Skip to main content
xआप एक स्वतंत्र और सवाल पूछने वाले मीडिया के हक़दार हैं। हमें आप जैसे पाठक चाहिए। स्वतंत्र और बेबाक मीडिया का समर्थन करें।

NFHS 5 : सरकार पोषण में आई उल्लेखनीय गिरावट से इनकार कर रही है

एनीमिया (ख़ून की कमी) में वृद्धि जैसी चिंताजनक स्वास्थ्य प्रवृत्तियों ने सरकार को परेशान कर दिया है, जिसने इस गंभीर संदेश पर ध्यान देने के बजाय संदेशवाहक (आईआईपीएस निदेशक) को ही दंडित करने का फैसला किया है।
malnutrition
प्रतीकात्मक तस्वीर।

नव-उदारवादी आर्थिक सुधारों के दौर में, पिछले तीन दशकों के दौरान, भारतीय आबादी के भीतर पोषक आहार सेवन करने की प्रवृत्ति धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से नीचे गई है। भारत में पोषण संबंधी सेवन पर पांच-वर्षीय राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) की रिपोर्ट में प्रति व्यक्ति कैलोरी के साथ-साथ प्रोटीन सेवन में गिरावट दर्ज की गई है (लेकिन वसा सेवन यानि फेट सेवन में वृद्धि हुई है, जो सबसे अधिक खर्च वाले समूह में आता है)।

पोषण में गिरावट सबसे पहले ग्रामीण भारत में शुरू हुई, बाद में शहरी क्षेत्र भी इसकी चपेट में आ गए हैं। हमारी आबादी के मामले में उर्जा और प्रोटीन का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत खाद्यान्न है, यानी अनाज और दालें हैं - जो खाद्यान्न का नौ से दसवां हिस्सा है – और ग्रामीण व्यक्ति को इससे ऊर्जा और प्रोटीन सेवन का औसत दो-तिहाई हिस्सा मिलता है।

नव-उदारवादी सुधारों के तीन दशक  के दौरान प्रति व्यक्ति अनाज की खपत इस हद तक गिर गई कि अब जब कई वर्षों से भारत ने उपभोग का स्तर जो दर्ज किया है (भोजन के रूप में अनाज का इस्तेमाल और पशु उत्पादों के उत्पादन के लिए चारे के रूप में अप्रत्यक्ष चारे दोनों को ध्यान में रखते हुए जैसे दूध, अंडे, पोल्ट्री मांस वगैरह की पैदावार की जाती है) वह अफ्रीका के स्तर से काफी नीचे और सबसे कम विकसित देशों के स्तर से नीचे आ गया है।

इसके अलावा, भोजन पर प्रति व्यक्ति वास्तविक खर्च (अर्थात्, सभी खाद्य पदार्थों पर प्रति व्यक्ति कम से कम खर्च, जिसे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से बाद के वर्षों को पहले के वर्षों की तुलना में कम करने के लिए घटाया जाता है) में भी दशकों से गिरावट आ रही है। अपर्याप्त स्तर से लेकर भोजन पर प्रति व्यक्ति कम खर्च, प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद की उच्च दर वाले देश के लिए बहुत अजीब है और यह अभूतपूर्व प्रवृत्ति, न केवल आय की असमानता में बल्कि पूर्ण पोषण संबंधी गरीबी में भी तेज वृद्धि को दर्शाती है। 

अर्थशास्त्रियों ने भारत में प्रति व्यक्ति भोजन खर्च पर तथा पोषण सेवन में लंबे समय से आ रही गिरावट को जायज़ ठहराने के लिए हर तरह के गुमराह करने वाले तर्क दिए हैं, जैसे कि मशीनीकरण के कारण ऊर्जा की कम जरूरत का होना, जनसंख्या की आयु संरचना में बदलाव आना, स्वाद में बदलाव और इसी तरह के अन्य कारण बताए हैं। उनके तर्क और कुछ नहीं बल्कि विशुद्ध रूप से सरकार का बचाव करने करते नज़र आते हैं, जब हम देखते हैं कि दुनिया में हर आबादी वाले विकासशील देश - जिनमें भारत की तुलना में समान जनसंख्या आयु संरचना और मशीनीकरण के उच्च स्तर वाले क्षेत्र शामिल हैं – वे भारतीयों की तुलना में काफी अधिक उपभोग करते हैं और उनमें पोषण संबंधी परिणाम बेहतर पाए जाते हैं। 

वर्ष 2019 के लिए संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) के नवीनतम आंकड़े हमें बताते हैं कि भारत में भोजन और चारे के रूप में प्रति व्यक्ति अनाज की खपत 171 किलोग्राम है, जबकि अफ्रीका में यह 190 किलोग्राम है, सबसे कम विकसित देशों में यह 205 किलोग्राम है, चीन और ब्राज़ील दोनों में 360 किग्रा (विश्व औसत 304 किग्रा से ऊपर है), और रूस में 407 किग्रा है। औद्योगिक उत्तर ने यूरोपीयन यूनियन में 494 किलोग्राम और अमेरिका में 590 किलोग्राम खपत दर्ज की गई है। ध्यान दें कि एफएओ डेटा खुद इकट्ठा नहीं करता है, बल्कि यह डेटा संबंधित देशों की सरकारें एफएओ को देती हैं। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि वैश्विक भूख सूचकांक में भारत 121 देशों में से सबसे निचले स्थान यानि 107वें पायदान पर पहुँच गया है।

