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मुद्दा: वास्तव में कैसा होगा हिंदू राष्ट्र?

एक हिंदू राज एकाधिकारवादी पूंजी की तानाशाही के सिवा और कुछ नहीं हो सकता है।
PM Modi with industrialists
प्रतीकात्मक तस्वीर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के प्रमुख उद्योगपतियों के साथ। (फ़ाइल फ़ोटो)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का लक्ष्य भारत में एक ‘‘हिंदू राष्ट्र’’ की स्थापना करना है। लेकिन, हिंदू राष्ट्र का ठीक-ठीक अर्थ क्या है?

इस सवाल का स्वत:स्पष्ट और तुरंत आने वाला उत्तर तो यही होगा कि वर्तमान भारतीय राष्ट्र में सभी नागरिकों के लिए, उनका धर्म चाहे कोई भी क्यों न हो, बराबरी की जो संविधान के जरिए गारंटी की गयी है उसकी जगह पर, हिंदू राष्ट्र में हिंदुओं को अन्य धर्मों के लोगों के मुकाबले और खासतौर पर मुसलमानों के मुकाबले, जो इस देश में सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय हैं, उच्चतर दर्जा दिया जाएगा। 

लेकिन, इस तरह की गैर-बराबरी को एक विशेष रूप से दमनकारी राज्य के बिना तो चलाते नहीं रहा जा सकता है। वैसे तो वर्गीय-दमनकारी समाज में हरेक राज ही दमनकारी होता है, लेकिन उस राज्य को जो इस तरह की असमानता को संस्थागत रूप देने का काम करेगा, उसे तो और भी खासतौर पर दमनकारी होने की जरूरत होगी। 

तब क्या हिंदू राष्ट्र का मतलब, सामूहिक रूप से हिंदुओं की तानाशाही होगी, जिसे अन्य धर्मों को मानने वालों पर चलाया जाएगा।

जैसे ही यह सवाल उठाया जाता है, फौरन ही जवाब आता है– ‘‘नहीं’’। हिंदू राज में भी एक रिक्शाचालक तो रिक्शाचालक ही रहेगा, उसका धर्म चाहे जो भी क्यों न हो। हिंदू राज में एक चपरासी तो चपरासी ही रहेगा, उसका धर्म चाहे जो भी हो। हिंदू राज में एक गिग वर्कर तो गिग वर्कर ही रहेगा, भले ही उसका धर्म कुछ भी हो। इस तरह, तथाकथित हिंदू राज हिंदुओं के बहुमत की लौकिक जिंदगी में कोई बदलाव लाने का न तो वादा करता है और न ऐसा बदलाव लाएगा। 

लेकिन, तब सवाल यह है कि इस तरह के राष्ट्र में अनिवार्य रूप से जो तानाशाही का राज चल रहा होगा, वह किस के हितों को साध रहा होगा? 

इस सवाल का स्वत:स्पष्ट उत्तर है--इजारेदार पूंजी यानी एकाधिकारवादी पूंजी (monopoly capital) के ही हित साध रहा होगा। इसके नाम से जो छवि बनती है उसके विपरीत, एक हिंदू राज इजारेदार पूंजी की तानाशाही के सिवा और कुछ नहीं हो सकता है।

हिंदू राज या अडानियों अंबानियों की तानाशाही

बेशक, ऐसे हिंदू राज में शासकीय आयोजनों पर हिंदू कर्मकांड और हिंदू धार्मिक आचारों का लेप चढ़ाया जाएगा। इसमें भी शक नहीं कि ऐसे राज में नौकरियों के लिए चयन में अन्य धर्मों के मानने वालों के मुकाबले हिंदुओं का वरीयता दी जाएगी। लेकिन, ऐसे राज में भी नयी नौकरियां तो न सिर्फ वैसे ही दुर्लभ होंगी जैसे कि आज दुर्लभ हैं बल्कि कारपोरेटों के कृत्रिम मेधा (एआई) को उपयोग में लाने के चलते, आज जो नौकरियां हैं भी, उनमें से बहुत सी गायब हो जाएंगी। 

