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यूपी चुनावों को लेकर चूड़ी बनाने वालों में क्यों नहीं है उत्साह!

कोविड-19 की तीन लहरें और उसके बाद के लॉकडाउन, डेंगू का प्रकोप, कच्चे माल और गैस की क़ीमतों में इज़ाफ़ा, कच्चे माल पर  GST के चलते फ़िरोज़ाबाद के पारंपरिक कांच उद्योग को भारी मंदी का सामना करना पड़ा है।
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तब आपके दिमाग़ में क्या आता है, जब आप आलीशान झिलमिलाते झाड़-फ़ानूस, ख़ूबसूरती से तराशे हुए कांच के बीयर मग, कांच के अलंकृत लैंप और आकर्षक मूर्तियों के बारे में सोचते हैं? यही न कि ये स्वीडन, मुरानो या किसी दूसरे यूरोपीय देश से आयात किये जाते होंगे? लेकिन नहीं, ऐसा नहीं है, क्योंकि इसके लिए आपको इतनी दूर जाने की ज़रूरत बिल्कुल नहीं है। फ़िरोज़ाबाद कई दशकों से देश के घरेलू बाज़ार के लिए कांच से बनी इस्तेमाल की तमाम चीज़ों और सजावटी उत्पादों के 80% से ज़्यादा का निर्माण कर रहा है।

यह ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों को भी ये शानदार उत्पाद भेजता है।

हैरत की कोई बात नहीं कि उत्तर प्रदेश के इस छोटे से औद्योगिक शहर को देश का कांच केंद्र भी कहा जाता है। यह राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से तक़रीबन 255 किलोमीटर दूर और ताजमहल के शहर आगरा से एक घंटे की दूरी पर स्थित है।

उद्योग-आधारित कांच उत्पादों में दो प्रक्रियायें शामिल होती हैं- ग्लास ब्लोइंग और मैनुअल फिनिशिंग। ग्लास ब्लोइंग कांच बनाने वाली ऐसी तकनीक है, जिसमें ब्लोपाइप की सहायता से पिघले हुए कांच को बुलबुले में फुलाया जाता है। इसके बाद शिल्पकार इस पिघले हुए कांच को शिल्प उत्पाद में बदल देते हैं।

ये कारीगर पेपरवेट, मोतियों, फूलों के फूलदान, ऐशट्रे, डिज़ाइनर जग आदि जैसे अनूठे हस्तशिल्प उत्पादों का उत्पादन करने के लिए लैम्पवर्क ग्लास का भी निर्माण करते हैं। वे लौ की ताप पर कांच की छड़ों को पिघला लेते हैं और उन्हें सुंदर मूर्तिकला उत्पादों में बदल देते हैं। अगर दुनिया के कांच कलाकारों से बेहतर नहीं, तो उनके इस कौशल की तुलना दुनिया के सर्वश्रेष्ठ कांच कलाकारों से तो की ही जा सकती है।

पुराने समय के लोगों का कहना है कि स्थानीय कारीगरों ने दिल्ली सल्तनत के लाये फ़ारसी कांच के कलाकारों से कांच के दीपक बनाने का प्रशिक्षण देने का कौशल हासिल किया था, ताकि सुल्तानों की ज़रूरतों को स्थानीय स्तर पर पूरा किया जा सके। धीरे-धीरे, कला का यह रूप विकसित होते-होते एक सुस्थापित उद्योग बन गया,जिसका कि अब राष्ट्रीय और वैश्विक बाज़ारों पर वर्चस्व है।

यह शहर कांच से बनी अपनी सुंदर चूड़ियों के लिए भी जाना जाता है; इसलिए इसे 'सुहाग नगरी' भी कहा जाता है। हालांकि, ये चूड़ियां सभी उम्र, धर्म और हैसियत की महिलाओं की कलाई को सुशोभित करती हैं, लेकिन विवाहित महिलायें इन्हें पूरे देश में पहनती हैं, क्योंकि ये उनकी वैवाहिक स्थिति का एक सांस्कृतिक प्रतीक हैं।

जहां कारखानों में केवल सादे चूड़ियों का उत्पादन होता है, वहीं उन्हें घर पर महिलाओं इन्हें आकर्षक डिज़ाइन बख़्शती हैं। इन ख़ूबसूरत चूड़ियों पर बहुत सारे तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है।

