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पेड़ों, नदियों और पहाड़ों को मिल रहा क़ानूनी दर्जा लेकिन यह पर्यावरण मुद्दों का समाधान नहीं!

जैसे-जैसे पर्यावरणीय मुद्दों की गंभीरता और अधिक स्पष्ट होती जा रही है, क़ानून निर्माता प्रकृति की रक्षा के लिए नए तरीके खोज रहे हैं।
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गेलवे (आयरलैंड): जैसे-जैसे पर्यावरणीय मुद्दों का पैमाना और गंभीरता अधिक स्पष्ट होती जा रही है, कानून निर्माता प्रकृति की रक्षा के लिए नए तरीके खोज रहे हैं।

इनमें से एक तरीका प्रकृति के तत्वों - पेड़ों, नदियों और पहाड़ों - को कानूनी अधिकार देना और लोगों को उनकी ओर से अदालत का रुख करने की अनुमति देना है।

2022 में, स्पेन में खारे पानी का लगून मार मेनोर यूरोप का पहला पारिस्थितिकी तंत्र बन गया जिसे एक कंपनी के समान सीमित कानूनी दर्जा दिया गया।

इस बीच, जैव विविधता ह्रास को लेकर आयरलैंड में हाल में एक नागरिक सभा हुई। सभा ने संविधान में संशोधन कर उसमें प्रकृति के अधिकारों से संबंधित एक प्रावधान शामिल करने की सिफारिश की।

 ऐसा ही विचार 1970 की शुरुआत में भी पेश किया गया था, जब एक अमेरिकी कानूनी विद्वान क्रिस्टोफर स्टोन ने प्राकृतिक तत्वों के अधिकारों के धीरे-धीरे विस्तार पर बहस छेड़ दी थी।

स्टोन जानते थे कि आज नहीं तो कल अमेरिकी उच्चतम न्यायालय इस मामले पर सुनवाई करेगा, जिसमें सिएरा क्लब नामक पर्यावरणीय संगठन ने सिकोइया राष्ट्रीय वन में स्की रिसॉर्ट के निर्माण पर रोक लगाने का अनुरोध किया था।

स्टोन को यह भी पता था कि पर्यावरण पर खास ध्यान देने के लिए जाने जाने वाले एक न्यायाधीश विलियम ओ. डगलस इसका समर्थन करेंगे। स्टोन ने जल्द ही इसपर एक लेख लिखा जिसका शीर्षक था, ‘क्या पेड़ों के अधिकार होने चाहिए?’ इस लेख में उन्होंने अपने विचार विस्तारपूर्वक प्रकट किए।

न्यायाधीश डगलस को यह विचार पसंद आया और उन्होंने अपने फैसले में इसका जिक्र करते हुए कहा, “वादी के रूप में नदी अपने जीवन की पारिस्थितिक इकाई की बात करती है जो इसका हिस्सा है। वे लोग जिनका नदी से सार्थक संबंध है - चाहे वह मछुआरा हो, नौका चलाने वाला हो, प्राणीशास्त्री हो या लकड़हारा - उन्हें उन मूल्यों के लिए आवाज उठानी चाहिए जिनका नदी प्रतिनिधित्व करती है और जिन मूल्यों के पतन का खतरा है।”

हालांकि उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीश डगलस के इन विचारों से प्रभावित नहीं हुए, लेकिन इन विचारों की वजह से इस विषय पर अकादमिक लेखनों की बाढ़ आ गई। साथ ही स्की रिसॉर्ट का निर्माण भी नहीं हो पाया।

कुछ समय के लिये स्टोन मीडिया में सुर्खियों में रहे। इसके बाद प्रकृति को कानूनी अधिकार देने का विचार लोगों की नजरों से ओझल हो गया। 21वीं सदी की बात करें तो पर्यावरण कार्यकर्ताओं के साथ-साथ शिक्षाविदों ने इस विचार को एक नया जीवन दिया है। इसमें विभिन्न विचारधाराओं को शामिल किया गया है और इन सिद्धांतों पर अब दुनिया भर में अमल किया जा रहा है।

