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राजस्थान: सचिन पायलट को ‘अनशन’ से क्या मिलेगा?

चुनाव के कुछ महीने पहले राजस्थान कांग्रेस में एक बार फिर कलह देखने को मिल रही है। सचिन पायलट अपनी ही सरकार को घेरने का एक भी मुद्दा नहीं छोड़ रहे हैं।
Sachin Pilot
फ़ोटो साभार: PTI

राजस्थान में रेगिस्तान का जहाज कहे जाने वाला ऊंट और यहां कि सियासत में ज़्यादा फर्क नहीं है, अपना वक्त पूरा हो जाने पर करवट ले ही लेते हैं...। अब पिछले कुछ दशकों को ही उठाकर देख लीजिए, सत्ता में कभी भाजपा, तो कभी कांग्रेस। यानी अगर कहें कि एक पार्टी ठीक से टिककर काम कर ले तो असंभव ही लगता है।

अब जब राजनीतिक करवट का वक्त एक बार फिर नज़दीक है, तब सत्ता में बैठी कांग्रेस इस कोशिश में है, कि जैसे बैठे हैं वैसे ही बैठे रहें। लेकिन दूसरी ओर विपक्षी भाजपा पूरा ज़ोर लगा रही है सत्ता की दिशा को बदल देने के लिए।

अब चुनाव से पहले यहां भाजपा थोड़ा ही सही लेकिन जीतती दिखाई दे रही है। क्यों?

क्योंकि सत्ताधारी कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हैं जो कुर्सी छोड़ने के लिए तैयार नहीं है, और पार्टी के ही दूसरे बड़े नेता सचिन पायलट उन्हें उतारकर ख़ुद बैठने के बजाय मानना चाहते नहीं हैं।

पायलट और गहलोत की इस रस्साकशी में कई बार तो अशोक गहलोत गिरते-गिरते बचे, लेकिन आखिर में बचे ही रहे, और सचिन पायलट राजस्थान से दिल्ली तक सिर्फ चक्कर ही काटते रह गए।

यही कारण है कि इस बार सचिन पायलट ने अपने निशाने पर सिर्फ अशोक गहलोत की तस्वीर नहीं बनाई, बल्कि आलाकमान और गांधी परिवार के नाम की लकीरें भी खींच दी।

हम ऐसा क्यों कह रहे हैं...क्योंकि?

जब सचिन पायलट राजस्थान में अनशन पर बैठे, तब उनके पीछे जो पोस्टर था, उसमें न तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की तस्वीर थी, न पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की तस्वीर थी, न राहुल गांधी, न प्रियंका और न सोनिया गांधी।

इस पोस्टर में दिख रहे थे तो महात्मा गांधी। और दूसरी जो तस्वीर चौंकाने वाली थी, वो थी ज्योतिबा फूले की। जिसका क्या संदेश हो सकता है, विस्तार से समझेंगे।

इन सबके बीच ये जानना बेहद ज़रूरी है कि सचिन पायलट आख़िर अनशन पर बैठ क्यों गए?

अभी जो रविवार गुज़रा है, यानी 9 अप्रैल को। सचिन पायलट ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी, जिसमें उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और वर्तमान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर सियासी मिलीभगत के आरोप मढ़ दिए। सचिन ने बताया कि वसुंधरा राजे जब मुख्यमंत्री थीं, तब उनके कार्यकाल में कई घोटाले हुए, जिसकी जांच के लिए वो दो बार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पत्र लिख चुके है, लेकिन कोई संज्ञान नहीं लिया जा रहा है। इसे लेकर ही मैं अनशन करने जा रहा हूं।

अब ज़ाहिर है, कि सचिन पायलट की ओर से तैयार की गई पूरी फिल्म का ये एक दृश्य मात्र है, क्योंकि कहानी का असल अंत तो वो ख़ुद को मुख्यमंत्री बनने पर ही करना चाहते हैं। इस कहानी का अनशन वाला दृश्य शुरु होने वाला ही था, कि राजस्थान के कांग्रेस प्रभारी रंधावा ने पत्र जारी कर दिया, और कहा कि सरकार के ख़िलाफ इस अनशन को अनुशासनहीनता माना जाएगा।

लेकिन पायलट कहां मानने वाले थे, वो बैठ गए अनशन पर। और अनशन के वक्त सचिन पायलट के चेहरे पर न रंधावा के पत्र का असर दिख रहा था, न आलाकमान के मन में तैयार हो रहे सवालों का डर।

भष्टाचार, भाजपा के खिलाफ प्रदर्शन तो ठीक है, लेकिन सवाल ये खड़ा होता है कि सचिन पायलट के पोस्टर में आलाकमान क्यों नहीं था?

कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और राहुल गांधी। ये वो नाम हैं, जो कांग्रेस के छोटे या बड़े कार्यक्रमों का प्रमुख चेहरा होते हैं। लेकिन सचिन ने अपने पोस्टर से इनको हटाकर सभी को चौंका दिया। सिर्फ चौंका ही नहीं दिया, बल्कि आलाकमान को ये चेतावनी भी दे दी कि चुनाव से पहले अगर मुख्यमंत्री नहीं बदला गया, या फिर अगले चुनाव के लिए उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं घोषित किया गया तो वो बड़ा कदम उठाने से चुकेंगे नहीं।

और आलाकमान को खूब बेहतर पता है कि अशोक गहलोत के अलावा सचिन पायलट का राजस्थान में अपना रुतबा और वोट बैंक है। यहां तक सरकार बनाने में उनके समर्थित विधायकों का भी बड़ा योगदान है।

पायलट के पीछे जो पोस्टर था, उसमें महात्मा गांधी और ज्योतिबा फूले की तस्वीर ही क्यों थी?

क्योंकि सचिन पायलट भ्रष्टाचार के मुद्दे का सहारा लेकर अनशन पर बैठे थे, ऐसे में महात्मा गांधी को वो भ्रष्टाचार से लड़ने का सिबंल बनाकर पेश करना चाह रहे थे, हालांकि मुख्य तौर पर ध्यान खींचा ज्योतिबा फूले ने। जिन्हें पुष्प अर्पित कर सचिन पायलट ने अपने अनशन की शुरुआत की थी। आपको पता ही होगा कि ज्योतिबा फुले हमेशा से दलितों और शोसितों के लिए लड़ाई लड़ते रहे हैं, उन्होंने हमेशा पिछड़ी जातियों को उनका हक दिलाने का बीड़ा उठाया है।

फिर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि राजस्थान में मायावती की बसपा की 6-7 सीटें हमेशा से आती ही रही हैं। यानी यहां ये कहा जा सकता है कि दलितों का एकमुश्त वोट अगर इकट्ठा किया जाए तो इसमें कामयाबी मिल सकती हैं, फिर दूसरी ओर जाटों में सचिन पायलट की अच्छी पकड़।

अब ज्योतिबा फुले की तस्वीर को यहां से यूं समझें कि सचिन पायलट की बगावत बढ़ती है, और वो पार्टी छोड़ने पर विचार करते हैं, तो एक नया दल बना सकते हैं, जिसमें उनकी राजनीति सीधे तौर पर प्रदेश के पिछड़ा वर्ग और अति पिछड़ा वर्ग को मुख्य धारा में रखकर कल्पना की जा सकती है, जिसमें उन्हें बसपा का साथ भी बखूबी मिल सकता है।

हां ये कहना भी ग़लत नहीं होगा कि अगर ऐसा होता है तो भाजपा और कांग्रेस के वोटों में सेंधमारी ज़रूर होगी।

इन सबके बाद कुल जमा बात ये जान लेना बहुत ज़रूरी है कि सचिन पायलट की आख़िर मांगें क्या-क्या हैं?

सचिन पायलट के हिसाब से देखें तो वो फिलहाल अनशन तो वसुंधरा राजे के कार्यकाल में हुए कथित भ्रष्टाचार की जांच कराने और कार्रवाई करने की मांग को लेकर कर रहे हैं। जिसमें वसुंधरा सरकार में खान महाघोटाला, भ्रष्टाचार, 90 बी घोटाला, बजरी, खनन माफिया समेत कई घोटाले को कांग्रेस ने चुनाव में मुद्दा बनाया था। इस मसले पर गहलोत ने ही कहा था कि कांग्रेस सरकार आएगी तो जांच करवाएंगे, आरोपी जेल में होंगे, लेकिन जांच नहीं की जा रही। पायलट ने कहा कि राजस्थान में अवैध खनन, बजरी माफिया, शराब माफिया मामले में भी कार्रवाई की बात कही गई थी। लेकिन पायलट की केवल ये ही मांग नहीं है बल्कि गहलोत और वसुंधरा राजे की मिली भगत को भी उजागर करना चाहते हैं।

दरअसल पायलट मुख्यमंत्री गहलोत की भाजपा नेता वसुंधरा राजे के बीच की राजनीतिक नजदीकियों से वाकिफ हैं, कहा जाता है कि पिछली बार गहलोत सरकार गिराने की पायलट की कोशिश नाकाम करने में वसुंधरा की अघोषित मदद का महत्वपूर्ण हाथ था, इसके अलावा उनकी डिमांड ये भी है कि पैरेलल बैठक करने और स्पीकर को कांग्रेस विधायकों ने सामूहिक इस्तीफे देने के मामले में भी पार्टी कार्रवाई करे। मांग ये भी है कि अनुशासहीनता के आरोपी मंत्री महेश जोशी, शांति धारीवाल और धर्मेंद्र राठौड़ पर एक्शन लिया जाए। इसके अलावा पायलट की सियासी ख्वाहिश मुख्यमंत्री बनने की है ही।

पायलट जो चाहते हैं वो उन्हें मिल क्यों नहीं रहा? इसके लिए एक नज़र गहलोत और पायलट के बीच अदावत पर डाल लेते हैं...