चूड़ी उत्पादन

कांच की चूड़ी उस सिलिका रेत से बनी होती है, जो 2,800 डिग्री सेल्सियस पर पिघलती है। फ़िरोज़ाबाद के चूड़ी कारखानों में लगी औद्योगिक भट्टी को चलाने का अधिकतम तापमान 1,200 डिग्री सेल्सियस होता है। इसलिए, सिलिका रेत को उस गाढ़े सोडा ऐश (सोडियम नाइट्रेट) के साथ मिलाया जाता है, जो इसके गलनांक को 1,100 डिग्री सेल्सियस तक कम कर देता है। इसके लिए आर्सेनिक और सोहागा (सोडियम बाइकार्बोनेट) का भी इस्तेमाल किया जाता है।

कांच को मज़बूती देने के लिए इसमें सोडियम क्लोराइड मिलाया जाता है। चूड़ियों के विभिन्न ज़रूरी रंगों के लिए इस मिश्रण के साथ कॉपर ऑक्साइड, क्रोमियम बाइकार्बोनेट, कैडमियम सल्फ़ाइड और सेलेनियम ऑक्साइड मिलाया जाता है। मसलन, फ़िरोज़ा रंग के लिए एक निश्चित अनुपात में कॉपर ऑक्साइड मिलाया जाता है, हल्के हरे (धानी) रंग के लिए क्रोमियम बाइकार्बोनेट, हरे रंग के लिए क्रोमियम बाइकार्बोनेट और कुछ मात्रा में कॉपर ऑक्साइड, पीले रंग के लिए कैडमियम सल्फ़ाइड, लाल रंग के लिए कैडमियम सल्फ़ाइड और सेलेनियम ऑक्साइड, नीले रंग के लिए कोबाल्ट, काले रंग के लिए मैंगनीज़ ऑक्साइड और क्रोमियम बाइकार्बोनेट मिलाये जाते हैं।  

चमक खोता उद्योग 

200 साल पुराने कहे जाने वाले फ़िरोज़ाबाद के इस पारंपरिक कांच उद्योग में भारी गिरावट देखी गयी है और इस गिरावट के पीछे की वजह कोविड-19 की तीन लहरें और उसके बाद के लॉकडाउन, डेंगू का प्रसार, कच्चे माल और गैस की क़ीमतों में इज़ाफ़ा, उच्च वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) है। बेरोज़गारी में बढ़ोत्तरी और अर्थव्यवस्था के घाटे में होने के चलते चूड़ियों, मूर्तियों, खिलौनों, रौशनी और सजावट के सामान, झूमर और लैब में इस्तेमाल होने वाले उपकरण जैसे कांच के उत्पादों की मांग में तेज़ी से गिरावट आती देखी गयी है।

इससे तक़रीबन 30% कारखाने बंद होने के लिए मजबूर हो गये है।इसका नतीजा यह हुआ है कि इस उद्योग के लगभग 80,000 कारीगरों और मज़दूरों की नौकरी चली गयी है। जो इकाइयां काम कर भी रही हैं, उन्होंने अपने उत्पादन में 15% की कमी कर दी है।

मैनपुरी गेट पर स्थित विनोभा ग्लास वर्क्स के मालिक ज़हीनुद्दीन सिद्दीक़ी ने न्यूज़क्लिक के लिए बताया, "इस कुटीर उद्योग को दूसरे एमएसएमई (सूक्ष्म, छोटे और मझोले उद्यमों) को आपूर्ति की जाने वाली गैस की क़ीमतों के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा प्राकृतिक गैस की आपूर्ति की जाती है। इसके अलावा, इस ईंधन की यह दर निश्चित नहीं, बल्कि लचीली होती है। यह अलग-अलग आपूर्ति के लिए अलग-अलग होती है। चूड़ी की क़ीमतों का हिसाब लगाने का यह बहुत ही मुश्किल वक़्त है। कभी-कभी तो हम इसे पिछली आपूर्ति वाली गैस की क़ीमत पर ही बेच देते हैं। लेकिन, जब बिल आता है, तो हम गैस की क़ीमत को बढ़ा हुआ पाते हैं। इससे हमें नुक़सान हो जाता है।"

उनकी शिकायत है कि सरकार विभिन्न इकाइयों के लिए ज़रूरी और पर्याप्त मात्रा में गैस उपलब्ध नहीं कराती है। नतीजतन, कारखाने के मालिकों को आरएलएनजी(Regasified Liquefied Natural Gas) ख़रीदना पड़ता है, जो कि ज़्यादा क़ीमत पर बेची जाती है, ताकि गैस की ज़रूरत में आने वाले अंतर की भरपाई की जा सके।

