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महंगाई: अब लहसुन ने तोड़े सारे रिकॉर्ड, 600 रुपए किलो तक पहुंचे रेट, जायके संग रसोई बजट भी बिगड़ा

महंगाई ने एक बार फिर लोगों का जायका और रसोई का बजट दोनों बिगाड़ कर रख दिया है। जी हां, प्याज टमाटर के बाद लहसुन की कीमतों में उछाल ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। बाजार में लहसुन के रेट 600 रुपए किलो तक जा पहुंचे हैं।
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महंगाई ने एक बार फिर लोगों का जायका और रसोई का बजट दोनों बिगाड़ कर रख दिया है। जी हां, प्याज टमाटर के बाद लहसुन की कीमतों में उछाल ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। बाजार में लहसुन के रेट 600 रुपए किलो तक जा पहुंचे हैं। अब भले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन लाख कहें कि वो लहसुन नहीं खाती लेकिन लहसुन (गार्लिक) सदियों से हमारी रसोई का अहम हिस्सा रहा है। लगभग हर किचन में लहसुन का इस्‍तेमाल खाने का स्‍वाद बढ़ाने के लिए किया जाता है, वहीं इसके एंटीबैक्टीरियल और एंटीसेप्टिक  प्रकृति यानी उपचारात्मक और औषधीय गुणों के चलते भी लोग लहसुन खाते हैं। खासकर सर्दियों में तो ज्यादा से ज्यादा लहसुन खाने की सलाह दी जाती है। लहसुन खाने से शरीर में गर्माहट आती है। ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने में मदद मिलती है। 

आम लोगों की खाने की थाली पर एक बार फिर महंगाई की मार लगी है। इन दिनों लहसुन के दाम में आग लगी हुई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यूपी के बुंदेलखंड और एमपी के जबलपुर आदि जिले में लहसुन का फुटकर दाम 600 रुपए किलो तक पहुंच चुका हैं। हालात यह हो गए हैं कि अब लोग लहसुन लेने से कतराने लगे हैं, क्योंकि लहसुन के दाम रोजाना नए रिकॉर्ड बना रहे हैं। इसके साथ ही बाजार से लहसुन गायब भी होता जा रहा है। लोग तो यह भी कर रहे है कि लहसुन चिकन से भी महंगा हो गया है और रेट पाकिस्तान से मुकाबले करते दिखने लगे हैं।

दरअसल, लहसुन खरीदना अब आम आदमी की बस की बात नहीं रह गई है। थोक मंडी तक में लहसुन के दामों में रोजाना ही इजाफा देखा जा रहा है। व्यापारियों का कहना है कि जहां थोक रेट में लहसुन 350 से 400 रुपए किलो तक बिक रहा है तो वहीं फुटकर बाजार में लहसुन के दाम 400 से 600 रुपए किलो तक पहुंच चुके हैं। व्यापारियों का मानना है कि अभी लहसुन के दामों में और भी बढ़ोतरी दर्ज की जा सकती है। नया लहसुन बाजार में अभी तक आया नहीं है और पुराने लहसुन का स्टॉक खत्म हो रहा है।

इस वजह से प्रभावित हो रहा है बाजार

ऐसे में लहसुन बाजार में स्टॉक में रखा हुआ बचा-खुचा पुराना माल ही बिक रहा है। खुदरा व्यापारी अनुराग पटेल का कहना है कि अब ग्राहक भी लहसुन ना के बराबर खरीद रहा है, जिसकी वजह से बाजार प्रभावित हो रहा है। हालांकि, पिछले साल की बात करें तो लहसुन के दाम महज 100 से 150 रुपए रुपए किलो तक थे। लेकिन इस साल फसल कम होने से लहसुन के दामों ने सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले है। थोक व्यापारी कहते है कि, इसके पीछे एक बड़ी वजह लहसुन का उत्पादन कम होना हैं। दरअसल, किसानों ने इस बार लहसुन की फसल की बोनी को कम कर दिया था। एमपी बड़ा लहसुन उत्पादक प्रदेश है लेकिन अबकी जबलपुर समेत पूरे महाकौशल क्षेत्र में बहुत कम मात्रा में लहसुन की पैदावार हुई है। छिंदवाड़ा और इंदौर जैसे इलाकों में ही लहसुन की पैदावार देखी गई है। इसके अलावा यूपी और राजस्थान से भी लहसुन की आवक कम हो गई है। इस वजह से लहसुन के दाम आसमान छू रहे हैं।

