Skip to main content
xआप एक स्वतंत्र और सवाल पूछने वाले मीडिया के हक़दार हैं। हमें आप जैसे पाठक चाहिए। स्वतंत्र और बेबाक मीडिया का समर्थन करें।

जी-7 बनाम ब्रिक्स: सत्ता का संघर्ष वर्ग संघर्ष नहीं है

नए उभरते समाजवादी समूहों का फोकस अमेरिका और चीन, जी-7 और ब्रिक्स दोनों को चुनौती देना है, बावजूद इसके कि उनके बीच राज्य और निजी उद्यमों के अलग-अलग संतुलन बने हुए हैं। 
Bricks

वर्ग-संघर्ष उनके साथ जुड़े होते हैं लेकिन वे सत्ता के संघर्ष से अलग होते हैं। शहर-राज्यों एथेंस और स्पार्टा के बीच प्राचीन संघर्ष सत्ता-संघर्ष थे, जबकि प्रत्येक के भीतर, मालिक और दास वर्ग के संघर्ष भी चल रहे थे। ब्रिटेन और फ्रांस यूरोपीय सामंतवाद के भीतर पूरी तरह से राजतंत्र राज्य थे जो पूरी तरह से सत्ता के संघर्ष में लगे हुए थे। उसी समय, सामंतों और किसानों के बीच वर्ग संघर्ष ने आंतरिक रूप से दोनों "महान" शक्तियों को उत्तेजित किया हुआ था।

आज, जब दासता और सामंतवाद काफी हद तक समाप्त हो गए हैं और पूंजीवाद विश्व स्तर पर मजबूत हो गया है तो जी-7 और ब्रिक्स और उनके सदस्य देशों के साथ-साथ अन्य देशों के बीच भयानक सत्ता का संघर्ष चल रहा हैं। साथ ही सभी देशों में मालिकों और कर्मचारियों के बीच वर्ग संघर्ष चल रहा है। सत्ता और वर्ग संघर्ष एक दूसरे को आकार देते हैं। दोनों इतिहास के मुख्य पहलू रहे हैं और बने रहेंगे। इसलिए उन्हें भ्रमित या फुसलाने वाली वैचारिक आदतें भी मौजूद हैं।

जर्मनी के सम्राट कैसर विल्हेम द्वितीय ने 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के बाद कहा था, "मैं अब [राजनीतिक] दलों की पहचान नहीं करता हूं, मैं केवल जर्मन लोगों को पहचानता हूं। उन्होंने युद्ध जीतने में मदद के लिए वर्ग-विभाजित जर्मनी को एकजुट करने के लिए राष्ट्रवाद का इस्तेमाल किया। कैसर उपनिवेशों, विश्व व्यापार और विदेशी निवेश पर विश्व शक्तियों के बीच बढ़ रहे गंभीर संघर्षों से हिल गया था। युद्ध से पहले के दशकों में जर्मनी की मार्क्सवाद से प्रेरित सोशलिस्ट पार्टी के उदय से भी वे दंग रह गए थे।

जर्मनी के पूंजीवादी मालिकों का वर्ग भी इस सब से हिल गया था और स्तब्ध रह गया था। मिल मालिकों को श्रम और पूंजी के बीच तेजी से विभाजित होते देश में, समाजवाद को विफल करने और युद्ध जीतने के लिए जर्मन राष्ट्रवाद की रणनीति की जरुरत थी। उस रणनीति की कुंजी लोगों को राष्ट्रीय और अंततः सैन्य संघर्षों के संदर्भ में सोचने (और आत्म-पहचान) करने के लिए प्रेरित करना था न कि वर्ग संघर्षों के संदर्भ में ऐसा करना था।

जर्मनी की रणनीति विफल रही और वह प्रथम विश्व युद्ध हार गया। राजशाही समाप्त हो गई और इसकी सोशलिस्ट पार्टी ने युद्ध के बाद जर्मनी में सरकार बना ली थी। जर्मनी में युद्ध के बाद समाजवाद पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूती से उभरा। प्रथम विश्व युद्ध के अन्य लड़ाकू देशों के लिए भी यही सच था। कमोबेश उन सभी देशों ने भी युद्ध प्रयासों को संगठित करने और वर्ग चेतना को कमजोर करने और विस्थापित करने के लिए राष्ट्रवाद का इस्तेमाल किया था।

