नव-उदारवाद का संकट: मर्ज़ बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा दी उनने
नव-उदारवाद के प्रवक्ताओं की एक बात बहुत खास होती है। जब भी नव-उदारवाद पर अमल के चलते कोई अर्थव्यवस्था संकट में फंस जाती है, वह एक ही रामबाण उपचार बताते हैं– और ज्यादा नव-उदारवादी ‘सुधार’ किए जाएं।
यह सबसे स्वत:स्पष्ट रूप में सोवियत संघ के पराभव के बाद रूस में देखने को मिला था। जैसे-जैसे नव-उदारवादी ‘सुधार’ रूसी अर्थव्यवस्था को संकट में गहरे से गहरा धंसाते गए, वैसे-वैसे हरेक चरण में ‘सुधारवादी’ यही सुझाते रहे कि और ज्यादा ‘सुधार’ किए जाएं। यह सिलसिला तब तक जारी रहा जब तक कि देश की अर्थव्यवस्था ही मुट्ठीभर धनकुबेरों के हाथों में नहीं आ गयी और मेहतनकश जनता के जीवन स्तर में एक सत्यानाशी शुद्ध गिरावट नहीं हो गयी। व्लादीमीर पुतिन के बारे में हम चाहे जो भी सोचते हों, आखिरकार उन्हीं ने अर्थव्यवस्था को धनकुबेरों के शिकंजे से बाहर निकला था।
ऐसा ही दृश्य आज भारत में देखने में आ रहा है। इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था गंभीर संकट की जकड़ में है। इस संकट की अभिव्यक्ति सबसे बढ़कर रुपए के विनिमय मूल्य में भारी गिरावट और मुद्रास्फीति के तेज होने में हो रही है। रुपए का यह अवमूल्यन, हालांकि पिछले कुछ समय में इसमें इसने और तेजी पकड़ी है, एक लंबे अर्से से जारी परिघटना है। वास्तव में इसकी शुरूआत तो तभी हो गयी थी, जब नव-उदारवाद के तकाजों के अनुरूप रुपए को विनिमय मूल्य के मामले में तैरता छोड़ दिया गया था। 1992-93 में, रुपए को तैरता छोड़े जाने के फौरन बाद, एक डालर का मूल्य 22.74 रुपये के बराबर था। 2024 के आखिर में एक डालर का मूल्य 85.47 रुपये पर पहुंच चुका था और आज एक डालर 95 रुपये से ऊपर जा चुका है।
एक ऐसी अर्थव्यवस्था में, जो कमोबेश साल दर साल अपने भुगतान संतुलन में चालू खाता घाटे में चल रही हो, मुद्रा का तैरता छोड़ा जाना, सीधे-सीधे यही सुनिश्चित करना है कि संबंधित मुद्रा का मूल्य नीचे से नीचे ही खिसकता जाए, जैसा कि वास्तव में हुआ भी। रुपए की विनिमय दर को तैरता छोड़े जाने से पहले के लंबे दौर में, रुपए की विनिमय दर एक स्तर पर बांध कर रखी जा रही थी और उस दौर में विदेशी मुद्रा बाजार की पहचान राशनिंग से होती थी। साफ है कि नव-उदारवादी सुधारों के ही चलते, जिनका तकाजा था कि रुपए के विनिमय मूल्य को तैरता हुआ छोड़ दिया जाए, रुपए के विनिमय मूल्य में यह आम गिरावट भी आयी है और पिछले ही दिनों में आयी वह और भी तेज गिरावट भी, जो और भी हाल की विशेष परिस्थितियों के साथ जुड़ी हुई है, जिसमें ट्रंप के टैरिफ और ईरान के खिलाफ युद्ध शामिल हैं। इसके बावजूद, वर्तमान संकट के समाधान के रूप में और ज्यादा ‘सुधार’ की मांग का समूह गान शुरू हो गया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर नीति आयोग के सदस्यों तक और सरकारी तथा गैर-सरकारी अर्थशास्त्रियों की लंबी कतार तक, एक ही दलील सुनने को मिल रही है कि निजी तथा खासतौर पर विदेशी पूंजी को, उस पर हमारे देश में जो बची-खुची पाबंदियां रह भी गयी हैं, उनसे भी आजाद करा दिया जाना चाहिए और सभी संभव उपायों से उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि भारत में आएं, ताकि इस देश को संकट से उबार सकें।
वैश्विक दक्षिण में नवउदारवाद अवमूल्यन अपरिहार्य क्यों?
