ख़बरों के आगे-पीछे: आधार, राशन कार्ड, वोटर आईडी किस काम के?
यह बड़ा सवाल है कि व्यक्ति की पहचान के लिए इस्तेमाल होने वाले तीन पहचान पत्रों- आधार, राशन कार्ड और वोटर आईडी का क्या काम रह गया है? सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के मसले पर दायर याचिकाओं का निबटारा करते हुए कहा कि ये तीनों पहचान पत्र किसी की नागरिकता प्रमाणित नहीं करते हैं।
लेकिन बात इतनी नहीं है। इन तीनों के दम पर कोई व्यक्ति देश का मतदाता भी नहीं बन सकता है। अभी किसी के पास मतदाता पहचान पत्र है, जिसके दम पर उसने 2024 के लोकसभा चुनाव में वोट डाला है लेकिन इसके दम पर अब वह मतदाता सूची में अपना नाम नहीं जुड़वा सकता है। ऐसा पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में हुआ है और अब जिन 19 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर का काम चल रहा है वहां भी ऐसा ही होगा।
लोगों ने कितनी कवायद की थी आधार बनवाने के लिए। अब भी अगर किसी को आधार में कोई बदलाव कराना होता है तो बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। ऐसे ही वोटर आई कार्ड बनवाना भी आसान काम नहीं होता है। लोगो ने मेहनत करके सब बनवाया लेकिन अब इनके दम पर मतदाता सूची में नाम नहीं शामिल हो सकता। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद स्पष्ट है कि इन तीन में से किसी एक या तीनों दस्तावेज होने के बावजूद कोई अन्य दस्तावेज देना होगा तब जाकर मतदाता सूची में नाम शामिल होगा।
भारत का शेयर बाजार सातवें स्थान पर लुढ़का
भारत के शेयर बाजार का मूल्य लगातार गिरता जा रहा है। अब यह खिसक कर सातवें स्थान पर पहुंच गया है। पिछले दिनों खबर आई थी कि ताइवान की सिर्फ एक कंपनी टीएसएमसी का बाजार मूल्य बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज यानी बीएसई में सूचीबद्ध सभी कंपनियों के बाजार मूल्य से ज्यादा हो गया है। जाहिर है जब एक कंपनी का मूल्य ही पूरे शेयर बाजार से ज्यादा हो जाएगा तो उस देश का पूरा शेयर बाजार तो आगे निकलेगा ही। सो, ताइवान के शेयर बाजार का मूल्य भारत के शेयर बाजार से ज्यादा हो गया। इसके बाद खबर आई कि दक्षिण कोरिया का बाजार भी भारत से आगे निकल गया।
अमेरिका, जापान, चीन और हॉन्गकॉन्ग पहले से ऊपर थे। इन चार देशों के बाद ताइवान और दक्षिण कोरिया आ गए। ताइवान और दक्षिण कोरिया का बाजार सिर्फ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई कंपनियों के शेयरो में आई तेजी की वजह से बढ़ा है। गौरतलब है कि दक्षिण कोरिया की कंपनी सैमसंग चिप डिजाइन करने वाली सबसे बड़ी दो कंपनियों में से एक है। अब दक्षिण कोरिया का शेयर बाजार पांच ट्रिलियन डॉलर का है और ताइवान का शेयर बाजार 5.2 ट्रिलियन डॉलर का है। भारत अब भी चार ट्रिलियन डॉलर के आसपास अटका है। इसका कारण यह है कि भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर कोई काम नहीं हो रहा है। यही स्थिति रही तो शेयर बाजार की हालत और कमजोर होगी। एआई में पिछड़ने का ही नतीजा है कि भारत में विदेशी निवेश भी नहीं आ रहा है।
सरकार समर्थक अर्थशास्त्री भी चिंतित
सरकार को किसी भी मुद्दे पर विपक्षी पार्टियां सलाह देती हैं तो उन्हें राजनीतिक आलोचना कह कर खारिज कर दिया जाता है। राहुल गांधी कई वर्षों से लगातार कह रहे हैं कि भारत अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में पिछड़ रहा है। लेकिन उनकी बात नहीं सुनी जाती है, उल्टे उन्हें पप्पू ठहराने का अभियान चलता रहता है। लेकिन अब तो सरकार के समर्थक अर्थशास्त्री भी कह रहे हैं कि भारत गाथा यानी इंडिया स्टोरी पटरी से उतर गई है और उसे फिर से पटरी पर लाने के लिए बड़े सुधारों की जरुरत है।