एनएसएस रिपोर्ट, घरेलू उपभोक्ता व्यय 2017-18 के प्रमुख संकेतक, पिछले साल सार्वजनिक रूप से सुलभ डोमेन में संक्षेप में ऑनलाइन उपलब्ध थे और इसमें पहली बार 2011 की तुलना में सभी वस्तुओं और सेवाओं पर प्रति व्यक्ति वास्तविक खर्च में गिरावट देखी गई थी, जो प्रति व्यक्ति वास्तविक खाद्य व्यय में दशकों से चली आ रही गिरावट से ऊपर थी। जनता को इस महत्वपूर्ण जानकारी से वंचित करने के लिए सरकार ने इसे तुरंत हटा दिया था। 

यही है सबसे हालिया और विचित्र घटनाक्रम की पृष्ठभूमि, जिसमें सरकार ने कथित तौर पर इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंसेज, मुंबई के निदेशक को 'निलंबित' कर दिया है, जो स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन आते है। संस्थान समय-समय पर राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) भी करता है।

2019-21 से संबंधित सर्वेक्षण की पांचवीं रिपोर्ट में 2015-16 से संबंधित चौथी रिपोर्ट की गर तुलना की जाए खासकर बच्चों और महिलाओं के मामले में तो कुछ स्वास्थ्य संकेतकों में काफी गिरावट देखी गई है। ऐसा लगता है कि इसने सरकार को परेशान कर दिया है, जिसने इस गंभीर संदेश पर ध्यान देने के बजाय उस संदेशवाहक को ही दंडित करने का अतार्किक निर्णय लिया है, जो ईमानदार शिक्षाविद है।

स्वास्थ्य के कई संकेतक केवल पोषण पर निर्भर नहीं होते हैं, इनमें सुरक्षित जल आपूर्ति, रोग फैलाने वाले मच्छरों, घोंघे और कृमि पर नियंत्रण, सुरक्षित अपशिष्ट निपटान और सामुदायिक स्वास्थ्य देखभाल जैसे नागरिक उपायों के माध्यम से भी सुधार किया जा सकता है। अन्य देशों की तरह, भारत ने भी कई संकेतकों पर बहुत धीमी गति से ही सही, प्रगति दर्ज की है। लेकिन अन्य संकेतक काफी हद तक पोषण की स्थिति पर निर्भर होते हैं और जब पोषण का सेवन कम हो रहा होता है तो स्थिति खराब होना लाज़िमी है।

2015-16 के पिछले एनएफएचएस 4 की तुलना में एनएफएचएस 5, 2019-21 में शिशु और बाल मृत्यु दर में गिरावट जारी है, हालांकि पहले के वर्षों की तुलना में इसकी दर कम है।  लेकिन बच्चों और वयस्कों दोनों में एनीमिया यानि खून की कमी की घटनाएँ, जो पहले से ही बहुत अधिक थीं, इस अवधि में और अधिक बढ़ गईं हैं। जबकि 2015-16 में 59 प्रतिशत बच्चे (6 महीने से 59 महीने की उम्र के नमूने) एनीमिया से पीड़ित थे, 2019-21 तक यह बढ़कर 67 प्रतिशत हो गया है।

इसमें विशेष रूप से परेशान करने वाली बात यह है कि मध्यम से गंभीर एनीमिया की घटनाएँ 30.6 प्रतिशत से बढ़कर 38.1 प्रतिशत हो गईं है, जबकि हल्के एनीमिया की घटनाएँ दो तारीखों में 28.4 प्रतिशत और 28.9 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रहीं हैं।

इसी अवधि में वयस्कों, विशेषकर महिलाओं में एनीमिया की घटनाओं में भी वृद्धि दर्ज की गई है। महिलाओं में (49 वर्ष की आयु तक) वृद्धि 53 प्रतिशत (जिनमें से 28.4 प्रतिशत  मध्यम से गंभीर एनीमिया की थी) थी, बाद की तारीख में यह 57 प्रतिशत हो गई (जिनमें से 31.4 प्रतिशत मध्यम से गंभीर एनीमिया की थी)।

फिर, तीन-चौथाई वृद्धि मध्यम से गंभीर एनीमिया में की थी। पुरुषों में (नमूना: 49 वर्ष की आयु तक) घटना बहुत कम थी, जो 23 प्रतिशत से बढ़कर 25 प्रतिशत हो गई, इसके भीतर मध्यम से गंभीर एनीमिया, 5 प्रतिशत से बढ़कर 8 प्रतिशत हुआ और हल्के एनीमिया श्रेणी में थोड़ी गिरावट आई है।