आइए, इस दलील की जरा सावधानी से पड़ताल करते हैं। जब तक किसी देश में चालू खाता घाटा बने रहने की प्रवृत्ति रहती है, उसकी विनिमय दर के संबंध में आम प्रत्याशा गिरावट होने की ही रहती है। बेशक, संबंधित अर्थव्यवस्था में वित्तीय प्रवाह आ रहे हो सकते हैं, जिनसे केंद्रीय बैंक के विनिमय दर में बढ़ोतरी से बचने के प्रयास के साथ, विदेशी मुद्रा संचित कोष भी जमा हो सकता है। फिर भी सटोरिये अगर बिल्कुल ही आंखों के अंधे नहीं होंगे तो वे यह मानने के लिए तैयार नहीं होंगे कि संबंधित अर्थव्यवस्था में चालू खाता घाटा बराबर बने रहने के बावजूद, चालू विनिमय दर हमेशा के लिए जहां की तहां बनाए रखी जा सकती है। उस तरह का भरोसा करने का मतलब तो उनका विश्वासपूर्वक यह मानना होगा कि चाहे जैसी भी परिस्थितियां हों, संबंधित देश में आने वाले वित्तीय प्रवाह हमेशा ही चालू खाता घाटे को पाटने के लिए जरूरी वित्त प्रवाहों से फालतू ही बने रहेंगे। और ऐसा होने की संभावना करीब-करीब नहीं के बराबर होगी।
अगर कुछ समय तक वित्त के प्रवाह, चालू खाता घाटे की भरपाई करने लिए जरूरी वित्त से ज्यादा बने रहते हैं तथा इसके चलते कुछ विदेशी मुद्रा कोष जमा भी हो जाता है, तब भी कोई भी ऐसा आकस्मिक घटना विकास जिसके चलते वित्तीय प्रवाह, उक्त घाटे की भरपाई करने के लिए आवश्यक स्तर से कम हो जाएं, विनिमय दर को नीचे ले आएगा। संबंधित देश का केंद्रीय बैंक इसे रोक नहीं पाएगा क्योंकि वह अपने विदेशी मुद्रा संचित कोष से विदेशी मुद्रा निकालने में झिझकेगा। क्योंकि इससे ऐसी प्रत्याशाएं भड़कने का डर होगा, जिनके चलते वित्त का पलायन शुरू हो सकता है। और एक बार जब विनिमय दर में गिरावट शुरू हो जाती है, सटोरियों को यह उम्मीद लग जाएगी कि आगे और अवमूल्यन होगा। और ऐसी प्रत्याशाओं के साथ, एक ऐसी अर्थव्यवस्था में जहां चालू खाता घाटा लगातार बना रहता हो, अगर विनिमय दर को तैरता छोड़ दिया गया हो, मुद्रा का लगातार अवमूल्यन होना अपरिहार्य है।
विनिमय दर को तैरता छोड़ने के पैरोकार यह दलील दे सकते हैं कि विनिमय दर को तैरता छोड़ने का तो असली मकसद ही यह है कि चालू खाता घाटे को खत्म किया जाए और इस तरह यह सुनिश्चित किया जाए कि चालू खाता घाटे के बराबर बने रहने की जिस स्थिति को हम प्रदत्त मानकर चल रहे हैं, उससे हमेशा के पीछा ही छूट जाए। दूसरे शब्दों में, तैरती विनिमय दर के ये पैरोकार किसी ‘संतुलनकारी विनिमय दर’ के अस्तित्व पर विश्वास करते हैं, जिसे पाने पर चालू खाता घाटा खत्म ही हो जाएगा। और वे इसमें विश्वास करते हैं कि अगर विनिमय दर को तैरते रहने दिया जाता है, वास्तविक विनिमय दर इस संतुलनकारी दर की ओर चली जाएगी।
संतुलित विनिमय दर की मरीचिका
बहरहाल, यह दलील पूरी तरह से बेतुकी है। किसी खास विनिमय दर पर (डालर के मुकाबले), किसी देश के माल विश्व बाजार में किसी अन्य देश की तुलना में कितने सफल होते हैं, यह अनेक कारकों पर निर्भर करता है। इनमें, डालर के मुकाबले उस विनिमय दर पर, उस देश की वास्तविक मजदूरी दर तथा उसके, उसके द्वारा प्रयोग की जा रही प्रौद्योगिकी से लेकर, उसके अंतर्राष्ट्रीय संबंधों तक शामिल हैं और उसके प्रतिद्वंद्वी देशों के लिए यही तुलनीय कारक शामिल हैं। यह आशा करना कि मुद्रा का विनिमय मूल्य तैरता छोड़ने से यह मूल्य खिसक कर किसी संतुलन की स्थिति की ओर बढ़ जाएगा, यह मानकर चलना है कि किसी मानीखेज अर्थ में ऐसा कोई संतुलन मौजूद है।
