Skip to main content
xआप एक स्वतंत्र और सवाल पूछने वाले मीडिया के हक़दार हैं। हमें आप जैसे पाठक चाहिए। स्वतंत्र और बेबाक मीडिया का समर्थन करें।

सियासत: अनिश्चितता व आशंकाओं से भरा माहौल और विपक्ष की चुनौतियां

चुनाव तैयारी के साथ विपक्ष को सरकार तथा हिंदुत्व-ब्रिगेड के संविधानेतर लोकतंत्र-विरोधी अभियान का भी मुकाबला करना होगा।
INDIA
फ़ोटो साभार : ट्विटर

राष्ट्रीय राजनीति में इतनी अनिश्चितता और आशंकाओं भरा माहौल शायद ही कभी रहा हो। विपक्ष द्वारा भारी दबाव और आलोचना के बाद सरकार ने 18 सितंबर से आहूत संसद के विशेष सत्र के एजेंडा का आंशिक खुलासा किया है, जिसमें चुनाव आयुक्तों की चयन समिति से CJI को बाहर करने का खतरनाक बिल तथा कुछ pending बिल शामिल हैं, पर अभी भी मोदी-शाह और उनके चुनिंदा लोगों के अलावा कोई नहीं जानता कि इस सत्र का असली मकसद और एजेंडा क्या है। सम्भव है जो आंशिक खुलासा किया गया है, वह विपक्ष और देश को गफलत में रखने के लिए बस tip of the iceberg हो !

आज कोई नहीं जानता, एक राष्ट्र एक चुनाव का जो राग छेड़ा गया है, अंततः इसके क्या implications होने जा रहे हैं। क्या संविधान के साथ कुछ गम्भीर छेड़छाड़ की तैयारी है ? क्या दूरगामी महत्व के कुछ बिल पेश होने वाले हैं? आखिर आम चुनाव कब होगा और यह किस तरह का चुनाव होगा ? हालत यह है कि आसन्न विधानसभा चुनावों की टाइमिंग को लेकर भी अनिश्चितता का वातावरण बन गया है।

बहरहाल विपक्ष को छकाने और भरमाने वाले मोदी सरकार के mega-events और चौंकाने वाले तमाम unpredictable कारनामों के बीच जनता भी अपनी ओर से कुछ सन्देश दे रही है।

G20 द्वारा मोदी जी की larger than life छवि गढ़ने की जो कवायद थी, ऐन उसी वक्त आये 6 राज्यों के विधानसभा उपचुनावों के नतीजों ने उसके गुब्बारे की हवा निकाल दी।

यह सचमुच अचरज में डालने वाला था कि घोसी की एक गुमनाम सीट के उपचुनाव ने जो लोकसभा की भी नहीं, बल्कि महज विधानसभा सीट थी, राजनीतिक हलकों और मीडिया में हलचल मचा दी। इसे मौजूदा असाधारण राजनीतिक दौर की ही विशेषता (characteristic) मानना चाहिए।

उपचुनावों विशेषकर घोसी के नतीजों ने G20 के जश्न और यूफोरिया पर पानी फेर दिया। इसने गोदी मीडिया के तमाम surveys द्वारा मोदी की पुनर्वापसी के पक्ष में गढ़े जा रहे माहौल को फुस्स कर दिया। दरअसल विपक्षी गठबंधन INDIA की बढ़ती हलचलों के बीच उपचुनावों की टाइमिंग ऐसी रही कि इसने स्वतः ही इसे NDA बनाम INDIA बना दिया और यह साबित हो गया कि NDA के सामने INDIA अब एक प्रबल चुनौती बन कर खड़ा हो गया है।

उपचुनाव में अपने शासन वाले दो छोटे राज्यों त्रिपुरा और उत्तराखंड की सीटों को किसी तरह हासिल करने में भाजपा भले कामयाब रही, पर पश्चिम बंगाल, केरल, झारखंड और UP में उसे जैसी हार का सामना करना पड़ा है, वह आगामी लोकसभा चुनावों के लिए उसके लिए खतरे की घण्टी है।

भाजपा की दृष्टि से सबसे विध्वंसक नतीजा देश में उनके सबसे बड़े गढ़ UP से ही आया है।

दरअसल, 80 सीटों वाला UP देश का शायद वह इकलौता राज्य है जहाँ मोदी-योगी के ' संयुक्त करिश्मे ' के बल पर भाजपा सीटों के घटने की बजाय बढ़ने की चर्चा होती है! गोदी मीडिया में उनके समर्थक विश्लेषक और चुनावी सर्वे इस बार भाजपा गठजोड़ की सीटें 2019 के 64 से बढ़कर 2014 की 73 सीटों या उसके भी ऊपर पहुंचने की भविष्यवाणी कर रहे हैं !

