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नवउदारवादी वादे और उन वादों का झूठ

चाहे हम वृहत्तर तस्वीर देखें या राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के उपभोग खर्च सर्वेक्षणों के नतीजों को देखें, एक ही कहानी सामने आती है--शुद्घ या घोर गरीबी में जी रहे लोगों के अनुपात में बढ़ोतरी की।
Liberalism

नव-उदारवाद, भारत में अपने से पहले वाले नियंत्रणात्मक निजाम की तुलना में, खुद को बेहतर दिखाने के लिए, कुछ साफ-साफ असत्यों का प्रचार करता है। इस प्रचार का बुनियादी कथानक यही दिखाने का रहता है कि नवउदारवाद के अंतर्गत, सकल उत्पाद की वृद्घि दर में ऐसी तेजी आयी है कि समग्रता में लोग, पहले के मुकाबले काफी खुशहाल हो गए हैं और उनकी विशाल संख्या को गरीबी के गर्त में से बाहर निकाल लिया गया है (एक खास उत्साही ने तो यह दावा तक कर दिया है कि अब सिर्फ 2 फीसद आबादी ही गरीबी की शिकार रह गयी है)। बेशक, नियंत्रणात्मक दौर में भी देश में कोई घी-दूध की नदियां नहीं बह रही थीं और उसकी वामपंथ से ज्यादा तीखी आलोचना किसी और ने नहीं की होगी। लेकिन, यह दावा कि नवउदारवाद, जनता के जीवन स्तर के लिहाज से, नियंत्रणात्मक दौर के मुकाबले प्रगति का प्रतिनिधित्व करता है, कतई बेतुका है।

नव-उदारवाद की चौतरफा मार

मैं यहां खुद को सिर्फ आर्थिक संकेतकों तक ही सीमित रखूंगा और नव-उदारवाद का जनतंत्र को कमजोर करने के रूप में जो असर हुआ है (और यह वर्तमान फासीवादी निजाम से पहले तक जाता है) उसमें मैं नहीं जाऊंगा। मैं इसमें नहीं जाऊंगा कि किस तरह नवउदारवाद ने आत्म-केंद्रितता तथा स्वार्थपरता को समाज में पहले के मुकाबले ज्यादा सर्वव्यापी बना दिया है, जिसकी कि बेरोक-टोक पूंजीवाद के अंतर्गत उम्मीद भी की ही जाती है। उसने एक स्वार्थपरायण अभिजन को उभारा है जिसके मन में गरीबों के प्रति नफरत के सिवा और कुछ नहीं है और नवउदारवाद ने राष्टï्र के नैतिक कुतुबनुमा को इस प्रकार पूरी तरह से नष्टï कर दिया है कि ऐसी नौबत तक आ गयी है कि जीवित स्मृति के सबसे बुरे जनसंहार के खिलाफ सार्वजनिक विक्षोभ के प्रदर्शन तक के लिए, सरकार मनाही कर देती है और मीडिया में इस पर कोई शोर तक नहीं होता है।
इसका सबसे ज्यादा ठोस और त्रासद आर्थिक संकेतक, पिछले तीन दशकों में तीन लाख से ज्यादा किसानों तथा खेत मजदूरों का आत्महत्या करना ही है। निश्चित रूप से स्वतंत्रता के बाद के भारत में, इसके जैसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता है। इसकी जड़ें सीधे उस संकट में खोजी जा सकती हैं, जिसमें नवउदारवाद के अंतर्गत राजकीय सहायता से हाथ खींचे जाने के चलते, किसानी खेती को धकेल दिया गया है। राजकीय सहायता से यह हाथ खींचा जाना, नकदी फसलों के लिए मूल्य समर्थन के हटाए जाने में खासतौर पर देखा जा सकता है, जबकि पहले इस तरह का मूल्य समर्थन हासिल था। इस तरह हाथ खींचे जाने के चलते, विश्व बाजार की कीमतों के हिसाब से, संबंधित फसलों के घरेलू दामों में भारी चढ़ाव-उतार आते हैं।