युद्ध के विजेताओं के मामले में, राष्ट्रवाद ने जीत हासिल करने के उद्देश्य से उनकी सेवा की हो सकती है। फिर भी, इसने समाजवाद को पराजित या निर्वासित नहीं किया। इसके बजाय, समाजवाद ने अपनी पहली सरकार रूस में बनाई और देश समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारधाराओं शाखाओं में विभाजित हो गया जिनमें से प्रत्येक ने बड़े पैमाने पर लोगों को अपनी तरफ आकर्षित किया। दोनों विचारधाराएं 1920 के दशक में विश्व स्तर पर तेजी से फैल गईं और 1930 के दशक में इसका और अधिक फैलाव हुआ क्योंकि दुनिया भर के अधिकांश देशों में पूंजीवाद ढह रहा था तथा बड़े संकट में था।

अब, एक सदी बाद, वैश्विक पूंजीवाद में सत्ता संघर्ष और अधिक तेज हो गया है। शीत युद्ध के दौरान वर्चस्ववादी संयुक्त राज्य अमेरिका की शक्ति अब घट रही है। यूरोप में पहले से जारी गिरावट, उनके उपनिवेशों के नुकसान और दो गहरे विनाशकारी विश्व युद्धों के कारण, अभी भी जारी है। यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका दोनों चीन के आर्थिक विकास की आश्चर्यजनक, अभूतपूर्व गति और वैश्विक शक्ति के रूप में उभरने से दुखी हैं। पहले से ही, चीन के गठबंधनों का नेटवर्क, विशेष रूप से ब्रिक्स, अमेरिका और उसके गठबंधनों, विशेष रूप से जी-7 का सामना कर रहा है। चीन और ब्रिक्स का उदय संयुक्त राज्य अमेरिका और जी-7 के साथ उनके शक्ति संघर्ष को जोड़ता है। यह वृद्धि ग्लोबल नार्थ/वैश्विक उत्तर और ग्लोबल साऊथ/वैश्विक दक्षिण के बीच और एक तरह से या किसी अन्य तरीके से, सभी देशों के बीच और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के बीच शक्ति संबंधों को फिर से संगठित कर रही है।

वर्ग संघर्ष ने करीब-करीब सभी समाजों में योगदान दिया है और इसने विभिन्न रूप हासिल किए हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समाजवादी अब पूंजीवाद बनाम राज्य संपत्ति और समाजवाद के रूप में राज्य की योजना के रूप में निजी संपत्ति और मुक्त बाजारों के बीच संघर्ष पर कम ध्यान केंद्रित करते हैं। कई समाजवादियों ने अपना ध्यान केंद्रित करके यूएसएसआर और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना में राज-सत्ता के साथ 20 वीं शताब्दी के अनुभवों पर प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

राज-सत्ता और योजना को यद्यपि समाजवादी लक्ष्यों के रूप में खारिज नहीं किया गया था, लेकिन इसे अपने आप में अपर्याप्त मना गया था। पोस्ट-पूंजीवादी व्यवस्था को हासिल करने के लिए कुछ अधिक या अलग करने की जरुरत थी जिसे समाजवादी गले लगा सकते थे और अपना सकते थे। समाजवादियों ने कार्यस्थलों में बदलाव लाने की अपनी प्राथमिकताओं पर फिर से ध्यान केंद्रित किया। कारखानों, कार्यालयों और स्टोर के अंदर पूंजीवादी पदानुक्रम की आलोचना के आधार पर - और इसके सामाजिक प्रभाव को देखते हुए, समाजवादियों ने उत्पादन को जनवादी रूप से पुनर्गठित करने के प्रस्तावों पर जोर दिया।

एक उद्यम में प्रत्येक मजदूर के पास यह तय करने का समान वोट होगा कि क्या, कहां और कैसे उत्पादन करना है और साथ ही उत्पाद का निपटान कैसे करना है (या शुद्ध राजस्व जहां उत्पाद का विपणन किया जाता है)। सभी कार्यस्थलों (घरों के साथ-साथ उद्यमों) का जनवादीकरण समाजवाद के अर्थ का एक केंद्रीय लक्ष्य बन जाता है।

इस तरह का समाजवाद विकसित हुआ लेकिन इसने 19 वीं और 20 वीं शताब्दी के मैक्रो, राज्य-केंद्रित समाजवाद को भी चुनौती दी। इस प्रकार, जहां राज्य के स्वामित्व वाले और संचालित उद्यम नियोक्ता-कर्मचारी द्वंद्ववाद के आसपास उत्पादन करना जारी रखे हुए थे, वे समाजवादियों की आलोचनाओं का शिकार हो रहे थे जैसा कि निजी स्वामित्व वाले और संचालित उद्यम करते हैं।