जायके के साथ किचन का बजट भी बिगड़ा

सब्जी मंडी पहुंचे ग्राहकों का कहना है कि इस बार तो लहसुन के दाम चिकन से भी दुगने हो गए हैं। ऐसे में लहसुन खरीद पाना आम लोगों के बस की बात नहीं है। कहा कि ड्राई फ्रूट के दाम पर लहसुन बिक रहा है, जिसने किचन का बजट बिगाड़ दिया। उन्होंने कहा कि बढ़ते दामों को लेकर सरकार और प्रशासन को भी कोई कदम उठाना चाहिए।

प्रबंधन की कमी भी है किल्लत का बड़ा कारण

लहसुन का यह हाल तब है जब भारत दुनिया का दूसरा बड़ा लहसुन उत्पादक देश है और पिछले साल ही यहां किसान एक रुपए किलो तक प्याज बेचने को मजबूर हुए थे। इस सब के बावजूद भारतीयों को लहसुन के लिए रिकॉर्ड कीमत चुकानी पड़ रही है। देश के कई हिस्सों में लहसुन का रिटेल भाव 500- 600 रुपए प्रति किलो की रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया है। दूसरी तरफ भारत से लहसुन निर्यात की कीमत देखें तो पता चलेगा कि लहसुन को लेकर देश में प्रबंधन कितना खराब है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वित्त वर्ष 2023-24 के शुरुआती 7 महीने यानी अप्रैल से अक्टूबर के दौरान देश से 62026 टन लहसुन का एक्सपोर्ट हुआ है जो एक्सपोर्ट को लेकर अब तक का रिकॉर्ड है। किसी भी वित्त वर्ष पहले इतना लहसुन कभी निर्यात नहीं हुआ है। पूरे वित्त वर्ष 2022-23 के दौरान देश से करीब 57 हजार टन लहसुन का एक्सपोर्ट हुआ था। यह एक्सपोर्ट को लेकर अब तक का रिकॉर्ड था लेकिन इस साल सारे रिकॉर्ड टूट गए हैं। अगर मात्रा के लिहाज से इस साल अप्रैल–अक्टूबर के दौरान 62026 टन लहसुन का एक्सपोर्ट हुआ है, वहीं कीमत के लिहाज से देखें तो यह आंकड़ा 318.33 करोड़ रुपए का है। इस लिहाज से प्रति किलो एक्सपोर्ट भाव 51.26 रुपए बैठता है। यानी जिस लहसुन के लिए भारतीय 500 रुपए प्रति किलो का भाव दे रहे हैं, वह देश से सिर्फ 51.49 रुपए प्रति किलो के भाव पर एक्सपोर्ट हुआ है।

भारत से लहसुन का सबसे ज्यादा इंपोर्ट बांग्लादेश करता है और इस साल भी जितना एक्सपोर्ट हुआ है उसका आधे से ज्यादा हिस्सा बांग्लादेश को ही गया है। यानी बांग्लादेश के लोग भारत के लहसुन को भारतीयों से कम कीमत देकर खा रहे हैं। वित्त वर्ष 2022-23 के दौरान देश से एक्सपोर्ट हुए 57346 टन लहसुन में 28244 टन का एक्सपोर्ट बांग्लादेश को हुआ था। बांग्लादेश के अलावा मलेशिया, वियतनाम और थाईलैंड भारतीय लहसुन के बड़े खरीदार हैं। यही सब कारण है कि सब्जी में तड़का लगाना एक बार फिर महंगा हो गया है। और कोलकाता से लेकर अहमदाबाद तक एक किलो लहसुन का भाव 500 रुपये से लेकर 600 रुपये तक पहुंच गया है।

