Skip to main content
xआप एक स्वतंत्र और सवाल पूछने वाले मीडिया के हक़दार हैं। हमें आप जैसे पाठक चाहिए। स्वतंत्र और बेबाक मीडिया का समर्थन करें।

DU: ''सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा'' लिखने वाले इक़बाल को पाठ्यक्रम से हटाया गया

''सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा'' लिखने वाले इक़बाल को दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र के पाठ्यक्रम से हटा दिया गया है। इक़बाल को हटाने पर छात्रों की इसमें दिलचस्पी बढ़ गई है और वे उनके बारे में और पढ़ रहे हैं।
DU

साल 1984 की बात है राकेश शर्मा को स्पेस में जाने वाले पहले भारतीय होने का गौरव हासिल हुआ था। जिस वक़्त वे अंतरिक्ष में थे उस दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनसे पूछा था, ''ऊपर से भारत कैसा दिखता है आपको''? तो उन्होंने जवाब दिया था ''जी मैं बग़ैर किसी झिझक के कह सकता हूं सारे जहां से अच्छा''। ये लाइन उस नज़्म/ गीत का हिस्सा थी जिसे अल्लामा इक़बाल ने लिखा था।

ये गीत 26 जनवरी की परेड के दौरान सेना के म्यूजिकल बैंड कदमताल करते हुए जब राजपथ (जो अब कर्तव्य पथ है) पर आगे बढ़ते थे तो देखने-सुनने वाले उस धुन के साथ ख़ुद को गुनगुनाने से रोक नहीं पाते होंगे। लेकिन इस गीत को लिखने वाले अल्लामा इक़बाल को दिल्ली विश्वविद्यालय के पॉलिटिकल साइंस के पाठ्यक्रम से हटाने के फैसले को शुक्रवार के दिन एक्जीक्यूटिव काउंसिल में भी पास कर दिया गया।

सिलेबस से बाहर हुए इक़बाल

बीए पॉलिटिकल साइंस के पाठ्यक्रम में इक़बाल को तमाम विचारकों जैसे महात्मा गांधी, बाबा साहब आंबेडकर के साथ पढ़ाया जा रहा था। लेकिन अब उन्हें सिलेबस से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक और भी कुछ बदलाव किए गए हैं जिसमें सावरकर को एक पूरे पेपर के तौर पर पढ़ाया जाना शामिल है।

शुक्रवार को हुई दिल्ली विश्वविद्यालय की एक्जीक्यूटिव काउंसिल की बैठक में इस (इक़बाल से जुड़े चैप्टर को हटाने के) प्रस्ताव को पारित करने से पहले इसे एकेडमिक काउंसिल (AC) में पेश किया गया था (नियम के मुताबिक) जहां इसपर चर्चा हुई थी। और फिर इसे एग्जीक्यूटिव काउंसिल (EC) के पास भेजा गया और वहां इस फैसले पर मोहर लग गई।

''सावरकर को पढ़ा रहे हैं तो इक़बाल को भी पढ़ाना चाहिए''

हमने EC की एक सदस्य डॉक्टर सीमा दास से इस सिलसिले में बात की तो उनका कहना था कि ''इकबाल के चैप्टर को हटाना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है, सब तरह की विचारधारा को पढ़ाया जाना चाहिए, अगर आप सावरकर को पढ़ा रहे हैं तो आपको इक़बाल को भी पढ़ाना चाहिए। आख़िर इक़बाल अविभाजित भारत से जुड़े हुए हैं, हम फैक्ट को, इतिहास को कैसे नज़रअंदाज़ कर सकते हैं''?

वे आगे कहती हैं कि ''दिल्ली यूनिवर्सिटी की एक परंपरा और एक इतिहास रहा है कि हम किसी एक विचारधारा के चश्मे से नहीं देखते, यूनिवर्सिटी तो 'यूनिवर्स ऑफ आइडिया' होती है, जहां अलग-अलग तरह के विचारों के लिए जगह होती है, मैं इस तरह के नज़रिए से सहमत नहीं हूं, छात्रों और शिक्षकों के पास विकल्प (choice) होने चाहिए''।

वे बताती हैं कि इस तरह से इक़बाल को हटाने पर छात्रों की इसमें दिलचस्पी बढ़ गई है और वे उनके बारे में और पढ़ रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक एकेडमिक काउंसिल की बैठक में दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर योगेश सिंह ने कहा था कि ''जिसने भारत के विभाजन की नींव रखी उसे सिलेबस में नहीं होना चाहिए'' (those who laid the foundation to break India should not be in syllabus'')

एकेडमिक काउंसिल की बैठक में और क्या बात हुई थी या फिर इस प्रस्ताव का क्या किसी ने विरोध किया था हमने जानने की कोशिश की।

''इक़बाल की जगह दारा शिकोह को पढ़ा लो''

