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ज्ञानवापी सर्वे रिपोर्टः BJP-RSS ने तैयार कर ली है 2027 के यूपी चुनाव जीतने की पटकथा?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी और आरएसएस ज्ञानवापी को अपने एजेंडे में शामिल कर सकती है। फ़िलहाल बीजेपी ने इस मुद्दे को रिज़र्व में रखा है।
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ज्ञानवापी मस्जिद में हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की सर्वे रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद बनारस में जबर्दस्त गहमा-गहमी है। आशंका जताई जा रही है कि अयोध्या के बाद अब आदि विश्वेश्वर मंदिर की मांग तूल पकड़ सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी और आरएसएस,  ज्ञानवापी को अपने एजेंडे में शामिल कर सकती है। फिलहाल बीजेपी ने इस मुद्दे को रिजर्व में रखा है। साल 2027 में उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव में यह मुद्दा सर्वाधिक चर्चा का विषय हो सकता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ज्ञानवापी के मामले में दिसंबर 2023 में जिस तरह से मुस्लिम पक्ष की पांच याचिकाएं एक साथ  खारिज की उसी के बाद से यह सवाल सुलगने लगा था कि क्या देश में अब उपासना स्थल कानून का कोई खास मतलब नहीं रह गया है?

ज्ञानवापी मस्जिद की देखरेख करने वाली संस्था अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी ने बनारस से डिस्ट्रिक कोर्ट में याचिका दायर करते हुए जिला जज डॉ. अजय कृष्ण विश्वेश से आग्रह किया था कि ASI सर्वे रिपोर्ट सार्वजनिक होने पर अमन-चैन बिगड़ सकता है। डिस्ट्रिक कोर्ट ने 25 जनवरी 2024 को हिन्दू और मुस्लिम पक्षों को ASI सर्वे रिपोर्ट की सत्य प्रतिलिपि देने का आदेश दिया, लेकिन किसी पक्ष से इस आशय का हलफनामा नहीं लिया कि वो उस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं करेंगे।

डिस्ट्रिक कोर्ट से जैसे ही सर्वे रिपोर्ट की प्रतिलिपि मिली, ज्ञानवापी मामले में हिंदू पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील विष्णु शंकर जैन ने तत्काल प्रेस कांफ्रेस बुलाई और दावा किया कि ASI ने इस बात की पुष्टि की है कि भव्य हिंदू मंदिर तोड़कर उसके ढांचे पर ज्ञानवापी मस्जिद निर्माण किया गया है। ASI ने मस्जिद परिसर से हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां, खंडित धार्मिक चिह्न, सजावटी ईंटें, दैवीय युगल, चौखट-दरवाजे के टुकड़े, घड़े, हाथी, घोड़े, कमल के फूल के अवशेष जुटाए हैं। इन्हें छह नवंबर 2023 को जिलाधिकारी की सुपुर्दगी में दिया था।

जैन ने यह भी कहा, "ज्ञानवापी मस्जिद परिसर पर ASI की सर्वे रिपोर्ट से पता चला है कि 17 वीं शताब्दी में पहले से मौजूद संरचना को नष्ट कर दिया गया था। इसके कुछ हिस्से को संशोधित करते हुए उसका  दोबारा उपयोग किया गया था। वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वहां मौजूदा ढांचे के निर्माण से पहले एक बड़ा हिन्दू मंदिर मौजूद था। ASI ने यह भी कहा है कि मौजूदा ढांचे की पश्चिमी दीवार पहले से मौजूद हिन्दू मंदिर का शेष हिस्सा है। ASI सर्वे रिपोर्ट आने के बाद अयोध्या के राम मंदिर की तरह ज्ञानवापी का साल 1669 से चल रहा पुराना विवाद हमेशा के लिए खत्म हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने सर्वे रिपोर्ट के आधार पर ही अयोध्या में राम जन्मभूमि के पक्ष में आदेश पारित किया था। अयोध्या की तरह ही ज्ञानवापी का सर्वे किया है और उसकी रिपोर्ट हिन्दुओं के पक्ष में है। मुस्लिम समुदाय को इस मस्जिद पर अपनी दावेदारी छोड़ देनी चाहिए। ASI ने इतने सबूत जुटा लिए हैं कि कोर्ट का फैसला भी हमारे पक्ष में ही आएगा।"

