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संकटमोचन संगीत समारोहः मंदिर में संगीत रसिकों का जमावड़ा, जिनमें न कोई हिन्दू, न मुसलमान !

"संकटमोचन मंदिर ने दुनिया को बताया है कि गीत-संगीत का कोई धर्म नहीं होता, इसकी जाति नहीं होती, कोई जेंडर नहीं होता, कोई क्लास नहीं होता।"
Sankat Mochan Sangeet Samaroh

उत्तर प्रदेश के बनारस में भले ही ज्ञानवापी मस्जिद का मुद्दा गरम है, लेकिन इसी शहर में संकटमोचन मंदिर एक ऐसा धार्मिक स्थल है जहां गीत-संगीत के साथ ही भाईचारा, कौमी एकता और सौहार्द की बारिश होती है। गंगा-जमुनी तहज़ीब को जिंदा रखने के लिए यह मंदिर हमेशा नई इबारत लिखता है। सांप्रदायिक सौहार्द की अद्भुत मिसाल पेश करने वाले इस मंदिर में पिछले सौ सालों से गीत-संगीत की सरिता बह रही है। ऐसी सरिता जिसमें दुनिया भर के संगीत प्रेमी गोता लगाते हैं, जिनमें न कोई हिन्दू होता है और न मुसलमान।

संकटमोचन एक हिंदू मंदिर है, जो उत्तर प्रदेश के वाराणसी (बनारस) में स्थित है। यहां 10 अप्रैल 2023 से संगीत समारोह शुरू हो गया है। यह समारोह इसलिए भी ज्यादा अहमियत रखता है क्योंकि अबकी इसके सौ साल पूरे होने जा रहे हैं। समारोह को भव्य रूप देने के लिए परिसर को बेहतरीन तरीके से सजाया गया है। यहां एक वीथिका भी बनाई गई है, जिसमें पूर्वांचल के तमाम कलाकारों की कृतियां रखी गई हैं। कई स्थानों पर एलईडी स्क्रीन और कटआउट लगाए गए हैं। इंतजाम ऐसा किया गया है कि संकटमोचन परिसर के किसी भी कोने में बैठकर संगीत प्रेमी संगीत साधना में लीन हो सकते हैं।

इस विश्वविख्यात संकटमोचन समारोह में बड़ी तादाद में संगीत प्रेमियों का जमावड़ा हो रहा है। अल्हड़ रसिक भाव-विभोर होकर पूरी रात संगीत की सरिता में गोते लगाते रहे हैं। संकटमोचन के 100वां संगीत समारोह 16 मार्च तक चलेगा। इसमें 180 से अधिक ख्यात और प्रतिष्ठित कलाकार गीत-नृत्य की प्रस्तुति देंगे। संगीत समारोह में प्रसिद्ध बांसूरी वादक पंडित हरि प्रसाद चौरसिया, भजन गायक अनूप जलोटा, जयपुर के सारंगी उस्ताद मोइनुद्दीन खान, उस्ताद अकरम खान, कोलकाता के तबला वादक बिलाल खान, संतूर के फनकार तरुण भट्टाचार्य, उस्ताद राशिद खान और प्लेबैक सिंगर सोनू निगम समेत 20 से ज्यादा पद्म अवार्डी शिकरत करेंगे। बनारस का यह इकलौता मंदिर है जहां 13 कार्यक्रम सिर्फ मुस्लिम पेश करेंगे।

सौहार्द का प्रतीक है यह मंदिर

बनारस का संकटमोचन मंदिर ऐसा धार्मिक स्थल है जो गंगा-जमुनी तहजीब को जिंदा रखने के लिए हमेशा नई गाथा लिखता रहा है। इस संगीत समारोह में जो कोई आता है उसका धर्म और ईमान सिर्फ संगीत होता है। यहां जो एक बार भी गा-बजा लेता है, वह जगत प्रसिद्ध हो जाता है। संकटमोचन संगीत समारोह आयोजक महंत विशंभरनाथ मिश्र कभी हिन्दू-मुस्लिम फनकारों में भेद नहीं करते। संकटमोचन मंदिर में 07 मार्च 2006 को आतंकवादियों ने बम धमाकों से बनारस को दहलाने की कोशिश की थी। आतंकवादी घटना के बाद भाजपा से जुड़े संगठनों ने बितंडा खड़ा करना चाहा और मंदिर कैंपस में धरना देने के लिए सरकार व प्रशासन से अनुमति मांगी थी, लेकिन सांप्रदायिकता का जहर घोलने में वो नाकाम रहे।

