Skip to main content
xआप एक स्वतंत्र और सवाल पूछने वाले मीडिया के हक़दार हैं। हमें आप जैसे पाठक चाहिए। स्वतंत्र और बेबाक मीडिया का समर्थन करें।

फ़िल्म: बॉलीवुड तड़के के साथ राजनीतिक-सामाजिक पहलुओं को उकेरती ‘जवान’

"डर, पैसा, जात-पात, धर्म, संप्रदाय के लिए वोट देने की बजाय जो आपसे वोट मांगने आए उससे सवाल पूछो कि अगले पांच सालों तक तुम मेरे लिए क्या करोगे...मेरे देश को आगे बढ़ाने के लिए क्या करोगे!”
Jawan

"डर, पैसा, जात-पात, धर्म, संप्रदाय के लिए वोट देने की बजाय जो आपसे वोट मांगने आए आप उससे सवाल पूछो, पूछो उससे कि अगले पांच सालों तक तुम मेरे लिए क्या करोगे...मेरे देश को आगे बढ़ाने के लिए क्या करोगे।”

जवान फिल्म का ये डायलॉग पर्दे पर ज़रूर शाहरुख खान बोलते हैं, लेकिन ये हम-आप और देश के हर नागरिक से जुड़ी एक अहम बात है, जो हमारे वोट के अधिकार की ताकत और ज़िम्मेदारी दोनों बताती है। गुरुवार, 7 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई निर्देशक एटली की फिल्म 'जवान' भले ही काल्पनिक हो लेकिन इसकी कहानी आम जन की समस्याओं की सच्चाई है। फिल्म किसानों की समस्या से लेकर बदहाल हेल्थ सिस्टम, कोर्पोरेट-पॉलिटिक्स नेक्सस, भ्रष्टाचार और देशभक्त-देशद्रोही जैसे तमाम मुद्दों को छूने के साथ ही आपको आपके वोट की अहमियत भी समझाती है।

फिल्म की कहानी में शाहरुख खान बाप (विक्रम राठौर) और बेटे (आज़ाद) दोनों का किरदार डबल रोल में निभा रहे हैं। बाप विक्रम जहां सेना के स्पेशल ऑपरेशन्स को लीड करता है, तो वहीं बेटा आज़ाद एक आईपीएस ऑफिसर और महिला जेल का जेलर भी है। आज़ाद की ज़िंदगी का मकसद आम लोगों की सहायता और करप्ट अधिकारियों-नेताओं को सज़ा देना है। आज़ाद की मदद उसी जेल की 6 कैदी जो अपनी मजबूरियों के चलते अलग-अलग मामलों में सज़ायाफ्ता हैं, वो करती हैं।

कहानी में सबसे पहले किसानों के कर्ज की समस्या को दिखाया गया है, जिसके लिए आज़ाद मेट्रो पैसेंजर्स को बंदी बनाकर हेल्थ मिनिस्टर से नेगोशिएट करता है। वो इस विडंबना को भी ज़ाहिर करता है कि हमारे देश में महंगी कार खरीदने के लिए लोन आसान है, लेकिन किसान की खेती के लिए मुश्किल। इस कर्ज के भंवर में किस तरह किसान फंसकर आत्महत्या कर लेते हैं, कहानी इस मर्म को भी दिखाती है।

बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था और भ्रष्टाचार का ज़िम्मेदार कौन?

दूसरी समस्या जो फिल्म में दिखाई गई है वो हमारे हेल्थ सिस्टम को लेकर हैं। जहां आपको गोरखपुर के अस्पताल में ऑक्सीजन की कथित कमी से हुई कई मासूम बच्चों की मौत भी याद आने लगती है। वोट मांगते वक्त नेता कहने को तो हमारे सरकारी अस्पतालों को लेकर बहुत वादे करते हैं, लेकिन इनकी खस्ता हालत किसी से नहीं छिपी। फिल्म इस मुद्दे को बड़ी गंभीरता से उठाती है और अपने हुक्मरानों से इसके लिए सवाल पूछने को कहती है।