क्या कहता है मुस्लिम पक्ष 

ASI की सर्वे रिपोर्ट आने के बाद 26 जनवरी 2024 को अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी के अधिवक्ता अख़लाक़ अहमद का एक बड़ा बयान सामने आया है। वह कहते हैं, "ASI की सर्वे रिपोर्ट में ऐसा कुछ नहीं कहा गया है, जिससे ज्ञानवापी में मंदिर का ढांचा साबित हो रहा हो। रिपोर्ट में जिन चिह्नों के मिलने का दावा किया गया है उन्हें मस्जिद के मलबे से निकाले जाने की बात कही गई है। इससे यह तस्दीक नहीं होती कि मस्जिद पहले मंदिर था। ज्ञानवापी मस्जिद के बगल में एक बिल्डिंग थी जिसे छत्ताद्वार कहा जाता है। उसमें हमारे पांच किरायेदार थे और वो सभी मूर्तियां बनाने  का काम करते थे। वो मूर्तियों का मलबा पीछे की तरफ फेंक दिया करते थे। ASI ने जिन मूर्तियों के मिलने का दावा किया है वो सभी खंडित हैं। ASI ने जो मूर्तियां जुटाई हैं उसका ब्योरा रिपोर्ट में विस्तार से दिया गया है। मूर्तियों के साइज लंबाई, चौड़ाई और गहराई भी बताई गई है।"

एडवोकेट अख़लाक़ अहमद यह भी कहते हैं, "विश्वनाथ मंदिर के आसपास बहुत से दुकानदार भी मूर्तियां बेचा करते थे। पहले मस्जिद परिसर को नहीं घेरा गया था। संभव है कि खंडित मूर्तियां वहीं फेंकी जाती रही हों। मस्जिद के मलबे में ऐसी कोई मूर्ति नहीं मिली है जिसे कहा जाए कि ये भगवान शिव की मूर्ति है। सबसे बड़ी बात यह है कि मूर्तियां मस्जिद के अंदर नहीं मिली हैं। मस्जिद के उत्तर तरफ एक कमरा है। संभव है कि मूर्तियां उधर मिली होंगी। मस्जिद की बैरिकेडिंग साल 1993 में कराई गई। उससे पहले पूरा मस्जिद परिसर खुला था। मस्जिद में विभिन्न धर्मों के लोग आते-जाते थे। हमारे किरायेदार ही खंडित मूर्तियों के मलबा फेंकते थे। वही टुकड़े मिले होंगे। जहां तक भित्तिचित्रों की बात है तो मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल में उसे मस्जिद पर उकेरा गया था। अकबर ने दीन-ए-इलाही नामक नया धर्म (पंथ) चलाया था, जिसकी कोई शर्त नहीं थी। एक तरह का वह सोशल आर्डर था, जिसमें तमाम धर्मों की अच्छी चीजों को लेकर नया पंथ शुरू किया गया था।"

"दीन-ए-इलाही को शुरू करने के पीछे अकबर की मंशा यह थी कि सभी जातियों और धार्मिक संप्रदायों में सद्भाव पैदा हो ताकि उसके साम्राज्य में स्थिरता आए। हर व्यक्ति राजा और धर्म के प्रति एक ही नजरिया रखे। दरअसल वह खुद को सांप्रदायिक सद्भाव रखने वाले राष्ट्रीय सम्राट के रूप में प्रतिष्ठित कराना चाहते थे। उनकी इच्छा थी कि प्रजा उन्हें अपना अच्छा प्रतिनिधि माने और कोई विद्रोही रवैया न अपनाए। अकबर चाहते थे कि समाज में कोई धार्मिक बितंडा खड़ा न हो और सभी धर्मों में एकता और समन्वय स्थापित हो ताकि बेहतर समाज का निर्माण हो सके। दीन-ए-इलाही (तौहीद-ए-इलाही) को अपनाने के लिए अकबर ने कभी किसी को मजबूर नहीं किया।"