संकटमोटन मंदिर पर सालों से चल रहे संगीत समारोह ने कई रूढ़ियों को तोड़ा है। साथ ही यह भी संदेश दिया है कि दुनिया में अगर कुछ अनमोल है तो वह बंधुत्व और प्यार की भाषा। वह भाषा जिसे नए जमाने ने भुला दिया है। संकटमोचन मंदिर बनारस का इकलौता ऐसा धार्मिक स्थल ऐसे है जहां गंगा-जमुनी तहजीब का दर्शन होता है।

साल 2006 में संकटमोचन बम विस्फोट के बाद 2008 से तात्कालीन महंत पंडित वीरभद्र मिश्र ने संगीत समारोह में मुस्लिम कलाकारों को आमंत्रित करना शुरू किया। इसके बाद गजल गायकी का भी चलन हुआ। उस्ताद गुलाम अली भी आए। हालांकि शहनाई वादक भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां भी संकट मोचन में शहनाई वादन करना चाहते थे, मगर अनुमति न होने की वजह से वह नहीं आ सके। उन्हें अनुमति तब मिली जब उनका इंतकाल हो चुका गया।

पिछले साल शिराज अली खां, कोलकाता (सरोद वादक), बिलाल खां, कोलकाता (तबला वादक), उस्ताद साकिर खां, पुणे (सितार वादक), उस्ताद गुलाम अब्बास खां, मुंबई (गायन), सलीम अल्लाहवाले, भोपाल (तबला), उस्ताद शाहिद परवेज खां, पुणे (सितार), उस्ताद मशकूर अली खां, कोलकाता (गायन), उस्ताद मोइनुद्दीन खां व मोमिन खां, जयपुर (सारंगी युगलबंदी), उस्ताद अकरम खां, दिल्ली (तबला) ने अपने कंठ का जादू बिखेरा था। कुछ साल पहले बनारस के संकटमोचन संगीत समारोह में शिरकत करने पहुंचे प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक गुलाम अली ने कहा था, "हमें मोहब्बत का पैगाम बांटने की जरूरत है। पाकिस्तान ही नहीं, भारत में भी कुछ ताकतें ऐसी हैं जो यह नहीं चाहती हैं कि हम मिलकर रहें। चाहे वो खेल का मैदान हो या फिर गीत-संगीत का मंच। हम दोनों ही मुल्कों के अवाम शांति और भाईचारा चाहते हैं, लेकिन चंद मुट्ठी भर लोगों को शायद ये गवारा नहीं ताकि उनकी सियासी रोटियां सिकतीं रहें।"

महिला फ़नकारों को मिली पहचान

बनारस के मंदिरों में पहले महिला कलाकारों को गाने-बजाने का अवसर नहीं मिलता था। संकटमोचन संगीत समारोह के आयोजकों ने सत्तर के दशक में इन रूढ़ियों को तोड़ना शुरू किया तो पूर्वांचल के अन्य मंदिरों में होने वाले सालाना जलसों में महिला फनकारों को इंट्री मिलने लगी। बनारस में अस्सी के दशक में मुस्लिम और अन्य धर्मों के कलाकारों को परफार्मेंस देने का अवसर दिया जाने लगा। मौका मिला तो पाकिस्तानी ग़ज़ल गायक गुलाम अली संकटमोचन संगीत समारोह के सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले कलाकार बन गए। इनके अलावा पंडित जसराज हर साल इस संगीत समारोह में शामिल होने के लिए अमेरिका से बनारस आते थे।