पायलट और अशोक गहलोत के बीच सियासी वर्चस्व की ये जंग 2018 के चुनाव के बाद से ही चली आ रही है, नवंबर 2018 में जब विधानसभा चुनाव हुए तब सचिन पायलट प्रदेश अध्यक्ष थे। क्योंकि कांग्रेस ने राजस्थान जीत लिया था, और सबसे बड़ी पार्टी बन गई थी, तो मुख्यमंत्री पद के लिए भी अशोक गहलोत और सचिन पायलट अड़ गए। पायलट का तर्क था कि वो कांग्रेस अध्यक्ष हैं, और पांच सालों तक भाजपा के खिलाफ संघर्ष किया है, इसलिए मुख्यमंत्री की कुर्सी उन्हें ही मिलनी चाहिए। जबकि अशोक गहलोत ज्यादा विधायकों का अपने पक्ष में समर्थन होने और वरिष्ठता के आधार पर अपना हक जता रहे थे। तो इस पूरी तकरार में अशोक गहलोत जीत गए। इसके बाद दावा किया जाने लगा कि मुख्यमंत्री के लिए ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला तय हुआ था, जिसने मनमुटाव और बढ़ा दिया। जुलाई 2020 में पायलट ने कुछ कांग्रेस विधायकों के साथ मिलकर बगावत भी कर दी थी, जुलाई 2020 को सचिन पायलट को प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और डिप्टी सीएम पद से बर्खास्त कर दिया गया। हालांकि बाद में प्रियंका गांधी के दखल के बाद पायलट की नाराजगी दूर हुई।

गहलोत का पीछा क्यों नहीं छोड़ पा रही है कांग्रेस?

अशोक गहलोत पार्टी के उन नेताओं में है, जिन्होंने राजीव गांधी के साथ भी काम किया है, और हमेशा से गांधी परिवार के वफादार रहे हैं। पार्टी के भीतर उनके कद का अंदाज़ा का इस बात से भी लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए भी उनके नाम की चर्चा ख़ुद आलाकमान ने की। ये बात और है कि वो राजस्थान छोड़ना नहीं चाहते।

इसके अलावा अशोक गहलोत का राजस्थान में जनाधार, राजनीतिक रणनीतियों में मंझा होना भी आलाकमान को उनकी ओर झुका ही देता है। हाल ही में देखने को मिला था जब सचिन पायलट बग़ावत पर उतर आए थे, तब उन्होंने पायलट समर्थित विधायकों के हस्ताक्षर भी अपने पक्ष में दिखा दिए थे।

इसके अलावा पिछले कुछ साल कांग्रेस के लिए ऐसे रहे कि पार्टी को वो बड़े-बड़े नेता दूर हो गए, जो जड़ से कांग्रेसी रहे हैं। चाहे गुलाम नबी आज़ाद हों, ज्योतिरादित्य सिंधिया हों, आरपीएन सिंह हों, जितिन प्रसाद हों या कैप्टन अमरिंदर सिंह।

ऐसे में कांग्रेस ये नहीं चाहेगी कि अशोक गहलोत की नाराज़गी राजस्थान चुनाव से पहले जोखिम भरा कारण बन जाए। फिर हाल ही में अशोक गहलोत द्वारा शुरु की गई कुछ योजनाएं प्रदेश में विधानसभा और लोकसभा चुनाव दोनों के लिए ट्रंप कार्ड साबित हो सकती हैं। ऐसे में अशोक गहलोत के साथ खड़े रहना आलाकमान की मजबूरी है।

आलाकमान की मजबूरियों के बीच सचिन पायलट के मन में क्या हो सकता है?

चुनाव करीब है, ऐसे में पायलट अपना सियासी कद और बढ़ाने के लिए सोच रहे होंगे... क्योंकि इसके पहले भी वह तीन बार ऐसा कर चुके हैं। एक बार तो पायलट अपने करीब 20 समर्थित विधायकों के साथ दिल्ली में डेरा भी डाल चुके हैं।

अगर सचिन पायलट नया मोर्चा बनाने की सोच रहे हैं, तो ये अटकलें दूर हो जाती हैं, कि वो भाजपा में शामिल होंगे। क्योंकि वसुंधरा राजे के खिलाफ ही तो उन्होंने मोर्चा खोल रखा है। ऐसे में कहा जा सकता है कि वह न तो कांग्रेस में रहना चाहते हैं और न ही भाजपा में जाना चाहते हैं। हां पायलट खुद की नई पार्टी बना सकते हैं। पायलट युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं। ऐसा करके वो उन वोटर्स को साधना चाहते हैं जो कांग्रेस और भाजपा दोनों से ही नाखुश हैं। फिर ज्योतिबा फुले की तस्वीर के ज़रिए शोषितों की मदद का संदेश तो दे ही चुके हैं।

ख़ैर... जो भी हो, इस वक्त कांग्रेस के लिए सचिन पायलट बहुत बुरी स्थिति तैयार कर चुके हैं, जिसे वक्त रहते सुलझाया नहीं गया तो भविष्य में पार्टी के लिए बड़ा खतरा पैदा हो सकता है।

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