रोजगार वृद्घि में कमी, आय असमानता बढ़ी

जहां कृषि संकट ने ‘‘काश्तकारों’’ की संख्या 1991 और 2011 की जनगणनाओं के बीच 1.5 करोड़ घटा दी थी। इनमें से कुछ काश्तकारों को खेत मजदूरों की कतारों में धकेल दिया गया था जबकि अन्य को रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने पर मजबूर कर दिया गया। इसके साथ ही, रोजगार में वृद्घि में, नियंत्रणात्मक दौर की तुलना में कमी हो गयी है। जहां कम जीडीपी वृद्घि वाले नियंत्रणात्मक दौर में रोजगार वृद्घि की दर मोटे तौर पर 2 फीसद सालाना रहने का अनुमान लगाया गया है। बेशक, यह दर इसके लिए तो काफी नहीं थी कि श्रम की सुरक्षित सेना के सापेक्ष आकार में, जो कि उपनिवेशवाद की विरासत के रूप में पहले से चली आ रही थी, कमी ले आती। फिर भी, नवउदारवादी दौर में रोजगार में वृद्घि की दर गिरकर सिर्र्फ 1 फीसद सालाना रह गयी है, जो कि इस दौर में आबादी में वृद्घि की औसत दर से भी कम है। इसके चलते, बेरोजगारों की सेना के सापेक्ष आकार में बढ़ोतरी हुई है। इतना ही नहीं, एक अनुमान (सीएमआइई) के अनुसार, बेरोजगारों की कुल संख्या भी, पिछले पांच साल में कमोबेश जस की तस बनी रही है।

जीडीपी में वृद्घि की दर में तेजी के बावजूद, रोजगार में वृद्घि की दर में इस गिरावट को, श्रम उत्पादकता में वृद्घि की दर में तेेजी से बढ़ोतरी होने से समझा जा सकता है। और श्रम की उत्पादकता में वृद्घि में यह तेजी आयी है, नवउदारवाद  के चलते अर्थव्यवस्था के दरवाजे, सघन विदेशी प्रतिस्पद्र्घा के लिए खोले जाने से। इसके चलते, श्रम की सुरक्षित सेना के सापेक्ष आकार में हुई बढ़ोतरी ने, श्रम शक्ति की प्रतिव्यक्ति आय को कमोबेश गुजारा भर करने के स्तर से बांधे रखा है। इससे, श्रम उत्पादकता में वृद्घि की तेज रफ्तार को देखते हुए, जीडीपी में आर्थिक अधिशेष के हिस्से में भारी बढ़ोतरी हुई है। इसके चलते, नव-उदारवादी दौर में आय असमानता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है और सिर्फ बड़े पूंजीपतियों द्वारा ही नहीं बल्कि उनके ‘‘लग्गों-भग्गों’’ की एक बारीक सी उपरली परत ने भी, जिसमें नवउदारवादी के पैरोकार भी शामिल हैं, अभूतपूर्व पैमाने पर खुशहाली बटोर ली गयी है।

आय की असमानता में यह बढ़ोतरी कितनी ज्यादा है, यह दो फ्रांसीसी अर्थशास्त्रियों, थॉमस पिकेट्री और लूकास चांसल के अनुमानों से स्वत:स्पष्ट है, जिन्होंने इस काम के लिए भारत के आयकर के डॉटा का उपयोग किया है। उन्होंने कुल राष्ट्रीय आय में सबसे धनी-1 फीसद के हिस्से को लिया और यह पाया कि स्वतंत्रता के बाद से इस हिस्से में गिरावट हुुई थी और 1982 तक यही हिस्सा घटकर 6 फीसद ही रह गया था। लेकिन, उसके बाद से, खासतौर पर नवउदारवादी दौर में इस हिस्से में बढ़ोतरी हुई है। 2013-14 और 2014-15 में, जो कि आखिरी वर्ष है जिसके लिए डॉटा उनके पास था, यह हिस्सा बढ़कर करीब 22 फीसद पर पहुंच चुका था। इस स्तर पर, सबसे धनी 1 फीसद का हिस्सा, 1922 में जब पहली बार भारत में आयकर लागू किया गया था, उस समय के मुकाबले बढक़र था। आर्थिक अधिशेष के हिस्से में इसी बढ़ोतरी ने, और यह बढ़ोतरी भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में हुई है, अधि-उत्पादन के उस संकट को पैदा किया है, जिसने नवउदारवादी निजाम को एक बंद गली में पहुंचा दिया है।

