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उत्तराखंड: असिस्टेंट प्रोफेसर पदों पर भर्ती की शर्तों का विरोध, इंटरव्यू के 100 नंबर पर न हो जाए खेल!

इन पदों के लिए आवेदन करने वाले सैकड़ों अभ्यर्थियों ने उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष को एक ज्ञापन भेजा है। इसमें नियुक्ति का आधार एपीआई और साक्षात्कार बनाए जाने को नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के प्रतिकूल बताया है।
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असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों के लिए निकाली गई नियुक्तियां और स्टुडेंट्स द्वारा मुख्यमंत्री को लिखा गया पत्र

उत्तराखंड सरकार चुनाव के पहले धड़ाधड़ नौकरियां निकाल रही है। इसी क्रम में चार दिसंबर, 2021 को असिस्टेंट प्रोफ़ेसरों के 455 पदों पर नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकाला गया है। लेकिन चार साल के इंतज़ार के बाद निकले इस विज्ञापन का विरोध शुरू हो गया है। इसकी वजह इन पदों के लिए अपनाई जा रही चयन प्रक्रिया है। इस बार इन पदों के लिए प्रवेश परीक्षा को हटा दिया गया है। यही नहीं एपीआई (एकेडमिक परफ़ॉर्मेंस इंडिकेटर्स) में भी जिस तरह नंबरों को आधार दिए गए हैं अभ्यर्थी उसका भी विरोध कर रहे हैं। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा और भाकपा (माले) के गढ़वाल सचिव इंद्रेश मैखुरी के इस पर ऐतराज़ जताने का बाद मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है।

शानदार नौकरी और अबूझ शर्तें 

उत्तराखंड लोक सेवा आयोग ने 4 दिसंबर को असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (सहायक आचार्य) के 455 पदों के लिए विज्ञापन निकाला। इसके लिए आवेदन करने की अंतिम तारीख 24 दिसंबर है। 26 विषयों के लिए निकाले गए इन पदों का वेतनमान रुपये 15,600-39,100 ग्रेड पे-6000 जिसका वेतन मैट्रिक्स 57,700 से 1,82,400 रुपये है। ज़ाहिर तौर पर इतने पैसे वाली सरकारी नौकरी के लिए बेरोज़गार युवा बहुत कुछ कर गुज़रने को तैयार रहेंगे।

विवाद की वजह क्या है

एपीआई(Academic performance indication) “शैक्षणिक प्रदर्शन संकेतक” में ग्रेजुएशन से पीएचडी डिग्री तक के लिए अंक निर्धारित किए गए हैं।

ग्रेजुएशन में 60% से 80% स्कोर हैं तो 19 अंक,

अगर यदि ग्रेजुएशन में 55% से 60 % स्कोर हैं तो 16 अंक,

ग्रेजुएशन में 45% से 55% स्कोर हैं तो 10 अंक,

पोस्ट-ग्रेजुएशन में 60% से 80% स्कोर हैं तो 23 अंक,

पोस्ट-ग्रेजुएशन में 55% से 60% स्कोर हैं तो 20 अंक,

पीएचडी डिग्री के लिए 25 अंक हैं, 

NET के लिए 08 अंक,

JRF के लिए 10 अंक,

और प्रत्येक शोध पत्र के लिए 02 अंक निर्धारित हैं।

इन पदों का इंतज़ार कर रहे अभ्यर्थियों को इस एपीआई पर ही कई ऐतराज़ हैं। उनका कहना है कि इस एपीआई से पीएचडी करने वालों को सीधा फ़ायदा होगा क्योंकि उसके अंक एक चौथाई यानी 25 हैं। इसके विपरीत राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा नेट/जेआरफ़ को सिर्फ़ 08 और 10 अंक देकर इनका महत्व बहुत कम कर दिया गया है।

शिवानी पांडे गढ़वाल विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रही हैं। उनके जैसे बहुत से अभ्यर्थियों की पीएचडी कोरोना के कारण अटकी हुई है। उनकी चिंता यह है कि इसकी वजह से उनके हाथ से यह मौका निकल जाएगा जो चार साल बाद आया है और फिर न जाने कब आएगा।

