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मौजूदा वक़्त में क्या इसी को आज़ादी कहते हैं?

हम आज़ादी के अमृतकाल में हैं लेकिन मणिपुर की हिंसा से लेकर हरियाणा में जलाई गई संविधान निर्माता की तस्वीर ये सवाल खड़ा करती है कि हम ज़हनी तौर पर कितने आज़ाद हैं?
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200 सालों की ग़ुलामी के बाद जब आज़ादी के पन्ने लिखे गए, तब उसमें कुछ चुनिंदा लोगों या धर्म के नाम नहीं थे, बल्कि समूचे हिंद को ये अधिकार मिला कि वो आज़ाद हवा में सांस ले सकते हैं।

अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ बग़ावत की आवाज़ सिर्फ दिल्ली में ही नहीं गूंज रही थी, बल्कि देश के सभी राज्यों में स्वतंत्रता सेनानियों ने इसके लिए अपना खून बहाया था।

लेकिन आज आज़ादी के मायनों में तब्दीली आ चुकी है, आज आज़ादी की कीमत को सियासी बयानबाज़ी से किसी एतिहासिक प्राचीर से यूं परोस दिया जाता है, जैसे सब कुछ बहुत अच्छा हो। और जैसे ही इस तथाकथित 'बहुत अच्छा' की हुंकार भरी जाती है, तब मणिपुर में महिलाओं के साथ हुई वो दुर्दांत घटना आंखों के सामने आ जाती है, हरियाणा का वो हिस्सा आ जाता है जहां देश को संविधान सौंपने वाले बाबा साहेब अंबेडकर की तस्वीर को जलाकर जश्न मनाया जाता है। मध्यप्रदेश का वो गांव आ जाता है, जहां एक सरपंच को कथित तौर पर ये कहकर ध्वजारोहण नहीं करने दिया जाता, कि तुम फलां जाति के हो।

ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या महज़ झंडे के साथ तस्वीरें खिंचवाकर अपने सोशल मीडिया की शोभा बढ़ा देना ही आज़ादी है? या फिर उन भाषणों को सुनना जिसमें देश के सबसे बड़ा नेता ख़ुद के बखान को छोड़ और कुछ बोलते ही नहीं है।

ख़ैर...15 अगस्त को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले की प्राचीर से ध्वजारोहण कर रहे थे, और देश आज़ादी का जश्न मना रहा था, तब दिल्ली से करीब 165 किलोमीटर दूर हरियाणा के हिसार में संविधान निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर की तस्वीर को गोबर के उपलों पर रखकर जलाया जा रहा था, बाबा साहेब अंबेडकर की तस्वीर को सिर्फ जलाया ही नहीं गया बल्कि इस घटना का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल भी किया गया, ताकि बचे-खुचे सांप्रदायिक सौहार्द में सेंध लगाई जा सके। इस घटना को भीम आर्मी चीफ़ चंद्र शेखर आज़ाद ने अपने ट्वीटर हैंडल से शेयर किया और इसकी निंदा की।

चंद्र शेखर आज़ाद ने घटना की निंदा करते हुए ट्वीट में ये लिखा कि "संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी की तस्वीर जलाने की घटना बेहद घृणित मानसिकता का परिचायक होने के साथ-साथ यह भी बता रही है कि देश को जातिवाद की जकड़न से आज़ादी मिलना अभी बाक़ी है। इस तरह का घृणित कृत्य स्वीकार नहीं किया जा सकता है।"

अंबेडकर की तस्वीर जलाए जाने के बाद डॉ. भीम राव अंबेडकर सोसायटी बूढा़खेड़ा के प्रधान सियाराम ने पुलिस को शिकायत दी कि "गांव के 2 युवकों ने संविधान निर्माता की फोटो को जलाकर वायरल कर दिया। ये दोनों युवक गांव का भाईचारा खराब करने का प्रयास कर रहे हैं।" सियाराम की शिकायत पर पुलिस ने आरोपी बिजेंद्र और सुरेंद्र की पहचान करके उन्हें पकड़ लिया।

हालांकि ये 2 या 2 हज़ार लोग भी अगर बाबा साहेब की तस्वीर जलाकर ये सोचें कि वे उनके विचारों और संकल्पों को भी जला सकते हैं, तो ये उनकी भूल है। लेकिन सवाल ये उठता है कि इन लोगों के मन में हमारे संविधान निर्माता के लिए इतना ज़हर कैसे है? इसके पीछे क्या कारण हो सकता है?

अब यहीं पर सवाल एक और है कि जिन बाबा साहेब अंबेडकर ने हमें संविधान दिया वो एक दलित समाज से आते हैं, या अगर हम बाबा साहेब का उदाहरण न भी लें तो क्या इस आज़ाद भारत में झंडा फहराने का अधिकार सिर्फ कुछ विशेष जातियों को है? हम ये सवाल क्यों उठा रहे हैं, इस वीडियो में देखिए...

