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सुप्रीम कोर्ट ने अबॉर्शन को लेकर महिलाओं के हक़ की जो ज़रूरी बातें कहीं, क्या इससे कुछ बदलेगा?

सुप्रीम कोर्ट ने 27 हफ़्ते की प्रेग्नेंट दुष्कर्म पीड़िता को अबॉर्शन की अनुमति देते हुए कहा कि हर महिला को हस्तक्षेप के बिना स्वायत्त प्रजनन विकल्प चुनने का अधिकार है।
supreme court
फ़ोटो : PTI

"महिला के शरीर पर सिर्फ उसका ही अधिकार है और बिना हस्तक्षेप के अबॉर्शन पर उसका निर्णय ही अंतिम निर्णय है।”

ये अहम टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 21 अगस्त को एक महत्वपूर्ण गर्भपात की याचिका के मामले में की। अदालत ने अपने आदेश में दुष्कर्म पीड़िता को 27 हफ्ते का गर्भ गिराने की इजाजत देने के साथ ही गुजरात हाई कोर्ट को सुनवाई में देरी के लिए फटकार भी लगाई। इसके अलावा सर्वोच्च अदालत ने हाईकोर्ट के उस फैसले को भी पलट दिया, जिसमें गुजरात हाइकोर्ट ने ठीक इसके विपरीत 26 हफ्तों की बात का हवाला देते हुए गर्भपात की इजाजत देने से इनकार कर दिया था।

बता दें कि सरकार ने 25 मार्च 2021 में गर्भपात कानून (मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी क़ानून, 1971) में बदलाव कर बलात्कार और व्यभिचार जैसे मामलों में गर्भपात कराने की सीमा को 20 सप्ताह से बढ़ा कर 24 सप्ताह कर दिया था। और अगर भ्रूण में गंभीर बीमारी के संकेत हैं तो मेडिकल बोर्ड की इजाज़त से इसके कुछ सप्ताह बाद तक भी गर्भपात कराया जा सकता है। हालांकि इसके लिए दो डॉक्टरों की मंज़ूरी की शर्त है। देश में सामान्य तौर पर एक डॉक्टर की मंज़ूरी से 20 सप्ताह के भीतर गर्भपात कराया जा सकता है। इससे पहले पुराने कानून में प्रेगनेंसी को टर्मिनेट करने के लिए 20 हफ्ता ही अंतिम डेडलाइन थी, 20-24 हफ़्ते में गर्भपात की महिला को अनुमति नहीं थी।

क्या है पूरा मामला?

गुजरात की हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा ये मामला दरअसल एक बलात्कार पीड़िता की प्रेगनेंसी के टर्मिनेशन का था। खबरों के मुताबिक पीड़िता की ओर से 7 अगस्त को गुजरात हाई कोर्ट में गर्भपात की अर्जी दाखिल की गई थी, जिस पर 8 अगस्त को सुनवाई हुई और मेडिकल बोर्ड का गठन के बाद 10 अगस्त को रिपोर्ट पेश की गई। 11 अगस्त को इस रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर ले लिया गया। उसके बाद गुजरात हाइकोर्ट ने 23 अगस्त की तारीख लगा दी थी, जिसके बाद ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। पीड़िता की ओर से कहा गया कि इस तरह से जो देरी की गई है, इसके कारण कीमती वक्त बर्बाद हो रहा है।

बीते शनिवार, 19 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट की स्पेशल बेंच ने इस मामले की सुनवाई की और गुजरात हाई कोर्ट के रवैए पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए इसे निराशाजनक बताया। अदालत का कहना था कि पीड़िता और उसकी प्रेगनेंसी के लिए एक-एक दिन महत्वपूर्ण है। ऐसे में इतना महत्वपूर्ण मसला होने के बाद भी इसकी सुनवाई 12 दिन के लिए क्यों टाली गई। काफी कीमती समय बर्बाद हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने उसी दिन पीड़िता की फिर से मेडिकल जांच करने की बात कही।

