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स्वामी सहजानंद किसानों-मज़दूरों के हाथ में राजनीतिक शक्ति देना चाहते थे

किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती की 134वीं जयंती के मौक़े पर बिहार के राघवपुर स्थित 'श्री सीताराम आश्रम' में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें बड़ी संख्या में विद्वानों और नेताओं ने भाग लिया।
Swami Sahajanand
स्वामी सहजानंद सरस्वती की 134 वीं जयंती के मौक़े पर बिहटा के श्री सीताराम आश्रम में जुटे विद्वान

प्रख्यात स्वाधीनता सेनानी व किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती की 134 वीं जयंती के मौके पर राघवपुर स्थित 'श्री सीताराम आश्रम' में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर दो दिवसीय किसान मेला का भी आयोजन किया गया। इस मौके पर सामाजिक कार्यकर्ता, प्रशासनिक पदाधिकारी, प्रोफेसर, जैसे गणमान्य लोग मौजूद रहे।

स्वागत वक्तव्य देते हुए ट्रस्ट के सचिव डॉ. सत्यजीत सिँह ने कहा, "स्वामी सहजानंद सरस्वती को किसानों में भगवान के दर्शन हुए। उन्होंने संन्यास के माध्यम से समाज़वाद तक की यात्रा की है।"

प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य महासचिव रवींद्रनाथ राय ने कहा, "स्वामी सहजानंद की दृष्टि सिर्फ आज़ादी के आंदोलन पर नहीं थी। उन्होंने देखा कि किसान एक ओर साम्राज्यवाद तो दूसरी ओर जमींदारों से पीड़ित थे। स्वामी जी की दृष्टि में ऐसा भारत बनना था जिसमें किसानों मज़दूरों का राजा कायम होना था। जमींदार नहीं चाहते थे कि खुशहाली नीचे तक आये। स्वामी जी ने किसानों की करुण कहानी को लिखा। स्वामी सहजानंद, प्रेमचंद और भगत सिंह तीनों एक ही तरह सोच रहे थे। उनकी दृष्टि में जो अन्न-वस्त्र उपजायेगा वह क़ानून बनाएगा। उन्होंने बकाश्त आंदोलन चलाया और अमवारी, रेवड़ा, बड़हिया जैसे बड़े आंदोलन किये। रेवड़ा के किसान परेशान थे। किसी के घर गाय का दूध नहीं मिलता था तो कहा जाता था कि किसानों की महिलाओं के दूध लाओ। इसी कारण दरभंगा महाराज को लेकर महात्मा गांधी से मोहभंग हुआ। इस दृष्टि से बिहटा का बहुत ऐतिहासिक महत्व बनाया। स्वामी जी की क्षमता थी कि साधारण से कस्बे बिहटा को राष्ट्रीय पटल पर ला खड़ा किया।"

बिहार सरकार के मुख्य सचिव रहे त्रिपुरारी शरण ने कहा, " हर धर्म में दो हिस्सा रहता है। यदि हमारे रिचूअल को फौलो कराता है तो वह गलत नहीं है। दिक्क़त तब होती है जब वह रिचुअल डोमेन से सेकुलर डोमेन में जाता है। यदि वह मुसलमान के खिलाफ कुछ बोलता है तब वह सांप्रदायिक कहा जाएगा। जो जाति के कर्मकांड में जकड़ कर रह जाता है तब वह प्रगति नहीं कर पायेगा। स्वामी जी ने जिन जमींदारों के खिलाफ लड़ाई लड़ी उनमें से अधिकांश उनकी ही जाति के थे। उनका विचार ऐसा था कि किसान ही देश को आगे बढ़ा सकता है। अंग्रेज़ों ने भारत में डि-इंडस्ट्रीयालाइजेशन किया। इस मायने में स्वामी जी का बहुत बड़ा योगदान है। इस बात को इतिहास्कारों ने रेखांकित किया है। वे अपने समय से बहुत आगे थे।"