श्रमिकों की प्रतिव्यक्ति वास्तविक आय में गिरावट

चूूंकि श्रम शक्ति की प्रतिव्यक्ति वास्तविक आय में बढ़ोतरी नहीं हुई है, कार्य बल के अनुपात के रूप में श्रम की सुरक्षित सेना का हिस्सा बढऩे का नतीजा यह निकला है कि श्रम शक्ति की यानी रोजगारशुदा, बेरोजगारों तथा अल्परोजगारशुदाओं को मिलाकर कुल श्रम शक्ति की प्रतिव्यक्ति वास्तविक आय में, कुल मिलाकर गिरावट आयी है। इसलिए, हैरानी की बात नहीं है कि घोर गरीबी में जीने वालों का सापेक्ष अनुपात बढ़ गया है। बेशक, सडक़ों तथा स्ट्रीट लाइटों जैसी साझा बुनियादी ढांचागत सुविधाओं तक उनकी पहुंच तो पहले से बेहतर हो सकती है, लेकिन उनकी वंचितता, मनुष्य की सबसे बुनियादी आवश्यकता, खाद्यान्न के उनके प्रतिव्यक्ति उपभोग में गिरावट में स्वत:स्पष्ट है।

भारत में गरीबी के अध्ययन की शुरूआत, 1973-74 को आधार वर्ष मानकर हुई थी और योजना आयोग ने ग्रामीण भारत में 2200 कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन और शहरी भारत में 2100 कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन से कम आहार तक पहुंच को, शुद्घ या घोर गरीबी की परिभाषा माना था। उसके बाद से सरकार द्वारा और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं द्वारा भांति-भांति की कपटलीलाएं आजमायी जाती रही हैं ताकि इस परिभाषा को बदला जा सके और गरीबी में गिरावट दिखाई जा सके। बहरहाल, आइए हम इसी बुनियादी, सुस्पष्ट परिभाषा पर ही कायम रहते हैं।

1973-74 में 2200 कैलोरी आहार से नीचे पडऩे वाली ग्रामीण आबादी 56.4 फीसद थी और 2100 कैलोरी आहार से नीचे आने वाली शहरी आबादी 49.2 फीसद। 1993-94 में नवउदारवादी नीतियां अपनाए जाने के समय तक (कुछ लोग इन नीतियों के अपनाए जाने का समय अस्सी के दशक के मध्य में मानते हैं) ग्रामीण भारत में यह अनुपात जरा सा बढक़र 58 फीसद और शहरी भारत में कहीं ज्यादा उल्लेखनीय रूप से बढक़र 57 फीसद हो गया था। बहरहाल, 2011-12 तक इन दोनों ही हलकों में गरीबी में और उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज हो चुकी थी और ग्रामीण भारत में यही हिस्सा 68 फीसद और शहरी भारत में 65 फीसद हो गया था।