बनारस के जाने-माने रंगकर्मी एवं कवि व्योमेश शुक्ल कहते हैं कि संकटमोचन मंदिर में बम धमाकों के बाद प्रशासन ने इसकी देख-रेख करने वाले प्रबंधन को दबाव में लेने की कोशिश की, लेकिन मुफ्ती-ए-बनारस और लाल चर्च के पादरी ने यहां पहुंचकर भाई-चारा और गंगा-जमुनी संस्कृति की एक नई मिसाल पेश की। आस्था के इस केंद्र को पर्यटन स्थल भी नहीं बनने दिया गया। बकौल, व्योमेश, "संकटमोचन मंदिर ने दुनिया को बताया है कि गीत-संगीत का कोई धर्म नहीं होता, इसकी जाति नहीं होती, कोई जेंडर नहीं होता, कोई क्लास नहीं होता। यहां रिक्शा खींचने वाला संगीत प्रेमी करोड़पति कारोबारी के बराबर में बैठक शास्त्रीय संगीत का आनंद लेता है। यदि टिकट खरीद कर इस तरह के प्रोग्राम देखे जाएं तो हर दर्शक को करीब 20 से 22 हजार रुपये खर्च करने पड़ेंगे। संगीत समारोह में इस साल भी 65 से ज्यादा कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इस कार्यक्रम का आयोजन कलाकार ही करते हैं। पंडित अमरनाथ मिश्र पखावज (वादक), प्रो.वीरभद्र मिश्र (गायक) के बाद अब पंडित विशंभरनाथ मिश्र (पखावज) अहर्निस इस कार्यक्रम का आयोजन कर रहे हैं। आयोजक मंडल में दुनिया के तमाम नामचीन संगीत साधक शामिल हैं, जिन्हें संगीत के मामले में कोई छल नहीं सकता। यूं भी कह सकते हैं कि सभी संगीत की गहराई में तैरने वाली मछलियां हैं।"

व्योमेश कहते हैं, "संकटमोचन संगीत समारोह में सिर्फ उन्हीं फनकारों को गाने-बजाने का अवसर मिलता है जो सचमुच सिद्धहस्त होते हैं। संकटमोचन मंदिर के महंत पं. विशंभर मिश्र के पुत्र पुष्कर मिश्र होनहार तबला वादक हैं। इसके बावजूद उन्हें इस मंच पर अपनी प्रस्तुति देने का आज तक मौका नहीं मिला। यहां कोई सोर्स सिफारिश नहीं चलती। संगीत समारोह में आने वाले दर्शक खुद ही संगीत के मर्मज्ञ होते हैं। इनके आगे भला कौन टिक पाएगा। इसीलिए नौजवान कलाकारों को शुरुआती घंटों में प्रस्तुति देने का अवसर मुहैया कराया जाता है।"

सात दिनी होगा शताब्दी समारोह

संकटमोचन संगीत समारोह शताब्दी वर्ष में पहली बार सात दिनों का होगा। 10 से 16 अप्रैल तक सात दिन में 58 कार्यक्रमों में 180 कलाकार प्रस्तुति देंगे। इसमें जयपुर के उस्ताद मोइनुद्दीन खान और उस्ताद अकरम खान का सारंगी और तबला वादन भी लोगों को सुनने को मिलेगा। ख्यात बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया 14 अप्रैल को तो वही पंडित रोनू मजूमदार 13 अप्रैल को तान छोड़ेंगे। 14 अप्रैल को भजन गायक अनूप जलोटा, 15 अप्रैल को डॉ. मालिनी अवस्थी, 16 अप्रैल 2023 को सोनू निगम कंकणा बनर्जी, पंडित साजन मिश्र की प्रस्तुतियां होंगी।

संकटमोचन मंदिर के महंत एवं संगीत समारोह के मुख्य आयोजक पंडित विशंभर नाथ मिश्र कहते हैं, "यहां नए कलाकारों को एक बड़ा प्लेटफार्म मिलता है। यह संगीत समारोह शास्त्रीय संगीत का नया ऑडियंस भी तैयार करता है। पहली बार बालीवुड के सितारों को बुलाया गया है, ताकि युवा प्रेमी भी इस आयोजन से जुड़ सकें। बीस से ज्यादा पद्म अवार्डी इस बार अपना जादू बिखेरेंगे। हमारे यहां राग भोग का कंसेप्ट है। अगर सेवा भोग से होता है तो राग-रागनियों से भी होता है। रामराज की कल्पना तभी साकार हो सकती है जब उसमें जाति और संप्रदाय का भेद नहीं होगा। संकटमोचन के दरबार में सभी के लिए जगह है।"

