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गैर-बराबरी वाले समाज में ट्रांसजेंडर समुदाय का मानसिक स्वास्थ्य

“12-13-14 की उम्र में अपने शरीर और मन के बदलावों से गुज़र रहे ट्रांसजेंडर बच्चे को काउसिंलिंग की जरूरत होती है। परिवार सपोर्ट नहीं करता। हमारा स्वभाव, व्यवहार, अभिव्यक्ति अलग होते हैं। परिवारवाले नाराज़ होते हैं कि उनका बच्चा ऐसा क्यों कर रहा है। उस समय माता-पिता को भी काउंसिलिंग की जरूरत होती है।.....”
Mental Health
ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ कार्य कर रही संस्था के दफ्तर में लगा पोस्टर, मानसिक हिंसा ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के साथ बड़ी समस्या है।

इस वर्ष विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस की थीम है “गैर-बराबरी वाले समाज में मानसिक स्वास्थ्य”। और डब्ल्यूएचओ ने लक्ष्य दिया है कि सभी को मानसिक स्वास्थ्य देखभाल मिले, इसे वास्तविकता बनाना। क्या ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर हम कुछ कर रहे हैं?

43 वर्ष की ट्रांस महिला शगुन चाहती हैं कि अलग जेंडर के चलते जो मुश्किलें उन्हें झेलनी पड़ी, आने वाली पीढ़ी के ट्रांसजेंडर बच्चों को उन तकलीफों से न गुज़रना पड़े। शगुन मानती हैं “12-13-14 की उम्र में अपने शरीर और मन के बदलावों से गुज़र रहे ट्रांसजेंडर बच्चे को काउसिंलिंग की जरूरत होती है। परिवार सपोर्ट नहीं करता। हमारा स्वभाव, व्यवहार, अभिव्यक्ति अलग होते हैं। परिवारवाले नाराज़ होते हैं कि उनका बच्चा ऐसा क्यों कर रहा है। उस समय माता-पिता को भी काउंसिलिंग की जरूरत होती है। उन्हें संवेदनशील बनाने की जरूरत होती है। मैंने मां-बाप को अपने बारे में सच्चाई बताई तो उन्होंने मुझे स्वीकार नहीं किया। मुझे बचपन में घर छोड़ना पड़ा। मेरे सामने कोई विकल्प नहीं था”।

हरिद्वार में रह रही शगुन ट्रांसजेंडर युवाओं को एचआईवी से बचाव के लिए कार्य कर रही हैं।

वह बताती हैं “मैंने अपने जीवन में कई बार आत्महत्या की कोशिश की। कुछ वर्ष पहले तक मेरे मन में आत्महत्या के ख्याल आते रहते थे। लगता था कि जीवन में इतनी दुविधा और निराशा है कि इसे कैसे जिऊं। लेकिन जब से मैं एचआईवी से बचाव के लिए कार्य कर रही संस्थाओं से जुड़ी, इस क्षेत्र में कार्य कर रहे एक्टिविस्ट के संपर्क में आई तो मैंने खुद को स्वीकार कर लिया। मैं मोटिवेट हो गई हूं। मैं ऐसी बहुत सी ट्रांसजेंडर महिलाओं को जानती हूं जिन्होंने कभी न कभी आत्महत्या की कोशिश की है। मेरी एक ट्रांसजेंडर सहेली ने होटल के कमरे में फांसी लगा ली थी।”।

शगुन की कहानी बहुत से ट्रांसजेंडर युवाओं की कहानी है। जीवन के मुश्किल हालात का सीधा असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।

शगुन अब ट्रांसजेंडर समुदाय के बीच बतौर एक्टिविस्ट कार्य कर रही हैं

दिल-दिमाग की दुविधा

 “मैंने विज्ञान के विषयों में 77 प्रतिशत अंक के साथ 10वीं पास की थी। लेकिन ट्रांसजेंडर होने के चलते 12वीं की पढ़ाई रेग्यूलर न करके प्राइवेट इग्जाम दिया। मैंने बीएससी में एडमिशन लिया। लेकिन मानसिक तनाव के चलते लगा कि बीएससी के लिए फोकस नहीं कर पाउंगी। फिर मैंने बीएससी छोड़ बीए में एडमिशन लिया। बीए पास करने में मुझे कई साल लग गए। सार्वजनिक तौर पर परीक्षा देने में मुझे घबराहट महूसस होती थी। लगता था कि सब मेरा मज़ाक उड़ा रहे होंगे। लड़के अपने जैसे लड़कों के साथ रहना पसंद करते थे। लड़कियां अपने समूह में रहती थीं। मैं बिलकुल अलग-थलग पड़ गई थी। स्कूल में तो बच्चों ने मेरा बहुत मज़ाक बनाया”।