गुजरात हाई कोर्ट को फटकार

सोमवार, 21 अगस्त को सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि शनिवार को सुप्रीम कोर्ट के इस मामले की सुनवाई के बाद गुजरात हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने स्वतः संज्ञान लेते हुए इस केस में आगे की तारीख को लेकर एक क्लैरिफिकेशन ऑर्डर जारी किया। सुप्रीम कोर्ट इस बात पर भी नाराज हुआ कि जब उसने इस मामले में सुनवाई कर दी तो गुजरात हाई कोर्ट को दोबारा सुनवाई करने की जरूरत कहां थी। स्पष्टीकरण के लिए इस तरह से ऑर्डर जो पारित किया गया, वो बेहद निराशाजनक है।

कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा, “गुजरात हाई कोर्ट में क्या हो रहा है? भारत में कोई भी अदालत किसी ऊंची अदालत के आदेश के ख़िलाफ़ आदेश पारित नहीं कर सकती। यह संवैधानिक फ़िलॉसफ़ी के ख़िलाफ़ है। हम हाई कोर्ट के इस तरह आदेश देने की सराहना नहीं करते।”

गुजरात हाई कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने गर्भधारण और गर्भपात को लेकर भी कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां की, जिसके आने वाले दिनों में दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं। याचिका पर गौर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय समाज में शादी के बाद गर्भधारण करना दंपति और समाज के लिए खुशी की वजह होता है लेकिन शादी के इतर जब अनचाहा गर्भ हो तो वो महिला के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने ये भी कहा कि इस तरीके की प्रेगनेंसी को कैरी करना बेहद खतरनाक हो सकता है। इसमें लड़की ट्रॉमा के कंडीशन में पहुंच सकती है। इसके अलावा अगर पीड़िता को यौन उत्पीड़न के परिणामस्वरूप पैदा हुए बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर किया जाता है तो बलात्कार का आघात आजीवन बना रह सकता है। खंडपीठ ने यह भी बताया कि हर महिला को हस्तक्षेप के बिना स्वायत्त प्रजनन विकल्प चुनने का अधिकार है। मानव गरिमा के विचार के केंद्र में राज्य है।

पीड़ित महिलाओं के लिए एक उम्मीद

जाहिर है इस ऑर्डर के बाद ऐसी कई पीड़िताओं को एक उम्मीद मिली होगी, जिन्हें अनचाहा गर्भ रखने के मजबूर किया जाता है। 27 हफ्ते की प्रेगनेंसी को टर्मिनेट करने का ये ऑर्डर भविष्य में ऐसे ही मामलों में नज़ीर साबित हो सकता है। आने वाले दिनों में इस जजमेंट का हवाला देते भी देखा जा सकता है। इस लिहाज़ से ये फैसला अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है।

ध्यान रहे कि बीते साल 2022 में आज के चीफ जस्टिस और तत्कालीन जस्टिस डी.वाई चंद्रचूड़़ के नेतृत्व वाली तीन-न्यायाधीशों की खंडपीठ ने अविवाहित महिला को भी गर्भपात का अधिकार देते हुए देश में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट को लेकर एक जरूरी बात कही थी। कोर्ट ने कहा था कि साल 2021 में संशोधन के बाद इस एक्ट में धारा 3 के स्पष्टीकरण में पति के बजाय पार्टनर शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा है, जो इस अधिनियम के तहत अविवाहित युवती को कवर करने के विधायी इरादे को दर्शाता है। इसलिए याचिकाकर्ता को केवल इस आधार पर लाभ से वंचित नहीं किया जाना चाहिए कि वह एक अविवाहित महिला है।

गौरतलब है कि भारत उन कुछ देशों में शुमार है जहां महिलाओं को बहुत हद तक क़ानूनी तौर पर गर्भपात का हक़ है, लेकिन यहां समस्याएं अलग तरह की हैं। अक्सर देखा गया है कि यहां अबॉर्शन का विकल्प चुनने वाले लोगों को समाज में बुरा ठहराकर ‘अपराधी और हत्यारा’ तक कहा जाता है। उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। पितृसत्तात्मक समाज और परिवार के लिए यह बिल्कुल मायने नहीं रखता कि सामने वाला क्या चाहता है। देश में अबॉर्शन को लेकर सामाजिक और आर्थिक पहलू भी हैं। भारत में मातृत्व मृत्यु का तीसरा बड़ा कारण असुरक्षित गर्भ समापन है।

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