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सत्य की खोज में सत्यपाल मलिक, लेकिन सत्य चाहिए किसे?

मोदी सरकार अब किसी का सवाल का जवाब देने की ज़हमत उठाने को तैयार भी नहीं है। क्योंकि हिंदू-मुसलमान के नाम पर ध्रुवीकरण से बीजेपी-आरएसएस खुद को जनता के प्रति जवाबदेही से ऊपर मानने लगी है। और बहुमत को ही लोकतंत्र मान लिया गया है।
satyapal malik
फ़ोटो साभार: IANS

जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने पुलवामा में हुए आतंकी हमले को भारत सरकार की लापरवाही या अक्षमता का नतीजा बता कर सबको चौंका दिया है। इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भ्रष्टाचार को लेकर तथाकथित ज़ीरो टॉलरेंस नीति और ना खाउंगा, ना खाने दूंगा के नेरैटिव को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। मलिक ने मीडिया को हाल ही में दिए साक्षात्कार में पीएम मोदी की अनभिज्ञता और सत्ता के केंद्रीयकरण को लेकर हैरान करने वाली जानकारियां साझा की है

चार राज्यों में राज्यपाल रहे बीजेपी नेता सत्यपाल मलिक के बयान से बीजेपी के लिए पीछा छुड़ाना मुश्किल साबित हो रहा है। ऐसे में बीजेपी इसे टीआरपी पाने की कोशिश बता कर नज़र अंदाज करना चाहती है। मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी को मित्र पूंजीपति के बीस हज़ार करोड वाले कांग्रेस के सवाल के बाद सत्यपाल मलिक का ये खुलासा बहुत असहज कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने तो पूर्व सांसद और बाहुबली नेता अतीक अहमद और उनके भाई की हत्या को भी इन सवालों पर मिट्टी डालने की कोशिश बताया है।

हाल में 'द वायर' के लिए करण थापर को दिए साक्षात्कार में सत्यपाल मलिक ने बताया कि 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हुए आतंकी हमले के पीछे केंद्र सरकार की चूक थी। दोपहर तीन बज कर पंद्रह मिनट पर हुए इस हमले के बाद बतौर राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कम से कम दो टीवी चैनलों को फोन पर दिए बयान में साफ तौर पर कहा कि मैं इसकी जिम्मेदारी लेता हूं। ये हमारी लापरवाही का नतीजा है। हालांकि मलिक ये भी कहते हैं कि सीआरपीएफ अपनी गतिविधियों की जानकारी अपने पास ही सीमित रखती है। उनका कहना है कि सीआरपीएफ के कुछ अधिकारियों ने उन्हें बताया कि जवानों को लाने के लिए गृहमंत्रालय से पांच विमानों की मांग रखी थी, लेकिन वो पूरी नहीं हुई। लिहाजा नौ सौ जवानों को बसों में जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग से ले जाना पड़ा था। मलिक का आरोप है कि कभी भी इतने अधिक जवानों को सड़क मार्ग से नहीं ले जाया जाता है। मलिक ये भी कहते हैं कि अवंतिपोरा में लेथपोरा वाले इलाके के दस किलोमीटर के क्षेत्र में कम से कम दस लिंकिंग रोड हैं, लेकिन किसी भी लिंकिंग रोड में एक जिप्सी तक तैनात नहीं की गई थी। वे जोर दे कर कहते हैं कि ये लिंकिंग रोड्स पूरी तरह अनमैन्ड थीं। वहीं बसों की स्पीड भी ज्यादा रखने की ज़रूरत थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