इन पदों के लिए आवेदन करने वाले सैकड़ों अभ्यर्थियों ने उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष को दिए एक ज्ञापन भेजा है। इसमें नियुक्ति का आधार एपीआई और साक्षात्कार बनाए जाने को नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के प्रतिकूल बताया है।

इसमें यह भी कहा गया है कोरोना को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय अनदुान आयोग (UGC) ने एक जुलाई, 2018 को जारी नोटिफ़िकेशन से सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति की प्रकिया का आधार API और साक्षात्कार को रखने की योजना को 2023 तक स्थगित कर दिया है। इसका मुख्य कारण कोरोना महामारी से प्रभावित छात्रों का एक वर्ग है, जो कोरोना के कारण अपने शोध को समय पर पूरा नहीं कर पाए हैं।

इसके अलावा साल में दो बार आयोजित होने वाली राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (NET) की प्रक्रिया भी डेढ़ साल बाद 20 दिसंबर 2021 से शुरू हुई है और अभी जारी है। इसके परिणाम अभी घोषित नहीं हुए हैं।

उत्तराखंड सरकार में 2016 के बाद से प्रदेश में राज्य पात्रता परीक्षा (USET) का आयोजन नहीं करवा सकी है। इस ज्ञापन में उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष से मांग की गई है कि इस नियुक्ति प्रक्रिया को निरस्त कर लिखित परीक्षा (80%) तथा साक्षात्कार (20%) की पारदर्शी नियुक्ति प्रणाली को अपनाते हुए नियुक्तियां की जाएं।

राजनीति 

भाकपा (माले) के गढ़वाल सचिव इंद्रेश मैखुरी ने मुख्यमंत्री, उच्च शिक्षा मंत्री और लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष को ईमेल और वॉट्सऐप के ज़रिए एक ज्ञापन भेजा। इसमें नियुक्ति के लिए एपीआई प्रक्रिया को अपनाने का विरोध करते हुए लिखा कि इस शर्त से उत्तराखंड के अभ्यर्थी यह महसूस कर रहे हैं कि उक्त विज्ञप्ति उन्हें प्रतियोगिता में शामिल करने के लिए नहीं वरन वंचित करने के लिए निकाली गई हैं।

मैखुरी ने न्यूज़ क्लिक से बातचीत में कहा एपीआई वाली प्रक्रिया के चलते तो बहुत से नए बच्चे इन नियुक्तियों के लिए अपात्र ही हो जाएंगे। इसके विपरीत कई राज्यों में एंट्रेंस टेस्ट करवाया गया है। मध्य प्रदेश में तो अभ्यर्थियों ने अदालत की शरण ली, फिर सरकार को एंट्रेंस टेस्ट करवाना पड़ा।

उत्तराखंड के राज्यसभा सांसद और कांग्रेस नेता प्रदीप टम्टा ने भी एपीआई प्रक्रिया का विरोध करते हुए इसे अन्यायपूर्ण बताया। अपनी फ़ेसबुक पोस्ट में टम्टा ने लिखा, "चुनावी मौसम को देखते हुये हाल ही में #उत्तराखण्ड भाजपा सरकार ने प्रदेश के राजकीय महाविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (समूह-क) के रिक्त पदों हेतु भर्तियां निकालीं हैं। लेकिन अभ्यर्थियों की चयन हेतु इस बार परंम्परागत लिखित परीक्षा को आधार न बनाकर नए तरीके #API (Academic Performance Indicator) को आधार बनाया है, वह अन्यायपूर्ण है और उससे कई अभ्यर्थियों का भविष्य अन्धकारमय होने वाला है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग(University Grants Commission) की नियमावली के अनुसार उक्त पदों हेतु आवेदन करने हेतु न्यूनतम योग्यता #NET (National Eligibility Test) अथवा #SET (State Eligibility Test) का होना आवश्यक है।"