उधर अमित शाह ने हाल ही में अतिपिछड़े समुदाय के प्रभावशाली नेताओं ओम प्रकाश राजभर और दारा चौहान को, जो विधानसभा चुनाव के समय विपक्ष के साथ चले गए थे, पुनः अपने साथ जोड़कर, पुनर्गठित NDA में शामिल करा लिया था।

बहरहाल, पूर्वांचल की इन अतिपिछड़े नेताओं की गढ़ घोसी सीट पर भाजपा को 42 हजार से अधिक margin से बड़ी हार का सामना करना पड़ा। गौरतलब है कि यही पूर्वांचल स्वयं योगी आदित्यनाथ की भी कर्मभूमि और उनकी ताकत का सबसे बड़ा आधार है।

कुछ विश्लेषक घोसी के नतीजों को यह स्पिन देने की कोशिश कर रहे हैं कि स्वयं योगी जी ओमप्रकाश राजभर को पसंद नहीं करते और अमित शाह ने दारा सिंह चौहान-राजभर को जिस तरह थोपा था, योगी उससे नाराज थे। इन कहानियों की सच्चाई जो भी हो, उनकी आड़ में इस सबसे बड़े सच को झुठलाया नहीं जा सकता कि योगी चाहे जो कर लेते, किसी भी हाल में घोसी चुनाव भाजपा को जिता नहीं सकते थे।

दरअसल, इस चुनाव को जीतने के लिए भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी थी और कुछ भी उठा नहीं रखा- दोनों उपमुख्यमंत्री, सरकार के दो दर्जन मंत्री, उनके सभी सहयोगी दलों के नेता, राज्य के तमाम इलाकों से संघ-भाजपा के सैकड़ों कार्यकर्ता वहां कैम्प किये रहे, स्वयं योगी ने रैली की जिसमें अगल-बगल के तमाम जिलों से भीड़ जुटाई गई। सरकारी मशीनरी का जमकर दुरुपयोग किया गया। यहां तक कि चुनाव के दिन विपक्ष के कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को विशेषकर अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में डराने-धमकाने और मतदान से रोकने की कोशिश की गई। लेकिन प्रबल जनभावना और एकजुट विपक्ष के प्रतिरोध के आगे यह सारी कवायद धरी रह गयी और भाजपा बड़े अंतर से चुनाव हार गई।

जाहिर है जहाँ पूरी सरकार चुनाव लड़ रही हो, वहां प्रत्याशी का फैक्टर गौण हो जाता है। ऐसी सर्वांगीण और निर्णायक पराजय का मूल कारण प्रत्याशी से नाराजगी जैसे स्थानीय या तात्कालिक कारक नहीं हो सकते। यह जनादेश निश्चित रूप से भाजपा के खिलाफ है।

भाजपा के लिए यह सचमुच बड़े खतरे की घण्टी है और उनके नेताओं की नींद उड़ा देने के लिए पर्याप्त है कि जिस सवर्ण समुदाय को वह अपना core voter मानती है, उसमें विपक्ष ने भारी सेंधमारी कर दी और जो अतिपिछड़े समुदाय 2014-17 से 2022 तक UP में उनके अभूतपूर्व उभार के सबसे मजबूत स्तम्भ बने हुए थे, उनके बीच विभाजन पैदा कर, उनके एक हिस्से को जीतने में विपक्ष कामयाब रहा।

बसपा चुनाव मैदान में नहीं थी और अंतिम क्षणों में बसपा नेताओं ने नोटा बटन दबाने या मतदान से अलग रहने की अपील की थी।

बहरहाल नतीजों से साफ है कि अधिसंख्य दलित समुदाय के मतदाताओं ने नोटा दबाने, घर बैठ जाने अथवा भाजपा के लिए मतदान करने की बजाय विपक्षी उम्मीदवार को पसंद किया। दरअसल, अब यह एक ट्रेंड जैसा दिख रहा है कि बसपा जब नहीं लड़ रही तब दलित वोट, विशेषकर बसपा के जनाधार का बहुसंख्य जाटव वोट भाजपा के खिलाफ विपक्ष के साथ जा रहा है- सुदूर पश्चिम के खतौली से लेकर पूर्वांचल के आखिरी छोर घोसी तक की एक ही कहानी है।