पूर्व राज्यपाल मलिक का कहना है कि उन्होंने हमले के तुरंत बाद पीएम मोदी से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन वो जिम कार्बेट नेशनल पार्क में डॉक्यूमेंटरी की शूटिंग में व्यस्त थे। घटना के एक घंटे बाद पीएम ने पास के ढाबे या होटल से उन्हें फोन कर पूछा कि बताओ सत्यपाल क्या हुआ। तब मलिक ने आतंकी कार्रवाई से अवगत कराया और कहा कि ये हमारी गलती है, अगर हम उन्हें विमान दे देते तो इन चालीस जवानों की जान बच जाती। इस पर पीएम मोदी ने उन्हें चुप रहने की हिदायत दी। और कहा कि वो दिल्ली जा कर लाइन लेंगे। मलिक इशारा समझ गए कि मामले को राजनीतिक मोड़ दिया जाना है और पाकिस्तान पर इसका ठीकरा फोड़ा गया। हालांकि सत्यपाल मलिक आतंकी साजिश के लिए पाकिस्तान को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका कहना है कि 300 किलोग्राम आरडीएक्स सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान ही कश्मीर में भेज सकता है। लेकिन यहां मलिक ये कह कर चौंका देते हैं कि ये आरडीएक्स एक गाड़ी में दस दिन से ज्यादा वक्त तक सूबे की सड़कों पर घुमाया गया। हैरानी ये है कि अगर सत्यपाल मलिक की ये सूचना सही है तो ये इंटलिजेंस फेल्योर की ओर इशारा करता है। हालांकि खुफिया विभाग ने जनवरी से पंद्रह फरवरी तक कुल ग्यारह इनपुट दिए थे। और एक इनपुट तो वारदात के 24 घंटे पहले भी दिया गया था, बताया जाता है कि इसी वजह से विमान की मांग की गई थी। अगर ये जानकारियां सच हैं तो ये आपराधिक लापरवाही से कम भी नहीं हैं। कांग्रेस इस पूरे घटनाक्रम को देशद्रोह से जोड़ कर देख रही है।

पुलवामा पर सत्यपाल मलिक का बयान इस हमले के पीछे किसी बहुत बड़ी साजिश की ओर इशारा कर रहा है। सीआरपीएफ के मांगने पर भी विमान नहीं दिया जाना, नौ सौ जवानों को सड़क मार्ग से लाना, लिंकिंग रोड्स का सैनिटाइज़ेशन नही करना। पाकिस्तान से तीन क्विंटल आरडीएक्स लाया जाना, आरडीएक्स भरे वाहन का जम्मू-कश्मीर में दस दिन तक सड़कों पर रहने के बावजूद अनट्रेस रहना, और अचानक काफिले की गाड़ी के पास पहुंचना सुनियोजित साजिश का हिस्सा हो सकते हैं।

यही नहीं डीएसपी देवेंद्र सिंह को भले ही सत्यपाल मलिक क्लीन चिट देते हैं लेकिन पुलवामा हमले के वक्त देवेंद्र सिंह की वहीं तैनाती थी। देवेंद्र सिंह को दो वांटेड आतंकवादियों के संग अर्ध सैनिक बलों ने पकड़ा था। संसद हमले के आरोपी अफजल गुरु ने भी देवेंद्र सिंह का नाम लिया था। कहा था कि उन्हें दिल्ली में मकान किराए पर दिलाने और गाड़ी खरीदने में भी देवेंद्र सिंह ने अहम भूमिका निभाई थी। देवेंद्र सिंह मामले की जांच कहां तक पहुंची ये आज तक पता नहीं चल पाया है।

इसी तरह पुलवामा मामले की जांच को लेकर भी सरकार सवालों के घेरे में है तो बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर भी संदेह जताया जाता रहा है। आरोप तो ये भी लगते रहे है कि 2019 के आम चुनाव साधने के मकसद से ये पूरी कवायद की गई। या फिर इस पूरे मामले से चुनावी फायदा उठाने में कोई कसर बाकी रखी नही गई।

साथ ही पीएम मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की इस मामले में चुप रहने की सत्यापल मलिक को नसीहत पर भी सवाल खड़े होते हैं। इस बात पर भी हैरानी होती है कि साजिश करने वालों ने वो दिन चुना जिस दिन पीएम जिम कारबेट नेशनल पार्क में शूटिंग में व्यस्त है और उन तक फोन की भी पहुंच नहीं थी। इसके बाद भी पीएम सुरक्षा को लेकर खास एहतियात नहीं बरता गया। पीएम को सड़क मार्ग से ही बरेली तक लाया गया। जहां उन्होंने रैली की। जबकि कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने उस दिन यूपी में अपनी सभा रद्द कर दी थी। पुलवामा के शहीदों के नाम पर जिस तरीके से पीएम मोदी ने वोट मांगे हैं, वो किसी से छिपा नहीं है। मलिक कहते हैं कि ये पुलवामा टेरर अटैक वाज़ डिलीबेरेटली यूज्ड फ़ॉर इलेक्शन परपज।