इस तरह, इसमें शक नहीं कि ऐसे राज में मुसलमानों को तथा अन्य अल्पसंख्यक धार्मिक समूहों के लोगों को बहुत भारी तथा बहुपरतीय उत्पीड़नों को झेलना पड़ेगा, लेकिन ऐसे राज में हिंदुओं को भी अपनी पीड़ा में कोई कमी महसूस करने का मौका नहीं मिलेगा। 

दूसरी ओर, एक वर्ग जिसकी ताकत ऐसे राज में बहुत बढ़ जाएगी, वह है इजारेदार पूंजीपति वर्ग। और इस वर्ग के अंदर भी इजारेदार पूंजीपतियों के नये समूह की ताकत विशेष रूप से बढ़ जाएगी। 

दूसरे शब्दों में हिंदू राज एक ऐसा राज होगा जिसमें आम तौर पर बड़े भारतीय कारपोरेट राज करेंगे और खासतौर पर अडानियों और अंबानियों का राज होगा।

यह 1930 के दशक के जर्मनी की याद दिलाता है। वहां भी नाजियों का दावा यही था कि वे ‘‘गैर-आर्य’’ आबादियों, जैसे यहूदियों (नाजियों का मानना था कि कोई व्यक्ति ‘‘आर्य यहूदी’’ तो हो ही नहीं सकता था) और जिप्सियों या बंजारों (उसी तरह से नाजियों के हिसाब से ‘‘आर्य जिप्सी’’ भी हो ही नहीं सकता था) का उत्पीड़न करने के जरिए, ‘‘ आर्य श्रेष्ठता’’ को स्थापित कर रहे थे। 

बहरहाल, नाजी राज कोई ‘‘आर्य राज’’ नहीं था। इस राज ने जो तानाशाही कायम की थी, 1935 में हुई कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की सातवीं कांग्रेस में, उसके अध्यक्ष जॉर्जी दिमित्रोव के संबोधन के शब्दों में--‘‘वित्तीय पूंजी के सबसे प्रतिक्रियावादी, सबसे संकीर्णतावादी और सबसे साम्राज्यवादी तत्वों की खुल्लमखुल्ला आतंकी तानाशाही थी।’’

इजारेदार पूंजी की प्रत्यक्ष तानाशाही क्यों?

किसी राज की पहचान उसे चलाने वालों की पहचान से करना, कोई जरूरी नहीं है कि उस राज की सच्ची पहचान कराता हो। पूछने वाला असली सवाल यह होता है कि वह कौन सा वर्ग है जो अपने ही स्वार्थों को आगे बढ़ाने के लिए संबंधित राज का इस्तेमाल करता है। और आज के जमाने में जितने भी राज किसी खास एथनिक या धार्मिक या भाषायी समूह के हितों को आगे बढ़ाने का दावा करते हैं और इसके लिए जनतंत्र के पर कतरते हैं तथा अन्य समुदायों को दूसरे दर्जे के नागरिक बनाकर रखते हैं, वास्तव में इजारेदार पूंजी के ही स्वार्थों को आगे बढ़ाते हैं। वे ऐसा करते हैं, इजारेदार पूंजी की तानाशाही कायम करने और एथनिक, धार्मिक या भाषायी आधार पर मेहनतकश जनता को बांटने के जरिए।

एक आधुनिक, बहु-सामुदायिक समाज में, किसी एक समुदाय या समूह का राज थोपा जाना, वास्तव में इजारेदार पूंजी की तानाशाही थोपा जाना ही होता है।

यह सवाल किया जा सकता है कि आखिरकार, वर्तमान ‘‘धर्मनिरपेक्ष’’ राज में भी तो इजारेदार पूंजी का ही बोलबाला होता है। तब इजारेदार पूंजी को अपनी तानाशाही के मूर्त रूप के तौर पर एक ऐसे नये तथा पूरी तरह से भिन्न, हिंदू-श्रेष्ठतावादी राज की और इसलिए ऐसे राज के कायम होने में मदद करने की जरूरत ही क्या है? जाहिर है कि इस तरह के बदलाव की जरूरत तभी होती है, जब राज्य के पहले वाले रूप के लिए गंभीर खतरा पैदा हो जाता है। और यह होता है ऐसे दौर में जब अर्थव्यवस्था गत्यावरोध की शिकार हो जाती है और बेरोजगारी बहुत बढ़ जाती है। 