“मुझे बचपन से सजना-संवरना पसंद था। मां की साड़ियां पहनना पसंद था। घरवालों के लिए मैं बेटा थी। लेकिन मन बेटी का था”।

“मैं अपने समय में जागरुक थी। दसवीं पास करने के बाद अपना सेक्स चेंज करवाने के लिए अपनी मां को लेकर मैं दिल्ली गई थी। उस समय डॉक्टर ने एक लाख रुपये खर्च बताया था। ये आज से 20-25 साल पहले की बात है। जब हम दिल्ली से लौटकर आए तो परिवारवालों ने पैसे देने से इंकार कर दिया। रिश्तेदारों के साथ बात की। रिश्तेदारों ने मेरा मेडिकल करवाया। उस डॉक्टर ने कहा था कि वे कुछ दवाएं देंगे जिससे मैं ठीक हो जाउंगी। मेरी दाढ़ी आ जाएगी। वे मुझे और मेरे शरीर के अंदर की आत्मा को नहीं समझ पा रहे थे।" 

“परिवार के साथ लगातार तनाव और हिंसा झेलते-झेलते साल 2003 में मैंने घर छोड़ दिया। मैं न पुरुष की तरह नज़र आती थी, न स्त्री की तरह। मैं किन्नर नज़र आती थी। इसलिए कोई मुझे किराए पर कमरा देने को तैयार नहीं होता था”।

“रोटी खाने के लिए मैंने ट्रेन में भीख तक मांगी। एक बार हरिद्वार में गंगा किनारे बैठी थी। तो कुछ किन्नर वहां आए। वे वहीं पैसे मांगते थे। देह व्यापार भी करते थे। वे मुझे अपने साथ ले गए। उन्होंने सोचा था कि मुझसे भी देह व्यापार करवाएंगे। मैं 6 महीने उनके साथ रही। मैं ठीकठाक परिवार से थी। वहां नहीं रह पा रही थी। मैंने अपने परिवार में संपर्क किया। बहुत रोई। तो उन्होंने मुझे घर बुला लिया। तभी मैंने 12वीं की परीक्षा दी थी”।

“मैं पढ़ाई में अच्छी थी। परिवार ने साथ दिया होता तो मैं भी डॉक्टर, इंजीनियर या टीचर बन सकती थी। मेरी बहन अब कहती है कि तुम भी किन्नर अखाड़े की लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी की तरह बन सकती थी। लेकिन जब जरूरत थी तो उसने भी सपोर्ट नहीं किया। भाई को पढ़ाया। बहन को दहेज दिया गया। लेकिन मुझे कुछ भी नहीं...”।

ट्रांसजेंडर और मानसिक स्वास्थ्य

शगुन ज़ोर देकर कहती हैं “मैं मानती हूं कि किशोर उम्र में आ रहे ट्रांसजेंडर बच्चे मेंटल हेल्थ केयर की जरूरत होती है। साथ ही उनके मां-बाप की काउंसिलिंग भी बहुत जरूरी है। ज्यादातर ट्रांसजेंडर अब भी एक उम्र के बाद घर छोड़ देते हैं। इसके बाद वे देह-व्यापार से जुड़ते हैं। एचआईवी जैसी बीमारियों की चपेट में आते हैं”।

“आप अस्पताल में जाओ तो फिजिशियन मिलेंगे, दूसरे डॉक्टर मिलेंगे लेकिन मनो-चिकत्सक नहीं मिलेंगे। मैं मानती हूं कि जिला अस्पताल में कम से कम एक मनो चिकित्सक तो होना ही चाहिए। यही नहीं, एमबीबीएस की पढ़ाई के दौरान मेडिकल स्टुडेंट्स को जेंडर को लेकर सेंसेटाइज किया जाना चाहिए। ताकि वे ट्रांसजेंडर बच्चों-युवाओं का सही इलाज कर सकें”।