सत्यपाल मलिक भ्रष्टाचार का मामला भी सलीके से उठाते हैं। उनका कहना है कि पीएम मोदी को करप्शन को लेकर सख्त नफरत नहीं है। जिस मामले में सीबीआई जांच बैठाई गई थी, उन्ही मामलों को लेकर वो पीएम मोदी पर इशारों ही इशारों में निशाना साधते हैं। उन्होंने बताया कि रिलायंस की इंश्योरेंस पॉलिसी लागू करने के लिए उन पर आरएसएस-बीजेपी नेता राम माधव ने सुबह सात बजे उनके घर आ कर दबाव बनाने की कोशिश की थी। तो हाइडल प्रोजेक्ट के लिए जम्मू-कश्मीर बैंक के तत्कालीन चैयरमैन हसीब द्राबू ने भी सत्यपाल को असर में लेने की कोशिश की थी। मलिक का कहना है कि द्राबू ने कहा कि वो प्रोजक्ट तो वैसे भी पास करा लेंगे, लेकिन आप कर दें तो बेहतर रहेगा। मलिक बताते हैं कि मेरे ना करने पर भी उनका प्रोजक्ट कहीं ओर से पास कर दिया गया। मलिक ये भी बताते हैं कि अगर वो दोनों प्रोजेक्ट वो पास कर देते तो उन्हें तीसरे ही दिन तीन सौ करोड़ रुपए मिल जाते, लेकिन उन्होंने भ्रष्टाचार नहीं किया। जब भी पीएम से मिलने गए तो पीएम ने उन्हें हसीब द्राबू से मिलने का सुझाव दिया। मलिक का कहना है कि डिवीजन होने के बाद उन्होंने जम्मू-कश्मीर इसलिए छोड़ा कि इसे यूनियन टेरिटरी बना दिया गया। जहां उप राज्यपाल नियुक्त किया जाता है।

सत्यपाल मलिक पीएम मोदी को भ्रष्टाचार को लेकर लगातार घेरते हैं। उन्होंने ये भी कहा कि गोवा का राज्यपाल बनने पर उन्होंने वहां मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार संबंधी जानकारी पीएम मोदी को दी। लेकिन उन पर कार्रवाई के बजाय मलिक को ही मेघालय भेज दिया गया। मलिक कहते हैं कि पीएम मोदी को भ्रष्टाचार को लेकर कोई बहुत परवाह नहीं है। गोवा मामले में ये भ्रष्टाचार को लेकर उनकी किसी भी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

मलिक के इंटरव्यू से जो सबसे ज्यादा हैरान कर देने वाली बात सामने आई है वो है पीएम मोदी की इग्नोरेंट यानी बहुत कम जानकारी होने का आरोप। मलिक कहते हैं कि उनका रवैया हेल विद इट टाइप का है। वो अपने आप में मस्त रहने में व्यस्त रहते हैं। मोदीजी पर आत्ममुग्धता का आरोप लगता भी रहा है। मलिक अमित शाह के काम के तरीके को सराहते नज़र आते हैं। उन्होंने ये भी कहा कि लोग 370 हटाए जाने से ज्यादा राज्य को डॉउनग्रेड किए जाने से नाराज़ हैं। ये बात उन्होंने पीएम को कही थी, तब पीएम ने कहा कि उन्हें रिपोर्ट बना कर दीजिए, मलिक ने 20 पेज की रिपोर्ट दी, लेकिन उस पर कोई अमल नहीं हुआ। मलिक लद्दाख को यूटी और जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा दिए जाने के हामी हैं। लेकिन अब ऐसा होने की उन्हें उम्मीद कम ही है। उनका कहना है कि पुलिस व्यवस्था पर केंद्र की पकड़ बनाए रखने के लिए ही जम्मू-कश्मीर को यूनियन टेरिटरी घोषित किया गया। क्योंकि मोदी सरकार को यहां बगावत का खतरा नज़र आ रहा था।

मोदी सरकार की कार्यप्रणाली का भी मलिक खुलासा करते हैं। दिलचस्प बात ये है कि वो मिसाल के साथ अपनी बात रखते हैं। मसलन बताते हैं कि उनका राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से पहले से तय मुलाकात अचानक तब रद्द कर दी गई, जब वे राष्ट्रपति भवन के रास्ते पर थे। मलिक की जानकारी के मुताबिक पीएमओ ही राष्ट्रपति से मिलने वालों की सूची को अंतिम रूप देता है। ये बात वो दूसरे मामलों में भी कहते हैं। मलिक का कहना है कि सारे फैसले पीएमओ से ही लिए जाते हैं, व्यवाहारिक रूप से कोई सवाल नहीं उठा सकता है।

