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क्या यह महज़ ‘दरबारी पूंजीवाद’ है!

इन संभावित ‘विजेताओं’ के छांटे जाने में किसी भी ‘खेल के नियमों’ का अनुसरण नहीं किया जाएगा। इसमें तो सीधे-सीधे शासन की मदद से ऐसे इजारेदार पूंजीपतियों के साम्राज्यों को आगे बढ़ाया जाएगा, जिनके साथ हिंदुत्ववादी तत्वों का गठजोड़ हो चुका है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार : गूगल

फासिस्ट तत्व तो हर आधुनिक समाज में ही होते हैं। लेकिन, आम तौर पर ये हाशियाई, गैरमहत्वपूर्ण या मामूली तत्वों की हैसियत में ही रहते हैं। वे मंच के केंद्र में तभी पहुंचते हैं, जब उन्हें इजारेदार पूंजी का समर्थन मिलता है जो उन्हें इसके लिए ढेर सारा पैसा तथा मीडिया कवरेज मुहैया कराती है। और यह तब होता है जब ऐसा पूंजीवादी संकट पैदा हो जाता हैजो बेरोजगारी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी कर देता है और इजारेदार पूंजीवाद को तब तक हासिल रहे वर्चस्व पर सवालिया निशान खड़े कर देता है।

फासीवादी तत्व और नयी इजारेदार पूंजी का गठजोड़

ऐसे हालात में फासीवादी तत्वों की भूमिका यही होती है कि विमर्श में एक भटकाव पैदा कर दें ताकि इस संकट से ग्रसित पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत जीने का जो बुनियादी विषाद है उसे किसी असहाय धार्मिक या इथनिक या भाषायी अल्पसंख्यक समूह के खिलाफ घृणा तथा शत्रुता फैलाने के जरिए ढांपने का प्रयास किया जा सके। इसके अलावा, जब फासीवादी तत्व सत्ता में आते हैं, तो जाहिर है कि सरकारी दमनतंत्र का उपयोग किया जाता है और स्वयंभू-रक्षक समूहों के रूप में उसके अपने फासीवादी गुंडों का, उसका निशाना बनने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ और चिंतकों, बुद्धिजीवियों, राजनीतिक विरोधियों तथा स्वतंत्र अकादमिकों के खिलाफ, इस्तेमाल किया जाता है।

भारत पूरी तरह से इसी पैटर्न पर चल रहा है। बहरहाल, एक अतिरिक्त तत्व भी है, जो फासीवादी गुटों के राजनीतिक सत्ता तक पहुंचने के साथ लगा रहता है। इजारेदार पूंजीवाद के दायरे में से भी, कोई नया-नया उदीयमान तत्व, ‘नया इजारेदार पूंजीपति’ उदित होता है, जो फासीवादी ग्रुपों के साथ खासतौर पर घनिष्ठ रिश्ता हासिल कर लेता है। जाने-माने फ्रांसीसी अराजकतावादी-मार्क्‍सवादी, डेनियल गुएरिन ने अपनी पुस्तक, फासिज्म एंड बिग बिजनेस में यह तर्क दिया था कि जर्मनी में नये-नये उभरते हुए इजारेदार पूंजीपति, जो इस्पात, माल उत्पादन, हथियार तथा गोला-बारूद आदि क्षेत्रों में उभर कर आए थे, 1930 के दशक में नाजियों को खासतौर पर पुख्तगी से समर्थन देते रहे थे, जबकि कपड़ा तथा उपभोक्ता माल जैसे क्षेत्रों में लगे पुराने इजारेदार पूंजीपतियों का, उन्हें वैसा पुख्ता समर्थन नहीं था। यह कहने का अर्थ यह संकेत करना नहीं है कि इजारेदारों का यह बाद वाला समूह, नाजियों को समर्थन देता ही नहीं था। वास्तव में जाने-माने अर्थशास्त्री, मिशेल कलैकी तो नाजी निजाम को, फासीवादी नौसिखियों और बड़े कारोबारियों के बीच की साझेदारी के रूप में ही पेश करते हैं और इन बड़े कारोबारियों के बीच कोई विभाजन ही नहीं करते हैं। बहरहाल, यह एक तथ्य है कि नये इजारेदार ग्रुप ही हैं जो फासीवादी तत्वों को कहीं ज्यादा सकर्मक, कहीं ज्यादा आक्रामक समर्थन मुहैया कराते हैं।