मंदिर के स्ट्रक्चर होने और ऊपर से गुंबद बने होने के सवाल पर एडवोकेट अख़लाक़ अहमद कहते हैं, "ASI की सर्वे रिपोर्ट में ऐसा कुछ नहीं लिखा है। बड़े मीनार हमेशा दो पार्ट में होते हैं। एक पार्ट में मीनार होगा तो गिर जाएगा। ASI की जिस सर्वे रिपोर्ट के आधार पर कुछ लोग जनता को गुमराह करने में जुटे हैं। ASI ने अगर गलत रिपोर्ट दी होगी तो हम उसपर आपत्ति दाखिल करेंगे। ASI के निदेशक ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया था कि वो खुदाई नहीं कराएंगे, लेकिन उन्होंने खुलेआम प्रतिबंधित औजार का इस्तेमाल किया। मस्जिद के पीछे जो मलबा पड़ा था उसकी उन्होंने साफ-सफाई भी कराई। इससे फायदा यह हुआ कि पश्चिम तरफ हमारी जो मजारें थीं वो अब दिखने लगी हैं। दक्षिणी तहखाने से कुछ मिट्टी निकालकर कुछ पता करने के लिए खुदाई किया था। वहां कुछ नहीं मिला तो उन्होंने मिट्टी छोड़ दी। ASI सर्वे की रिपोर्ट के अध्ययन के बाद हम अगले कुछ दिनों में आपत्ति दाखिल करेंगे। अराधना स्थल कानून पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले तक सर्वे रिपोर्ट को सार्वजनिक पर रोक लगाने के लिए हाईकोर्ट भी जाएंगे। "

कोर्ट के फ़ैसलों पर भी सवाल

बनारस स्थित ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद करीब 355 साल पुराना है। हिन्दू पक्ष का दावा है कि साल 1669 में ज्ञानवापी मंदिर को ध्वस्त किया गया और मंदिर के पिलर व ढांचे पर मस्जिद बनाई गई। इस मामले में पिछले 33 सालों से कोर्ट केस चल रहा है। ज्ञानवापी को लेकर पहला मुकदमा साल 1991 में लॉर्ड विश्वेश्वरनाथ मामले में दाखिल हुआ था। बाद में राखी सिंह, सीता साहू, रेखा पाठक, मंजू व्यास और लक्ष्मी देवी ने बनारस के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की अदालत में 17 अगस्त 2021 को वाद दाखिल किया, जिसमें ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में शृंगार गौरी की पूजा अर्चना की मांग की गई थी। बाद में कोर्ट ने मूल वाद के साथ समूचे मस्जिद परिसर के एडवोकेट कमिश्नर सर्वे कराने का आदेश पारित कर दिया।

इसी दौरान दावा किया गया कि मस्जिद के वजूखाने में मुस्लिम पक्ष जिसे फव्वारा बता रहा है, वही आदि विश्वेश्वर का शिवलिंग है। हिंदू पक्ष की मांग पर कोर्ट ने वजूखाने को सील करने का आदेश दिया। बाद में मामला जिला जज डॉ अजय कृष्ण विश्वेश्वर की अदालत में आया। सुनवाई के दौरान बनारस के डिस्ट्रिक कोर्ट ने ASI से ज्ञानवापी का साइंटिफिक सर्वे कराने का आदेश पारित किया। 25 जनवरी 2024 को हिन्दू पक्ष ने ASI सर्वे रिपोर्ट सार्वजनिक करने के साथ ही मस्जिद पर अपनी मजबूत दावेदारी ठोंक दी।

दिसंबर 2023 में ज्ञानवापी मस्जिद को इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फ़ैसले के बाद ही यह सवाल उठने लगा है कि क्या अब पूजा स्थल कानून बेअसर हो गया है? हाईकोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की याचिका को ख़ारिज करते हुए डेढ़ महीने पहले फ़ैसला दिया था कि उपासना स्थल क़ानून के आधार पर हिंदू पक्ष की याचिकाएं ख़ारिज नहीं की जा सकतीं। कोर्ट का कहना था कि ये दावा कि ज्ञानवापी मस्जिद एक मंदिर के ऊपर बनाई गई थी। हिंदुओं को इसके नवीनीकरण, मंदिर निर्माण और यहां पूजा करने का अधिकार देना, उपासना स्थल क़ानून 1991 में वर्जित नहीं है।  इलाहाबाद हाईकोर्ट कोर्ट ने यह भी कहा था, "ज्ञानवापी परिसर का चरित्र हिन्दू धार्मिक हो सकता है अथवा मुस्लिम धार्मिक। एक ही साथ दोनों चरित्र नहीं चल सकते।"