हिंदू राज के नाम पर, इस समय इजारेदार पूंजी की तानाशाही की दिशा में जो आगे बढ़ा जा रहा है, नव-उदारवादी निजाम के बंद गली में जा फंसने को ही दिखाता है, जहां यह निजाम अर्थव्यवस्था में गत्यावरोध तथा  बढ़ी हुई बेरोजगारी ले आया है और मेहनतकश जनता की विशाल संख्या के लिए भारी बदहाली लाया है।

विभाजन ध्यान बंटाए इजारेदार तानाशाही चलाए

जनतंत्र, मेहनतकश जनता को प्रतिरोध और संघर्ष करने के लिए ज्यादा गुंजाइश देता है। इसीलिए, संकट के हरेक दौर में, जनतंत्र को कतरने की कोशिशें की जाती हैं। इसका मकसद होता है, इजारेदार पूंजी के वर्चस्व के लिए खतरों पर अंकुश लगाकर रखना। लेकिन, जब संकट लंबा चल रहा हो और उसके वर्चस्व के लिए खतरा लगातार बना रहे, तो इजारेदार पूंजी और ज्यादा अतिवादी कदम उठा लेती है। अब वह ऐसी किसी भी ताकत के साथ गठजोड़ कर लेती है, जो जनता को बांटने में सबसे ज्यादा सक्षम हो। इसके जरिए एक वैकल्पिक ध्यान बंटाऊ विमर्श पैदा किया जाता है, ताकि मेहनतकश जनता को एकजुट संघर्ष छेड़ने से रोका जा सके और एक संकीर्णतावादी राज कायम करने के नाम पर, जनतंत्र को कतरा जा सके। भारतीय संदर्भ में इसी का नाम हिंदू राज है।

भाजपा-आरएसएस के विमर्श की ध्यान-बंटाऊ प्रकृति आज पूरी तरह से स्वत:स्पष्ट है। आज, जब देश की श्रम शक्ति, खास तौर पर युवा श्रम शक्ति, बेरोजगारी के बोझ के नीचे दबी हुई है और शिक्षितों के बीच बेरोजगारी का अनुपात बहुत ही ज्यादा है, इस ज्वलंत समस्या पर कहने के लिए देश के शासकों के पास एक शब्द तक नहीं है। इसके बजाए वे गला फाड़कर बांग्लादेश से घुसपैठ का शोर मचा रहे हैं! विडंबना यह है कि चूंकि भाजपा खुद यह मानती है कि किसी देश का प्रतिव्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद ही उसकी प्रगति का सही सूचक होता है और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के हिसाब से बांग्लादेश की प्रतिव्यक्ति आय इस समय भारत से ज्यादा है यानी उसे भारत से ज्यादा उन्नत माना जाना चाहिए। तब भाजपा जिस तरह की भारी घुसपैठ का दावा कर रही है, वैसी घुसपैठ एक कम ज्यादा उन्नत देश से, कम उन्नत देश में क्योंकर हो सकती है?

उदारवादी विचार के लोग पिछले कुछ समय से इसकी व्याख्या करने की कोशिश करते आ रहे हैं कि पिछले कुछ समय में भारत में हिंदुत्व का ऐसा उभार क्यों आया है। लेकिन, उदारवादी विचार इस का ध्यान रखने में विफल रहता है कि भारत में हिंदुत्व का उभार, दुनिया भर में नव-फासीवाद के उभार का हिस्सा है। इसलिए, उसके उभार की कोई भी सिर्फ भारत-विशिष्ट व्याख्या पर्याप्त नहीं होगी। दूसरे शब्दों में हिंदुत्व का यह उभार एक खुसूसी या स्थानिज परिघटना नहीं है। बहुत हद तक इसे भारत में भी वित्तीय तथा मीडियाई मदद के जरिए, इजारेदार पूंजी द्वारा उसी तरह से उकसाया गया है, जिस तरह से अर्जेंटीना से अमेरिका, इटली, फ्रांस, जर्मनी तथा यूके आदि तक में उकसाया गया है। और यह नव-उदारवादी पूंजीवाद द्वारा विश्व अर्थव्यवस्था को बंद गली में पहुंचा दिए जाने की पृष्ठभूमि में हो रहा है।

कॉरपोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ के वास्तुकार बने मोदी

आरएसएस ने पिछले ही दिनों अपनी शताब्दी मनायी। आज वह अचानक खुद को सत्ता में बैठा पा रहा है, जबकि सौ साल तक वह सत्ता के आस-पास भी नहीं पहुंच पाया था। इतना ही नहीं वह अपने ‘‘दुनिया की सबसे धनी राजनीतिक पार्टी’’ होने की शेखी भी मार सकता है। यह सब इस समय उसे इजारेदार पूंजी से मिल रहे भारी समर्थन का ही नतीजा है।

लेकिन, ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ इजारेदार पूंजी ने ही हिंदुत्व के प्रति समर्थन का रुख अपना लिया हो। हिंदुत्ववादी तत्वों ने भी इजारेदार पूंजी के प्रति अपने रुख को बदला है। 

पहले आरएसएस का मुख्य समर्थन आधार दुकानदारों, छोटे पूंजीपतियों और शहरी मध्य वर्ग के बीच ही हुआ करता था और उसे कुछ सामंती तत्वों की वित्तीय सहायता भी हासिल हुआ करती थी। बेशक, जर्मनी के विपरीत जहां नाजियों ने सत्ता में आने से पहले प्रकटत: एक इजारेदारी-विरोधी रुख अपनाए रखा था, आरएसएस ने कभी इजारेदार-विरोधी बोली बोलना मंजूर नहीं किया था, फिर भी आरएसएस सिर्फ इजारेदार पूंजी परस्त भी नहीं रहा था। पहले हिंदुत्ववादी खेमे में आर्थिक नीति के संबंध में वैकल्पिक स्वर भी हुआ करते थे, हालांकि आर्थिक नीति अपने आप में हिंदुत्ववादी ताकतों की खास चिंता का विषय कभी भी नहीं रही थी।

नरेंद्र मोदी का योगदान इस सब को बदल देने में ही है। हिंदुत्व के पदानुक्रम में उनका महत्व इसी में है कि नरेंद्र मोदी कॉरपोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ के वास्तुकार बन गए हैं। और यह गठजोड़ कायम करने के बल पर ही हिंदुत्व सत्ता में आया है। 

वास्तव में नरेंद्र मोदी को देश के प्रधानमंत्री के पद के लिए आगे बढ़ाए जाने का विचार ही, गुजरात में ‘‘इन्वेस्टर समिट’’ में पूंजीपतियों के एक जमावड़े में पेश किया गया था, जो कि तब की बात है जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। बदले में नरेंद्र मोदी इजारेदार पूंजी के और उसमें भी खासतौर पर इस पूंजी के नवोदित या नौसिखिया तत्वों के बेझिझक, कुछ भी करने को तैयार, प्रमोटर बन गए। इस प्रक्रिया में वह अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के भी प्रमोटर बन गए, जिसके साथ नव-उदारवादी दौर में भारतीय इजारेदाराना पूंजी ने खुद को एकाकार कर लिया था। नव-उदारवादी पूंजीवाद के गत्यावरोध के दौर में, अपने नव-फासीवादी एजेंडा के साथ मोदी, भारतीय इजारेदार पूंजी के लिए एक खासतौर पर उपयोगी परिसंपत्ति बन गए हैं।  

(लेखक दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र में प्रोफ़ेसर एमेरिटस हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

मूल रूप से अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

What Does Hindu Rashtra Mean?

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