गठजोड़ का भारतीय पैटर्न

इसी प्रकार, जापान में इजारेदार पूंजीपतियों के उदीयमान नये ग्रुप या शिंको जैबत्सु फर्म, जैसे निस्सान तथा मोरी ही थे, जो 1930 के दशक में जापानी सैन्य-फासिस्टी निजाम को समर्थन देने में कहीं ज्यादा आक्रामक थे, जबकि पुराने जैबत्सु, जिनमें मित्सुई, मित्सुबिशी तथा सुमितोमो जैसे कारोबार घराने आते थे और जो पहले जापानी औद्योगीकरण की अग्रिम पंक्ति में रहे थे, इस निजाम के समर्थन में इतने आक्रामक नहीं थे। पुन: आशय यह नहीं है कि पुराने इजारेदाराना घराने फासीवादी निजाम का समर्थन नहीं करते थे; जाहिर है कि वे भी इस निजाम का समर्थन करते थे। आखिरकार, मित्सुबिशी तो जहाज निर्माण से जुड़ा हुआ था। और उनके इसी समर्थन का नतीजा था कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद, जापान में जनरल डगलस मैकार्थर के नेतृत्व में जो अमरीकी कब्जावर निजाम कायम हुआ था, उसने पुराने जैबत्सु घरानों को भी भंग कर दिया था, हालांकि यह दूसरी बात है कि आगे चलकर वे विभिन्न रूप धारण कर के फिर से उभरकर सामने आ गए। फिर भी सैन्य-फासीवादी निजाम के लिए नये इजारेदार घरानों का ही समर्थन मुकम्मल, पूर्ण और कहीं ज्यादा आक्रामक रहा था।

इस मामले में भी भारतीय उदाहरण, पूरी तरह से इसी पैटर्न का अनुसरण करता है। अडानी और अंबानी जैसे नये इजारेदार घराने, मोदी निजाम के अपने समर्थन में कहीं ज्यादा आगे रहे हैं और इस तरह के समर्थन से उन्होंने बहुत भारी लाभ भी बटोरा है। पुराने तथा स्थापित इजारेदार घराने, उनके मुकाबले कहीं पीछे रहे हैं, हालांकि वे भी मोदी निजाम को अपना समर्थन देने के मामले में किसी भी तरह से अनिच्छुक नहीं रहे हैं। टाटा घराने के मुखिया तो हिंदुत्ववादी सांप्रदायिकता के निजाम से अपनी नजदीकी को रेखांकित करने के लिए, नागपुर में आरएसएस के मुख्यालय भी गए थे।

नये इजारेदार तत्वों के साथ खासतौर पर और इजारेदार पूंजी के साथ आम तौर पर, मोदी सरकार के घनिष्ठ रिश्ते को अक्सर ‘दरबारी पूंजीवाद’ कह दिया जाता है। बहरहाल, इस तरह की प्रस्तुति सत्तारूढ़ फासीवादी तत्वों और इजारेदार पूंजी तथा खासतौर पर नयी इजारेदार पूंजी के बीच की मिलीभगत की घनिष्ठता को, कम कर के ही दिखाती है। यह प्रस्तुति, भारत में इस रिश्ते की खासियत, उसकी अनोखी प्रकृति को छोड़ ही देती है, जबकि इस रिश्ते को कारपोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ की संज्ञा ज्यादा बेहतर तरीके से पकड़ पाती है। यह तो ऐसे ही है जैसे सारे आधुनिक पूंजीवाद पर लागू होने वाली एक सर्वसमेटू संज्ञा का उपयोग, फासीवादी तत्वों के उभार के खास हालात पर करने का प्रयास किया जाए और इस प्रक्रिया में, इन तत्वों के उभार की विशिष्टता को ही छूट जाने दिया जाए।