15 दिन के भीतर पहुंचे आसमान पर दाम

देश में लहसुन की कीमत में ये ताबड़तोड़ तेजी महज 15-20 दिनों के भीतर ही देखने को मिली है। इस दौरान 200 रुपये प्रति किलो बिकने वाले लहसुन का भाव 300 रुपये से ज्यादा बढ़कर 500 रुपये के पार निकल चुका है। वहीं हफ्तेभर पहले ही ये 300 रुपये प्रति किलो बिक रहा था। रिपोर्ट्स की मानें तो कोलकाता में जो लहसुन 15 दिन पहले 200-220 रुपये के भाव पर बिक रहा था, वो 500 रुपये मिल रहा है, वेस्ट बंगाल वेंडर एसोशिएसन की ओर से ये बात कही गई है। रिपोर्ट में एसोसिएशन के प्रेसिडेंट कमल डे के हवाले से बताया गया है कि प्रोडक्शन घटने के कारण इस साल कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। यहां के बाजारों में अधिकांश आपूर्ति बंगाल के बाहर से आती है और इसका प्रमुख स्रोत नासिक है। ना केवल कोलकाता, बल्कि गुजरात के अहमदाबाद में भी लहसुन 400-450 रुपये प्रति किलोग्राम बिक रहा है। इसके अलावा दिल्ली, यूपी, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में लहसुन के दाम लगातार बढ़ते हुए नजर आ रहे हैं।

सीतापुर रोड पर स्थित मानपुर मंडी में आढ़ती अशोक कुमार बताते हैं कि देश भर में रोजाना करीब 1 लाख कट्टा लहसुन की खपत होती है लेकिन पिछले कुछ दिनों से करीब 50 से 60 हजार कट्टा ही लहसुन मंडियों तक आ पा रहा है, जिसकी वजह से देशभर में करीब 40 से 50 हजार कट्टा लहसुन की मांग बनी हुई है और इसकी वजह से कीमत आसमान पर चढ़ गई हैं। आजादपुर थोक मंडी में ही लहसुन 400 रुपये किलो की कीमत पर बिका है। थोक में महंगे हुए लहसुन की कीमतें रिटेल में कई गुना हो गई हैं। दिल्‍ली-एनसीआर ही नहीं बल्कि अन्‍य राज्‍यों के खुदरा बाजार में भी लहसुन 500 से 600 रुपये किलो तक बेचा जा रहा है। जबकि पिछले साल फरवरी में इसी मंडी में लहसुन का रेट करीब 100 रुपये प्रति किलोग्राम था। अशोक ने यह भी बताया कि लहसुन की कीमत बढ़ने के पीछे पिछले साल लहसनु की फसल कम होना और इस वजह से फसल की आवक कम होना है। बता दें कि फरवरी के आखिर में देश के कई हिस्‍सों से लहसुन की नई फसल आती है लेकिन तब तक पुरानी फसल से आपूर्ति होती है। पिछले साल लहसुन की फसल कम हुई थी, ऐसे में नई फसल आने तक पुरानी फसल की आपूर्ति ठप हो गई है. लिहाजा मांग ज्‍यादा होने और पूर्ति न हो पाने से कीमतें बढ़ रही

आख‍िर अचानक इतना महंगा क्यों हो गया लहसुन?

प‍िछले साल क‍िसान महज एक दो रुपये क‍िलो पर लहसुन बेचने के ल‍िए मजबूर थे। फ‍िर घाटे के कारण गुस्से में खेती कम कर दी ज‍िसकी वजह से बाजार में सॉर्टेज हो गई और लहसुन का दाम इतना महंगा हो गया। क‍िसानों को दुखी करने की कीमत आज कंज्यूमर को उठानी पड़ रही है। 

क्या है उत्पादन का अर्थशास्त्र?

लहसुन की खेती करने वाले क‍िसानों ने सरकार और जनता दोनों को खेती-क‍िसानी का अर्थशास्त्र अच्छी तरह से समझा द‍िया है। जनवरी 2023 के दौरान मंड‍ियों में लहसुन महज एक दो रुपये प्रत‍ि क‍िलो के भाव पर ब‍िक रहा था, जबक‍ि इस साल दाम 400 रुपये क‍िलो तक जा पहुंचे हैं। फुटकर में तो उपभोक्ताओं को 500-600 रुपये तक दाम चुकाना पड़ रहा है। ऐसा क्यों हुआ, इस सवाल का जवाब जहां उत्पादन से जुड़ा है वहीं क‍िसानों और उपभोक्ताओं दोनों की समस्याओं का समाधान भी है। दरअसल, दाम कम होने की वजह से क‍िसानों ने खेती इतनी कम कर दी क‍ि बाजार में लहसुन की क्राइस‍िस हो गई और दाम बढ़ गया। ऐसे में सीख यही है क‍ि क‍िसानों को इतना मत दबाईए क‍ि वो घाटा सहकर 1- 2 रुपये क‍िलो में लहसुन बेचने के ल‍िए मजबूर हों। क्योंक‍ि यही मजबूरी खेती कम करवा देगी, ज‍िसका बोझ अंत में आकर उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा।