रराष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण का अगला उपभोग सर्वे 2017-18 में हुआ था। लेकिन, इसमें सामने आए आंकड़े 2011 की तुलना में इतनी बुरी स्थिति को दिखाते थे कि मोदी सरकार ने इस सर्वे के नतीजों को ही पूरी तरह से दबा दिया। बहरहाल, राष्टï्रीय नमूना सर्वे की इस रिपोर्ट के दबाए जाने से पहले, इसका जो डॉटा लीक होकर सार्वजनिक हो गया, यह दिखाता था कि 2011-12 और 2017-18 के बीच, देश के पैमाने पर ग्रामीण क्षेत्र में, तमाम मालों व सेवाओं के उपभोग पर वास्तविक प्रतिव्यक्ति खर्च में, 9 फीसद की अभूतपूर्व गिरावट हुई थी। इस बाद वाले वर्ष में ग्रामीण आबादी का 2200 कैलोरी प्रतिदिन तक पहुंच से नीचे रह जाने वाला हिस्सा, एक अनुमान के अनुसार 80 फीसद से ज्यादा बैठता है। (ये आंकड़े उत्सा पटनायक की अपडेटेड रिपोर्ट, एक्सप्लोरिंग द पॉवर्टी क्वेश्चन से लिए गए हैं, जिसे आइसीएसएसआर के सामने पेश किया गया था।)

बढ़ती भूख और गरीबी

हैरानी की बात नहीं है कि विश्व भूख सूचकांक पर भारत, जिन 125 देशों के लिए यह सूचकांक तैयार किया जाता है, उनमें से 111वें स्थान पर है और इस पैमाने पर भारत का स्थान पड़ौसी पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल से भी पीछे है।

गरीबी के ये आंकड़े, कुल-मिलाकर प्रतिव्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता के आंकड़े जो कुछ दिखाते हैं, उससे पूरी तरह से मेल खाते हैं। बीसवीं सदी के आरंभ में, ब्रिटिश भारत के लिए प्रतिव्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता करीब 200 किलोग्राम प्रतिवर्ष थी। यह लगातार गिरते हुए स्वतंत्रता प्राप्ति के समय तक, करीब 138 किलोग्राम प्रतिव्यक्ति रह गयी थी या फिर अगर हम 1946-47 पर समाप्त पंचवार्षिकी का औसत लें तब भी यह 150 किलोग्राम से कम थी। आजादी के बाद, इस गिरावट के रुझान को पलट दिया गया और यह सिलसिला 1980 के दशक के अंत के करीब तक जारी रहा। लेकिन, उसके बाद से प्रतिव्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता कमोबेश जहां की तहां बनी रही है, जिसमें बढ़ोतरी के बाद, गिरावट हो गयी है। अब अगर हम यह मान कर चलें, जिसके लिए सभी कारण बनते हैं, कि शीर्ष 10 फीसद आबादी का, प्रसंस्कृत खाद्य सामग्री तथा पशु उत्पादों के लिए पशु आहार आदि के लिए, खाद्यान्नों का प्रतिव्यक्ति परोक्ष उपभोग बढ़ता रहा है (और याद रहे कि यह संपन्नतर तबका पहले से और संपन्न हो गया है), तो शेष आबादी के लिए खाद्यान्न की प्रतिव्यक्ति उपलब्धता में गिरावट ही हो रही होगी।

इस तरह चाहे हम वृहत्तर तस्वीर देखें या राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के उपभोग खर्च सर्वेक्षणों के नतीजों को देखें, एक ही कहानी सामने आती है--शुद्घ या घोर गरीबी में जी रहे लोगों के अनुपात में बढ़ोतरी की। यह अनुपात, जो नियंत्रणात्मक दौर में गिरावट पर रहा था, नवउदारवाद के दौर में बढ़ता गया है।

नवउदारवाद के प्रचारकर्ता न सिर्फ इस तथ्य को दबाते हैं बल्कि तरह-तरह की तिकड़मों का सहारा लेकर, बेईमानी से यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि नवउदारवादी दौर, सभी के लिए खूब खुशहाली का दौर रहा है।

इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:

Neo-Liberalism’s Promise of Milk and Honey a Mirage

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