उन्होंने आगे लिखा, "ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि UGC के 2018 वाले सर्कुलर के मुताबिक राज्यों को यह स्वतंत्रता प्रदान की गई है कि वह अपने महाविद्यालयों में चयन परीक्षा की प्रक्रिया का निर्धारण स्वयं कर सकता है। अर्थात प्रदेश सरकार चाहे तो परंपरागत तरीके लिखित परीक्षा अथवा API (Academic Performance Indicator) दोनों में से किसी को भी चयन प्रक्रिया  हेतु प्रयोग कर सकती है। लिहाजा #उत्तरप्रदेश, #मध्यप्रदेश, #राजस्थान, #हरियाणा, #पंजाब, #दिल्ली, #हिमाचल तथा अन्य सभी राज्यों में चयन प्रक्रिया हेतु Academic Performance Indicator को आधार न मानते हुए परम्परागत लिखित परीक्षा को ही आधार रखा है।" 

राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत इस सारी प्रक्रिया को लेकर सवाल पूछे जाने पर पल्ला झाड़ लेते हैं और कहते हैं कि नियुक्ति प्रक्रिया तय करना सरकार का नहीं लोक सेवा आयोग का काम है। वह यह भी कहते हैं कि अगर अभ्यर्थियों को किसी तरह की कोई परेशानी है तो वह उनसे (उच्च शिक्षा मंत्री से) मिलें, लोक सेवा आयोग से कहकर उनकी परेशानी दूर करवाने की कोशिश करेंगे।

भ्रष्टाचार के लिए खुला दरवाज़ा 

अभ्यर्थियों की आशंका इस पूरी प्रक्रिया में भ्रष्टाचार की आशंका को लेकर भी है। क्योंकि इस पूरी प्रक्रिया में चयन साक्षात्कार के आधार पर ही होने हैं जिसमें 'खेल' होने की पूरी संभावना है।

'समस्त अभ्यर्थी गण' के नाम से जारी एक कॉन्सेप्ट नोट के अनुसार, "इसके पहले 2017 में जब असिस्टेंट प्रोफ़ेसर की परीक्षण हुई थी तो 100 नांबर की लिखित परीक्षा और 100 नंबर ही साक्षात्कार के रखे गए थे। परंतु वर्तमान में लिखित परीक्षा न कराकर API (Academic performance Indicator ) द्वारा चयनित अभ्यर्थियों में से भी साक्षात्कार में 1 पद के सापेक्ष केवल 4 अभ्यर्थी बुलाए जाएँगे। ये अभ्यर्थी वही होंगे जिनका API स्कोर सबसे अधिक होगा। इनमें से भी प्रथम चार (यदि किसी विषय में सीट 10 से कम हुई तो प्रथम 8) को ही बुलाया जाएगा।"

"इसका अर्थ यह हुआ की आवेदन की प्रक्रिया में ऊर्जा, धन एवं समय सभी का खर्च होगा परन्तु निश्चित नहीं है कि उन्हें साक्षात्कार हेतु बुलाया भी जाएगा या नहीं?"

"इस प्रकार लाखों अभ्यर्थी 'प्रतिस्पर्धा के सामान अवसर' से वंचित हो जाएंगे। सरकार लाखों अभ्यर्थियों को आवेदन तो करवाएगी, फीस जमा करवाएगी लेकिन अवसर मिलेगा या नहीं यह किसी को नहीं पता।"

इस प्रक्रिया में सब कुछ अंततः साक्षात्कार पर निर्भर करेगा और यह अजीब नहीं है कि इसमें भ्रष्टाचार की बू आए। नाम न बताने की शर्त पर पत्रकार ने न्यूज़क्लिक को बताया कि अस्टिटेंट प्रोफ़ेसर के एक पद के लिए 20 लाख तक की रिश्वत की बातें चल रही हैं।

इस बारे में बात करने पर इंद्रेश कहते हैं कि यह पूरी प्रक्रिया कुछ ख़ास लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए अपनाई गई लगती है। वह कहते हैं कि एक तो इतने लंबे अरसे बाद इतने पद निकाले गए हैं, जो काफ़ी कम लगते हैं, उस पर अगर आप पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया अपनाएं तो इसमें दिक्कत किसे हो सकती है? 

राज्य के बहुत से पीएचडी कर रहे विद्यार्थी इस मुद्दे को हाईकोर्ट में ले जाने की तैयारी कर रहे है।

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