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जी-20 की दिल्ली घोषणा की चुप्पियां

दिल्ली में संपन्न हुई जी-20 की बैठक, विश्व अर्थव्यवस्था के गहरे आर्थिक संकट के बीच हो रही थी।
G20

आइएमएफ के अनुमान के अनुसार, विकसित अर्थव्यवस्थाओं की वृद्धि दर 2022 के 2.7 फीसद से धीमी होकर, 2023 में 1.3 फीसद ही रह जाने वाली है। आइएमएफ के ही एक वैकल्पिक अनुमान के अनुसार, 2023 में उनकी वृद्धि दर गिरकर 1 फीसद से नीचे भी जा सकती है। चूंकि श्रम की उत्पादकता की वृद्धि दर, कुल वृद्धि दर के इस आंकड़े से ज्यादा ही बैठने की संभावना है, इसका मतलब यह हुआ कि विकसित दुनिया में बेरोजगारी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होने जा रही है। खासतौर पर यूरोपीय यूनियन के मामले में इस संकट में पूर्वी यूरोप से प्रवासियों के भारी प्रवाह से और भी बढ़ोतरी होने जा रही है। यह प्रवाह पिछले कुछ समय से जारी है। इसके अलावा इसे और भी बढ़ा रहे होंगे यूक्रेन से आने वाले शरणार्थी, जिनका प्रवाह उनके देश को रूस के खिलाफ नाटो का एवजी का युद्घ लड़ने के लिए उकसाए जाने का नतीजा है।

यूरोप में फासीवादी रुझान को, जिसमें पिछले कुछ अर्से में काफी तेजी आयी है, बेरोजगारी में इस बढ़ोतरी से और बढ़ावा मिलने जा रहा है। बेरोजगारी में यह बढ़ोतरी प्रवासियों के प्रति शत्रु-भाव को और बढ़ावा ही देने जा रही है। जर्मनी में नव-नाजी एएफडी को पहले ही 20 फीसद के करीब वोट मिलने लगे हैं और वह कम से कम प्रांतीय स्तर पर सत्ता में आने के लिए, ऐसी पार्टियों के साथ सौदे करने की ओर बढ़ रही है, जो पार्टियां अब तक उसे छूना नहीं चाहती थीं। उधर फ्रांस में फासीवाद की झंडाबरदार, मारीन लॉ पेन के जन-अनुमोदन का आंकड़ा, वर्तमान राष्ट्रपति इमेनुअल मैक्रां से ऊपर निकल गया बताया जाता है। इटली में पहले ही एक फासीवादी सरकार चुनी जा चुकी है और स्पेन के भी आम तौर पर ऐसा ही करने के अनुमान लगाए जा रहे थे, पर उसे हाल में हुए चुनाव में अनिर्णयात्मक फैसला आने से फौरी तौर पर कुछ राहत मिल गयी है। इन सभी तत्वों को आगे और ताकत मिल जाने वाली है।

विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाओं के इस अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहे होने का असर, कम विकसित दुनिया पर भी पड़ेगा। इसके चलते उनकी जीडीपी की वृद्घि धीमी पड़ जाएगी, बेरोजगारी बढ़ेगी, उनका ऋण संकट और तीव्र होगा और वहां फासीवाद की दिशा में झुकाव बढ़ेगा। अर्जेंटीना पहले ही एक ऐसे राष्ट्रपति को चुनने की ओर बढ़ रहा है, जो सारे के सारे कल्याणकारी खर्चों को खत्म करने के लिए वचनबद्घ है। और यह दु:खद रुझान उन देशों को भी अपनी चपेट में ले सकता है, जहां वह पहले ही पहुंच नहीं गया है।

सदुपदेशों की दिल्ली घोषणा

ऐसे हालात में हो रहे जी-20 के शिखर सम्मेलन से यह उम्मीद की जाती थी कि वह इस आर्थिक संकट से उबरने के मामले में उसी तरह से कुछ कदम उठाएगा, जिस तरह से अमेरिका के आवसन के बुलबुले के फूटने के फौरन बाद हुई जी-20 की बैठक में कदम उठाए गए थे। तीसरी दुनिया के देशों के विदेशी ऋण के मामले में किसी पहल की खासतौर पर उम्मीद की जाती थी क्योंकि भारत द्वारा जी-20 की अपनी अध्यक्षता को, कम विकसित दुनिया के हितों के लिए एक अनुकूल प्रगति के रूप में पेश किया जा रहा था और कुछ भारतीय आधिकारिक प्रवक्ताओं ने तो इसका इशारा भी किया था कि तीसरी दुनिया के ऋण के मुद्दे पर चर्चा हो रही है।