बाबरी मस्जिद-आयोध्या मंदिर आंदोलन के समय पास किए गए उपासना स्थल क़ानून 1991 को भविष्य में और किसी मंदिर-मस्जिद विवाद को रोकने के लिए लाया गया था।  फिर भी यह कानून काशी और मथुरा के विवाद को रोक पाने में नाकाम रहा। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस आदेश की कई क़ानूनी विशेषज्ञों ने आलोचना की और उनका मानना था कि उपासना स्थल क़ानून के तहत इस मामले को ख़ारिज कर दिया जाना चाहिए था। साल 1991 में बने उपासना स्थल क़ानून के मुताबिक, "किसी पूजा स्थल के धार्मिक चरित्र को बदला नहीं जा सकता। इस बाबत कोई मुक़दमा दायर नहीं किया जा सकता।

अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी अदालतों में लगातार अपील कर रही है कि आज़ादी के समय ज्ञानवापी मस्जिद एक मस्जिद थी, इसके धार्मिक चरित्र को बदला नहीं जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने साल 2022 में ज्ञानवापी मामले में मौखिक टिप्पणी करते हुए ASI सर्वे पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। कोर्ट का कहना था कि उपासना स्थल क़ानून किसी पूजा स्थल के असली धार्मिक चरित्र का पता लगाने से नहीं रोकता।  हिन्दू पक्ष का कहना है कि ज्ञानवापी के मामले में पूजा स्थल कानून लागू नहीं होता है। एक बार जो मंदिर होता है वो हमेशा मंदिर ही रहता है। वो कहीं गुम नहीं हो सकता। उसे ध्वस्त नहीं किया जा सकता।"

अयोध्या की तर्ज़ पर दी जा रही हवा 

बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप कुमार को लगता है कि अयोध्या की तर्ज पर काशी और उसके बाद मथुरा के मामले को बीजेपी व आरएसएस अपना मुख्य एजेंडा बना सकते हैं। ASI की सर्वे रिपोर्ट आने के बाद सियासी मुनाफे के लिए शिव मंदिर की स्थापना की मांग बढ़ सकती है। हिन्दू संगठनों ने अयोध्या की तर्ज पर ज्ञानवापी के मुद्दे को हवा देनी शुरू कर दी है। ये संगठन कोर्ट में मुकदमे तो लड़ ही रहे हैं, अब सड़कों पर भी मुहिम छेड़ रहे हैं। ये संगठन उस समय चर्चा में आए थे जब उन्होंने दावा किया था कि ज्ञानवापी के अंदर मौजूद फव्वारा नहीं, "शिवलिंग" है। इनका कहना है कि ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि मंदिर के पास मौजूद शाही ईदगाह मुगलकाल में मंदिरों को तोड़कर बनाए गए थे। अयोध्या के नए मंदिर में राम की मूर्ति स्थापना के बाद ज्ञानवापी और ईदगाह के मुद्दों को नए सिरे से हवा दी जा रही है। इस बीच अदालतों में भी दोनों मामलों की सुनवाई तेज़ हो गई है।"

"ज्ञानवापी परिसर में जिस समय एएसआई ने सर्वे शुरू किया, उसी समय तमाम साधु-संत और हिन्दूवादी संगठनों के लोग दावा कर रहे थे कि रिपोर्ट हिन्दुओं के पक्ष में आएगी। तभी से मुस्लिम पक्ष यह मान कर चल रहा है कि उनका धार्मिक स्थल अब उनके हाथ से निकल जाएगा। अयोध्या के राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा समारोह ने हिन्दुओं को एक बार फिर जगा दिया है। ज्ञानवापी के मामले में अब बीजेपी और आरएसएस को आवाज़ उठाने की कोई ज़रूरत नहीं है। यह मामले खुद ही आगे बढ़ेंगे और अगर ज्ञानवापी मस्जिद के भीतर शिवलिंग की मौजूदगी की पुष्टि हो गई तो मुसलमानों का यह धार्मिक स्थल भी हमेशा के लिए छिन सकता है। हमें लगता है कि बीजेपी इस मुद्दे को साल 2027 में यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बचाकर रखना चाहेगी। चुनाव से पहले वह इस मुद्दे को गरम करेगी। उम्मीद है कि लोकसभा चुनाव के बाद काशी और मथुरा का मुद्दा बीजेपी और आरएसएस के एजेंडे में स्थायी रूप से शामिल हो जाएंगे।"

वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप यह भी कहते हैं, "पीएम नरेंद्र मोदी ने हाल ही में मथुरा दौरे के समय कहा था कि वह दिन दूर नहीं जब ब्रज क्षेत्र में भी भव्यता के साथ भगवान के दर्शन होंगे। उनका बयान इस बात को पुष्ट करता है कि अयोध्या के बाद काशी और फिर मथुरा का नंबर है। चौथी बार सत्ता में आने के लिए बीजेपी ने इन दोनों मुद्दों को अपने लिए रिजर्व कर लिया है। यह बात हर कोई जानता है चुनाव से पहले बीजेपी और आरएसएस हिन्दुओं की दुखती रंगों पर हाथ फेरती है सत्ता पर काबिज हो जाती है। इनके लिए मंदिर का मुद्दा किसी संजीवनी से कम नहीं है।"

बनारस में गहमा-गहमी

ASI सर्वे रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद बनारस में गहमा-गहमी की स्थिति है। 26 जनवरी को जुमे (शुक्रवार) कि नमाज के चलते बनारस कमिश्नरेट पुलिस अलर्ट मोड में रही। ज्ञानवापी मस्जिद के बाहर श्री काशी विश्वनाथ धाम के गेट नंबर-4 के सामने और उसके आसपास सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। जिला प्रशासन की निगरानी और कड़ी सुरक्षा के बीच ज्ञानवापी परिसर में जुमे की नमाज पढ़ी गई। इस दौरान सघन तलाशी के बाद लोगों को ज्ञानवापी परिसर में एंट्री मिली। शासन ने शहर के सभी थानों को सतर्कता बरतने का निर्देश दिया है। पुलिस कमिश्नर ने श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर के बाहर सुरक्षा बढ़ा दी है।

देश भर के खबरिया चैनलों के पत्रकार कैमरों के साथ जुट गए थे। मीडिया इसे एक बड़े मुद्दे के रूप में कवरेज दे रहे थे। कुछ चैनल इसका लाइव प्रसारण भी कर रहे थे। नमाजियों के बाहर निकलने पर खबरिया चैनलों ने उन्हें घेरना शुरू किया तो आपाधापी की स्थिति पैदा हो गई। बाद में कुछ चैनलों ने दावा किया कि उनके साथ धक्का-मुक्की की गई।

इस बीच, अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी की ओर से संदेश जारी कर मुस्लिम समाज से शांति बनाए रखने की अपील की गई है। संस्था के संयुक्त सचिव मोहम्मद यासीन न्यूज़क्लिक से कहते हैं, " हमने बयान जारी करके अवाम को बता दिया है कि हमारी जिम्मेदारी मस्जिद को आबाद रखने की है। मायूसी हराम है। सब्र से काम लेना होगा। दुआओं का एहतमाम करना होगा, क्योंकि हमारे मुल्क में चंद लोग हैं जो मुसलमान और मुसलमानों के किसी भी अधिकार को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। हमारी एकजुटता इस पर भारी पड़ेगी। हमारी अपील है कि बहस मुबाहसा से बचा जाए और पुरअमन रहकर ऐसे मंसूबों को नाकाम कर दिया जाए। इस मामले को हम अदालत में लड़ेंगे और सुप्रीम कोर्ट तक लेकर जाएंगे। इसलिए कौम के लोग से शांति बनाए रखें।"

यासीन यह भी कहते हैं, "ज्ञानवापी मस्जिद 804-42 हिजरी के समय जौनपुर के एक रईस मुसलमान ने बनवाई थी। तभी से वहां नमाज अदा की जा रही है। सारी बातें किताबों में लिखी हैं। मस्जिद के निर्माण के करीब डेढ़ सौ साल बाद बाद मुगल बादशाह अकबर ने मस्जिद का जीर्णोद्धार कराया था। ASI ने अपनी ख्याति के अनुरूप सर्वे रिपोर्ट दे दी है। यह सिर्फ रिपोर्ट है, फैसला नहीं है। सर्वे रिपोर्ट को पढ़ने और इसके विश्लेषण में काफी वक्त लगेगा। हम इस मामले में विशेषज्ञों की मदद लेंगे। इस मामले को हम अदालतों में ले जाएंगे। ASI की कार्यप्रणाली से हमें पहले ही आशंका थी कि सर्वे रिपोर्ट पर सिर्फ अफसरों के दस्तखत होंगे। सत्ता में बैठे लोग जो चाहेंगे, रिपोर्ट उसी के अनुरूप बनेगी। नीयत साफ होती तो ASI की सर्वे रिपोर्ट सार्वजनिक करने पर पाबंदी लग गई होती और मुकदमा चलता रहता। बड़ा सवाल यह है कि अगर इस मसले के लेकर कहीं कोई बितंडा खड़ा होता है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार होगा? "

