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मध्य प्रदेश : सीएम शिवराज से मिलने पहुंचीं आशा कार्यकर्ताओं पर मुकदमा, बोलीं-सरकार की करनी और कथनी में अंतर

मानदेय वृद्धि और नियमितीकरण समेत अन्य मांगों को लेकर प्रदेशभर में आशा- ऊषा कार्यकर्ता लगभग एक महीने से अनिश्चितकालीन धरने और हड़ताल पर बैठी हुई हैं।
ASHA Workers

मध्य प्रदेश में आशा- ऊषा कार्यकर्ता और शिवराज सिंह सरकार एक बार फिर आमने-सामने हैं। बीते रविवार, 16 अप्रैल को प्रशासन के अश्वासन के बाद मुख्यमंत्री से मिलने उनके कार्यक्रम में पहुंची इन कार्यकत्रियों को कथित तौर पर पुलिसिया कार्यवाही का सामना करना पड़ रहा है। इन कार्यकत्रियों का कहना है कि ग्वालियर के आंबेडकर महाकुंभ में घंटों शांतिपूर्ण रूप से धूप में बैठने के बाद भी जब इन्हें सीएम से नहीं मिलने दिया गया, तो मज़बूरन इन लोगों को चक्का जाम करना पड़ा, जिसके बाद आठ कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया है। इतना ही अधिकारियों द्वारा सीएम के आदेश पर इनके बीते 6 महीने के रिकार्ड्स भी चेक करने के लिए मंगवाए जा रहे हैं।

बता दें कि मानदेय वृद्धि और नियमितीकरण समेत अन्य मांगों को लेकर प्रदेशभर में आशा- ऊषा कार्यकर्ता लगभग एक महीने से अनिश्चितकालीन धरने और हड़ताल पर बैठी हुई हैं। इन कार्यकर्ताओं का ये संघर्ष बीते लंबे समय से जारी है और इन प्रदर्शनकारियों का कहना है कि साल 2021 में जारी आश्वासन के बावजूद अब तक सरकार ने इस ओर कोई पहल नहीं की है, नाहीं अब तक सरकार का कोई प्रतिनिधि या नेता इन आंदोलनरत कार्यकत्रियों से मिलने आया है। इनका आरोप है कि चुनावी साल में सरकार महिलाओं के नाम पर तमाम वोट तो हासिल करना चाहती है, लेकिन मेहनतकश महिलाओं को उनकी कमाई नहीं देना चाहती।

क्या है पूरा मामला?

प्राप्त जानकारी के मुताबिक ग्वालियर में रविवार को आंबेडकर महाकुंभ कार्यक्रम के दौरान आशा कार्यकर्ताओं को सुबह से बैठा कर रखा गया था। प्रशासन के अधिकारियों ने उन्हें आश्वासन दिया था कि उनकी सीएम शिवराज से मुलाकात करवाई जाएगी। लेकिन इसके बावजूद भी उन्हें सीएम तक पहुंचने नहीं दिया गया। जिसके बाद मजबूरन सभी आशा कार्यकर्ताओं ने एकजुट होकर सीएम शिवराज सिंह चौहान के काफिला रोकने के लिए घेराव किया, जहां उनकी और पुलिस की धक्का-मुक्की भी हुई। इस पूरी घटना को लेकर पुलिस ने कुल आठ आशा कार्यकर्ताओं पर मुकदमा दर्ज किया है।

मुकदमे में लीला रायपुरिया का नाम भी शामिल है, जो उस वक्त कार्यक्रम में मौजूद थीं। उन्होंने पूरे मामले की खबर देते हुए न्यूज़क्लिक को बताया कि प्रशासन ने आशा कार्यकर्ताओं के साथ धोखा किया है। पहले मिलने का आश्वासन दिया गया और बाद में गुमराह किया गया।

लीला के मुताबिक पहले आशा कार्यकर्ताओं को पंडाल से बाहर बैठा दिया गया। फिर कहा गया कि पांच सदस्यों के एक प्रतिनिधी मंडल की मुलाकात सीएम से भाषण खत्म होने और फिर हैलीपैड पहुंचने पर करवाई जाएगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसके चलते आशाओं को चक्का जाम करना पड़ा। जहां सीएम अपनी गाड़ी से उतरे और बीना कुछ बोले ज्ञापन लेकर चलते बने। लीला का आरोप है कि सीएम ने अधिकारियों से प्रदर्शन में शामिल आशाओं पर कार्यवाही करने को भी कहा।

ध्यान रहे कि इस आंबेडकर महाकुंभ में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बीडी शर्मा, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित ग्वालियर चंबल अंचल के बीजेपी के मंत्री और नेता सभी शामिल हुए थे। इस मौके पर आशा कार्यकर्ताओं ने जमकर विरोध किया और सरकार विरोधी नारे भी लगाए लेकिन किसी मंत्री-नेता ने इनका कोई संज्ञान नहीं लिया। रविवार को ही प्रदेशभर में मशाल जुलूस भ इन कार्यकर्ताओं द्वारा निकाला गया।