सरकार की नीतियों के समर्थक अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने लगातार दूसरी बार अपने कॉलम में सरकार की नीतियों में कमियां बताई हैं और सुधार की जरुरत पर जोर दिया है। उन्होंने 'इंडियन एक्सप्रेस’ के पिछले कॉलम में कहा था कि भाजपा चुनाव जीत रही है लेकिन देश की अर्थव्यवस्था लगातार बिगड़ती जा रही है। अब ताजा कॉलम मे उन्होंने इस विमर्श को आगे बढ़ाते हुए कहा है कि भारत की अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए जिस सुधार की जरुरत थी वह नहीं किया गया है। उन्होंने सीधे 2014 के बाद यानी नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद की विफलताओं का जिक्र किया है। उन्होंने कहा है कि 2014 में भारत और इंडोनेशिया की कहानी शुरू हुई थी। इंडोनेशिया ने ऐसे सुधार किए, जिससे उसे निवेश मिला और सम्मान भी मिला, जबकि भारत ने जरूरी सुधार नहीं किए, जिससे पूंजी निकल कर बाहर गई और दुनिया से भारत को अवमानना मिली।
भाजपा के हर काम में देरी
भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष पद पर जेपी नड्डा का तीन साल का कार्यकाल छह साल तक चला। बाद के तीन साल तो वे वैसे ही सेवा विस्तार पर चले, जैसे सीबीआई और ईडी के निदेशक और अन्य अधिकारी चलते हैं। छह साल बाद जैसे-तैसे नड्डा की जगह नितिन नवीन राष्ट्रीय अध्यक्ष बने तो करीब साढ़े चार महीने के बाद भी अभी तक उनकी टीम का गठन नहीं हुआ है। यही हाल दो राज्यों में बनी नई सरकार का है। भाजपा ने पश्चिम बंगाल में बड़ी जीत हासिल की और सरकार बनाई लेकिन करीब एक महीने तक मुख्यमंत्री ने सिर्फ पांच मंत्रियों के साथ सरकार चलाई। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी अकेले 42 विभाग संभालते रहे। बडी मशक्कत के बाद वहां मंत्रिपरिषद का विस्तार हुआ। 35 नए मंत्री बनाए गए। ऐसे ही असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक महीने तक चार लोगों के साथ सरकार चलाई और एक महीने बाद वहां मंत्रिपरिषद का विस्तार हो पाया। सोचें, अगर ऐसा किसी कांग्रेस शासित राज्य में हो जाता तो भाजपा कितना बड़ा मुद्दा बनाती और मीडिया किस तरह से कांग्रेस पर हमले करता।
केरल में कांग्रेस को नेता चुनने में भाजपा के मुकाबले दो दिन का अधिक समय लगा था। लेकिन 'केरल में कांग्रेस नेता नहीं चुन पा रही है’ इस नैरेटिव पर डेढ़ सौ से ज्यादा डिबेट टीवी चैनलों में हुई थी। बहरहाल, इस लिहाज से देखें तो केंद्रीय मंत्रिपरिषद में तो फ़ेरबदल की कोई संवैधानिक जरुरत नहीं है। वह तो राजनीतिक जरुरत के लिहाज से किया जाना है।
कोई भी पार्टी जगह नहीं दे रही महिलाओं को
अप्रैल में जब नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन का विधेयक संसद के विशेष सत्र में पेश किया गया था तो ऐसा लगा जैसे भाजपा और उसके नेताओं को महिलाओं की कितनी परवाह है। विपक्षी पार्टियो ने भले ही इसका विरोध किया था लेकिन महिलाओं के प्रति जुबानी जमाखर्च करने में उसने भी कंजूसी नहीं की थी। उसके बाद पांच राज्यों के चुनाव मे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में प्रचार के दौरान विपक्ष को महिला विरोधी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। भाजपा अपने को इस बात के लिए प्रतिबद्ध बता रही है कि वह महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देगी। लेकिन पश्चिम बंगाल के चुनाव में उसने 294 सीटों में से कुल 33 सीटों पर महिलाओं को उतारा था। यानी करीब 11 फीसदी टिकट महिलाओं को दिए थे। भाजपा को 207 सीटें मिली हैं, जिनमें से 21 महिलाएं हैं। इनमें से सात महिलाओं को मंत्री बनाया गया है। कुल 41 मंत्री बने हैं, उनमें सिर्फ सात महिलाएं है। यानी 20 फीसदी से कुछ कम महिलाओं को मंत्री बनाया गया। इसका अर्थ है कि जब तक कानून नहीं बनेगा तब तक महिलाओं को 33 फीसदी हिस्सा भाजपा भी नहीं देगी।
उधर कर्नाटक मे कांग्रेस की नई सरकार बनी तो पहले चरण में 14 मंत्रियों ने शपथ ली है। उनमें एक भी महिला मंत्री नहीं है। यह पूर्वाग्रह की हद है। ऐसा नहीं है कि कर्नाटक अपवाद है। केरल में कांग्रेस की 21 सदस्यों की वीडी सतीशन सरकार में भी सिर्फ दो महिलाएं मंत्री हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)
अपने टेलीग्राम ऐप पर जनवादी नज़रिये से ताज़ा ख़बरें, समसामयिक मामलों की चर्चा और विश्लेषण, प्रतिरोध, आंदोलन और अन्य विश्लेषणात्मक वीडियो प्राप्त करें। न्यूज़क्लिक के टेलीग्राम चैनल की सदस्यता लें और हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित हर न्यूज़ स्टोरी का रीयल-टाइम अपडेट प्राप्त करें।