अब तक, वे पर्यावरणीय समस्याओं का त्वरित समाधान नहीं कर पाए हैं। लेकिन कुछ सफलताएं हासिल हुई हैं। अधिक प्रयोग यह पहचानने में मदद कर सकते हैं कि इन विचारों को प्रभावी ढंग से कैसे कार्यान्वित किया जाए। लेकिन केवल प्रकृति को अधिकार देना शायद मजबूत संस्थानों और सार्थक प्रवर्तन का विकल्प नहीं है।

तीन देशों न्यूजीलैंड, बांग्लादेश और इक्वाडोर में प्रकृति को अधिकार देने के प्रयास किए जा चुके हैं, लेकिन वे खास कारगर साबित नहीं हुए।

1840 में, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड के स्वदेशी माओरी लोगों के बीच वेटांगी की संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस संधि का उद्देश्य भूमि और संसाधनों से संबंधित माओरी लोगों के अधिकार की रक्षा करना था।

संधि से संबंधित एक समझौते के तहत ते उरेवेरा नामक पूर्व राष्ट्रीय उद्यान को 2014 में और वांगानुई नदी को 2017 में न्यूजीलैंड के कानून में अधिकार प्राप्त संस्थाओं के रूप में मान्यता दी गई।

इस समझौते में प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन के लिए दो बोर्ड गठित किया जाना शामिल है, जिसमें सरकार और स्थानीय जनजाति का संयुक्त प्रतिनिधित्व होगा। ते उरेवेरा पर पुनर्विचार करने की योजनाएं अभी भी तैयार की जा रही हैं, और वांगानुई नदी के लिए प्रतिनिधित्व हाल ही में नियुक्त किया गया है। इसमें कोविड-19 महामारी समेत विभिन्न कारणों से देरी हुई है। इस योजना के तहत 30 मिलियन न्यूजीलैंड डॉलर की लागत से नदियों का जीर्णोद्धार किया जाएगा।

हालांकि यह योजना कितनी कारगर साबित होगी, यह तो वक्त ही बताएगा।

इसी तरह साल 2019 में, बांग्लादेश के उच्च न्यायालय ने तुराग नदी (और बांग्लादेश की अन्य सभी नदियों) को कानूनी अधिकारों के साथ एक जीवित इकाई के रूप में मान्यता दी और कहा कि सरकार इसकी रक्षा के लिए महत्वपूर्ण कार्रवाई करे। अदालत के निर्देश के बाद राष्ट्रीय नदी संरक्षण आयोग ने त्वरित कार्रवाई का वादा किया। लेकिन, आज भी, बड़े पैमाने पर औद्योगिक और मानव अपशिष्ट फेंके जाने के कारण होने वाले प्रदूषण की वजह से देश में कई जल निकाय “मृत” अवस्था में हैं।

बांग्लादेश की राजधानी ढाका के दक्षिण-पश्चिम में बहने वाली बुरिगंगा नदी अब इतनी प्रदूषित हो गई है कि इसका पानी काला दिखाई देता है।

साल 2008 में, इक्वाडोर ने एक नया संविधान अपनाया जिसमें स्पष्ट रूप से प्रकृति के अधिकार को मान्यता देने वाला एक लेख शामिल है।

इस घटनाक्रम के कारण भूमि मालिक और पर्यावरणविद देश की नदियों व जंगलों की रक्षा के लिए अदालत में मामला दायर कर सकते हैं, और धीरे-धीरे यह अधिकार वास्तविकता बन गया है।

इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण 2021 में सामने आया जब इक्वाडोर संवैधानिक न्यायालय ने लॉस सेड्रोस में खनन परमिट रद्द कर दिया - जो कि एंडियन पहाड़ों में व्यापक जैव विविधता एक वन क्षेत्र है। इस लिहाज से देखें तो इक्वाडोर एकमात्र देश है, जहां उम्मीद की किरण दिखाई देती है। हालांकि प्रकृति को उसका अधिकार प्रदान करने के लिए हमें अभी लंबा रास्ता तय करना है।

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