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किसान आंदोलन: ज़रा याद कीजिए जर्मनी में कृषक युद्ध और एंगेल्स

"मजदूर-किसान गठबंधन का ठीक-ठीक गठन और इस गठबंधन का ठीक-ठीक एजेंडा, ठोस हालात के हिसाब से अलग-अलग देशों में, अगल-अलग होगा."
जर्मनी में कृषक युद्घ और एंगेल्स

आज जब हमारे देश के किसान केंद्र सरकार के तीन कुख्यात कानूनों को निरस्त कराने के लिए बहादुरी पूर्ण संघर्ष में लगे हुए हैं और बारिश तथा हाड़ कंपाने वाली सर्दी के बीच दिल्ली में डेरा डाले बैठे हैं, ऐसे में यहाँ 1525 के जर्मनी के कृषक युद्घ के फ्रेडरिक एंगेल्स के अध्ययन को याद करना उपयुक्त होगा। इस अध्ययन में एंगेल्स ने इस कृषक युद्ध के असाधारण नेता, थॉमस मुएंजर की प्रशंसा भी की थी। एंगेल्स के इस लेखन को याद करना, एक और कारण से भी आवश्यक हो गया है।

बहुत से लोगों के बीच यह धारणा है कि जहाँ लेनिन ने मजदूर-किसान गठबंधन का विचार पेश किया था, आगे चलकर उसे माओ ने तथा तीसरी दुनिया के अन्य कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों ने आगे बढ़ाया था, खुद मार्क्स और एंगेल्स दोनों ही, समाजवाद की ओर संक्रमण में सर्वहारा के सहयोगी के रूप में किसानों की संभावित भूमिका को लेकर संशयशील थे। संदर्भ से काटकर, मार्क्स की कुछ छिटपुट टिप्पणियों को छांट-छांटकर उद्यृत किए जाने ने भी, इस धारणा को मजबूत करने में मदद की है।

अराजकतावादी, इस मामले में मार्क्सवाद की खासतौर पर कड़ी आलोचना करते थे। बाकुनिन ने जर्मन कम्युनिस्टों पर आरोप लगाया था कि वे तमाम किसानों को, प्रतिक्रिया के तत्वों के रूप में देखते थे। बाकुनिन ने यह भी जोड़ा था: ‘सच्चाई यह है कि मार्क्सवादी इससे अलग कुछ सोच ही नहीं सकते हैं। किसी भी कीमत पर राज सत्ता की पूजा करने वाले मार्क्सवादी तो, हरेक जन-क्रांति को, खासतौर पर एक किसान क्रांति की आलोचना तो करेंगे ही, जो अपनी प्रकृति से ही अराजक होती है और जो सीधे राज्य के खात्मे की ओर बढ़ती है।’

बहरहाल, मार्क्स और एंगेल्स के संबंध में यह धारणा पूरी तरह से गलत है। जर्मन मजदूर वर्ग के नेता, फर्डिनेंड लासेल ही थे जिन्होंने जर्मनी के सोलहवीं सदी के किसान विद्रोह को ‘क्रांतिकारी नजर आने’ के बावजूद, अपनी ‘अंतर्वस्तु तथा सिद्धांत’ मेें प्रतिक्रियावादी कहा था। इस मामले में और इसी प्रकार अन्य क्षेत्रों में भी, जैसे लासाल द्वारा प्रस्तुत किए गए तथाकथित ‘मजदूरी के लौह नियम’ के मामले में (कि पूंजीवाद के अंतर्गत मजदूरी कभी भी गुजारे के एक खास भौतिक स्तर से ऊपर नहीं निकल सकती है), लासाल के विचारों को भ्रांतिपूर्वक, मार्क्स और एंगेल्स के विचारों के साथ जोड़ दिया गया। वास्तव में जर्मनी के सोलहवीं सदी के किसान विद्रोह के एंगेल्स के अध्ययन का मकसद ही जर्मन वामपंथ में मौजूद इसी प्रवृत्ति की काट करना था, जिसके शिकार विल्हेल्म लीबनेख्त जैसे नेता तक थे, जो किसानों को एक प्रतिक्रियावादी भीड़ की तरह देखते थे, जिसके साथ मजदूर वर्ग का कोई गठबंधन नहीं हो सकता था।

इसके विपरीत एंगेल्स ने, न सिर्फ आगामी जर्मन क्रांति के लिए मजदूर-किसान गठबंधन की वकालत की थी, बल्कि यह भी सुझाया था कि 1525 का किसान विद्रोह विफल ही इसलिए हुआ था कि वह स्थानीय प्रकरणों की एक श्रृंखला भर बना रहा, जबकि इन प्रकरणों के बीच राष्ट्रीय स्तर पर शायद ही कोई तालमेल था (तब तक तो जर्मनी एक एकीकृत देश भी नहीं बना था) और इसलिए भी कि किसान, स्थानीय स्तर पर भी मेहनतकश शहरी अवाम के साथ (जो पूर्व-सर्वहारा वर्ग बनाते थे) गठबंधन कायम करने में विफल रहे थे। वास्तव में थुरिंगिया जैसे क्षेत्रों में, जहाँ थॉमस मुएंजर सक्रिय थे और जहाँ किसान, मेहनतकश अवाम से गठबंधन कायम करने में कामयाब रहे थे, वे कहीं ज्यादा मजबूती से प्रतिरोध भी कर पाए थे।