फ़िरोज़ाबाद में रोज़ाना क़रीब 12-15 लाख क्यूबिक मीटर गैस की खपत होती है, जबकि यहां की इकाइयों को एपीएम (Administered Pricing Mechanism) क़ीमतों पर रोज़ाना 11 लाख क्यूबिक मीटर का कोटा आवंटित किया गया है। जब यह ज़रूरत बढ़ जाती है, तो बढ़ी हुई गैस की मांग की भरपाई इसी रेगैसिफ़ाइड लिक्विड नेचुरल गैस (RLNG) से की जाती है, जो कि महंगा पड़ता है। जब इन दो अलग-अलग क़ीमतों को जोड़ा जाता है, तो यह यूपीएम (यूनिफ़ॉर्म प्राइसिंग मैकेनिज़्म) की क़ीमतें बन जाती हैं।

उन्होंने बताया कि कांच की इन चूड़ियों को जीएसटी से छूट तो दी गयी है, लेकिन उन्हें कच्ची सामग्री ख़रीदते समय ही इस कर का भुगतान करना होता है। "इसलिए, परोक्ष रूप से हम जीएसटी का भुगतान करते हैं। चूंकि अंतिम उत्पाद इसके दायरे से बाहर है, इसलिए हम इसे फिर से हासिल करने में नाकाम रहते हैं। इसका मतलब है कि हम करों का भुगतान तो करते हैं, लेकिन उन्हें वसूल नहीं पाते हैं। इससे हमें नुक़सान हो जाता है। यह कहीं अच्छा होगा कि सरकार चूड़ियों को भी जीएसटी के दायरे में ले आये।"

कोविड-19 के पहले चरण के बाद ऑर्डर आने शुरू हो गये थे। इससे 10,000 करोड़ रुपये का यह उद्योग ठीक हो रहा था। लेकिन, दूसरे लॉकडाउन ने स्थिति को फिर से वहीं लाकर खड़ा कर दिया, जिससे यह कारोबार एक बार फिर थम गया।

उन्होंने आगे बताया, "कम से कम 30% विनिर्माण इकाइयां बंद कर दी गयी हैं। जो इकाइयां चल रही हैं, वे भारी नुक़सान में काम कर रही हैं, क्योंकि कारोबार में 50% से ज़्यादा की गिरावट आ गयी है। जो इकाइयां बंद हो रही थीं, उन्होंने अपने उत्पादन को 15% से भी कम करके ख़ुद को पुनर्जीवित करने की कोशिश की थी। लेकिन, वे नाकाम रहे। हम उत्पादन को 15% से ज़्यादा कम नहीं कर सकते, क्योंकि इसमें ख़र्च तक़रीबन समान ही रहता है।"

फ़िरोज़ाबाद पिछले साल सितंबर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में डेंगू के प्रकोप का केंद्र था। ऑल इंडिया ग्लास मैन्युफैक्चरर्स फेडरेशन के कोषाध्यक्ष और कांच उत्पादों के निर्यातक मुकेश कुमार बंसल ने कहा, "कोविड-19 की दूसरी लहर के बाद इस ज़िले में डेंगू का प्रकोप यहां के कांच उद्योग के लिए एक बड़ा झटका था।" उनका कहना है कि उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ, क्योंकि श्रमिक बुखार में थे। दूसरा कारण यह है कि बड़े ख़रीदारों के नुमाइंदों ने कोविड और लॉकडाउन के चलते इस शहर का रुख़ ही नहीं किया।

प्रकोप का वह वक़्त बहुत मुश्किल था। उत्पादकों को देश और दुनिया भर से हर साल सितंबर के आसपास ज़्यादतर ऑर्डर मिलते हैं। उत्पादों को दिवाली और क्रिसमस के आसपास भेज दिया जाता है। उन्होंने बताया कि इसका कुल टर्नओवर 10,000 करोड़ रुपये प्रति वर्ष का है, लगभग 2,500 करोड़ के वर्क ऑर्डर इसी सीज़न के दौरान मिलते हैं। श्रमिकों के इस संकट ने एक समस्याग्रस्त स्थिति को पैदा कर दिया।

कभी आगरा का एक हिस्सा रहे फ़िरोज़ाबाद को 1989 में एक ज़िले का दर्जा दिया गया था, लेकिन ज़मीन पर बहुत कुछ नहीं बदला।