लेकिन, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। इस शिखर सम्मेलन से जो दिल्ली घोषणा निकल कर आयी है, उसमें आज के ज्वलंत आर्थिक मुद्दों पर मुश्किल से ही कुछ कहा गया है, जबकि जैसाकि चीनी तथा रूसी प्रतिनिधिगण हमेशा से जोर देते आए थे, जी-20 को सुरक्षा के मामलों की कम और आर्थिक मामलों की ही ज्यादा चिंता करनी चाहिए। बेशक, इस घोषणा में यूक्रेन युद्घ के मुद्दे पर, इंडोनेशिया में बाली में हुए पिछले शिखर सम्मेलन की घोषणा की तुलना में, रुख में कुछ बदलाव आया है। जहां बाली घोषणा में नाम लेकर रूस की आलोचना की गयी थी, दिल्ली घोषणा में रूस को दोष देने से बचा गया है। लेकिन, इस घोषणा की शांति की पुकार, सराहनीय होते हुए भी, इसका शायद ही कोई असर होने वाला है।

नाटो देश शांति की सभी पहलों को विफल करते आए हैं क्योंकि वे तो यूक्रेनी जनता को, रूस के खिलाफ अपनी लड़ाई में, तोपों के चारे के तौर पर इस्तेमाल करने का मन बनाए बैठे हैं। अमेरिका तथा ब्रिटेन ने ही मिन्स्क समझौते को नाकाम किया था। इन्हीं देशों ने, रूस की सैन्य कार्रवाइयां शुरू होने के फौरन बाद शुरू हुई शांति वार्ताओं को भी नाकाम किया था। और वे अब भी यूक्रेन को युद्घ चालू रखने के लिए ही उकसाने में लगे हुए हैं। इसलिए, यह युद्घ तो तभी खत्म होगा, जब नाटो इसका अंत चाहेगा और नाटो के इसका अंत चाहने न चाहने पर, जी-20 की दिल्ली घोषणा का रत्तीभर असर पड़ने वाला नहीं है। यह इसके बावजूद है कि इस घोषणा में उन्होंने ऐसी शब्दावली के लिए अपनी हामी भर दी है, जो उनके लिए बहुत अनुकूल नहीं है। दिल्ली घोषणा में ऐसे पैराग्राफ हैं जो धार्मिक सहिष्णुता तथा विविधता का सम्मान करने की प्रशंसा करते हैं। यह बेशक प्रशंसनीय है, पर इसका शायद ही कोई व्यावहारिक महत्व होगा। इस वक्तव्य पर तुर्की के एर्दोगन तथा भारत के मोदी जैसे शासनाध्यक्षों ने दस्तखत किए हैं, जबकि उनके अपने देश, उनकी सरकारों की मिलीभगत से इससे ठीक उल्टी दिशा में बढ़ रहे हैं। ऐसे में संयुक्त वक्तव्य में इस तरह के जुमलों के आने को, सदुपदेशों की तरह ही देखा जा सकता है।

विकासशील देशों के लिए कुछ नहीं

बेशक, ऐसा तो नहीं है कि दिल्ली घोषणा में कोई आर्थिक मुद्दे आए ही नहीं हैं। लेकिन, ये मुद्दे बहुत ही सामान्यीकृत तरीके से आए हैं। इसमें तीसरी दुनिया के गरीब देशों के लिए ऋण राहत दिलाने के संबंध में कोई ठोस प्रस्ताव ही नहीं है बल्कि इस मुद्दे पर विचार करने के लिए किसी अंतर्राष्ट्रीय बैठक की बात तक नहीं है। इतना ही नहीं, सतत आर्थिक वृद्धि हासिल करने तक के मामले में, इस पर जरा सा विचार तक करना गवारा नहीं किया गया है कि यह किया कैसे जाएगा? बेशक, यह कहा जा सकता है कि घोषणाओं में ठोस प्रस्ताव नहीं रखे जाते हैं। लेकिन, इसका भी कोई साक्ष्य नहीं है कि इस शिखर सम्मेलन में वर्तमान ज्वलंत मुद्दों पर कोई चर्चा तक हुई है।

लेकिन, इसमें हैरानी की कोई बात भी नहीं है। आखिरकार, मेजबान देश की सबसे ज्यादा दिलचस्पी इस शिखर सम्मेलन से अपना अधिकतम प्रचार करने में ही थी, इसमें उसे कामयाबी मिली भी। दूसरी ओर गरीब देशों का तो, इस शिखर सम्मेलन में कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं था, जबकि वर्तमान संकट की सबसे ज्यादा मार उन्हीं को झेलनी पड़ रही है क्योंकि वे ही हैं जिन्हें आइएमएफ द्वारा थोपी जाने वाली ‘कटौतियों’ से कुचला जाता है। और विकसित देश तो आर्थिक संकट के होने की बात तक स्वीकार नहीं करते हैं, फिर उससे उबरने के उपायों पर विचार करने का तो सवाल ही कहां उठता है। यह दूसरी बात है कि व्यक्तिगत हैसियत से ‘प्रतिष्ठानिक अर्थशास्त्री’ भी संकट की मौजूदगी की तस्दीक कर चुके हैं। संक्षेप में जी-20 की बैठक तो एक ऐसा शो था जिसमें अलग-अलग देश, अपने ही अलग-अलग कारणों से हिस्सा ले रहे थे, लेकिन यह शो दुनिया के सामने उपस्थित समस्याओं को हल करने के लिए बहुत चिंतित नहीं था।

विकसित पूंजीवादी सरकारें निश्चिंत कैसे हैं?

