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कर्नाटक: हिजाब से हटेगा बैन, राजनीति के चलते ज़रूरत से ज्यादा बढ़ा विवाद?

हिजाब बैन हटाने को लेकर विपक्षी दल बीजेपी विरोध में उतर आई है, तो वहीं सत्ता पक्ष कांग्रेस इसे अपनी पसंद और अधिकार की बात से जोड़ रही है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर। PTI

"हम हिजाब सर्कुलर को वापस ले लेंगे। इस पर कोई प्रतिबंध नहीं है। कपड़ों का चयन करना व्यक्ति का अपना विशेषाधिकार है।"

ये बयान कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने शुक्रवार, 22 दिसंबर को मैसुरू के एक कार्यक्रम में हिजाब से प्रतिबंध हटाने का ऐलान करते हुए दिया। उन्होंने आगे कहा कि कर्नाटक ने स्कूल-कॉलेजों में लड़कियों के हिजाब पहनने पर लगे बैन को हटाने का फैसला किया है। और इसके लिए अधिकारियों को 2022 में पिछली बीजेपी सरकार द्वारा लाए गए हिजाब पर प्रतिबंध लगाने वाले आदेश को वापस लेने का निर्देश दिया गया है। 

मुख्यमंत्री के इस भाषण के साथ ही कर्नाटक की सियासत एक बार फिर हिजाब को लेकर गर्मा गई है। विपक्षी दल बीजेपी इसके विरोध में उतर आई है, तो वहीं सत्ता पक्ष कांग्रेस इसे अपनी पसंद और अधिकार की बात से जोड़ रही है।

बता दें कि बीते साल 2022 में कर्नाटक का हिजाब मामला उस वक्त पूरे देश के लिए सुर्खियां बन गया था, जब प्रदेश की पिछली बीजेपी सरकार ने हिजाब प्रतिबंधित करने का आदेश दिया था। तब ये मुद्दा शिक्षा और धर्म से आगे बढ़ता राजनीति और कानूनी लड़ाई के बीच उलझ कर लड़कियों को शिक्षा से दूर करने की एक और साज़िश के तौर पर देखा जाने लगा था। हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट पहुंचा ये मामला फिलहाल किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा है। सुप्रीम कोर्ट के खंडित फैसले के लगभग एक साल से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी सर्वोच्च अदालत में इसके लिए बड़ी बेंच गठन होना बाकी है।

हिजाब को लेकर कांग्रेस और बीजेपी का पक्ष और राजनीति

द हिंदू की खबर के मुताबिक कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने ये संकेत दिया था कि सत्ता में आने पर वो हिजाब बैन को ख़त्म कर देगी। हालांकि मैसुरू कार्यक्रम में पहली बार मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इसका सार्वजनिक तौर पर ऐलान किया है। सभा को संबोधित करते हुए सीएम सिद्धारमैया ने कहा कि पीएम मोदी का 'सब का साथ, सबका विकास' झूठा है। बीजेपी लोगों और समाज को कपड़े, पहनावे और जाति के आधार पर बांट रही है।

उन्होंने आगे कहा, "मैं तुम्हें क्यों परेशान करूं? आप जो भी ड्रेस पहनना चाहें पहन लें। तुम जो चाहो खाओ। अपनी पसंद का खाना खाना आपका अधिकार है। मैं जो भी खाऊंगा वो मेरा अधिकार है। मैं धोती पहनता हूं। कोई शर्ट-पैंट पहन सकता है। इसमें गलत क्या है। राजनीतिक फायदे के लिए इस तरह के मामलों का राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए।"

उधर, बीजेपी ने भी इस पूरे मामले पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि वह हिजाब प्रतिबंध को रद्द करने के किसी भी कदम का विरोध करेगी। सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री के ऐलान का विरोध करते हुए पार्टी ने लिखा, "मुख्यमंत्री शांतिपूर्ण समाज में धर्मांधता का जहर खोलने जा रहे हैं।"

पार्टी के मुताबिक सिद्धारमैया वोट बैंक की राजनीति के लिए इस तरह का फै़सला ले रहे हैं। यूनिफॉर्म छात्र-छात्राओं में समानता सुनिश्चित करती है। लेकिन मुख्यमंत्री लोगों को बांटने की कोशिश कर रह रहे हैं। लेकिन आने वाले दिनों में जनता उन्हें सबक सीखा देगी।

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साल 2021 में शुरू हुआ विवाद, अब तक राजनीति की भेंट चढ़ा

ध्यान रहे कि इस पूरे विवाद की शुरुआत साल 2021 में हुई थी। जब उडुपी के सरकारी पीयू कॉलेज में छह लड़कियों को कक्षा में हिजाब पहनने की अनुमति नहीं दी गई थी। जिसके बाद छात्राओं ने हिजाब पहनकर कैंपस में घुसने की कोशिश की थी लेकिन उन्हें बाहर ही रोक दिया गया था। इन लड़कियों ने इसके बाद कॉलेज प्रशासन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन शुरू कर दिया था और जनवरी 2022 में उन्होंने कर्नाटक हाई कोर्ट में हिजाब पर प्रतिबंध के ख़िलाफ़ याचिका दायर कर दी थी।

