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तिरछी नज़र: सरकार जी की सलाह और हम अंधभक्त

सरकार जी की यह पुरानी आदत है। लोगों को उपदेश देना पर खुद नहीं मानना। ख़ैर, राजा और प्रजा के आचरण में फ़र्क़ होना ही चाहिए।
PM MODI
कार्टून, कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य के X हैंडल से साभार

सरकार जी ने एक सलाह दी और उस पर हमने अमल भी किया। हालांकि सरकार जी ने स्वयं अमल नहीं किया पर हमने किया। सरकार जी ने जिस दिन सलाह दी उसके अगले दिन ही उसे तोड़ दिया। सलाह दी कि विदेश यात्रा न करें और अगले दिन ही विदेश यात्रा पर चले गए। सरकार जी भी विदेशी नेताओं से वर्चुअल मीटिंग कर सकते थे पर पर वर्चुअल मीटिंग में वह सुख कहाँ जो आमने सामने की मीटिंग में है। वर्चुअल मीटिंग में न तो नोर्वे जैसी भद्द पिटती है और न ही इटली में मेलोडी देने जैसा सुख मिलता है।

सरकार जी की यह पुरानी आदत है। लोगों को उपदेश देना पर खुद नहीं मानना। ख़ैर, राजा और प्रजा के आचरण में फर्क होना ही चाहिए। यह मेरा नहीं, सरकार जी का मानना है। सरकार जी स्वयं विदेशी चश्मा, विदेशी पेन, विदेशी घड़ी, विदेशी जैकेट पहन कर प्रजा को स्वदेशी अपनाने की सलाह देते हैं। जबकि इनमें से कुछ चीजें हमारा देश भी अच्छी बना रहा है। साइन तो दस बीस रुपये वाले बॉल पेन से ही अच्छे होते हैं, बशर्ते करने आते हों।

पर मैं उन लोगों में से हूँ जो सरकार जी की दी गई सारी सलाह मानते हैं। सरकार जी उन सलाहों को खुद माने या न माने, मैं अवश्य मानता हूँ। तो मैंने सोचा कि इस बार घूमने विदेश नहीं जाऊंगा। और मैं तो एक बार को सरकार जी की सलाह नहीं भी मानू पर श्रीमती जी एक दम देशभक्त हैं। जब से सरकार जी ने सोना नहीं खरीदने की सलाह दी है, मज़ाल है जो हमारे घर में एक ग्राम भी सोना आ गया हो। उससे पहले तो हम हर रोज सुनार जी की दुकान पर बैठे रहते थे और कम से कम पांच दस तोला सोना खरीद कर ही उठते थे। तो परिवार समेत यहीं आसपास घूमने का कार्यक्रम बनाया। 

सरकार जी के हम बहुत बड़े भक्त हैं। सचमुच में बड़े वाले। अरे वही जिन्हें आप अंधभक्त कहते हैं ना, वही। कोरोना काल में सरकार जी के कहने पर बरतन भांडे भी बजाये और मोमबत्ती भी जलाई। गोमूत्र पीने की भी कोशिश की पर उसकी सुगंध (दुर्गन्ध लिखने का साहस नहीं कर पा रहा हूँ। कहीं किसी की भावनाएं न आहत हो जाएं) न तो नाक बर्दाश्त कर पाई और न ही दिमाग़। गोबर भी लपेटा पर एक्सपेरिमेंट के लिए एक ही बाँह पर लपेटा। उस बाहँ पर इतनी खुजली हुई और फोड़े फुंसी उगीं कि सारे शरीर पर पोतने का साहस ही नहीं हुआ। हाँ, इसका एक लाभ अवश्य हुआ। कोरोना काल में मैं तीन बार कोरोना से संक्रमित हुआ पर उस बाँह को कोविड नहीं हुआ।

तो गर्मियां शुरू हुईं। बाहर घूमने जाने का कार्यक्रम बनना शुरू हुआ तो सरकार जी की सलाह आ गई। फिर तो देश में ही घूमने का कार्यक्रम बनाना था। वैसे मन विदेश जाने का था पर क्या करें ऐन वक़्त पर सरकार जी की सलाह आ गई। और सलाह क्या, मानो आदेश था। तो हमने देश में ही घूमने का प्रोग्राम बना लिया। जाने के लिए जगह भी चुन ली।

प्रोग्राम क्या बनाया, जैसे सिर मुंडाते ही ओले पड़े। प्रोग्राम बनाने और उसे कार्यान्वित करने के बीच में ही तीन बार पेट्रोल के दाम बढ़ गए। हमारी यह ख़ुशी कि सरकार जी इतने अच्छे हैं कि खाड़ी युद्ध के बावजूद तेल के दाम नहीं बढ़ा रहे हैं, क्षण भर में काफुर हो गई। समझ में आया कि वह सरकार जी की अच्छाई नहीं, चुनाव की महिमा थी कि पेट्रोल डीज़ल के दाम नहीं बढ़ रहे थे।

खैर, ओखली में सिर दिया है तो मूसल का क्या डर। जब सरकार जी को चुना है तो महंगाई का क्या रोना। और पेट्रोल के दाम अब कम होने से रहे भले ही खाड़ी युद्ध बंद हो जाये और कच्चे तेल के दाम रसातल में पहुंच जाएं। कीमतें जो एक बार बढ़ गईं, बढ़ गईं, कम नहीं होती हैं।

तो चल दिए अपने गंतव्य की ओर। रास्ते में टोल पड़े, उनका भुगतान अपने आप कट गया। सरकार जी ने फ़ास्ट टैग सिस्टम अच्छा किया है। अब तो गाड़ी खरीदते हुए ही फ़ास्ट टैग खरीदना अनिवार्य है। फ़ास्ट टैग की सिक्योरिटी और उसमें पड़ा पैसा (रिचार्ज) बैंक में बिना ब्याज पड़ा रहता है और अमीरों के काम आता है।

एक्सप्रेस वे और फ़ास्ट टैग से ध्यान आया, देश में दो तरह के गरीब हैं। एक तो वे अस्सी करोड़ गरीब जिन्हें सरकार जी, उन्हीं के पैसे से पांच किलो अनाज देते हैं। इन अस्सी करोड़ से सरकार जी कुछ नहीं चाहते हैं, बस सिर्फ वोट उन्हें देते रहें।

दूसरा वह एक ‘गरीब सेठ’ है जिसे सरकार जी पूरा देश दिये बैठे हैं। सरकार जी उससे वोट भी नहीं चाहते हैं। सरकार जी बस यह चाहते हैं कि वह बना रहे और सरकार जी भी बने रहें। सरकार जी उसे देते रहें और वह लेता रहे। बताते हैं टोल टैक्स का पैसा भी उसे ही मिलता है। और जिस सड़क से हम गुजरे वह पूरी बनी भी नहीं थी पर टोल कट रहा था। जगह जगह फ्लाई ओवर बन रहे थे, साथ में बनी कच्ची पक्की रोड से हम गुजर रहे थे। गाड़ी तेल पी रही थी, ससपेंशन गड़बड़ा रहा था और कमाई उस एक गरीब की हो रही थी। और यह कमाई हमने एक बार नहीं, दो बार करवाई। आखिर वहां बसने तो गए थे नहीं। लौटे भी।

(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

 

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