मुद्दा नंबर तीन, कहानी में सेना और उन्हें सप्लाई करने वाले हथियारों के मालिक से जुड़ा है। इसमें सेना के जवान जहां बॉर्डर पर करप्शन के चलते बेकार हथियारों की वजह से दिक्कतों का सामना कर रहे हैं, वहीं हथियारों का कॉन्ट्रैक्टर अपने मुनाफे के लिए उसपर सवाल उठाने वाले को ही देशद्रोही साबित कर देता है, जोकि वास्तव में सबसे बड़ा देशभक्त होता है। यहां विक्रम कहता है, “हमारा सर देश के लिए सौ बार हाज़िर है, लेकिन आपके मुनाफ़े के लिए नहीं।"

फिल्म में आम जनता को उनके वोट की ताकत का एहसास दिलाते हुए झकझोरा गया है कि ये उंगली की ताकत कितनी ज़रूरी और शक्तिशाली है। हमें अपना वोट किसे और क्यों देना है, ये तय करने से पहले हमें कई सवाल अपने उम्मीदवारों से पूछने चाहिए। हमें पूछना चाहिए कि "अगले पांच सालों तक तुम मेरे लिए क्या करोगे। मेरे बच्चों की शिक्षा के लिए क्या करोगे। मुझे नौकरी दिलाने के लिए क्या करोगे। मैं अगर बीमार पड़ गया तो मेरे परिवार के लिए क्या करोगे। अगले पांच सालों तक तुम मेरे देश को आगे बढ़ाने के लिए क्या करोगे!"

वोट और सवाल की ताकत

फिल्म के कई सीन आपको भावुक कर देंगे तो वहीं कई हंसने और सोचने पर भी मजबूर कर देंगे कि आखिर हमारे हालात ऐसे क्यों हैं, हमारे देश के हालात ऐसे क्यों हैं। हमें इसके लिए ज़रूरी सवाल पूछने ही होंगे और हां ये सवाल पूछने से आप देशद्रोही नहीं बन जाते, बल्कि आप अपने देश को बचाने की कोशिश करते हैं इसलिए ये कहा जा सकता है कि ये फिल्म किसी खास इंसान की नहीं बल्की एक आम इंसान की कहानी है जो हर किसी की भलाई के लिए कुछ खास चीज़ें कर रहा है।

फिल्म में साउथ स्टार नयनतारा, विजय सेतुपति, लहर खान, सान्या मल्होत्रा, प्रियामणि और रिद्धि डोगरा भी अपने किरदारों में पावरफुल हैं। दीपिका पादुकोण की स्पेशल अपीयरेंस हैं, लेकिन उनका छेटा-सा रोल आपके दिलों दिमाग में बस जाएगा। फिल्म भोपाल गैस ट्रैजडी, नोट के बदले वोट जैसे विषयों पर भी रोशनी डालती है और अपने फायदे के लिए पर्यावरण को ज़हरीला बनाती इंडस्ट्रीज़ को बेधड़क काम करने की इजाज़त देते कार्पोरेट-पॉलिटिक्स नेक्सस को भी बखूभी समझाती है।

फिल्म, महिला किरदारों की कहानियां उन्हें मजबूर दिखाने की बजाय, उन्हें बहुत मजबूत बनाती नज़र आती है। कुल मिलाकर फिल्म कानून की नज़रों में अपराधी बन चुके एक शख्स के इर्द-गिर्द घूमती है, जो करप्ट बिज़नेसमैन से पैसे लूटकर जनता की मदद करता है। जनता की नज़रों में हीरो और एक मॉडर्न रॉबिनहुड बन जाता है। 2 घंटे 45 मिनट लंबी इस फ़िल्म के हर एक सीन में इमोशन है, लंबे रन टाइम के बावजूद कहीं भी कुछ भी बेमतलब नहीं लगता। इस फिल्म की कहानी में कई ऐसी चीज़ें हैं जो एक दर्शक ही नहीं, इस देश के एक नागरिक के तौर पर भी आपको अपील करेंगी, कुछ बदलने का भाव मन में पैदा करेंगी। उम्मीद भी देंगी और बेहतर करने की इच्छाशक्ति भी।

अपने टेलीग्राम ऐप पर जनवादी नज़रिये से ताज़ा ख़बरें, समसामयिक मामलों की चर्चा और विश्लेषण, प्रतिरोध, आंदोलन और अन्य विश्लेषणात्मक वीडियो प्राप्त करें। न्यूज़क्लिक के टेलीग्राम चैनल की सदस्यता लें और हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित हर न्यूज़ स्टोरी का रीयल-टाइम अपडेट प्राप्त करें।

टेलीग्राम पर न्यूज़क्लिक को सब्सक्राइब करें

Latest