2024 में INDIA गठबंधन की ओर से कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे के UP से लड़ने और चंद्रशेखर आज़ाद के खुलकर गठबंधन के साथ आने की खबरें सच साबित हुईं तो यह ट्रेंड और मजबूत हो सकता है और बसपा सुप्रीमो मायावती भी नए सिरे से stand लेने और पुनर्विचार के लिए प्रेरित हो सकती हैं। साथ ही नीतीश कुमार की सक्रियता UP में बढ़ती है तो पिछड़े, अतिपिछड़े समुदाय की राजनीति का नया ध्रुवीकरण आकार ले सकता है। जाति-जनगणना और संविधान की रक्षा का सवाल जिस तरह विपक्षी गठबंधन के प्रमुख एजेंडा के रूप में उभर रहा है, यह भाजपा विरोधी सामाजिक ध्रुवीकरण को नया आवेग दे सकता है।

योगी सरकार घोसी में रामपुर के मॉडल पर सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल कर मुसलमानों को मतदान से रोकने में सफल नहीं हो पाई। यह मुस्लिम अवाम के प्रतिरोध, विपक्ष के जुझारू तेवर और प्रतिरोध तथा बदले सामाजिक संतुलन के कारण सम्भव हुआ। 2024 के लिए यह नया मॉडल बन सकता है।

विपक्ष घोसी मॉडल से जरूरी सबक लेते हुए सटीक रणनीति के साथ आगे बढ़ा, तो लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है और UP का उसका अभेद्य लगने वाला किला दरक सकता है।

घोसी तथा अन्य चुनाव नतीजों का सन्देश बिल्कुल साफ है। मोदी-योगी, हिंदुत्व का तिलस्म टूट रहा है। मोदी मैजिक जो बड़े बड़े झूठे सपने बेचकर हिंदुत्व-राष्ट्रवाद और लाभार्थी कार्ड द्वारा गढ़ा गया था, उसकी चमक फीकी पड़ चुकी है। G 20 जैसे तमाशे अब जनता को आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं। महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक बदहाली से पैदा जिंदगी के असल सवाल भारी पड़ रहे हैं। जनता के अंदर गहरी बेचैनी है। जमीन पर भाजपा सरकार के ख़िलाफ़ जबर्दस्त silent आक्रोश खदबदा रहा है, सटीक रणनीति द्वारा एकताबद्ध विपक्ष ने उसे राजनीतिक स्वर दिया, तो मोदी-शाह की तीसरे कार्यकाल की महत्वाकांक्षा पर विराम लग सकता है।

जाहिर है मोदी-शाह को इसका पूर्वाभास है। इसीलिए, जैसे जैसे सरकार अपनी लोकप्रियता और वैधता खोती जा रही है तथा लोकतांत्रिक ढंग से अपनी पुनर्वापसी को लेकर असुरक्षित होती जा रही है, यह आशंका गहराती जा रही है कि मोदी-शाह लोकतांत्रिक प्रक्रिया से सत्ता हस्तांतरण को सम्भव होने देंगे या वे अपने अधिनायकवादी दुस्साहस में देश को किसी बड़े संकट में धकेलने की तैयारी में हैं ?

क्या " एक राष्ट्र, एक चुनाव " की कवायद के माध्यम से संविधान से छेड़छाड़ और अपने मनोनुकूल समय तक चुनाव टालने की तैयारी हो रही है ?

उधर लव-जेहाद, धर्मांतरण व सनातन को मुद्दा बनाकर 30 सितंबर से बजरंग दल की शौर्य जागरण यात्रा शुरू हो रही है और आने वाले महीनों में राममंदिर के उद्घाटन को केंद्र कर हिंदुत्व की उन्मादी लहर खड़ा करने की तैयारी है।

आज लोकतंत्र और संविधान की हिफाजत के लिए विपक्ष को दोनों स्तर पर निपटने की तैयारी करनी होगी- लोकतांत्रिक चुनावों में मोदी-भाजपा को शिकस्त देने की रणनीति तो बनानी ही होगी, साथ ही सरकार तथा हिंदुत्व-ब्रिगेड दोनों के लोकतंत्र-विरोधी संविधानेतर दुस्साहसवाद के खिलाफ भी जुझारू लोकतांत्रिक जनप्रतिरोध खड़ा करना होगा।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

अपने टेलीग्राम ऐप पर जनवादी नज़रिये से ताज़ा ख़बरें, समसामयिक मामलों की चर्चा और विश्लेषण, प्रतिरोध, आंदोलन और अन्य विश्लेषणात्मक वीडियो प्राप्त करें। न्यूज़क्लिक के टेलीग्राम चैनल की सदस्यता लें और हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित हर न्यूज़ स्टोरी का रीयल-टाइम अपडेट प्राप्त करें।

टेलीग्राम पर न्यूज़क्लिक को सब्सक्राइब करें

Latest