“एक्ट से फ़ैक्ट नहीं बदलते”

ASI की सर्वे की रिपोर्ट आने के बाद हिन्दू पक्ष उत्साहित है। इनके पक्ष को खबरिया चैनल भी बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहे हैं। ज्ञानवापी का वजूस्थल सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सील किया गया है। इसके चलते निचली अदालत ने इस मामले में कोई भी दखल से साफ इनकार कर दिया है। अधिवक्ता सुभाष नंदन चतुर्वेदी कहते हैं, "ज्ञानवापी में हिन्दू पक्ष का पहला दावा सच हो गया है। अब वजूटैंक और कथित शिवलिंग के सर्वे के लिए हम तैयारी कर रहे हैं। अगले महीने लंबित याचिकाओं पर सुनवाई के लिए अपील की जाएगी। इसमें वजूस्थल के सील एरिया को खोलने, वजूस्थल का साइंटिफिक सर्वे और विवादित आकृति (कथित शिवलिंग) की कार्बन डेटिंग कराने की मांग की जाएगी।"

दूसरी ओर, अखिल भारतीय संत समिति ने ASI की सर्वे रिपोर्ट के निष्पक्ष बताते हुए कहा है, "किसी एक्ट से फैक्ट नहीं बदलते। मुस्लिम समुदाय के लोग रोना-धोना बंद करें और मस्जिद छोड़ दें ताकि हम वहां भव्य मंदिर का निर्माण करा सकें। सर्वे रिपोर्ट से यह साफ हो गया है कि मुगल शासक औरंगज़ेब ने मंदिर को ध्वस्त कराया था। हिंदुओं को मंदिर के पुनर्निर्माण और वहां पूजा पाठ करने का अधिकार है।  निर्माण का धर्म और इतिहास होता है, विध्वंस का नहीं। ऐसे में ज्ञानवापी पर मुसलमानों का कोई अधिकार नहीं है। "

क्या दूसरी मस्जिद नहीं खोजी जाएगी?

बनारस के जाने-माने एडवोकेट संजीव वर्मा कहते हैं, "किसी धार्मिक स्थल के चरित्र को तय करने के लिए कोर्ट को सर्वे का आदेश देने की कोई ज़रूरत नहीं थी। मौजूदा समय में ज्ञानवापी मस्जिद मुसलमानों के कब्जे में है और वहां हर रोज़ नमाज़ होती है। कोर्ट को सिर्फ़ यह तय करने की ज़रूरत थी कि उपासना स्थल क़ानून 1991 के तहत यह मुकदमा चलाने योग्य है अथवा नहीं? जरूरत इस बात की है कि कानून की रोशनी में इसका निर्णय होना चाहिए, आस्था के आधार पर नहीं। ज्ञानवापी के मामले में उपासना स्थल कानून टूट गया तो इस तरह के हजारों मुकदमों की फाइलें अदालतों में जमा हो जाएंगी। अदालतों को सिर्फ यह तय करना है कि 15 अगस्त 1947 को ज्ञानवापी मस्जिद का धार्मिक चरित्र क्या था?"

"ज्ञानवापी केस में सिविल कोर्ट ने 25 अगस्त 1937 को एक डिक्री कर रखी है। इस डिक्री पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साल 1942 में मुहर लगाई थी। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया था कि ज्ञानवापी मस्जिद और इसका चबूतरा वक्फ़ बोर्ड की संपत्ति थी। मुसलमानों को वहां नमाज़ अदा करने का अधिकार है। इस आदेश ये साफ पता चलता है कि 15 अगस्त 1947 को ज्ञानवापी का धार्मिक चरित्र एक मस्जिद का था। सालों बाद अराधना स्थल कानून को नए सिरे से बहस का केंद्र क्यों बनाया गया है? अदालती लड़ाई के बीच मुस्लिम पक्ष ऐलानिया तौर पर कह रहा है कि पूजा स्थल क़ानून के रहते ऐसे क़दम ग़ैर-क़ानूनी और गैर-वाजिब हैं। मस्जिद-मंदिर के बहस के चलते अदालतें याचिकाओं से भरती जा रही हैं और लगता है कि अब कोई कुछ भी कर सकता है।"