एकेडमिक काउंसिल के एक सदस्य आलोक पांडेय ने हमें बताया कि ''विरोध हो रहा था कि इक़बाल को बहुत दिनों से पढ़ाया जा रहा है तो आगे भी बढ़ाया जाना चाहिए, लेकिन कहा गया कि आप इक़बाल की जगह दारा शिकोह को पढ़ा लीजिए, इतने साल तो इक़बाल पढ़ा लिया अब कुछ नया क्यों न पढ़ाया जाए तो हमने कहा कि इक़बाल ने ''सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां'' लिखा है, तो हमें कहा गया कि आप इक़बाल के बदले किसी और को पढ़ाएं हमें दिक्कत नहीं है, हमने कहा कि इक़बाल को हमें जानना चाहिए लेकिन वे बहुमत में थे तो उन्होंने उसे (प्रस्ताव को) पास करवा लिया''।

''इक़बाल को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते''

बहुमत बहुत ही बड़ा लफ़्ज़ है। लेकिन क्या इक़बाल की जगह दारा शिकोह को पढ़ाने की दलील वाजिब लगती है? ये समझने के लिए हमने दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अपूर्वानंद से बातचीत की तो उन्होंने सवाल सुनते ही ज़ोर का ठहाका लगाया और कहा कि ''ये बहुत ही हास्यपद है कि एक मुसलमान नाम हटा लिया तो एक मुसलमान ले लो, ये ऐसा है कि आम को संतरे से बदल दो, दारा शिकोह एक अलग कालखंड से हैं, दारा शिकोह एक अलग पहचान है, ये बहुत ही संकीर्ण सोच है। एक पॉलिटिकल फिलॉसफी जो औपनिवेशिक काल को समझने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है उसे हटा रहे हैं, अगर हिंदुस्तान के संदर्भ में 'हिस्ट्री ऑफ आइडिया' पढ़ेंगे तो आप इक़बाल को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।''

वे आगे कहते हैं कि ''इक़बाल के बारे में उनका कहना है कि जिसने ऐसी विचारधारा दी जो देश को विभाजित करती है उनको पढ़ने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन इक़बाल का एक पॉलिटिकल थॉट है, इक़बाल सिर्फ पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। फिलॉस्फर के तौर पर पूरी दुनिया में उनकी अपनी एक हैसियत है। आप अपने सिलेबस में से उनको हटा दीजिए लेकिन दुनिया के दूसरे मुल्कों में तो पढ़ाया ही जाएगा। ऐसा तो नहीं है कि आपने हटा दिया तो इक़बाल हर जगह हट गए।''

''वैचारिक संघर्ष को समझने के लिए सावरकर और इक़बाल दोनों को पढ़ना होगा''

प्रोफेसर अपूर्वानंद आगे कहते हैं कि ''दूसरा इक़बाल अविभाजित भारत या औपनिवेशिक काल के भारत में ही पैदा हुए और मर गए तो औपनिवेशिक काल के भारत में जो आइडियोलॉजिकल बैटल (वैचारिक संघर्ष) चल रही थी। उसको हम कैसे समझेंगे, अगर हम इक़बाल को समझेंगे ही नहीं। मैं तुलना नहीं कर रहा हूं क्योंकि फिलॉसफिकल वे बहुत कमज़ोर थे। लेकिन अगर सावरकर को नहीं पढ़ेंगे तो उन्हें कैसे समझेंगे। उसी तरह से अगर आप समझना चाहते हैं कि क्या थी आइडियोलॉजिकल बैटल या स्ट्रगल तो इक़बाल को भी पढ़ना होगा।''

अपनी बात ख़त्म करते हुए प्रोफेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि ''इक़बाल को हटाने से दिल्ली यूनिवर्सिटी नाइंसाफी कर रही है राजनीति शास्त्र के छात्रों के साथ।''

इकबाल की विचारधार ग़लत थी क्योंकि वे मुसलमानों के लिए एक अलग राज्य की सोच रखते थे। उनकी विचारधारा पाकिस्तान के जन्म का सबब बनी। उनकी इसी सोच की वजह से दिल्ली यूनिवर्सिटी ने भी उन्हें सिलेबस से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इक़बाल की उस सोच की सज़ा उन्हें आज दी जा रही है, लेकिन उस विचारधारा, सोच का क्या करें जो आज देशभर में गली-गली घूम कर हिंदू राष्ट्र का नारा बुलंद कर रहे हैं?

अपने टेलीग्राम ऐप पर जनवादी नज़रिये से ताज़ा ख़बरें, समसामयिक मामलों की चर्चा और विश्लेषण, प्रतिरोध, आंदोलन और अन्य विश्लेषणात्मक वीडियो प्राप्त करें। न्यूज़क्लिक के टेलीग्राम चैनल की सदस्यता लें और हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित हर न्यूज़ स्टोरी का रीयल-टाइम अपडेट प्राप्त करें।

टेलीग्राम पर न्यूज़क्लिक को सब्सक्राइब करें

Latest