झंडा नहीं फहराने देने का आरोप लगा रहे ये शख्स बारेलाल अहिरवार हैं, मध्य प्रदेश के विदिशा ज़िले में सिरोंज क्षेत्र भगवंतपुर ग्राम पंचायत के सरपंच हैं। सरपंच अहिरवार का आरोप विद्यालय के प्रिंसिपल पर है, और उनका कहना है कि उन्हें झंडा इसलिए नहीं फहराने दिया गया क्योंकि 'वो दलित हैं’, वीडियो में आप उन्हें 'जातिसूचक शब्द' द्वारा अपमानित किए जाने का आरोप लगाते हुए भी सुन सकते हैं। सरपंच ने ये आरोप भी लगाया कि उन्हें स्कूल में इस समारोह के लिए बुलाया भी नही गया था जबकि पंचायती राज अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार सरपंच को ही झंडा फहराना चाहिए।

यहां ये बता देना ज़रूरी है कि ये वही प्रदेश है जहां कुछ दिनों पहले एक दलित शख्स पर पेशाब किए जाने का वीडियो सामने आया था और आरोप भाजपा के एक नेता पर लगा था, बाद में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उस शख्स को अपने घर बुलाकर उसके पांव धोए थे और साथ में खाना खिलाकर मामले पर मरहम लगाने की कोशिश की थी। ऐसे में सवाल ये उठता है कि अब इस 'अपमान' का डैमेज कंट्रोल मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कैसे करेंगे।

लेकिन ये समझना बहुत ज़रूरी है कि आज़ादी के सात दशक बीत चुके हैं, देश आज़ादी के अमृत काल में है, लेकिन लोग इतनी छोटी मानसिकता से छुटकारा नहीं पा सके हैं। इसके अलावा ये जांच का विषय इसलिए भी है कि अगर सरपंच का आरोप सही है और विद्यालय की प्रिंसपल ने ऐसा किया है, तो वहां पढ़ने वाले बच्चों के भविष्य पर भी प्रश्नचिन्ह है।

इन घटनाओं के ज़िक्र के बाद अब हम चलते हैं मणिपुर की ओर...वही मणिपुर जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ दिनों पहले जिगर का टुकड़ा बता रहे थे। लेकिन ये बात भी सच है कि न तो संसद में बोलते वक्त और न ही लाल किले से भाषण के दौरान प्रधानमंत्री की तरफ से मामले को लेकर कोई गंभीरता दिखी।

ख़ैर...मणिपुर में महिलाओं के साथ हुई जघन्य घटना को कौन भूल सकता है? पिछले करीब 100 दिनों से मणिपुर में लगी आग इस बात गवाही है और एक तरह आग्रह या ज़िम्मेदारी भी है, कि आज़ादी के जश्न में हम इस ख़ूबसूरत राज्य की बेबसी न भूल जाएं। वहां 150 से ज़्यादा लोग मर चुके हैं, 10 हज़ार से ज़्यादा घरों को नुकसान पहुंच चुका है।

मणिपुर ट्राइबल्स फोरम ने 10 अगस्त को ये दावा किया था कि “100 दिन बीत जाने के बावजूद मणिपुर में कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका है, फोरम ने कहा कि मणिपुर में जारी हिंसा में अकेले कुकी समाज के 130 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 55000 लोग बेघर हुए हैं।” इससे पहले संसद में बोलते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने ख़ुद कहा था कि मणिपुर में 152 लोगों की मौत हो चुकी है।

बात महिलाओं की हो रही है तो दिल्ली का भी ज़िक्र किया जाए। राजधानी दिल्ली में महिला पहलवानों के साथ बदसलूकी हुई, वो महिला पहलवान जिन्होंने देश का सम्मान दुनिया भर में बढ़ाने के लिए दिन-रात मेहनत की और अपनी पहलवानी से भारत को कई मेडल लाकर दिए। यहां इस बात का ज़िक्र करना बहुत ज़रूरी है कि दिल्ली में जिस जगह ये सब हुआ, वहां से संसद भवन की दूरी कुछ एक किलोमीटर की है... इसके बावजूद वहां तक इन बेटियों की आवाज़ नहीं पहुंची।

यहां गौर करने वाली बात ये है कि इन महिलाओं के उस वक़्त बदसलूकी हुई जब नई संसद का उद्घाटन समारोह चल रहा था, उसी नई संसद में भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह थे, जिस पर इन महिला पहलवानों ने यौन शोषण का आरोप लगाया था।

अब बात करते हैं पंजाब, किसान और क़र्ज़ की। जबसे हम आज़ाद हुए हैं...या उससे भी पहले से हमारे देश की अर्थव्यवस्था किसानों पर ही निर्भर रही है, लेकिन आज की तारीख में पंजाब में प्रति किसान औसत क़र्ज़ 2.95 लाख रूपये है, जो देश में सबसे ज़्यादा है। नाबार्ड के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक पंजाब के 24.92 फीसदी किसानों ने कमर्शियल, को-ऑपरेटिव और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों से 73673.62 करोड़ रूपये का क़र्ज़ लिया हुआ है। खेत-मज़दूरों द्वारा लिए गए क़र्ज़ अलहदा हैं। खेत-मज़दूरों और निम्न वर्गीय किसानों पर साहूकारी क़र्ज़ा है, जिसके पुख्ता आंकड़ें उपलब्ध नहीं हैं।

किसानों की हालत महज़ पंजाब में ही ऐसी नहीं है, बल्कि पूरे देश का यही हाल है, आप को याद ही होगा कि कैसे अपने 'अधिकारों' की मांग के लिए किसानों ने दिल्ली-यूपी के बॉर्डर पर करीब एक साल से ज़्यादा दिन गुज़ारे थे।

मुद्दे बहुत हैं...किसान, मज़दूर, व्यापारी से लेकर देश को सम्मान दिलाने वाले दिग्गज तक आज अपनी पहचान और सम्मान बचाने के लिए लड़ रहे हैं। ऐसे में ये चिंता बेहद ज़रूरी है कि आज़ाद भारत में इस वक़्त मौजूदा हालात क्या हैं!

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