इसल‍िए लहसुन ही नहीं क‍िसी भी फसल पर क‍िसानों की जो लागत आती है उस पर मुनाफे का संतुलन बनाए रखने की जरूरत है। वरना एक साल क‍िसान लुटेगा और दूसरे या तीसरे साल कंज्यूमर। लहसुन जैसी ही स्थ‍ित‍ियां ही अगले साल तक प्याज को लेकर भी पैदा हो सकती हैं। क्योंक‍ि इस साल वो एक्सपोर्ट बैन की वजह से 1-2 रुपये क‍िलो पर प्याज बेचने के ल‍िए मजबूर हैं। बहरहाल, हम लहसुन की बात करते हैं, ज‍िसका रकबा एक ही साल में 10 फीसदी कम हो गया है जबक‍ि उत्पादन में 8 फीसदी से ज्यादा की ग‍िरावट दर्ज की गई है। ज‍िसका असर बाजार पर द‍िखाई दे रहा है। 'क‍िसान तक' आदि  मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मध्य प्रदेश के व‍िद‍िशा ज‍िला मुख्यालय से लगभग 18 क‍िलोमीटर दूर करैया हाट गांव के आकाश बघेल ने प‍िछले साल 10 बीघे में लहसुन की खेती की थी। लहसुन एक मसाला कैटेगरी की फसल है। फ‍िर भी इसकी दुर्गत‍ि हो रही थी। कम दाम की वजह से उन्हें 4 लाख का घाटा हुआ था। बघेल ने 'क‍िसान तक' को बताया क‍ि उन्हें 5 से 35 रुपये किलो तक का दाम म‍िला था, ज‍िसमें घाटा ही घाटा हुआ था। इसल‍िए परेशान होकर लहसुन की खेती ही बंद कर दी। उज्जैन में पहले के मुकाबले स‍िर्फ 20 फीसदी लहसुन की खेती बची है।

कम दाम से नाराज क‍िसानों ने अपना गुस्सा द‍िखा द‍िया है। मध्य प्रदेश लहसुन का सबसे बड़ा उत्पादक है, इसल‍िए वहां पर इसकी खेती करने वाले क‍िसानों को प‍िछले वर्ष काफी नुकसान हुआ था। उन्होंने उसी गुस्से में या तो रकबा कम कर द‍िया है या फ‍िर उसकी जगह दूसरी फसलों की खेती कर ली है। ज‍िससे बाजार में लहसुन की सॉर्टेज हो गई है। इसकी कीमत क‍िसान भी चुका रहे हैं और उपभोक्ता भी।

क‍ितना घटा रकबा और उत्पादन?

केंद्रीय कृष‍ि मंत्रालय के मुताब‍िक साल 2021-22 में देश भर में 4,31,000 हेक्टेयर में लहसुन की खेती हुई थी. जो 2022-23 के तीसरे अग्र‍िम अनुमान में घटकर मात्र 3,86,000 हेक्टेयर में स‍िमट गई। यानी एक ही साल में रकबा 45,000 हेक्टेयर घट गया। इस तरह क‍िसानों के गुस्से से रकबा 10.4 फीसदी कम हो गया। वहीं उत्पादन की बात करें तो साल 2021-22 के दौरान देश भर में 35,23,000 मीट्र‍िक टन लहसुन का उत्पादन हुआ था। जबक‍ि 2022-23 के तीसरी अग्र‍िम अनुमान में यह घटकर 32,33,000 मीट्र‍िक टन ही रह गया है। यानी एक साल में 2,90,000 मीट्र‍िक टन की ग‍िरावट आई है। अगर परसेंट में देखें तो 8.2 फीसदी की कमी। ज‍िसकी वजह से लहसुन का दाम इस साल अपनी र‍िकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया है।

साभार : सबरंग 

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