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झारखंड: मुख्यमंत्री सोरेन की सदस्यता गई तो कौन होगा मुख्यमंत्री?

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सदस्यता रहेगी या जाएगी, इसका फैसला अब राज्यपाल के हाथ में है। देखना होगा कि इसका लाभ भाजपा कैसे उठा पाती है?
hemant soren

झारखंड की राजनीतिक गलियों में इन दिनों एक सवाल बहुत तेज़ी से दौड़ रहा है, कि अगर हेमंत सोरेन की सदस्यता चली गई तो मुख्यमंत्री कौन होगा?

हालांकि झामुमो और कांग्रेस के लिए इसका जवाब ढूंढना जितना ज़रूरी है, उससे ज्यादा चुनौतीपूर्ण होने वाला है अपने विधायकों को एकजुट रखना। 26 विधायकों वाली भारतीय जनता पार्टी इस मौके का फायदा उठाने से पीछे नहीं हटेगी। हम ऐसा इस लिए कह रहे हैं क्योंकि इसकी बानगी पिछले दिनों ही देखने को मिली थी जब कांग्रेस के तीन विधायक करीब 48 लाख रुपयों के साथ पकड़े गए थे।

फिलहाल आपको बता दें कि लाभ के पद मामले में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर चुनाव आयोग ने अपनी राय राज्यपाल रमेश बैस को भेज दी है, जिन्हें अब अंतिम निर्णय लेना है।

बताया जा रहा है कि चुनाव आयोग ने हेमंत सोरेन को लोक जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 9-ए के उल्लंघन का दोषी पाया है।

क्या है पूरा मामला?

साल 2022 के फरवरी महीने में लाभ के पद का मामला चुनाव आयोग के पास तब पहुंच गया, जब पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जब खनन मंत्री थे तब उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग किया। रघुबर दास ने आरोप लगाया कि हेमंत सोरेन ने रांची ज़िले की एक स्टोन माइंस की लीज़ अपने नाम पर आवंटित करवा ली, जो लोक जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 9ए का उल्लंघन है।

रघुबर दास यहीं नहीं रुके वे भाजपा के दूसरे नेताओं के साथ राजभवन गए और राज्यपाल से मिलकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सदस्यता खत्म करने की मांग की। जबकि राज्यपाल रमेश बैस ने उस शिकायत को चुनाव आयोग भेज दिया। चुनाव आयोग ने इस मामले पर सुनवाई की और शिकायतकर्ता भाजपा के रघुबर दास और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को नोटिस जारी कर अपना-अपना पक्ष रखने की अपील की।

दोनों पक्षों के जवाब मिल जाने के बाद और कई तारीखों के बाद आयोग ने अगस्त महीने में अपनी सुनवाई पूरी की, और अपना बंद लिफाफे के ज़रिए राज्यपाल को भेज दिया। यानी अब हेमंत सोरेन की सदस्यता पर आख़िरी फैसला राज्यपाल रमेश बैस को लेना है।

जब इस पूरे कृत्य ने तेज़ी पकड़ी तब हेमंत सोरेन ने सीधा केंद्र सरकार और राज्य भाजपा पर हमला बोल दिया। उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्थानों को तो ख़रीद लोगो, जनसमर्थन कैसे ख़रीद पाओगे?... ये बात मुख्यमंत्री ने एक वीडियो शेयर करते हुए ट्वीट के ज़रिए कही...

इससे पहले हेमंत सोरेन इस मामले में सफाई देते हुए कह चुके हैं, कि उस ख़नन पट्टे के लिए उन्होंने कई साल पहले आवेदन किया था, तब वे लाभ के किसी पद पर नहीं थे। हालांकि, भाजपा द्वारा इस मामले को उछाले जाने के बाद उन्होंने वह लीज सरेंडर कर दी और उसपर कोई खनन नहीं हुआ। ऐसे में यह लाभ के पद के दुरुपयोग का मामला ही नहीं है और उन्हें डिस्क्वालिफाई नहीं किया जा सकता।

अब कारण कोई भी हो, हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री पद पर रहते हैं या नहीं ये राज्यपाल को तय करना है। लेकिन अगर हेमंत सोरेन की सदस्यता चली जाती है तब उस स्थिति में क्या हो सकता है ये जान लेना भी बेहद अहम है...

