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हिमाचल प्रदेश : क़र्ज़ के बोझ तले दबी है जनता

हिमाचल प्रदेश की 'डबल इंजन' सरकार, केंद्र सरकार के इशारे पर बाज़ारों से क़र्ज़ ले रही है।
Himachal Pradesh
Image courtesy : Outlook India

पर्वतीय राज्य हिमाचल प्रदेश के लोग और आने वाली राज्य सरकारें निवर्तमान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार के कामों को निराशा की नजर से देखेंगी। क्योंकि हिमाचल की भाजपा सरकार प्रदेश को कर्ज़ के पहाड़ नीचे छोड़ कर जाएगी, जिसका अनुमान चालू वित्त वर्ष के बजट में 74,686 करोड़ रुपये का है। 

मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर के तहत पिछले पांच वर्षों के भाजपा शासन के दौरान, राज्य का कर्ज़ आश्चर्यजनक रूप से 58 प्रतिशत बढ़ गया है। (नीचे चार्ट देखें) इसका मतलब यह है कि हिमाचल प्रदेश का हर एक निवासी - नवजात शिशुओं से लेकर वरिष्ठ नागरिकों तक - 1 लाख रुपये से अधिक के कर्ज़ में डूबा हुआ है।

ध्यान दें कि यह सिर्फ राज्य सरकार का कर्ज़ है: भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार भी अपनी ओर से भारी कर्ज लेने की एक समान नीति पर चल रही है, इतना ही नहीं जून 2022 तक केंद्रीय वित्त मंत्रालय की तिमाही रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार का कुल कर्ज़ 141 लाख रुपये से अधिक था।

यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि यह बकाया देनदारियों की संख्या हैं और इनमें राज्य सरकार की गारंटी शामिल नहीं है। जब राज्य की सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम वित्तीय संस्थानों से पैसा उधार लेते हैं, तो राज्य सरकार गारंटी देती है कि वह किसी भी डिफ़ॉल्ट या कर्ज़ न चुकाने के मामले में कर्ज़ वापस कर देगी।

एक गैर-लाभकारी विधायी अनुसंधान निकाय, पीआरएस इंडिया द्वारा उद्धृत राज्य बजट दस्तावेजों के अनुसार, 2020-21 के अंत में, हिमाचल प्रदेश की बकाया गारंटी जीएसडीपी (सकल राज्य घरेलू उत्पाद) का 1.37 प्रतिशत अनुमानित थी, जिसमें बिजली क्षेत्र और राज्य बिजली बोर्ड में गारंटी के स्तर में वृद्धि हुई थी।

यह भविष्य से समझौता है

वर्तमान में वित्तीय वर्ष 2022-23 में राज्य सरकार का कुल कर्ज़ जीएसडीपी का लगभग 40.49 प्रतिशत है। यह रिकॉर्ड ऊंचाई पर है। अनुमानों के अनुसार, आने वाले वर्षों में राज्य का कर्ज थोड़ा निचले स्तर पर चला जाएगा। पीआरएस के अनुसार, 2025-26 में कर्ज जीएसडीपी का 39.49 फीसदी अनुमानित है।

इसका मतलब यह है कि यह कर्ज़ के जल्द ही चुकाए जाने की कोई संभावना नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उधार को एक निश्चित अवधि में चुकाना पड़ता है और इस बीच, अधिक उधार जमा हो सकता है। इसलिए आने वाले समय में भी उस कर्ज को चुकाया जाएगा जिसे अब लिया जा रहा है। 

इस बीच, कर्ज़ के ब्याज भुगतान हर साल किया जा रहा है। बजट दस्तावेजों के अनुसार, कर्ज की अदायगी ने 2020-21 में 4,387 करोड़ रुपये की थी और चालू वित्त वर्ष में जिसके 5,342 करोड़ रुपये होने की उम्मीद है।

उधार कहाँ से आ रहा है?