इजारेदारी के दौर में दरबारी पूंजीवाद

वास्तव में एक अर्थ में तो सारा का सारा पूंजीवाद ही दरबारी पूंजीवाद होता है। बेशक, कुछ ‘खेल के नियम’ तो होते हैं, जिनका पालन करना होता है, लेकिन इन नियमों के दायरे में भी, ‘दरबारियों’ के पक्ष में, पक्षपात चलता है। मिसाल के तौर पर कोई ठेका लेने के लिए, सभी दावेदारों को कुछ न्यूनतम शर्तें तो पूरी करनी होती हैं, लेकिन इन शर्तों की परीक्षा में सफल होने वालों के बीच से भी ठेका उसी को मिलता है जिसके उपयुक्त ‘संपर्क’ हों या जो उपयुक्त पब्लिक स्कूल से पढक़र निकले हों या जिनकी ‘पृष्ठभूमि’ मजबूत हो। दूसरे शब्दों में पूंजीवाद के अंतर्गत ठेके कभी भी आंख पर पट्टी बांधकर नहीं बांटे जाते हैं। हां! इतना जरूर है कि आंख की पट्टी का सरकाया जाना, यह व्यवस्थागत तरीके से पक्षपात, ‘खेल के कुछ नियमों’ के दायरे तक ही रहता है।

बेशक, इजारेदार पूंजीवाद के अंतर्गत, इजारेदार पूंजीपतियों और राज्य के बीच यह रिश्ता बहुत घनिष्ठ हो जाता है। रुडोल्फ हिल्फर्डिंग ने अपने महाग्रंथ, डास फिनान्जकॉपीटल में बैंकों तथा औद्योगिक पूंजी के बीच एक ‘निजी गठबंधन’ और उसके आधार पर एक ‘वित्तीय कुलीनतंत्र’ के बनने की बात की है और ‘वित्तीय कुलीनतंत्र’ और राज्य के बीच भी, ऐसे ही ‘निजी गठबंधन’ की ओर इशारा किया है। बहुराष्‍ट्रीय कारपोरेशनों के पदाधिकारियों को शासन में वरिष्ठ पदों पर नियुक्त किया जाता है और इसी प्रकार, शासन में वरिष्ठ पदों पर बैठे लोग, बड़ी आसानी से बहुराष्‍ट्रीय निगमों में वरिष्ठ एक्जिक्यूटिव पदों पर खिसक जाते हैं। इस तरह राजकीय नीति, इजारेदार पूंजीपतियों के हितों की सेवा करनेे के हिसाब से ढल जाती है। बहरहाल, यह सब फिर भी कुछ ‘खेल के नियमों’ के दायरे में होता है और ये नियम चाहे कितने ही ज्यादा इजारेदार पूंजीपतियों के पक्ष में झुके हुए हों, उन्हें बनाए जरूर रखा जाता है।

जब सीआइए ने ग्वाटेमाला में जोकोबो अर्बेन्ज की सरकार को गिराने के लिए तख्तापलट कराया था, क्योंकि उसके लाए भूमि सुधारों से अमरीका की यूनाइटेड फ्रूट कंपनी पर चोट पड़ी थी या जब सीआइए तथा एमआइ-6 ने ईरान में प्रधानमंत्री मोसद्देह के खिलाफ तख्तापलट कराया था क्योंकि उन्होंने तेल उद्योग का राष्‍ट्रीयकरण कर दिया था और इस तरह ब्रिटिश तेल कंपनी, एंग्लो-ईरानियन को, तब तक उसे हासिल रही प्रभुता-संपन्नता की हैसियत से हटा दिया था, हमलावर राज्य खास-खास इजारेदार पूंजीपतियों के स्वार्थों की रक्षा करने के लिए यह सब तो कर रहे थे, फिर भी वे न तो पूंजीवाद के ‘खेल के नियमों’ को खारिज कर रहे थे और न ही इस बात को ही कबूल कर रहे थे कि किन्हीं खास इजारेदाराना स्वार्थों की हिफाजत करने के लिए तख्तापलट कराया गया था। वास्तव में आज तक ब्रिटिश सरकार औपचारिक रूप से तो उस तख्तापलट से अपना कुछ भी लेना-देना होने से इंकार ही करती है, जिस तख्तापलट के जरिए मुसद्देह की सरकार को गिराया गया था और ईरान के शाह को सत्ता में लाया गया था।