‘पीजेंट वार इन जर्मनी’, 1848 में यूरोप भर में क्रांति की पराजय की छाया में, 1850 में लिखी गयी थी। 1870 में एंगेल्स ने इस पुस्तक के नये संस्करण की एक भूमिका लिखी थी जिसमें उन्होंने, 1525 तथा 1848 की क्रांतियों की समानताएं दिखायी थीं और मजदूर-किसान गठबंधन के पक्ष में अपनी दलील को और स्पष्ट किया था।

1870 की अपनी भूमिका में एंगेल्स ने बताया था कि जर्मन पूंजीपति वर्ग, बहुत देरी से परिदृश्य में आया था। तब तक यूरोप में अन्यत्र पूंजीवादी विकास ने अपने साथ ही साथ सर्वहारा को इस हद तक विकसित कर दिया था कि इन देशों तक में पूंजीपति वर्ग, राजनीतिक रूप से पीछे हट रहा था और उसे अन्य पुराणपंथी, मजदूरवर्ग विरोधी तत्वों के साथ रिश्ते बनाकर, अपनी स्थिति को मजबूत करना पड़ रहा था। मिसाल के तौर पर फ्रांस में पूंजीपति वर्ग को, लुई बोनापार्ट के शासन तक को स्वीकार करना पड़ा था। जर्मनी में, जहां पूंजीपति वर्ग ने राजनीतिक सत्ता की ओर कोई कदम बढ़ाए तक नहीं थे, जहां से वह ‘पीछे हटता’, उसे शुरूआत से ही सामंतों के साथ गठजोड़ करना पड़ा था ताकि निजी संपत्ति की हिफाजत करने के लिए, जिसमें पूंजीवादी तथा सामंती, दोनों तरह की निजी संपत्तियां शामिल थीं, एक संयुक्त मोर्चा बना सके।

इस प्रक्रिया में पूंजीपति वर्ग ने अनिवार्य रूप से किसानों के हितों के साथ विश्वासघात किया था और किसानों के हित तभी साध सकते थे, जब मजदूर-किसान गठबंधन का निर्माण करने के जरिए, सर्वहारा वर्ग सत्ता में आ जाता। इस तरह का गठबंधन बनाया जा सकता था और इन दोनों सहयोगियों के संयुक्त संख्या बल के आधार पर, वास्तव में सर्वहारा को सत्ता में पहुंचाया सकता था। इस तरह, पूंजीपति-भूस्वामी गठजोड़ का मुकाबला करने के लिए, मजदूर-किसान गठबंधन ऐतिहासिक रूप से जरूरी भी था और संभव भी।

एंगेल्स ने आबादी के उन तबकों की सूची भी तैयार की थी, जो उन्नीसवीं सदी के आखिर के जर्मनी की ठोस परिस्थितियों में, सर्वहारा के सहयोगी बन सकते थे। ये तबके थे: छोटे किसान (एंगेल्स, किसानों के विभिन्न वर्गों के लिए बड़े, मंझले तथा छोटे किसान की संज्ञा का ही प्रयोग करते हैं न कि धनी, मध्यम तथा गरीब किसान की संज्ञा का) और खेत मजदूर (जिन्हें वह खेत में काम करने वाले उजरती मजदूर कहते हैं)। वह अपने तर्क को इस प्रकार स्पष्ट करते हैं:

‘छोटे किसान (कहीं बड़े किसान पूंजीपति वर्ग में आते हैं) एकसार नहीं होते हैं। वे या तो भू दासता में होते हैं, जो अपने मालिकों या जमींदारों से बंधे होते हैं और चूंकि पूंजीपति वर्ग उन्हें भू दासता से मुक्त कराने में अपना कर्तव्य पूरा करने में नाकाम रहा होगा , उन्हें यह समझाना मुश्किल नहीं होगा कि वे सिर्फ मजदूर वर्ग के ही हाथों से अपनी मुक्ति की उम्मीद कर सकते हैं। या फिर वे गैर-भूधर रैयत (टेनेंट) होते हैं, जिनकी स्थिति करीब-करीब आइरिशों जैसी होती है। ज़मीन के भाड़े इतने ज्यादा होते हैं कि सामान्य फसल की सूरत में भी किसान तथा उसका परिवार मुश्किल से किसी तरह गुजारा चला पाता है और जब फसल खराब होती है, तब तो वह शब्दश: भूखों मरता है। जब वह जमीन का भाड़ा नहीं दे पाता है, वह पूरी तरह से जमींदार के रहमो-करम पर होता है। पूंजीपति वर्ग, मजबूर किए जाने पर ही, उसे राहत मुहैया कराने की बात सोचता है। इसलिए, ये रैयत राहत के लिए मजदूर वर्ग के सिवा और किस की ओर देख सकते हैं?