यह लोकतांत्रिक समाजवाद या सामाजिक लोकतंत्रों पर लागू होता है जहां उद्यम निजी स्वामित्व में होते हैं लेकिन बाजारों के साथ-साथ वे कराधान और हुकूमत के नियंत्रण में रहते हैं। उद्यमों के निजी बनाम हुकूमत के नाम होना, महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उनके मतभेद अन्य कारणों से हैं, अक्सर वे वर्ग के संदर्भ में भिन्न नहीं होते हैं। दोनों आम तौर पर उत्पादन के मामले में मालिक/कर्मचारी आंतरिक संगठन को प्रदर्शित करते हैं। यदि पूंजीवाद से समाजवाद की ओर जाने का मतलब सूक्ष्म-स्तरीय कार्यस्थल संगठनों में संक्रमण है जो लोकतांत्रिक हैं, तो इस तरह के संक्रमण सार्वजनिक और निजी दोनों उद्यमों पर लागू होते हैं।

यह नया उभरता समाजवादी फोकस अमेरिका और चीन, जी-7 और ब्रिक्स दोनों को चुनौती देता है, उनके बीच राज्य और निजी उद्यमों के विभिन्न संतुलनों के बावजूद ऐसा है। इसके अलावा, अब उनके बीच तेजी से (और इस प्रकार नाटकीय रूप से) बदलते ताक़तों के संतुलन का हर राष्ट्र के वर्ग संघर्षों पर प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, यूक्रेन युद्ध पर रूस के खिलाफ जी-7 प्रतिबंध, और यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका आवर दुनिया के देशों पर उनके मुद्रास्फीति के प्रभावों ने उन असमानताओं के परिणामस्वरूप नियोक्ता बनाम कर्मचारी टकरावों को तेज कर दिया है। 

उन नीतियों में से एक - अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दर में की गई बड़ी वृद्धि - बाहरी क़र्ज़ लेने वाले देशों को निचोड़ रही है। इस संकट से गुजर रहे देशों में मालिक और कर्मचारी इस के खिलाफ टकराव में चले जाते हैं जो अक्सर उनके वर्ग-घर्षों को तेज कर देते हैं।

अतीत और वर्तमान की एक बड़ी समस्या सत्ता और वर्ग संघर्षों को भ्रमित करने और दूसरे के प्रति अंधा होने की व्यापक प्रवृत्ति रही है। आंशिक रूप से, ये समस्याएं वर्ग चेतना को दबाने के लिए कैसर विल्हेम द्वितीय जैसे राष्ट्रवादी प्रयासों के परिणामस्वरूप हुईं। जबकि अन्य समस्याएं तब उभरीं जब संस्कृतियों ने वर्ग चेतना से इनकार कर दिया या अस्वीकार कर दिया, शायद पूंजीवादी मालिकों और विज्ञापनदाताओं पर उनके मास मीडिया की निर्भरता के कारण ऐसा हुआ।

अक्सर समाजवादियों और समाजवादियों-विरोधियों दोनों ने भ्रम और अंधापन में योगदान दिया। यह तब हुआ जब शीत युद्ध (1945-1990) और इसकी स्थायी विरासत ने प्रभावी रूप से दोनों पक्षों के कई लोगों को समाजवाद, साम्यवाद और यूएसएसआर को एक ध्रुव बनाम पूंजीवाद, लोकतंत्र, संयुक्त राज्य अमेरिका और "पश्चिम" को दुसरे ध्रुव के रूप में समान मान लिया था।

आज की नई उभरती अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था में, राष्ट्रवाद फिर से मजबूत हैं। सत्ता संघर्ष एक बार फिर सुर्खियों में है: अमेरिका बनाम रूस और चीन, जी-7 बनाम ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ बनाम ग्लोबल नॉर्थ। ताक़तों की श्रेणियां न केवल प्रमुख विश्व मामलों के मामले में विश्लेषणात्मक बहस से वर्ग श्रेणियों को हटा दिया है बल्कि इसने देशों के आंतरिक मामलों के बारे में चर्चाओं पर भी आक्रमण किया है। सत्ता संघर्ष को नियमित रूप से वर्ग संघर्ष के रूप में गलत समझा जाता है। इसलिए वर्ग और वर्ग-संघर्ष चर्चा से बाहर हो जता है।

  
जी-7 के खिलाफ ब्रिक्स के उदय और संघर्ष को वर्ग संघर्षों से भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए। उनमें से कोई भी सरकार आंतरिक कार्यस्थल संगठन के नियोक्ता-कर्मचारी मोड से परे संक्रमण के अर्थ में पूंजीवाद को समाजवाद के साथ बदलने के लिए प्रतिबद्ध नहीं है। न ही उनमें से कोई भी सरकार पूंजीवाद को निजी से सार्वजनिक उद्यम स्वामित्व और बाजारों से योजना की ओर व्यवस्थित रूप से स्थानांतरित करने के पुराने अर्थों में बदलने के लिए प्रतिबद्ध है। फिर भी, उन सभी के भीतर, ऐसे समूह और आंदोलन हैं जो पूंजीवाद को अपनी परिभाषाओं के आधार पर समाजवाद से बदलने के प्रति प्रतिबद्ध हैं।