यह चूड़ी उद्योग 1996 तक फलता-फूलता रहा। पर्यावरण प्रदूषण पर दायर एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के दिये गये आदेश के बाद जब फ़िरोज़ाबाद को ताज ट्रैपेज़ियम ज़ोन (TTZ) में शामिल कर लिया गया, तो ताजमहल के आसपास के इस क्षेत्र में एक ज़बरदस्त बदलाव देखा गया।

शीर्ष अदालत ने टीटीजेड के तहत आने वाली औद्योगिक इकाइयों में कोयले के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया और प्राकृतिक गैस को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने का निर्देश दिया।

गैस के एक वैकल्पिक ईंधन बनने के साथ ही बोतलें, सजावटी सामान, झूमर और कांच से बने दूसरे पदार्थ लोकप्रिय हो गये।

मज़दूरों की बदहाली

चूड़ी बनाना एक श्रमसाध्य काम है। यह उद्योग इस समय भी पारंपरिक तरीक़ों का ही इस्तेमाल करता है। मसलन, हर एक चूड़ी को बनते हुए 80 हाथों से गुज़रना होता है। शायद यही वजह है कि दुनिया भर से ख़रीदार यहां आते हैं।

लेकिन, निर्माण इकाइयां लंबे-लम्बे समय तक काम करवाकर और दैनिक मज़दूरी और दूसरे अधिकारों से वंचित करके अपने मज़दूरों का शोषण करती हैं। तक़रीबन 70% श्रमिकों को न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं मिलती है। वे बेहद प्रदूषित और ख़तरनाक माहौल में काम करते हैं।

कांच और चूड़ी मज़दूर सभा के अध्यक्ष रामदास मानव ने न्यूज़क्लिक को बताया, "श्रमिकों को रोज़ान आठ घंटे काम करने के लिए 200 रुपये मिलते हैं। उन्हें बहुत कम भुगतान किया जाता है। उच्च तापमान वाली भट्टियों से निकलने वाली गर्म हवा के संपर्क मे आने, पिघले हुए कांच से चौंधिया देने वाली चमक पैदा होने और सिलिका के सूक्ष्म कणों को सांस के भीतर लेने से सांस से जुड़ी समस्यायें, सिलिकोसिस, कमजोर होती नज़र, गंभीर डिहाइड्रेशन और दूसरी बीमारियां होती हैं।" .

घोर ग़रीबी के चलते श्रमिकों के पास इन ख़तरनाक और अमानवीय परिस्थितियों में काम करने के अलावा और कोई चारा नहीं है। उन्हें अपने परिवारों के वजूद को क़ायम रखने के लिए यह सब करना होता है।

उन्होंने कहा, "कोविड ने जहां उनकी हालत ख़राब कर दी थी, वहीं डेंगू और कारखानों के बंद होने से यह स्थिति और भी ख़राब हो गयी है। सरकार को उनके बारे में गंभीरता से कुछ करना चाहिए।"

महज़ एक और चुनाव

फ़ैक्ट्री मालिकों से लेकर कारोबारियों और श्रमिकों तक के बीच राज्य में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर कोई उत्साह नहीं दिख रहा, क्योंकि उनसे किये गये वादे अधूरे हैं।

ग्लास इंडस्ट्रियल सिंडिकेट के कोषाध्यक्ष पीके जिंदल ने बताया, "फ़िरोज़ाबाद को ऊपर वाले की रहम पर छोड़ दिया गया है। यहां किसी भी बदलाव की बहुत कम उम्मीद है। राजनीतिक नेता बड़े-बड़े वादे करते हैं, और सरकारें आती हैं और जाती रहती हैं, लेकिन यहां कुछ नहीं होता है। चुनावी वादों की तो कोई क़ीमत ही नहीं रह गयी है।" 

उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान आयोजित उन जनसभाओं का हवाल दिया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वादा किया था कि प्राकृतिक गैस कम क़ीमतों और आसान शर्तों पर उपलब्ध करायी जायेगी।

उन्होंने बताया, "हालांकि, वह सरकार बनाने के बाद अपने चुनावी वादों को भूल गये।" उन्होंने आगे कहा, "चुनाव हमारे लिए नये तो हैं नहीं और चुनावों से उद्योग की स्थिति में कोई बदलाव भी नहीं आते हैं। फिर भी हम फ़िरोज़ाबाद की पहचान बचाने को लेकर व्यापक योजना का इंतज़ार कर रहे हैं।”

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें:

Why UP Assembly Elections Seem to Generate No Enthusiasm Among Bangle Makers

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