ये मामला शुरू तो उडुपी ज़िले से हुआ था लेकिन जल्द ही जंगल की आग की तरह बाक़ी ज़िलों में भी फैल गया। शिवमोगा और बेलगावी ज़िलों में भी हिजाब पहनकर कॉलेज आने वाली मुसलमान छात्राओं पर रोक लगा दी गई। भगवा गमछा पहने छात्रों ने हिजाब पहने छात्राओं के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी शुरू कर दी। कोंडापुर और चिकमंगलूर में प्रदर्शन और प्रदर्शनों के ख़िलाफ़ हिंदू और मुसलमान छात्रों के प्रदर्शन शुरू हो गए।

इस दौरान सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी वायरल हुआ जिसमें हिजाब पहने कॉलेज जा रही छात्रा मुस्कान ख़ान के ख़िलाफ़ भगवा गमछा डाले युवा छात्रों की भीड़ नारेबाज़ी कर रही थी। ये घटना कर्नाटक के मंड्या ज़िले में हुई थी लेकिन जल्द ही हिजाब बनाम भगवा गमछे की लड़ाई पूरे कर्नाटक में शुरू हो गई। हालांकि कर्नाटक हाई कोर्ट में हिजाब मामले पर सुनवाई शुरू होने के तीन दिन पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री बसावराज बोम्मई की सरकार ने एक आदेश जारी करके सभी छात्रों के लिए कॉलेज प्रशासन की तरफ़ से तय यूनिफॉर्म को पहनना अनिवार्य कर दिया। इस आदेश के दो दिनों के भीतर ही प्रदर्शन राज्य भर में फैल गए और कई जगह हिंसक घटनाएं भी हुईं।

8 फरवरी 2022 को उडुपी के एमजीएम कॉलेज में सैकड़ों छात्रों की भीड़ ने हिजाब पहने लड़कियों के ख़िलाफ़ जय श्री राम का नारा लगाया। कर्नाटक के कई इलाक़ों में हिंसक झड़पें हुईं। पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा और आंसू गैस छोड़नी पड़ी। मुख्यमंत्री को एहतियात के तौर पर कई दिनों तक सभी स्कूलों को बंद रखने का आदेश देना पड़ा। इसके बाद मामला कर्नाटक हाई कोर्ट की तीन जजों की बेंच में पहुंचा। जिसने सरकार के फैसले का समर्थन किया था।

हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट और प्रदेश से पूरे देश में चला विवाद

हाईकोर्ट के बाद, उडुपी की मुस्लिम छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। मुस्लिम छात्रा निबा नाज की ओर से विशेष अनुमति याचिका दायर की गई थी। इस याचिका में कहा गया था कि कर्नाटक शिक्षा अधिनियम छात्रों द्वारा पहनी जाने वाली किसी भी अनिवार्य वर्दी का प्रावधान नहीं करता है और हिजाब पहनने का अधिकार निजता के अधिकार के दायरे में आता है।

सुप्रीम कोर्ट जुलाई 2022 में हिजाब बैन को लेकर कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के लिए राजी हो गया था। सितंबर, 2022 में करीब 10 दिनों की बहस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के स्कूलों में हिजाब पहनने पर प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इसके बाद 13 अक्टूबर को इस मुद्दे पर खंडित फैसला आया, जिसमें दो पीठासीन न्यायाधीश, जस्टिस हेमंत गुप्ता और सुधांशु धूलिया, एक समझौते पर नहीं आ सके।

जहां एक ओर न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता ने कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया और राज्य में शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध को बरकरार रखा, वहीं न्यायमूर्ति धूलिया ने हिजाब पहनने को पसंद का मामला बताते हुए इसे अनुच्छेद 14, 15 और 19 से जोड़ा। उन्होंने अपने फैसले में लड़कियों की शिक्षा को सर्वोपरि माना। मौजूदा समय में ये मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को भेजा गया है और शीर्ष अदालत इस पर भी विचार करेगी कि क्या मामले को नौ न्यायाधीशों की पीठ को भेजा जाना चाहिए। कुल मिलाकर ये मामला अभी अदालत के ठंडे बस्ते में है।

हिजाब को लेकर चिंता और सवाल

गौरतलब है कि इस पूरे विवाद में कई लोग पक्ष और विपक्ष में बंटे हुए थे, तो वहीं एक धड़ा प्रगतिशील लोगों का भी था, जो हिजाब के हिमायती तो नहीं थे, लेकिन वो इसे जबरन उतरवाने के ख़िलाफ़ थे। और इसका सबसे बड़ा कारण उनका ये डर था कि कहीं इसके चलते मुस्लिम लड़कियां शिक्षा से दूर न हो जाएं और शायद यही वजह रही कि इसके विरोध में और ज़्यादा महिलाओं ने न चाहते हुए भी हिजाब की ओर कदम बढ़ा दिए।

यहां ये भी गौर करने वाली बात थी कि अचानक, अकादमिक सत्र के बीच हिजाब का मुद्दा पैदा कैसे हुआ? जिसे बेवजह और जरूरत से ज्यादा हवा दी गई। कोर्ट ने ये भी कहा कि जिस तरह सामाजिक अशांति और द्वेष फैलाने की कोशिश की गई वो सबके सामने है। उसमें अब बहुत कुछ बताने की जरूरत नहीं है। इस तमाम बहस में ये बड़ा सवाल है कि क्या हिजाब पहनना आज़ादी का संकेत है या भारतीय मुसलमान की पहचान को ज़ाहिर करने का तरीका। हिजाब उतारना धार्मिक और राजनीतिक मामला है या सत्ता और पितृसत्ता का हथियार।

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