“मुझे ये भी लगता है कि 10वीं-11वीं के सिलेबस में भी जेंडर संवेदनशीलता पर चैप्टर होना चाहिए। जिसमें लड़का-लड़की के साथ ट्रांसजेंडर के बारे में भी बात करनी चाहिए। सेक्स और जेंडर अलग-अलग होते हैं। सेक्स तो मुझे जन्म के समय मिला। लेकिन मेरा जेंडर वो है जो मैं महसूस करती हूं”।

“सरकारों को ट्रांसजेंडर समुदाय के बारे में भी सोचना चाहिए। आखिर हम भी तो इस देश के नागरिक हैं”।

ग़ज़ल कहती हैं कि दोराही ज़िंदगी जीते-जीते बहुत से युवा तंग हो गए हैं, फिर भी कुछ नहीं कर सकते..।

घुट-घुट कर जीते हैं ट्रांसजेंडर’

देहरादून में रह रही गजल रोज़ उन्हीं रास्तों से गुजरती है, जिनसे हम और आप। घर, सड़क, बाज़ार, समाज से उसकी दुनिया के धागे वैसे ही जुड़े हैं जैसे हमारे और आपके। उम्र के साथ उसके मन में भी ख़ुशी, जुनून, शरारतें, समझदारियां वैसे ही आती गईं जैसे हमारे और आपके। लेकिन गजल को सड़क, बाजार, समाज उस तरह नहीं लेता जैसे हमें या आपको।

ट्रांसजेंडर से जुड़े मुद्दों पर कार्य कर रही देहरादून की परियोजन कल्याण समिति से ग़ज़ल पियर एजुकेटर (सह-शिक्षक) के तौर पर जुड़ी हैं।

ग़ज़ल बताती हैं “बहुत से ट्रांसजेंडर समाज के सामने आना ही नहीं चाहते हैं। वे अपनी पहचान छिपाकर रह रहे हैं ताकि घरवालों के साथ रह सकें। किसी को घरवाले स्वीकार नहीं करते तो किसी को ज़माना स्वीकार नहीं कर रहा। बहुत से ऐसे युवा हैं जो अंदर ही अंदर घुट रहे हैं। एक तरह से दोराही ज़िंदगी जीते-जीते हम में से बहुत से लोग तंग हो गए हैं। फिर भी कुछ नहीं कर सकते। इस मामले में हम लोग निहत्थे हैं”।

“सड़क पर चलते हैं तो लोग कमेंट पास करते हैं। कोई कहता है कि इन्हें अपने बगल में मत बैठने दो। अपने से दूर रखो”।

“हम रोजगार चाहते हैं। नौकरी मांगने जाते हैं और सोचते हैं कि लोग हमें सामान्य व्यक्ति की तरह देखें। लेकिन हमें हमेशा अलग नज़र से देखा जाता है। हमें कोई नौकरी नहीं देना चाहता। लोगों को हमारी नज़ाकतों से दिक्कत रहती है कि हमारी हरकतें ऐसी-वैसी हैं। हमारे रहने से माहौल खराब हो जाएगा। साथ के लोगों पर गलत असर पड़ेगा। हमारे हाव-भाव भी ईश्वर की देन हैं”।

ग़ज़ल कहती हैं कि एक ट्रांसजेंडर युवा के सामने आजीविका के साधन जुटाना सबसे बड़ी चुनौती होती है।

देवयानी बताती हैं कि ट्रांसजेंडर युवाओं के लिए काउंसिलिंग बेहद जरूरी है, ताकि उनके मन में निराशा न घर करे

परियोजन कल्याण समिति से जुड़ी देवयानी ट्रांसजेंडर युवा और उसके परिवार की काउंसिलिंग करती हैं। वह बताती हैं “बच्चे के जेंडर में फर्क का पता चलने पर ज्यादातर परिवार स्वीकार नहीं करते और उससे संबंध खत्म कर देते हैं। घर से निकाल देते हैं। इस तनाव से कई बच्चे खुदकुशी तक कर लेते हैं। वह बताती हैं कि हरिद्वार में वर्ष 2017 में एक ट्रांसजेंडर ने इन्हीं मुश्किलों के चलते आत्महत्या कर ली थी”।