मध्य प्रदेश आशा- ऊषा सहयोगिनी श्रमिक संघ की प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मी कौरव ने न्यूज़क्लिक से बातचीत में कहती हैं, “सीएम चुनावी साल में लाडली बहना योजना ला रहे हैं, हम पूछना चाहते हैं कि ये बहनें कौन सी हैं? क्या मेहनत करने वाली आशा कार्यकर्ता इनकी बहनें नहीं हैं, फिर उनके साथ इतना अन्याय क्यों हो रहा है। ये साफ तौर पर सरकार की कथनी और करनी में अंतर को दर्शाता है।

लक्ष्मी के अनुसार अब ये लड़ाई सिर्फ वेतन वृद्धी की नहीं है, अब ये लड़ाई आशा-ऊषाओं के स्वाभिमान की लड़ाई बन गई है। सीएम साहब कहते हैं, भाई पर भरोसा रखिए, सब हो जाएगा, लेकिन बीते कई सालों से सिर्फ आश्वासन ही मिला है, हुआ कुछ नहीं है। ऐसे में अब सवाल सिर्फ आशाओं की मांगों का नहीं, बल्कि सरकार की विश्वसनीयता का भी है। आशाएं अब आर-पार की लड़ाई को तैयार हैं।

प्रदर्शन में शामिल अन्य आशा-ऊषा कार्यकर्ताओं ने बताया कि कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें बेहद कम वेतन 2,000 रूपए पर गुजारा करना पड़ रहा है। साल 2021 में जब आशा और ऊषा कार्यकर्ताओं ने राजधानी भोपाल में बड़ा प्रदर्शन किया था, तब उन्हें ये आश्वासन दिया गया था कि जल्द ही प्रदेश की हर आशा को 10 हजार रुपए और पर्यवेक्षकों को 15 हजार रुपए का वेतन निर्धारित कर दिया जाएगा। लेकिन अब दो साल बीत जाने के बाद भी सरकार ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की है। आशाएं केवल काम के बदले दाम मांग रही हैं, जो कामकाजी महिलाओं का हक़ है, जिसे सरकार नज़रअंदाज नहीं कर सकती है, क्योंकि महिलाएं भी सरकार की वोटर हैं और सरकार बदलने की हिम्मत रखती हैं।

गौरतलब है कि साल 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत स्वास्थ्य सुविधाओं को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से आशा कार्यकर्ताओं की भर्ती की जाती है। वहीं सहयोगिनी की भूमिका आशा कार्यकर्ताओं की निगरानी और उनका मार्गदर्शन करना है। इनकी ज़िम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग को आशा कार्यकर्ताओं के किये गये कार्यों की प्रगति की रिपोर्ट करने की भी होती है। साल 2021 में मध्यप्रदेश में हज़ारों आशा कार्यकर्ताओं का बड़ा और अहम आंदोलन देखने को मिला था। उनकी मांगों में स्थायी कर्मचारियों के रूप में मान्यता दिये जाने और मानदेय के बदले 18,000 रुपये प्रति माह नियमित वेतन दिये जाने की मांगें शामिल थीं। यह राशि सातवें वेतन आयोग के मुताबिक़ केंद्र सरकार के कर्मचारियों को दिये जाने वाला शुरुआती वेतन मानदंड है। फिलहाल आशा कार्यकर्ता अपनी नियमित गतिविधियों के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत 2000 रुपये प्रति माह के मासिक मानदेय की हक़दार हैं।

ध्यान रहे कि साल 2018 से पहले ये सभी कार्यकर्ता केवल 1,000 रूपए मासिक पारिश्रमिक लेती थीं। इस मासिक मानदेय के अलावा इन्हें जननी सुरक्षा योजना, गृह आधारित नवजात शिशु देखभाल (HBNC), आदि जैसे अतिरिक्त कार्यों के आधार पर प्रोत्साहन राशि मिलती है। सरकारी खबरों के मुताबिक आशा कार्यकर्ताओं को महामारी के दौरान किये गये उनके सभी कार्यों के लिए उनके इस मासिक मानदेय 2,000 रुपये के अलावा उन्हें 1,000 रुपये की मामूली राशि का भी भुगतान किया गया है।

प्रदर्शनकारी आशाओं की मानेंं तो, 24 जून 2021 को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की निदेशक आशा कार्यकर्ताओं को प्रति माह 10,000 रुपये के मानदेय का प्रस्ताव देने और राज्य सरकार और यूनियनों को इस प्रस्ताव के भेजे जाने पर सहमत हुई थीं। उन्होंने इस शर्त पर सहयोगियों के मानदेय में बढ़ोत्तरी किये जाने का भी वादा किया था कि उनके कार्य दिवस 25 दिन से बढ़ाकर 30 दिन कर दिए जायेंगे। उन्होंने ड्यूटी के दौरान कोविड-19 के कारण मरने वाली आशा कार्यकर्ताओं के परिवारों को 50 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का भी वादा किया था। लेकिन बीते दो साल में इस पर सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। ऐसे में ये चुनावी साल इन आशा और ऊषा कार्यकर्ताओं के लिए भी बेहद अहम है।

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