ज्ञानवापी मुद्दे का जिक्र करने पर महंत प्रो. विशंभर नाथ कहते हैं, "झगड़े-फसाद का कोई शड्यूल नहीं बनता। धर्म बांटने में नहीं, जोड़ने का दूसरा नाम है। इंसानियत का जज्बा पैदा करने का नाम है। फसाद की कोई प्लानिंग नहीं होती। प्लानिंग से शुरू किया गया फसाद धर्म नहीं होता। अगर दिमाग खराब है तो आप झगड़ा कीजिए। सैकड़ों साल पीछ जाना हो तो फसाद शुरू कर कीजिए। संकटमोचन मंदिर गोस्वामी तुलसीदास की पद्धति से संचालित होता। तुलसीदास ने मुगलकाल में रामचरित मानस की रचना की। सम्राट अकबर से उनके अच्छे संबंध थे। तुलसीदास ने ही रामलीला के जरिये ओपेन थिएटर का कांसेप्ट इंट्रोडूयूज किया था। यह देश सबका है। क्या हिन्दू,क्या मुसलमान। भगवान सभी के दिल में रहते हैं।"

मंदिर की ड्योढ़ी से हुई थी शुरुआत

महंत प्रो. मिश्र ने बताया कि संगीत महोत्सव का पहला आयोजन 1923 में हुआ था। पहला मंच मंदिर की ड्योढ़ी था, जहां से कलाकारों ने हनुमान से राम मिलन की गुहार लगाई थी। गर्भगृह के बाहर बैठकर कलाकार गायन-वादन की प्रस्तुतियां देते थे। पंडित अमरनाथ मिश्र संगीत समारोह की पूरी जिम्मेदारी निभाते थे। 25 साल तक यह संगीत समारोह सिर्फ एक दिन का होता था। इस समारोह में जब भीड़ बढ़ने लगी तो बड़े महंत पंडित बांकेराम मिश्र ने कुएं की जगत को मंच बनवा दिया। कलाकार कुएं की जगत पर बैठकर हनुमान जी को संगीत सुनाने लगे। कलाकारों की संख्या और आयोजन की प्रसिद्धि बढ़ने लगी तो स्थानीय के बाद बाहरी कलाकारों का प्रवेश शुरू हुआ। 40वें साल में आयोजन स्थल गर्भगृह के दक्षिणी छोर के बरामदे में हो गया। आयोजन दो दिन का होने लगा। 66 के दशक में बाहर से आने वाले पंडित सियाराम तिवारी बड़े कलाकार थे। 71 और 72 में पंडित जसराज के बड़े भाई पंडित मणिराम रहे, दूसरे आयोजन में दिल्ली के वायलिन वादक विजी जोग और पंडित राजन मिश्र के चाचा पंडित गोपाल मिश्र ने सारंगी पर जुगलबंदी की। तबले पर थे पंडित किशन महाराज। किशन महाराज ने तबले पर ऐसी थाप दी कि ट्यूबलाइट ही टूट गई। इसको लेकर चर्चाएं भी खूब हुईं। समापन पर तबला वादक पंडित कंठे की अंतिम प्रस्तुति से होती थी। ख्याति और कलाकारों की बढ़ती संख्या को देख मंच के साथ ही आयोजन भी तीन दिवसीय हो गया।

साल 1971 में संगीत समारोह का चौथा मंच गर्भगृह के उत्तर दिशा के आंगन के पश्चिमी बरामदे को बनाया गया। तब से आयोजन स्थल वहीं है। आयोजन भी तीन दिवसीय हो गया। 1977-78 के दशक में चार दिन का आयोजन हुआ। इसके बाद पांच दिन का कार्यक्रम होने लगा। पंडित मिश्र ने बताया कि बड़े महंत प्रो. वीरभद्र मिश्र के समय तक आयोजन पांच दिन का ही होता था, लेकिन कलाकारों की संख्या बढ़ने लगी तो 2014 से इसे छह दिन का कर दिया गया। शताब्दी वर्ष में इसे सात दिन का किया गया है, यह केवल इसी बार रहेगा।