अवकाश प्राप्त प्रशासनिक अधिकारी " महापुरुषों के साथ दिक्क़त यह रहती है कि हम उनका नाम बहुत लेते हैं लेकिन उनके विचारों के बारे में बहुत कम् जानते हैं। हम महापुरुषों की जाति तो अवश्य जानते हैं लेकिन उनके विचार से वाकिफ नहीं होते। स्वामी सहजानंद एक पिछड़े गांव देवा में पैदा हुए। बालक नवरंग राय निकल कर देश के सभी तीर्थ घूम कर आये थे। सिर्फ वे पूजा पाठ करने वाले नहीं बल्कि मार्शल रेस के थे। जिस समाज में रहे उसके लिए लगा कि कुछ करना चाहिए। इसी आश्रम से किसान क्रांति का सूत्रपात हुआ है। इसी कारण मैं यहां खडे होकर गौरवान्वित हूं। 1757 में नवाब सुजाउद्दौला की पराजय के बाद रैयतों से लगान वसूलने के लिए जमींदारी व्यवस्था कायम की है। जो दीवानी अधिकार मिला आगे चलकर ईस्ट इंडिया कंपनी ने फ़ौजदारी कानून भी जमींदारों को ही सौंप दिया। अंग्रेज़ों को सिर्फ पैसे से मतलब था। 1793 आते-आते स्थाई बंदोबस्ती कर दी गई। किसानों को अपना लगान चुकाने के लिए अपनी बेटियों तक को बेचना पड़ता था। यदि वे सिर्फ धर्म कर्म में संलग्न रहते थे तो कराहती मनुष्यता को कौन बचाता। बिहार प्रदेश किसान सभा ने तय किया था कि शोषण को बातचीत से हल करेंगे। लेकिन स्वामी जी ने अनुभव से सीखा की शोषक-शासक वर्ग तब तक प्रसन्न रहता है जब तक आप उसके हितों पर प्रहार नहीं करते हैं। ज्योंहि आप उसके हित पर सवाल उठाते हैं वह हिंसक हो उठता है। यदि स्वामी जी दंडी स्वामी रहते, वेद पढ़ाते रहते, पुराण पढ़ाते रहते तो परेशानी नहीं होती। जब किसानों की बात स्वामी जी ने उठाई तब जाकर जमींदारों को दिक्क़त होने लगी। 1950 में ही जिस साल स्वामी जी की मौत हुई उसी साल सीलिंग एक्ट लागू करने वाला पहला राज्य बना।"

अवकाश प्राप्त पुलिस पदाधिकारी राज्यवर्धन शर्मा ने संस्कृत के श्लोक सुनाते हुए कहा, " संन्यास के रास्ते से राजनीति में आने वाले बहुत विरले लोगों में थे स्वामी सहजानंद सरस्वती। स्वामी जी दंडी स्वामी थे। ऐसे लोग तीन दंड धारण करते हैं। वाणी, देह और चित्त का दंड धारण किया। इन तीनों दंडो को धारण करने के बाद उनके साथ भेदभाव किया गया। इस कारण वे क्रांतिकारी बने। हजारी प्रसाद द्विवेदी कहा करते थे कि जो सिर्फ प्रवचन देकर काम नहीं करता वह कुछ नहीं होता। ग्रामशी ने ऑर्गेनिक इंटेलेक्चुअल की चर्चा की है। स्वामी जी वैसे ही इंटेलेक्चुअल थे। स्वामी जी के प्रभाव में लोग जमींदारों के गुमाश्तों को तब पीट दिया करते थे ज़ब वे अत्याचार किया करते थे। गांधी जी से उनके मतभेद हुए। क्योंकि वे कांग्रेस से जुड़े जमींदारों के खिलाफ कुछ नहीं कहते थे। हमारा समाज कनफुकवा समाज है। एक बाबाडम है। स्वामी जी के भारत में अंधविश्वास से मुक्त हो तथा जब तक राजनीतिक शक्ति किसानों- मज़दूरों के हाथ में नहीं आती तब तक उसका कल्याण नहीं होता। इसलिए शासन सूत्र को लड़कर लेने की शिक्षा एक संन्यासी दे रहा है। वे आर्थिक आज़ादी के पक्षधर थे। वे मात्र 61 साल जिए। स्वामी जी व्यक्ति के दर्द को समष्टि के दर्द से जोड़ते हैं।"