यह देखना शिक्षाप्रद होगा कि हिमाचल सरकार यह सारा पैसा कहां से उधार ले रही है। भारतीय रिजर्व बैंक के डेटाबेस में उपलब्ध ब्रेक-अप के अनुसार, मार्च 2020 के अंत में, राज्य का कर्ज 62,218.4 करोड़ रुपये था, जिसमें से आंतरिक उधार 39,527.8 करोड़ रुपये था। इस आंतरिक उधार में मुख्य रूप से राज्य विकास उधार (एसडीएल) के माध्यम से बाजार का उधार शामिल हैं, जो केंद्र सरकार के नियमन के तहत राज्य सरकारों द्वारा जारी बांड के एवज़ में लिया जाता है। 2019-20 के लिए उपरोक्त उदाहरण में हिमाचल का एसडीएल 28,142.2 करोड़ रुपये था। यानी, एसडीएल में आंतरिक उधार लगभग 71 प्रतिशत और कुल उधार का लगभग 45 प्रतिशत था। इस प्रकार ये उधार वाणिज्यिक ब्याज दरों द्वारा निर्धारित किए जाते हैं और इनके पुनर्भुगतान का क्रम काफी सख्त होता है। 

उधार का एक अन्य प्रमुख स्रोत भविष्य निधि है जिससे हिमाचल सरकार ने 15,537 करोड़ रुपये या अपनी उधारी का लगभग 25 प्रतिशत लिया था। इसके अलावा राष्ट्रीय लघु बचत कोष (एनएसएसएफ), नाबार्ड और विभिन्न बीमा कंपनियों से भी कर्ज़ लिया गया है।

गैर-उत्साही वित्तीय प्रदर्शन

कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि यदि आम लोगों के लाभ के लिए धन का उपयोग किया जाता है तो उधार लेने में कोई बुराई नहीं है। वास्तव में, उत्पादक क्षमता या वित्तीय बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए अक्सर बाजार से उधार की जरूरत होती है। लेकिन हिमाचल प्रदेश सरकार के प्रदर्शन पर एक नज़र डालने से पता चलता है कि ये उधार वास्तव में तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का वित्तपोषण नहीं कर पा रहे हैं। बल्कि इनका इस्तेमाल सिर्फ राज्य सरकार को बचाए रखने के लिए किया जा रहा है.

वास्तव में, जैसा कि नीचे दी गई तालिका से पता चलता है, भाजपा सरकार कई महत्वपूर्ण व्यय मदों पर आवंटित धन को भी खर्च करने में असमर्थ रही है। डेटा 2020-21 का है, पिछले वर्ष जिसके लिए वास्तविक व्यय के आंकड़े उपलब्ध हैं।

कई प्रमुख क्षेत्रों, जैसे कि शिक्षा, ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य और कृषि और जल आपूर्ति - राज्य में सभी ज्वलंत मुद्दों पर किया गया खर्च आवंटित राशि से कम था। यह महामारी का वर्ष था और कोविड महामारी के हमले से जूझ रहे लोगों को अधिकतम सहायता प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए था। स्वास्थ्य क्षेत्र में भी खर्च में 16 प्रतिशत की कमी नज़र आई है!

स्पष्ट रूप से, भाजपा सरकार केवल कम टैक्स व्यवस्था को जारी रखने और वित्त का इतना अधिक कुप्रबंधन करने के लिए भारी उधार ले रही है और इसलिए वह आवंटित धन को भी खर्च नहीं कर रही है।

हिमाचल का कर-से-जीएसडीपी अनुपात सबसे कम है और खुद के टैक्स राजस्व के मुख्य स्रोत एसजीएसटी और उत्पाद शुल्क हैं। यहां केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को माल और सेवा कर (जीएसटी) मुआवजा उपकर का समय पर भुगतान नहीं करने की चाल ने राज्य को (कई अन्य राज्यों की तरह) वाणिज्यिक उधार लेने पर मजबूर किया है।

कुल मिलाकर, भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकार का प्रदर्शन वांछित परिणाम से बहुत पीछे रह जाता है और यह आश्चर्य की बात नहीं है कि राज्य विधानसभा के लिए हो रहे चुनाव अभियान में, इसे मतदाताओं के भारी असंतोष और गुस्से का सामना करना पड़ सकता है।

मूल रूप से अंग्रेज़ी में प्रकाशित साक्षात्कार को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करेंः

People Face a Mountain of Debt in Himachal Pradesh

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