पांच सौ साल पुरानी है परंपरा

बनारस के जाने-माने संगीतकार पद्मश्री राजेश्वर आचार्य कहते हैं, "संकटमोचन मंदिर में गीत-संगीत की परंपरा करीब पांच सौ साल पुरानी है। इसे गोस्वामी तुलसीदास ने ही शुरू कराया था। पहले विख्यात कलाकार आते थे और अपने मधुर कंठों का जादू बिखेरते थे। सौ साल पहले 1923 में संकटमोचन मंदिर के महंत पंडित बाकेराम मिश्रा ने आधिकारिक तौर पर इस कार्यक्रम की शुरुआत की। इसके बाद मंदिर में विधिवत मंच बनाकर शास्त्रीय गायन और वादन किया जाने लगा।"

"संकटमोचन संगीत समारोह की सबसे बड़ी खासियत है शास्त्रीय संगीत के राग। वो राग जो अलग-अलग समय में गाए और बजाए जाते हैं। जिस पहर का संगीत होगा, आप उसे उसी पहर में सुनेंगे। पूरी रात चलता है संगीत समारोह। भोर में आएंगे तो राग भैरवी सुनेंगे। सुबह होने पर राग सोहनी, गुणकली, बिलासखानी तोड़ी, तोड़ी, जोगिया आदि सुनने को मिलेगा। इसी तरह शाम के वक्त राग यमन, पुरिया, देस तो आधी रात में राग बागेश्री, रागेश्री, मालकौंस, अड़ाना, दरबारी आदि। राग-रागिनियों पर आधारित गायन, वादन और नृत्य देख हर कोई झूमने और ताली बजाने पर मजबूर हो जाता है। संकटमोचन संगीत समारोह में संगीत सुनना एक ऐसी सिद्धि हासिल करना है जिसका प्रभाव जीवन में सालों-साल दिखता है।"

सितार बजाती प्रो.सुप्रिया शाह

क्यों अनूठा है यह समारोह?

भारत में बहुत सारे त्योहार हैं, उन्हीं में एक है संकटमोचन संगीत समारोह। इस समारोह के बारे में सबसे अच्छी बात यह है कि यह सभी के लिए खुला है और इस उत्सव का हिस्सा बनने के लिए किसी आगंतुक को पास या पसंदीदा वीआईपी क्षेत्र की आवश्यकता नहीं है। इस संगीत समारोह का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि कलाकार निःशुल्क प्रदर्शन करते हैं। यह सुनने में अजीब लग सकता है लेकिन यह सच है। जो कलाकार दुनिया भर में प्रदर्शन करने के लिए पैसे लेते हैं, वे इस खुले संगीत समारोह में प्रदर्शन करने के लिए खुद को सम्मानित और धन्य मानते हैं। कलाकार भगवान हनुमान के प्रति अपना सम्मान और भक्ति दिखाते हैं और इसलिए कलाकार मुफ्त में प्रदर्शन करते हैं।

संकटमोचन संगीत समारोह सादगी में आनंद लेने का एक अवसर पेश करता है और यह निर्विवाद रूप से हमें एक दृश्य प्रदान करता है कि कैसे संस्कृति हमें जीवन को प्रेरित करती रहती है। अध्ययन करें तो पता चलता है कि आयोजन की आधारशिला गोस्वामी तुलसीदास ने रखी थी। देश के जाने-माने सरोदवादक पंडित विकास महाराज कहते हैं, "संकटमोचन मंदिर प्रांगण की ख़ासियत है वहां दाख़िल होते ही हर कोई अपना वैभव भूल जाता है। इस दरबार में पहुंचते कलाकार अपनी सारी कीर्ति एक तरफ छोड़कर अपनी अंजुरी में जो भी रस है उसे तिरोहित करते दिखाई देते हैं। इस प्रांगण में शामिल होना और परफॉर्म करना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण है किसी कलाकार को सुनना। यहां मंच पर अपनी कला को पेश करने वाला कलाकार जब अपनी प्रस्तुति ख़त्म कर नीचे उतरता है तो अपना सारा गौरव, अपना सारा ज्ञान एक तरफ रखकर नवोदित कलाकारों को विद्यार्थियों की तरह सुनता दिखाई देता है। संकटमोचन संगीत समारोह का जो आनंद है वह सारे आकर्षणों से परे है।"