कारपोरेट-हिंदुत्व गठजोड़

बहरहाल, फासीवादी तत्वों का सत्ता में आना, इस सब को बदल देता है। यह एक बुनियादी बदलाव लाता है, जो है ‘खेल के नियमों’ का त्याग ही दिया जाना। भारत के मामले में यह साफ-साफ देखा जा सकता है। जब प्रधानमंत्री मोदी ने फ्रांसीसी सरकार से मांग की थी कि अनिल अंबानी की नयी-नयी खड़ी की गयी फर्म को रफाल विमान के स्थानीय विनिर्माण साझेदार के रूप में स्वीकार कर लिया जाए, किसी तरह के वैश्विक टेंडर का कोई सवाल ही नहीं था और न ही किसी न्यूनतम मानदंड को पूरा करने का ही कोई सवाल था। वास्तव में सार्वजनिक क्षेत्र के विनिर्माता को भी दरकिनार कर दिया गया और इसके लिए कभी कोई सफाई दी ही नहीं गयी।

इसी प्रकार, जब हिंडेनबर्ग के रहस्योद्घाटनों के बावजूद, अडानी ग्रुप के मामलों में किसी जांच तक के आदेश नहीं दिए जाते हैं, तो यह भी ‘खेल के नियमों’ के निरस्त किए जाने को ही दिखाता है। खबरों के अनुसार, भाजपा सरकार इसकी योजना बना रही है कि कुछ फर्मों को छांट लिया जाए और उन्हें अन्य देशों की फर्मों के साथ प्रतिस्‍पर्धा में ‘विजेता’ बनने के लिए, मदद देकर खड़ा किया जाए। यह इजारेदार पूंजी, खासतौर पर नयी इजारेदार पूंजी के साथ, राज्य के बहुत ही नजदीकी गठजोड़ का द्योतक है। इन संभावित ‘विजेताओं’ के छांटे जाने में किन्हीं भी ‘खेल के नियमों’ का अनुसरण नहीं किया जाएगा। इसमें तो सीधे-सीधे शासन की मदद से ऐसे इजारेदार पूंजीपतियों के साम्राज्यों को आगे बढ़ाया जाएगा, जिनके साथ हिंदुत्ववादी तत्वों का गठजोड़ हो चुका है।

दूसरी ओर, नये इजारेदार तत्व इसके बदले में यह सुनिश्चित करेंगे कि हिंदुत्ववादी सांप्रदायिकता की सरकार को, मीडिया का पूर्ण समर्थन हासिल रहे। इसमें जरा भी हैरानी की बात नहीं है कि एक बचे-खुचे राह भूलेे हुए, किसी हद तक सरकार से स्वतंत्र टीवी चैनल को भी अडानी ने खरीद लिया ताकि कारपोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ के लिए, मीडिया का सर्वसम्मत समर्थन जुटाने की प्रक्रिया को मुकम्मल किया जा सके।

दरबारी पूंजीवाद से आगे का है मामला

इस पूरी प्रक्रिया को, जो उस चीज की याद दिलाती है जिसे मुसोलिनी ने ‘राज्य और कारपोरेट सत्ता का सम्मिलन’ कहा था, महज ‘दरबारी पूंजीवाद’ का मामला कहना, चीजों को बहुत कम कर के बताना होगा। वास्तव में ‘दरबारी पूंजीवाद’ की संज्ञा का प्रयोग अपने आप में, यह मानकर चलता है कि कोई ‘‘शुद्ध’’, ‘‘गैर-दरबारी’’ पूंजीवाद भी है, जो सामान्य रूप से पाया जाता है, लेकिन हिंदुत्ववादी तत्वों के राज में जिसका अतिक्रमण किया जा रहा है। लेकिन, ऐसे शुद्ध या गैर-दरबारी पूंजीवाद जैसी तो कोई चीज होती ही नहीं है। तमाम पूंजीवाद ही, ‘दरबारी पूंजीवाद’ होता है। वक्त के साथ राज्य और पूंजी के बीच का रिश्ता बदलता है और इजारेदार पूंजीवाद के अंतर्गत बहुत घनिष्ठ हो जाता है। बहरहाल, फासिस्टी राज के दौर में पूंजीवाद, इस रिश्ते में और गुणात्मक रूपांतरण को दर्शाता है, जिसमें नियमों को लागू ही एक कारपोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ के जरिए किया जा रहा होता है।

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