कार्ल मार्क्स और अन्य लोगों ने ब्रिटिश साम्राज्य और उसके उत्तरी अमेरिकी उपनिवेश के बीच संघर्ष को देखा था, जिसका समापन क्रांतिकारी युद्ध और 1812 के युद्ध में हुआ था, मुख्य रूप से यह एक सत्ता-संघर्ष था न कि वर्ग संघर्ष। उन युद्धों ने दासों को दासों के खिलाफ खड़ा नहीं किया, न ही सामंतों के खिलाफ किसानों को, न ही मालिकों के खिलाफ मजदूरों को; वे सत्ता के संघर्ष थे। हालांकि, उनके भीतर, ऐसे वर्ग संघर्षों के पल आए थे। नेपोलियन युद्ध सत्ता-संघर्ष था, फिर भी उनके भीतर भी, सामंतों के खिलाफ किसान आन्दोलन हुए थे। 

सामंती शक्तियों के बीच नेपोलियन युद्धों ने उन सभी को कमजोर कर दिया और पूंजीवादी वर्गों को पूरे यूरोप में सामंतवाद को समाप्त करने के लिए प्रेरित किया। उपनिवेशवाद और नव-उपनिवेशवाद के खिलाफ पिछली दो शताब्दियों के युद्धों में - सत्ता संघर्ष - उनके साथ कई वर्ग संघर्ष हुए हैं।

जी-7 और ब्रिक्स के बीच अब होने वाला सत्ता का संघर्ष दोनों गुटों के भीतर चल रहे वर्ग संघर्षों के साथ जुड़ाव रखेगा। दोनों गुटों के नेता, विचारक और मास मीडिया मुख्य रूप से उन सत्ता संघर्षों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। वर्ग बदलाव के पैरोकारों को वर्ग संघर्षों से सत्ता को स्पष्ट रूप से अलग करना होगा, अगर उन्हें जन चेतना और सक्रियता पर ध्यान केंद्रित करना है। 

इस प्रकार, ब्रिक्स ब्लॉक निश्चित रूप से विश्व अर्थव्यवस्था में जी-7 और अमेरिका के आधिपत्य को चुनौती दे रहा है। हालांकि, प्रतिस्पर्धी गुटों का सत्ता-संघर्ष पूंजीवाद को चुनौती देने वाला समाजवादी आंदोलन नहीं है। न ही चीन या ग्लोबल साउथ अब इस तरह की चुनौती पेश कर रहा है।

अमेरिका, जी-7 और ग्लोबल नॉर्थ के खिलाफ चीन, ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ के सत्ता-संघर्ष नए वर्ग संघर्षों को भड़का सकते हैं और साथ ही उन सभी टकरावों को प्रभावित कर सकते हैं जो पहले से ही चल रहे हैं। वे ऐसा कैसे करते हैं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हम सत्ता और वर्ग संघर्षों के बीच के अंतर को कैसे समझते हैं और उससे कैसे मुखातिब होते हैं।


(वोल्फ मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय, एमहर्स्ट में अर्थशास्त्र एमेरिटस के प्रोफेसर हैं और न्यूयॉर्क में न्यू स्कूल यूनिवर्सिटी के अंतर्राष्ट्रीय मामलों में स्नातक कार्यक्रम में एक अतिथि प्रोफेसर हैं।)


स्रोत: स्वतंत्र मीडिया संस्थान


क्रेडिट लाइन: यह लेख इकोनॉमी फॉर ऑल द्वारा तैयार किया गया था, जो स्वतंत्र मीडिया संस्थान की एक परियोजना है।

अंग्रेजी में प्रकाशित मूल लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:
G7 Vs. BRICS: Power Struggles are not Class Struggles

अपने टेलीग्राम ऐप पर जनवादी नज़रिये से ताज़ा ख़बरें, समसामयिक मामलों की चर्चा और विश्लेषण, प्रतिरोध, आंदोलन और अन्य विश्लेषणात्मक वीडियो प्राप्त करें। न्यूज़क्लिक के टेलीग्राम चैनल की सदस्यता लें और हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित हर न्यूज़ स्टोरी का रीयल-टाइम अपडेट प्राप्त करें।

टेलीग्राम पर न्यूज़क्लिक को सब्सक्राइब करें

Latest