संकटमोचन संगीत समारोह को लेकर बनारस के लोगों का यह उल्लास, उत्साह और आनंद नया नहीं, दशकों पुराना है। इस राग उत्सव का रस चखने के लिए संगीत प्रेमी अधीर रहते हैं।

बनारस के जाने-माने वायलिनवादक पंडित सुखदेव मिश्र "न्यूज़क्लिक" से कहते हैं, "वाराणसी गुणी संगीतज्ञों की जन्म-कर्मस्थली है। बनारस घराने की अद्वितीय संगीत परंपरा देश-दुनिया को स्वर, लय, ध्वनि से तरंगित करती है। इस घराने की संगीत की थाती जिन सच्चे कलाकारों की धरोहर रही, उन्होंने अपने यश और व्यक्तित्व वैभव से कला के अमरत्व को अर्थ दिए हैं। संकटमोचन संगीत समारोह अनमोल हैं। अनुभूतियों में संकटमोचन समारोह का सबसे असाधारण प्रभाव यह है पूरे मंदिर परिसर में संगीत हमारी हर स्थल पर उपस्थिति को तरंगित करता है, जहां हम विचरण कर रहे होते हैं। संगीत समारोह की प्रस्तुतियां हमारी ऐसी अनुभूतियों को अपने अनूठेपन के साथ अलंकृत करती हैं।"

बनारस के जान-माने सितारवादक पंडित शिवनाथ मिश्र बताते हैं, "साल 1966 से 67 तक संकटमोचन संगीत समारोह तीन दिन का होता था। उस समय हमारी उम्र 16-17 बरस की थी। तीनों दिन पहला एक घंटा काशी के युवा कलाकारों के लिए होता था। आठ बजे के बाद वरिष्ठ कलाकार गाते-बजाते थे। उसी समय पहली मर्तबा हमें सितार बजाने का अवसर मिला। तबला ईश्वरलालमिश्र, छोटोलाल मिस्र, कुमार लाल मिश्र, सितार अमरनाथ मिश्र ने युवा सत्र में बजाया था। सीनियर आर्टिस्ट अपनी प्रस्तुति के बाद मंच के सामने अग्रिम पंक्ति में बैठकर दूसरे कलाकारों को सुनते थे। तत्कालीन महंत पं. अमरनाथ श्री पखावजीज के अनुरोद पर तबला वादक पंडित कंठे महाराज, ठुमरी गायक पंडित महादेव प्रसाद मिश्र, सरोद वादक पंडित ज्योतिन भट्टाचार्य सहित दूसरे सीनियर आर्टिस्ट कार्यक्रम का संयोजन करते थे। तत्कालीन महंत हनुमान जी का प्रसाद और माला लेकर कलाकारों के घर जाते थे और उन्हें आमंत्रण पत्र देते थे।"

कुचिपुडी नृत्यांगना पद्मश्री पद्मजा रेड्डी ने देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री संकटमोचन को समर्पित किया और कहा, "पांच साल पहले मैं पहली बार बनारस आई थी। तब सोचा भी नहीं था कि दोबारा उन्हें नृत्य पेश करने का अवसर मिलेगा। मैं दरबार में नृत्य के जरिये इस अलंकरण को अर्पित करना चाहती हूं।"

नृत्य प्रस्तुत करतीं पद्मश्री पद्मजा रेड्डी

अहर्निश जारी रहा समारोह

महामारी के दौर में भी संकटमोचन संगीत समारोह बंद नहीं हुआ। इसे ऑनलाइन कराया गया। कोविड काल में परंपरा ना टूटे, इसलिए 2020 में संगीत समारोह का 97वां संस्करण डिजिटल कराया गया। इस समारोह में पंडित जसराज ने अमेरिका के न्यू जर्सी शहर से ऑनलाइन प्रस्तुति दी। संगीत समारोह अब वैश्विक हो चुका है। इस समारोह से बीस लाख से अधिक लोग ऑनलाइन जुड़ते हैं।

(लेखक बनारस स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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