सवाल ये भी उठ रहा है कि आखिर सत्यपाल का सत्य क्या है। जम्मू-कश्मीर में पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती को 2018 में राज्य में सरकार बनाने का मौका ना देने के लिए सत्यपाल मलिक पहले से कठघरे में हैं। ऐसे में पत्रकार प्रशांत टंडन, करण थापर और फिर रवीश कुमार को दिए इंटरव्यू के पीछे उनकी मंशा को कहां तक सही माना जा सकता है। इन इंटरव्यू में वो अपने कुछ पिछले बयानों से मुकर भी रहे हैं। लेकिन साथ ही वो जो सवाल उठा रहे हैं, वो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हुए हैं। मगर जिस सत्य को वे उजागर कर रहे हैं, उस सत्य से किसे सरोकार है, कम से कम सरकार को तो नहीं, तो फिर जांच एजेंसियों को क्यों होगा और तथाकथित मेन स्ट्रीम मीडिया जिसे कॉरपोरेट मीडिया या गोदी मीडिया कहा जाता है उसे भी इसमें क्यों दिलचस्पी होने लगी। तो फिर अंतिम सत्य तक कैसे पहुंचा जा सकता है। लेकिन जनता के सामने पूरा सच आना ही चाहिए। मगर क्या जनता भी आज वाकई जनता रह गई है और उसे पुलवामा का पूरा सच जानने में कोई रुचि है? ये ऐसे सवाल हैं जो शायद अनुत्तरित ही रहेंगे।

ये आसानी से समझा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार का राज्यपाल बनाने के बाद सत्यपाल मलिक को जम्मू-कश्मीर की जिम्मेदारी दी थी, संभवतया कर्ण सिंह के बाद वो पहले राजनेता थे, जिन्हें इसे संवेदनशील राज्य का राज्यपाल बनाया गया। वरना इस पद पर पूर्व सेनाधिकारियों या फिर नौकरशाहों को तैनात किया जाता रहा है। इस नियुक्ति को पीएम मोदी का मलिक पर भरोसे के तौर पर देखा जाता रहा है क्योंकि उनकी नियुक्ति उस वक्त की गई जब धारा 370 हटाने की तैयारी की जा रही थी। संभवतया इसी के तहत मलिक ने विधानसभा भंग कर दी और महबूबा मुफ्ती को सरकार बनाने का मौका नहीं दिया। बावजूद इसके मलिक की कार्यशैली पीएम मोदी को बहुत रास नहीं आई और वो गोवा भेज दिए गए।

सत्यपाल मलिक के सत्यान्वेषण की वजह को आसानी समझा जा सकता है। मोदी से लगातार मतभेद के साथ केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से निकटता के संकेत उनके साक्षात्कार में मिलते हैं। मलिक अपना साक्षात्कार करने वालों से बार-बार अपने उस बयान को वापस लेने का आग्रह जरूर करते हैं, जो अमित शाह ने पीएम मोदी के बारे में उनसे अनौपचारिक तौर पर कहा था। उस वक्त मलिक मेघालय के राज्यपाल थे और किसान आंदोलन चरम पर था। उन्होंने दादरी की एक किसान सभा में कहा था कि अमित शाह ने उनसे कहा था कि सत्यपाल, इसकी अकल मार रखी है कुछ लोगों ने। मलिक अब उस बयान से भी मुकर गए हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि आंदोलनकारी किसानों की मौत का जिक्र करने पर पीएम मोदी ने कहा था कि क्या वो मेरे लिए मरे हैं। हालांकि बयानों को वापस लेने और बड़े आरोप लगाने के पीछे मलिक की अपनी सियासत जरूर है। लेकिन मलिक पीएम मोदी का जो विश्लेषण करते हैं, उससे अमित शाह के पीएम मोदी संबंधी मूल्यांकन को समझा जा सकता है।

मेघालय से हटने के बाद सत्यपाल मलिक एक मध्यवर्गीय कॉलोनी में किराए के मकान में रह रहे हैं। मोदी सरकार ने उन्हें सुरक्षा के नाम पर एक पीएसओ दिया है। जबकि जम्मू-कश्मीर की एडवायजरी कमेटी ने उन्हें सरकारी बंगला और सुरक्षा मुहय्या कराने की सिफारिश की थी। गुमनामी में पड़े सत्यपाल मलिक के लिए मोदी सरकार पर हमला बोलने के सिवा कोई रास्ता भी नहीं बचा था। बहरहाल उस दौरान गवर्नर रहे मलिक का बयान पुलवामा हमले को लेकर उठ रहे सवालों की तस्दीक जरूर करता है। लेकिन मोदी सरकार अब किसी का सवाल का जवाब देने की जहमत उठाने को तैयार भी नहीं है। क्योंकि हिंदू-मुसलमान के नाम पर ध्रुवीकरण से बीजेपी-आरएसएस खुद को जनता के प्रति जवाबदेही से ऊपर मानने लगी है। और बहुमत को ही लोकतंत्र मान लिया गया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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