मिसाल के तौर पर मान लीजिए कि इन सभी कारकों को देखते हुए, जिनमें विनियम की दर भी शामिल है, प्रतिस्पर्द्धी देशों से मुकाबले में, चालू खाता घाटे को खत्म करना विनिमय दर के इस हद तक अवमूल्यन का तकाजा करता है, जहां वास्तविक मजदूर वर्तमान स्तर से घटकर, चौथाई हिस्सा ही रह जाए। इस स्तर की वास्तविक मजदूरी शायद मजदूरों को स्वीकार्य तो नहीं ही होगी, हो सकता है कि यह गुजारे के स्तर से भी इतनी कम हो कि इस मजदूरी पर वे जिंदा ही नहीं रह सकते हों। बुनियादी तौर पर इसका अर्थ यह है कि कोई व्यावहारिक संतुलित विनिमय दर होती ही नहीं है। ऐसी कथित संतुलित अवस्था की उम्मीद में विनिमय दर को तैरते हुए नीचे की ओर जाने देने का, शायद कोई औचित्य ही नहीं होगा।
मज़दूर वर्ग को भूखा मारने का नुस्खा
भारत में विनिमय दर को तैरते हुए, तीन दशक से ज्यादा हो चुके हैं। इसके बावजूद, चालू खाता घाटे के खत्म होने के तो कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं। दूसरी ओर ऐसा भी नहीं है कि मजदूर इतनी बढ़ती हुई मजदूरी मांगते और हासिल करते रहे हैं कि, विनिमय दर में लगातार हो रही गिरावट को, बढ़ी हुई मजदूरी बेअसर करती रही हो। इसलिए, वर्तमान संकट के रामबाण उपचार के रूप में, नव-उदारवादी सुधारों को और आगे बढ़ाने का जो फार्मूला पेश किया जा रहा है, उसका अर्थ है, विनिमय दर से पैदा हुए संकट का समाधान इसमें देखना कि विनिमय दर को तो तैरते ही रहने दिया जाए, लेकिन इसकी वजह से वास्तविक मजदूरी में जो कटौतियां थोपी जा रही हैं, उनके खिलाफ मजदूरों के प्रतिरोध का विरोध किया जाए तथा उसे रोका जाए। लेकिन, इसका अर्थ अर्थव्यवस्था को किसी संतुलन की ओर नहीं बल्कि मजदूर वर्ग को भूखों मारने की ओर धकेलना ही होगा। और अगर प्रतिस्पर्द्धी देश भी, अपने बाजारों को हमारे देश के हाथ में आने से रोकने के लिए, अपनी विनिमय दर को भी उसी तरह से नीचे खिसकने देते हैं, तब तो शायद मजदूर वर्ग को भूखा मारना भी काफी नहीं होगा।
इसका अर्थ यह है कि विनिमय दर को तैरने देना और उसके तैरते छोड़े जाने से पैदा होने वाले संकट पर काबू पाने के लिए दमनकारी श्रम कानून थोपना (जिसे नव-उदारवादी शब्दावली में श्रम बाजार के ‘सुधार’ कहा जाता है) या कर रियायतों के सहारे वित्तीय प्रवाहों को ललचाना या वैश्विक निवेशकों के लिए ऊंची ब्याज दरों की पेशकश करना (जिन दोनों का ही अर्थव्यवस्था पर संकुचनकारी प्रभाव पड़ेगा), अर्थव्यवस्था को ऐसी किसी संतुलित अवस्था में नहीं ले जाने वाला है, जहां बाकी सब कुछ जैसे का तैसा रहा तो, अर्थव्यवस्था स्थिरता प्राप्त कर लेगी।
नव-उदारवाद से गला छुड़ाना ज़रूरी