“परिजन बातचीत के लिए नहीं होते तैयार”

देवयानी कहती हैं “काउंसिलिंग के लिए कई बार हम परिवारवालों से संपर्क करते हैं तो वे इस मुद्दे पर बात ही नहीं करना चाहते। कई बार तो गालीगलौज तक करने लग जाते हैं। सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि ट्रांसजेंडर को कोई जल्दी नौकरी पर नहीं रखना चाहता। हर कोई इन हालात का सामना नहीं कर पाता। इस सबका असर ट्रांसजेंडर युवा के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। उन्हें लगता है कि जीवन के आगे सारे रास्ते बंद हो गए हैं”।

ट्रांसजेंडर के मानसिक स्वास्थ्य के लिए कोई योजना नहीं

उत्तराखंड एड्स कंट्रोल सोसाइटी के तहत एचआईवी से जुड़े प्रोजेक्ट के तहत ट्रांसजेंडर युवाओं के साथ कार्य कर चुकी कुसुम बेलवाल मानती हैं कि एचआईवी और एड्स से बचाव के लिए तो कार्य किया जा रहा है लेकिन ट्रांस व्यक्तियों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कोई योजना नहीं है। इन्हें समाज में जिस तरह से देखा और बर्ताव किया जाता है, इससे इनके मन में डर सा बैठ जाता है।

कुसम कहती हैं “ट्रांसजेंडर को लेकर जितना स्टिग्मा समाज में है, उतना ही ट्रांसजेंडर युवाओं के मन में भी है। इनके अंदर के इस कमजोर भाव को भी दूर करने की जरूरत है। बिहेवियर चेंज पर काम करने की जरूरत है। बहुत से ट्रांसजेंडर महिला-पुरुष अच्छी नौकरियों में हैं। अच्छा काम कर रहे हैं। लेकिन ज्यादातर को आजीविका के लिए बढ़ावा नहीं दिया जाता। जीवन स्तर सुधार पर कार्य नहीं किया जाता। इसके चलते ट्रांसजेंडर समुदाय ने सेक्सवर्क को आजीविका का विकल्प बना दिया है। जबकि ये लोग भी सामान्य व्यक्ति के तौर पर कामकाज कर सकते हैं”।

कुसुम कहती हैं “पिछले एक दशक में ट्रांसजेंडर समुदाय को लेकर समाज के भीतर और बाहर बदलाव आया है। बहुत सी संस्थाएं कार्य कर रही हैं। बहुत से सफल ट्रांसजेंडर के उदाहरण आज हमारे सामने हैं। नई पीढ़ी के ट्रांस युवा के सामने कई तरह के सवाल हैं। दुविधा है। वे अपने लिए रास्ता ढूंढ़ रही है। मुश्किल ये है कि ज्यादातर आसान रास्ते अपना लेते हैं। लेकिन इनके मानसिक स्वास्थ्य पर फोकस कर काम किया जाए तो हमें बेहतर बदलाव देखने को मिल सकते हैं”।

खुद को ट्रांसजेंडर के तौर पर पहचानने वाले लोगों को मानसिक तौर पर बहुत कष्ट झेलने पड़ते हैं। परिवार और समाज के मोर्चे पर मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं। जिसका सीधा असर इनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। शिक्षा- आजीविका प्रभावित होती है। इसका नुकसान हमारी अर्थव्यवस्था को भी झेलना पड़ता है।

ट्रांसजेंडर व्यक्ति ( अधिकारों का संरक्षण) बिल, 2019 की धारा 13, 14 और 15 उनके शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े हितों के बारे में बात करती है। लेकिन इन पर भी अब तक ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। 8 अक्टूबर को गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असम सरकार से पूछा कि ट्रांसजेंडर शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य पर क्या कदम उठाए गए हैं। ये सवाल उत्तराखंड समेत सभी राज्यों की सरकार के सामने भी हैं। सेहत की अवधारणा बिना मानसिक स्वास्थ्य के पूरी नहीं होती।

(This reporting has done under the Essence media fellowship on mental health issues)

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