हेमंत सोरेन के सामने सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प खुला है। हालांकि इस स्थिति में भी उनको इस्तीफा तो देना ही पड़ेगा, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ऐसे मामलों में तुरंत स्टे नहीं देता है। यानी हेमंत को अपनी पत्नी कल्पना सोरेन को या पिता शिबू सोरेन को सीएम पद सौंपना ही होगा। लेकिन संकट ये है कि उनके पिता का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता तो ऐसे में कल्पना सोरेन ही पार्टी संभालने के लिए सबसे योग्य होंगी।

इसके साथ ही हेमंत सोरेन सुप्रीम कोर्ट में कह सकते हैं कि जिस आधार पर हमें अयोग्य घोषित किया गया है वो पुख्ता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी अपने दो फैसलों में कह चुका है कि खान का लीज पर लेना भ्रष्टाचार का मामला नहीं है।

अगर कल्पना मुख्यमंत्री नहीं बनती हैं तो हेमंत सरकार की कैबिनेट में मंत्री चंपई सोरेन भी मुख्यमंत्री बनने की रेस में हैं। चंपई सोरेन अति पिछड़ा समाज से आने वाले पार्टी के बड़े नेता हैं और साल 2005 से लगातार सरायकेला विधानसभा से चुनाव जीतते आ रहे हैं।

हालांकि राजनीतिक में कुछ भी निहित नहीं है, ऐसे में देखना होगा कि हेमंत सोरेने का पार्टी और कांग्रेस क्या फैसला करती है। हालांकि इतना ज़रूर कहा जा सकता है, कि इस पूरे मुद्दे पर राज्य के भीतर यूपी ज़रूर रिलैक्स मोड में है, क्योंकि अगर विधायक नहीं छटकते हैं तो सरकार जस की तस बनी रहेगी। क्योंकि जबसे कांग्रेस के तीन विधायक इस मामले में फंसे तबसे पूरी सरकार बहुत ज्यादा अलर्ट हो गई है।

मौजूदा वक्त में अगर 81 विधानसभा सीटों वाले झारखंड के अंकगणित पर नज़र डालें, तो झामुमो के खाते में 30 विधायक हैं। आपको बता दें कि ये पहले मौका है जब झामुमो ने राज्य में इतनी सीटें जीतकर कांग्रेस और आरजेडी से गठबंधन किया था। क्योंकि कांग्रेस को 18 और आरजेडी को 1 विधानसभा सीट मिली थी। इसके अलावा झामुमो को एक निर्दलीय और एक माले विधायक का भी समर्थन प्राप्त है।

झामुमो--- 30

कांग्रेस—18

आरजेडी—1

भाजपा—26

आजसू—2

माले- 1

निर्दलीय—3

क्योंकि यहां बहुमत के लिए 41 विधानसभा सीटों की आवश्यकता होती है, ऐसे में झामुमो गठबंधन के पास कुल 52 विधायकों का समर्थन है, तो सरकार जाना तो मुश्किल है। ये सोरेन की सदस्यता पर बाते आते ही ऑपरेशन लोटस की सुर्खियां भी तेज़ हो गई थीं। ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है कि क्योंकि पिछले कुछ सालों में पुलिस ने इससे जुड़ी कई शिकायतें दर्ज की हैं।

आपको याद होगा जब महाराष्ट्र में उद्धव सरकार गिर रही थी, तब ख़बरें सामने आईं थीं कि महाराष्ट्र भाजपा के कुछ नेता झारखंड में सरकार गिराने के लिए कांग्रेस विधायकों को ख़रीदने की कोशिश कर रहे थे। फिर अचानक पिछले महीने कांग्रेस के तीन विधायक 48 लाख रुपये के साथ पकड़ लिए गए, हालांकि उन्होंने दलील दी कि ये पैसे साड़ियां खरीदने के लिए हैं। आदिवासी दिवस के मौके पर होने वाले कार्यक्रमों में महिलाओं को साड़ियां बांटी जाएंगी। उस वक्त कांग्रेस के ही एक विधायक ने आरोप लगाया था कि असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा झारखंड की सरकार गिराने की साज़िश में शामिल हैं।

ऑपरेशन लोटस की बात इस राज्य के लिए करना इसलिए भी ज़रूरी हो जाता है क्योंकि पिछले दिनों देखने को मिला कि ईडी और सीबीआई का आवागमन झारखंड में ज्यादा बढ़ गया है। जिसमें एक घटना ये देखने को मिली थी कि मुख्यमंत्री के विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा को ईडी ने गिरफ्तार कर लिया था और उनके प्रेस सलाहकार से लंबी पूछताछ की थी।

सिर्फ इतना ही नहीं पिछले दिनों जब बिहार में भाजपा खाली हाथ रह गई, तब लोग जो बात मज़ाक में कह रहे थे, कि अब भाजपा हार रही है तो ईडी और सीबीआई का इस्तेमाल करेगी। आख़िरकार वहीं हुआ। कहने का अर्थ ये है कि भारतीय जनता पार्टी के लिए राज्य कौन सा है ये मैटर नहीं करता... मैटर करता है कि और कितने विधायकों को किस तरह से तोड़ लिया जाए ताकि हमारी सरकार बन सके।

अब झारखंड में ये कितना कामयाब हो पाते हैं ये तो वक्त ही तय करेगा।

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