बेशक, इस तरह के ‘‘सुधारों’’ से फौरी तौर पर रुपए का अवमूल्यन रुक सकता है। ऐसा होना भी पक्का तो नहीं है, फिर भी हम माने लेते हैं कि ऐसा हो सकता है। लेकिन, ट्रंप द्वारा भारत से मांग की जा रही है कि वह या तो बहुत ऊंचे अमेरिकी टैरिफों को स्वीकार करे या फिर अमेरिका के साथ एक असमानतापूर्ण व्यापार डील को स्वीकार करे। इसके चलते, जल्द ही अमेरिका से साथ भारत का व्यापार घाटे में चले जाने वाला है। इसका अर्थ यह है कि समग्रता में विश्व के साथ भारत का व्यापार, अब तक जितना घाटे में रहा है, उससे भी ज्यादा घाटे में चला जाने वाला है। इस स्थिति में सटोरिए तो विनिमय दर के और गिरने की अपेक्षा करेंगे ही। इसका मतलब यह है कि पीछे हम जिस तरह के अतिरिक्त ‘सुधार’ के कदमों का जिक्र कर आए हैं, उनको अपनाने के सहारे फौरी तौर पर रुपए की गिरावट रुक भी जाती है, तब भी उसकी गिरावट जल्द ही दोबारा शुरू हो जाएगी और हम पलट कर, वहीं पर पहुंच जाएंगे, जहां से चले थे।
संक्षेप में यह कि संतुलित विनिमय दर जैसी कोई चीज नहीं है, ऐसा कोई मचान नहीं है जिस पर टिक कर रुपया कुछ अर्से तक विश्राम कर सकता हो। बस उसे अपनी वर्तमान और प्रत्याशित दरों से नीचे ही नीचे खिसकते जाना है।
यह मानना कि और ज्यादा उदारीकरण से, पहले से मौजूद उदारीकरण से पैदा हुए संकट को हल किया जा सकता है, एक मरीचिका है। वास्तव में, वर्तमान हालात हमें इसका मौका दे रहे हैं कि नव-उदारवादी ‘‘सुधारों’’ ने जो नुकसान कर दिया है, उसे अनकिया कर दें। विनिमय दर के मामले में, जिसकी हम चर्चा कर रहे हैं, इसका अर्थ है पूंजी नियंत्रण लागू करना, विनिमय दर को किसी खास स्तर पर बांधना और उसे तैराना बंद करना। और एक बार जब ऐसा किया जाता है, इसमें शक नहीं कि भविष्य के वित्तीय प्रवाह सिकुड़ जाएंगे और इसके चलते हमारे देश के लिए अपने व्यापार तथा चालू खाता घाटों का वित्तपोषण करना कठिन हो जाएगा। इससे निपटने के लिए व्यापार नियंत्रण भी लागू करने पड़ेंगे। और ये नियंत्रण अपने साथ नव-उदारवाद से दूर ले जाने वाले दूसरे भी बदलाव लाएंगे। इनमें यह भी शामिल है कि जिन देशों से हमें तेल जैसी महत्वपूर्ण लागत सामग्रियों का आयात करना होगा, उनके साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते करें, लेकिन अपने लेन-देन के माध्यम के रूप में डालर का उपयोग नहीं करें।
वास्तव में मोदी खुद निहितार्थत: इस तरह के नियंत्रणों की जरूरत को स्वीकार कर रहे हैं। उन्होंने लोगों से विदेशी मुद्रा बचाने के लिए विदेश यात्राओं से बचने की या तेल उत्पादों की मांग को कम करने के लिए घर से काम करने की जो अपील की है, निहितार्थत: नियंत्रण के प्रत्यक्ष कदमों की जरूरत को स्वीकार करना है। अगर लोग स्वेच्छा से उक्त नियंत्रण नहीं करेंगे, तो उनकी अपील के तर्क का तकाजा तो यही होगा कि उक्त लक्ष्यों को हासिल करने के लिए, शासन की ओर से नियंत्रण लगाए जाएं।
(लेखक दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र में प्रोफ़ेसर एमेरिटस हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)
अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें–
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