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के पूर्व केंद्रीय समिति सदस्य अरुण मिश्रा ने कहा, "देश में एक ओर साबरमती आश्रम तथा तो दूसरी ओर सीताराम आश्रम है जिसने किसान आंदोलन को खड़ा किया। स्वामी जी ने गतिशील जीवन जिया। उन्होंने समझा कि किसानों की दुर्दशा जब तक रहेगी भारत का कल्याण नहीं होगा। अंग्रेज़ों के लिए लाठी जमींदार चलाते थे। यदि अंग्रेज़ी राज को समाप्त करना है तो जमींदारों की रीढ़ तोड़ देना होगा। चीनी क्रांति के महानायक माओ ने तब हेनान प्रांत नामक जाकर किसानों को संगठित किया। उन्होंने देखा कि अभी जो राष्ट्रीय आंदोलन में लोग आ रहे हैं वे जमींदारों के अत्याचार को बंद करने की बात नहीं करते थे। भूमिहार सभा में देखा कि अमीर भूमिहार कुर्सीयों पर बैठे हैं और गरीब भूमिहार जमीन पर बैठा है। तब उनका विरोध करते हुए कहा कि भूमिहार सभा जमींदार सभा है। फिर उस सभा को तोड़ दिया। स्वामी जी की किताब 'किसान कैसे लड़ते हैं' पढ़ने पर हमारे रोंगटे खडे हो जाते हैं। प्रेमचंद के साहित्य में भी यही बात की गई है। 1941 में सोवियत संघ पर हिटलर ने हमला किया तो स्वामी को एक मिनट नहीं लगा और उन्होंने कहा कि सोवियत संघ को आज बचाना सबसे जरूरी है। स्वामी जी कहते हैं कि यदि जमींदारी को समाप्त कर दिया जाता तो पाकिस्तान के मामले में जिन्ना को सफलता नहीं मिलती। क्योंकि पाकिस्तान का नारा मुसलमान जमींदारों का नारा था। भारत में बड़े-बड़े आंदोलन हुए। यहां तेभागा, तेलंगाना, पुनप्रा वायलर, सुरमा वैली जैसे आंदोलन हुए। स्वामी जी के विचारों को फैलाने की जरूरत है कि किसान कैसे लड़ते हैं।"

इस मौके पर प्रो. दिलीप कुमार ने कहा, " स्वामी सहजानंद को किसी जाति का सिद्ध करना उनकी छाती पर पत्थर रगड़ने के समान है। स्वामी जी की प्रेरणा से देश के हर प्रदेश में संघर्ष हुए। 'गया जिले में किसानों की करुण कहानी' में उन्होंने 45 तरह के शोषण का जिक्र किया। वे सिर्फ बिहार नहीं बल्कि पूरे भारत के नेता थे। राहुल संस्कृत्यायन, फणीश्वर नाथ रेणु, नागार्जुन, रामवृक्ष बेनिपुरी जैसे साहित्यकार उनसे प्रभावित थे। 'किसान कैसे लड़ते हैं' में उनका 16 केस स्टडी है। 'किसान क्या करें ' रामायण की तरह है। सबको पढना चाहिए। स्वामी जी ने कहा कि किसान को पहले अर्थनीति की जरूरत है, राजनीति की नहीं। ज़ब तक हम स्वामी जी को पढ़ेंगे नहीं तब तक उन्हें समझ नहीं पाएंगे। आदिवासियों का विकास तब तक नहीं होगा जब तक एक उनकी लिपि नहीं रहेगी।"

सभा की अध्यक्षता कैलाशचंद्र झा ने की। उन्होंने कहा कि, 'मेरी और वालटर हाउज़र की प्रतिबद्धता स्वामी सहजानंद सरस्वती के साथ है। 1942 का जो भारत छोडो आंदोलन बिहार में सबसे अधिक सफल हुआ उसके पीछे किसान सभा और स्वामी जी की कोशिश थी। जब स्वामी सहजानंद के आंदोलन की विरासत कमजोर हुई तो उसका प्रभाव समाजवादी और वामपंथी दोनों पर पड़ी।"

इस सभा को सामाजिक कार्यकर्ता रामप्रवेश, हेम नारायन, सुधीर शरण सिंह, ने भी संबोधित किया। सभा का संचालन युवा संस्कृतिकर्मी जयप्रकाश ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन गोपाल शर्मा ने किया।

दो दिवसीय किसान मेला का समापन नुक्कड़ नाटक के साथ संपन्न हुआ। 'लोकपंच' की प्रस्तुति 'क़ातिल खेत' का प्रदर्शन किया गया जिसे बड़ी संख्या में लोगों ने देखा। इश्तियाक अहमद द्वारा लिखित इस नाटक का निर्देशन वरिष्ठ रंगकर्मी मनीष महिवाल ने किया।

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