बहरहाल, इससे एक सवाल उठता है कि विकसित देशों की सरकारें वर्तमान आर्थिक संकट को लेकर इतना निश्चिंत क्यों नजर आ रही हैं? पहले एक जमाने में तो बेरोजगारी का सवाल, पूंजीवादी सरकारों के लिए बहुत भारी चिंता का विषय हुआ करता था। उस जमाने में जॉन मेनार्ड केन्स ने, जो पूंजीवाद के घोषित हिमायती थे, यह तक कहा था कि, ‘दुनिया अब और इस बेरोजगारी को बर्दाश्त नहीं करेगी जो कि जुड़ी हुई है... आज के पूंजीवादी व्यक्तिवाद से।’ बेशक, उस पहले वाले दौर में बेरोजगारी, जोकि मंदी का लक्षण थी, मुनाफों में कमी के साथ चलती थी। इसलिए, बेरोजगारी जिस आर्थिक संकट का लक्षण थी, उसकी मार मजदूरों और पूंजीपतियों, दोनों पर पड़ती थी। लेकिन, समकालीन पूंजीवाद में अब वैसी स्थिति नहीं रही है। अब उत्पादन, मुनाफे का एकमात्र या मुख्य स्रोत तक नहीं रहा है। मुनाफों का खासा बड़ा हिस्सा वित्तीय गतिविधियों से आता है। इसलिए, अर्थव्यवस्था जब मंदी की अवस्था में होती है, तब भी पूंजीपतियों के मुनाफे मजबूत बने रहते हैं। बेशक, वित्तीय गतिविधियों में कोई अतिरिक्त मूल्य तो पैदा नहीं होता है, लेकिन उससे संसाधनों पर दावे तो पैदा होते ही हैं। इसलिए, जब उत्पादन गतिरोध में हो तब भी सार्वजनिक परिसंपत्तियों पर, छोटे पूंजीपतियों की परिसंपत्तियों पर और प्राकृतिक संसाधनों पर, ये दावेदारियां बढ़ती रह सकती हैं। इसी को जरा भिन्न तरीके से कहें तो उत्पादन के जरिए अतिरिक्त मूल्य के हड़पे जाने की जो प्रक्रिया चलती है, उसके पूरक के तौर पर समकालीन पूंजीवाद में बड़ेे कार्पोरेटों द्वारा परिसंत्तियों के सीधे अधिग्रहण की प्रक्रिया चल रही होती है, जिसमें अन्य पूंजीपतियों से, शासन से तथा ऐसे क्षेत्रों से जिन्हें तब तक माल उत्पादन के अंतर्गत न लाया गया हो, उनकी परिसंपत्तियों को हथियाया जाता है। इसे केंद्रीयकरण या पूंजी के आदिम संचय का मामला कहेंगे। इसीलिए, समकालीन पूंजीवाद के अंतर्गत प्रभुत्वशाली कॉर्पोरेट स्वार्थों को, मंदी मात्र से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है।

मुगालते की निश्चिंतता

लेकिन, इससे जन-बेरोजगारी तथा बदहाली के चलते जो सामाजिक अस्थिरता पैदा होती है, उसका क्या? जब हम उस संदर्भ को याद करेंगे जिसमें केन्स लिख रहे थे और आज के हालात से उसके अंतर को देखेंगे, तब हमारी समझ में आ जाएगा कि वर्तमान संकट के सामने विकसित देशों के निश्चिंत बने रहने की वजह क्या है? केन्स, बोल्शेविक क्रांति की पृष्ठभूमि में लिख रहे थे और यह वह जमाना था जब समाजवाद सिर्फ एक संभावना ही नहीं था, बल्कि सिर पर मंडराता नजर आता था। उस समय चिंता यह थी कि अगर बेरोजगारी के मामले में फौरन कुछ नहीं किया जाता है तो, मजदूरों का असंतोष पूंजीवादी व्यवस्था के लांघे जाने को ही एजेंडा पर ला देगा। दुर्भाग्य से, अब वैसी स्थिति नहीं है। वास्तव में मौजूद समाजवाद को धक्का लगने के बाद, अब विकसित पूंजीवादी दुनिया की सरकारों को सामाजिक अस्थिरता की संभावनाओं की चिंता करने की जरूरत नहीं रह गयी है। बेशक, विकसित पूंजीवादी देशों को अपने वर्चस्व के लिए एक चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन इस चुनौती में पहले जैसी तीखी विचारधारात्मक धार अब नहीं रही है। और मजदूर वर्ग की ओर से कोई खतरा आए भी तो उसे, फासीवादी तत्वों के इस्तेमाल से भोंथरा किया जा सकता है!

लेकिन, ऐसा मानकर वे मूर्खों के स्वर्ग में रह रहे हैं। इसी समय विकसित पूंजीवादी देशों में ही विशाल हड़ताली संघर्ष चल रहे हैं। और किसी को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि बोल्शेविक क्रांति भी जब हुई थी, उस समय तो ऐसा ही लगता था कि जैसे वह ‘अचानक आसमान से’ टपक पड़ी हो। 

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:

G20 Delhi Declaration Overlooks Deeping Global Economic Crisis

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