ग्रामीण बच्चों और वयस्कों में औसत से अधिक एनीमिया की घटना देखी गई है और   एनीमिया से पीड़ित माताओं के बच्चों में एनीमिया होने का खतरा अधिक पाया गया है। एक जिम्मेदार सरकार से अपेक्षा तो यही की जाती है कि वह इन प्रतिकूल प्रवृत्तियों को दूर करने के लिए कदम उठाए, न कि इनसे एकदम इनकार कर दे।

बाल पोषण संकेतक भी अपेक्षा से अधिक खराब थे। 2015-16 में 5 साल से कम उम्र के 36 प्रतिशत और 38 प्रतिशत बच्चे क्रमशः कम वजन (उम्र के हिसाब से कम वजन) और बौनेपन (उम्र के हिसाब से कम ऊंचाई) के पाए गए, 2019-21 तक इन आंकड़ों में मामूली कमी आई है- जो 32 प्रतिशत और 36 प्रतिशत जबकि वेस्टिंग (ऊंचाई के लिए कम वजन) से प्रभावित प्रतिशत भी 21 से मामूली रूप से गिरकर 19 हो गया है। लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर मामूली सुधार के ये समग्र आंकड़े, बिगड़ते बाल पोषण संकेतकों का परिणाम हैं। हालाँकि 2015-16 में बड़ी संख्या में राज्यों में जहां औसत अभाव मूल्य औसत से कम था, वहां कुछ हद तक, साथ ही उन पांच राज्यों में काफी सुधार हुआ, जहां प्रारंभिक मूल्य ऊंचे थे। जिन  राज्यों ने बाल कुपोषण में थोड़ी वृद्धि दर्ज की है, उन्हें प्रतिकूल प्रवृत्ति से निपटने के लिए  उपाय करने की जरूरत है, भले ही वे भारत में सबसे कम स्तर दर्ज कर रहे हों।

हाल ही में, केंद्र सरकार ने एक नया सूचकांक जारी करके 'गरीबी में भारी गिरावट' का दावा किया है, जिसका अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर पिछले 70 वर्षों से समझी और मापी गई गरीबी से कोई लेना-देना नहीं है। यह सूचकांक किसी परिवार की आधुनिक सुविधाओं की विभिन्न वस्तुओं (जैसे पाइप से पानी, बिजली, गैर-फूस की झोपड़ी, क्लिनिक और बैंक खाते, भले ही खाते में पैसा न हो) के आधार पर एक औसत निकालता है और 'पोषण' को सुचकांक में केवल एक-छठे हिस्से का वजन दिया गया है। इसके अलावा पर्याप्त 'पोषण' की परिभाषा बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) 18.8 से कम न होने तक ही सीमित कर दी गई है। इस 'गरीबी' सूचकांक के आधार पर, औद्योगिक रूप से उन्नत पूंजीवादी समाजों में कोई भी गरीबी नहीं पाई जाएगी। 

भारत में, जहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा, चाहे वह ग्रामीण हो या शहरी, पोषण से वंचित है और समय के साथ यह कमी बढ़ती जा रही है, वयस्कों के लिए बॉडी मास इंडेक्स का संकेतक, जो एक अनुपात है, को संदेह की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। हमारे सामने ऐसी स्थिति है जहां वर्तमान वयस्क आबादी का एक बड़ा हिस्सा कम वजन का और उम्र के हिसाब से कम लंबाई/ऊंचाई वाला है। वर्तमान में वयस्क स्टंटिंग या कम वजन की स्थिति के लिए कोई सूचकांक लागू नहीं किया जा रहा है।

बॉडी मास इंडेक्स, जिसे मीटर में वर्ग ऊंचाई से विभाजित किलोग्राम में वजन के रूप में परिभाषित किया गया है, लाखों कुपोषित लोगों को मूल्यों की एक 'सामान्य' सीमा में दिखाएगा, क्योंकि दोनों में मीटर और विभाजक स्वस्थ आबादी में होने की तुलना में कम हैं। 

कथित तौर पर भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद वयस्कों के लिए पोषण सेवन के निम्न मानदंड तैयार करने में व्यस्त है। राजनीतिक शक्ति का गलत इस्तेमाल करके शैक्षणिक ईमानदारी को किस हद तक कमजोर किया जा सकता है, यह कम से कम चिंताजनक मामला है।

पाठकों को यह चेतावनी देने तार्किक होगा कि जल्द ही सरकार भारत में 'शून्य गरीबी' का दावा कर सकती है, जिन्हे इन हेरफेर के ज़रिए नए सूचकांकों को लागू करके हासिल किया जा सकता है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:

NFHS 5: Govt in Denial on Marked Decline in Nutritional Intake

अपने टेलीग्राम ऐप पर जनवादी नज़रिये से ताज़ा ख़बरें, समसामयिक मामलों की चर्चा और विश्लेषण, प्रतिरोध, आंदोलन और अन्य विश्लेषणात्मक वीडियो प्राप्त करें। न्यूज़क्लिक के टेलीग्राम चैनल की सदस्यता लें और हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित हर न्यूज़ स्टोरी का रीयल-टाइम अपडेट प्राप्त करें।

टेलीग्राम पर न्यूज़क्लिक को सब्सक्राइब करें

Latest