फ्लैट्स बनवा दिए गए हैं।

इन तमाम मांगों को लेकर किसान सभा ने ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी के खिलाफ 7 फरवरी 2023 को अपना आंदोलन शुरू किया था, जिसके तहत किसान सभा ने 7 मार्च, 14 मार्च, 23 मार्च को एक-एक दिन का प्रदर्शन किया, जिसमें हजारों की संख्या में किसान शामिल हुए। 23 मार्च तक कोई नतीजा न निकलने पर किसान सभा ने 25 अप्रैल से रात दिन का धरना शुरू करने का फैसला किया था, जिसमें 6 जून तक अथॉरिटी के अधिकारी किसानों के 10 प्रतिशत प्लाट और अन्य बड़े मुद्दों पर ठोस कदम उठाने में आनाकानी करते रहे, 6 जून को अथॉरिटी के अधिकारियों ने पुलिस प्रशासन के अधिकारियों के साथ किसानों के धरना प्रदर्शन को जबरन खत्म करने की कोशिश की और रात के वक्त 33 किसानों को गिरफ्तार कर लिया। आरोप है कि गिरफ्तारी के विरोध में सैकड़ों किसान पुलिस लाइन का घेराव करने पहुंचे तो पुलिस ने उन पर बर्बर लाठीचार्ज कर दिया, इस खबर को सुनकर सभी किसान संगठन और विपक्षी पार्टियों ने किसान सभा को अपना समर्थन दिया और किसान सभा के साथियों ने अन्य सभी किसान संगठनों के साथ मिलकर 7 जून से धरना स्थल पर फिर से कब्जा कर लिया, जिसके बाद मजबूरन दादरी विधायक को बीच में लाकर किसानों के साथ बातचीत शुरू की गई, बातचीत बीच में ही फेल हो गई।

इसके बाद 16 जून से बातचीत में राज्यसभा सांसद सुरेंद्र नागर समेत और सांसद महेश शर्मा जैसे बड़ी शख्सियतों को शामिल किया गया। जिसके बाद प्रशासन की ओर से 15 जुलाई तक एक हाई पावर कमेटी का गठन करने का आश्वासन दे दिया गया, फिर 33 किसानों की रिहाई और सांसद सुरेंद्र नागर के समझाने पर किसानों ने 24 जून को प्रदर्शन स्थगित कर दिया। लेकिन कमेटी गठित होने की तय तारीख से पहले ही 6 जुलाई को अथॉरिटी ने वादाखिलाफी कर दी, और हाईपॉवर कमेटी के गठन से इनकार करते हुए किसान सभा को एक लैटर दिया।

अगले ही दिन यानी 7 जुलाई को किसान सभा ने अपनी बैठक बुलाई और 18 जुलाई से आंदोलन की घोषणा कर दी।

हालांकि बैठक के बाद किसानों ने अथॉरिटी और राज्यसभा सांसद सुरेंद्र नागर को चेतावनी दी थी कि वह किसानों के साथ किए गए समझौते का पालन 18 जुलाई से पहले करें, अन्यथा सरकार और भाजपा को किसानों के साथ किए गए धोखे की राजनीतिक कीमत 2024 के लोकसभा चुनाव में चुकानी पड़ेगी।

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