एडवोकेट संजीव कहते हैं, "यह मस्जिद को मंदिर में बदलने का टाइटिल सूट नहीं है। यह मस्जिद की बाहरी दीवार पर तीन मूर्तियों की पूजा का मुक़दमा है। अयोध्या मामले में फ़ैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 1991 में संसद का बनाया पूजा स्थल क़ानून, 1991 संविधान के प्रमुख मूल्यों को संरक्षित और सुरक्षित करता है। ऐसे में अदालतों की ज़िम्मेदारी है कि इस तरह के विवाद को बढ़ने से रोकें। बड़ा सवाल यह है कि क्या बीजेपी सरकार इस क़ानून के साथ खड़ी रहेगी? ज्ञानवापी के बाद क्या दूसरी मस्जिद नहीं खोजी जाएगी?"

"ASI की सर्वे रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद तमाम अटकलों को बल मिला है और बहुसंख्यक समुदाय के बीच अभी से बातें शुरू हो गई हैं कि मस्जिद में यह है..., वह है...। इस बारे में सुबूत क्या हैं और उसकी अहमियत क्या है? इसे समझने और समझाने की कोशिश कोई नहीं कर रहा है। लगता है कि अयोध्या की तरह ही बनारस की ज्ञानवापी मस्जिद को जल्द ही भावुक मुद्दा बना दिया जाएगा। यह सत्य है कि मुग़ल काल में बहुत से मंदिर तोड़े गए, लेकिन उसी दौरान कई मंदिरों का निर्माण भी हुआ। जाहिर है कि यह सब आपसी रजामंदी से ही हुआ होगा।"

वरिष्ठ पत्रकार अतीक अंसारी को लगता है कि ज्ञानवापी मामले में मीडिया का रोल ठीक नहीं है। खास राजनीतिक दल के लिए मीडिया ही इसे मुद्दा बना रही है। बनारस कबीर-नज़ीर और तुलसीदास का शहर है। इसे बिस्मिल्लाह खां का शहर रहने दिया जाए तो ही अच्छा है। ज्ञानवापी हो या मथुरा, ये मुद्दे पॉलेटिकल हैं। ASI  के सर्वे रिपोर्ट के सार्वजनिक किए जाने के बाद मुसलमानों को भरोसा हो गया है कि ये मस्जिद भी जाएगी। इसे लेकर अल्पसंख्यक समुदाय में मायूसी है और उन्हें लगता है कि अयोध्या की तरह इस मामले में भी कोर्ट आस्था के आधार पर फैसला सुना सकती है।

वरिष्ठ पत्रकार अतीक अंसारी कहते हैं, "मेरा मानना है कि फैसला सड़क पर नहीं, कोर्ट में होना चाहिए। चाहे वह आपको पसंद हो अथवा नहीं हो। सभी को खामोशी से मान लेना चाहिए। फैसला जब सड़क पर होगा तो उसका अंजाम अच्छा नहीं होता है। ASI की रिपोर्ट में ऐसा कहीं कुछ भी नहीं है जिससे यह साबित होता हो कि पहले मंदिर था। ASI  की सर्वे रिपोर्ट में सिर्फ इतना ही जिक्र है कि किसी पुरानी इमारत के ऊपर दो-तीन चरणों में इमारतें बनाई गई हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि मंदिर अथवा मस्जिद के अवशेष हैं। उस रिपोर्ट पर कोर्ट क्या निर्णय लेता है, यह भविष्य की बात है।"

अतीक अंसारी कहते हैं, "यह मुकदमा जल्द खत्म होने वाला नहीं है। सर्वे रिपोर्ट को प्रकाशित और प्रसारित करने में मीडिया ने भावावेश में अतिरेक का परिचय दिया है। खबरिया चैनलों के कवरेज को देखने से पता चल रहा था कि मीडिया के लोगों को छूट दे दी गई होती वही गैता-कुदाल लेकर मंदिर की नींव खोदने जुट जाते। अब कहने में शर्म आती है कि हम भी कभी मीडिया में थे। जब किसी निजाम में कातिल और मुंसिफ एक हों तो यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इंसाफ कैसा होगा? "

(लेखक बनारस स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं)

इसे भी पढ़ें: ज्ञानवापी विवाद: पूजा स्थल अधिनियम-1991 का अब क्या मतलब रह गया!

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