‘किसानों का एक समूह और है, जिनके पास जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा होता है। ज्यादातर मामलों में उन पर रेहनों का इतना बोझ लदा रहता है कि महाजन पर उनकी निर्भरता, जमींदार पर रैयत की निर्भरता के बराबर होती है। उनकी आमदनी व्यावहारिक मानों में एक मामूली मजदूरी होती है और वह भी अच्छी और खराब फसलों के अदल-बदल कर आने के चलते, बहुत ही अनिश्चित होती है। ये लोग पूंजीपतियों से शायद ही कुछ हासिल होने की उम्मीद कर सकते हैं क्योंकि पूंजीपति--पूंजीपति महाजन--ही उनका खून चूसते हैं। इसके बावजूद, किसान अपनी संपत्ति से चिपके रहते हैं, हालांकि वास्तविकता में वह उनकी नहीं होती है बल्कि महाजनों की ही होती है। इन लोगों के सामने यह स्पष्ट कर देना जरूरी होगा कि जब जनता की कोई सरकार, सारे रेहनों को राज्य के ऋणों में बदलेगी तथा इस तरह जमीन का भाड़ा कम कर देगी, तभी वे सूदखोरों से खुद को आजाद कर पाएंगे। लेकिन, यह मजदूर वर्ग ही कर सकता है।

‘जहां मंझले तथा बड़े भूस्वामियों का बोलबाला है, खेतों के उजरती मजदूर ही वह वर्ग बनाते हैं, जिसकी संख्या सबसे ज्यादा है। जर्मनी के समूचे उत्तरी तथा पूर्वी हिस्से में ऐसा ही है और इसी वर्ग में शहरों के औद्योगिक मजदूरों को, अपने सबसे बड़ी संख्या वाले तथा स्वाभाविक सहयोगी मिलेंगे। जिस तरह पूंजीपति, औद्योगिक मजदूर के खिलाफ होता है, उसी तरह बड़ा भूस्वामी या बड़ा रैयत, खेतिहर मजदूर के खिलाफ होता है। जो कदम इनमें से एक की मदद करते हैं, दूसरे की भी मदद करेंगे। औद्योगिक मजदूर खुद को मुक्त तभी कर पाएंगे जब वे पूंजीपति वर्ग की पूंजी को यानी कच्चे मालों, मशीनों व औजारों, उत्पादन के लिए आवश्यक खाद्य सामग्री को, सामाजिक संपत्ति में यानी अपनी ही संपत्ति में बदलेंगे, जिसका उपयोग वे साझा तरीके से करेंगे। इसी तरह खेतिहर मजदूरों को भयावह दरिद्रता से तभी मुक्त किया जा सकता है, जब उनके काम का मुख्य लक्ष्य यानी खुद जमीन, बड़े किसानों तथा उनसे भी बड़े सामंती प्रभुओं की निजी संपत्ति से हटा ली जाएगी और सामाजिक संपदा में रूपांतरित कर दी जाएगी, जिस पर खेतिहर मजदूरों का समूह साझे के आधार पर खेती करेगा।’

एंगेल्स यहाँ दो-चरणों में क्रांति कि नहीं बल्कि एक चरण में क्रांति की, एक समाजवादी क्रांति की ही कल्पना करते हैं। इसका अर्थ यह है कि क्रांति के फौरन बाद, तमाम प्रयास समाजवाद के विकास की दिशा में होंगे, न कि संक्रमण के एक दौर में शुरूआत में पूंजीवाद के किसी निर्माण की ओर। इसीलिए, वह सिर्फ बड़े किसानों को ही नहीं बल्कि मंझले किसानों तक को, मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी सहयोगियों की सूची से बाहर रखते हैं। वह भूमि के राष्ट्रीयकरण का सुझाव देते हैं, न कि सामंती जागीरों को तोडऩे के  बाद, भूमि के मूलगामी पुनर्वितरण का।

जाहिर है कि मजदूर-किसान गठबंधन का ठीक-ठीक गठन और इस गठबंधन का ठीक-ठीक एजेंडा, ठोस हालात के हिसाब से अलग-अलग देशों में, अगल-अलग होगा। इसके अलावा, आज के संदर्भ में किसान प्रश्न में सिर्फ सामंती उत्पीडऩ से मुक्ति ही नहीं आएगी बल्कि बड़ी पूंजी से मुक्ति भी शामिल होगी, जिसमें घरेलू कार्पोरेट तथा बहुराष्ट्रीय एग्रीबिजनेस, दोनों शामिल हैं। लेकिन जैसा कि एंगेल्स और मार्क्स ने पहचाना था (याद रहे कि उक्त पुस्तक पहली बार मार्क्स द्वारा संपादित नियो राइनिश त्सेइटुंग में, लेखों के रूप में प्रकाशित हुई थी, जो जाहिर है कि इस मामले में दोनों के विचारों की समानता को दिखाता था), किसान जनता के साथ उपयुक्त गठबंधन, समाजवाद तक पहुंचने की आवश्यक शर्त है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें  

Farmer Protests: Why Alliances with Urban Underclasses is Vital

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