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AMU के नॉन-टीचिंग अस्थायी कर्मचारी धरने पर; ना एक्सटेंशन, ना वेतन वृद्धि, ना नौकरी सुरक्षित

अपनी मांगों को लेकर यह कर्मचारियों ने घोषित समय के लिए धरने की घोषणा कर दी है। 9 नवंबर 2023 को इन कर्मचारियों की ओर से विश्वविद्यालय परिसर में बड़े स्तर पर एक विशाल धरना किया गया जिसमें आपातकाल सेवाओं को बंद कर दिया गया था।
AMU

अलीगढ़ : अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में ग़ैर शिक्षण अस्थाई कर्मचारी इन दिनों धरने पर हैं। नौकरी सुरक्षा एवं वेतन से संबंधित मांगों को लेकर यह कर्मचारी अघोषित समय के लिए धरने पर बैठ गए हैं। कर्मचारियों का आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से अस्थाई नियुक्तियों के मामले में गैर जिम्मेदारी बरती जा रही है। करीब पिछले 10 माह से अस्थाई कर्मचारियों का एक्सटेंशन रोक दिया गया है। तक़रीबन 6 माह से महंगाई भत्ता, बच्चों की शिक्षा के लिए मिलने वाला भत्ता आदि को रोक दिया गया है, इसी के साथ वेतन वृद्धि भी रोक दी गई है। जिसे लेकर यह कर्मचारी तरह-तरह की समस्याओं का सामना कर रहे हैं। वर्तमान में एक बड़ी संख्या में ग़ैर शिक्षण अस्थाई कर्मचारी एएमयू में सेवाएं दे रहे हैं। जिनमें एमटीएस (मल्टी टास्किंग स्टाफ), एलडीसी (लोवर डिवीजन क्लर्क), लैब टेक्नीशियन, असिस्टेंट लैब आदि अन्य बहुत से कर्मचारी शामिल हैं।

क्या है पूरा मामला?

इस पूरे मामले को विस्तार से जानने के लिए हमने कुछ कर्मचारियों से बात करने की कोशिश की तो इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के लैब असिस्टेंट फ़ैसल ख़ान ने हमें बताया, "दिसंबर 2022 में अस्थाई कर्मचारियों का एक्सटेंशन ख़त्म हो रहा था और उसी समय यूनिवर्सिटी रजिस्ट्रार ने अस्थाई कर्मचारियों का एक्सटेंशन रोक दिया जिसके बाद कर्मचारियों में जिज्ञासा बढ़ी और उन्होंने उसे तत्कालीन कुलपति प्रोफेसर तारीख मंसूर के सामने अपनी समस्याएं रखी इसके बाद कर्मचारियों को एक्सटेंशन दे दिया गया और इसी बीच एक मीटिंग में यह टाइप आया कि वेतन में कोई बदलाव नहीं होगा वेतन संरचना नवंबर 2022 के अनुसार ही होगी। लेकिन फिर जनवरी 2023 में विद्यालय प्रशासन की ओर से तकरीबन 237 कर्मचारियों की वेतन वृद्धि रोक दी गई जिसे फिर मार्च 2023 में बहाल किया गया। जब जुलाई 2023 में वेतन वृद्धि बढ़ाने की बारी आई उसे समय भी प्रशासन की ओर से वेतन वृद्धि रोक दी गई साथ ही साथ अस्थाई कर्मचारियों को मिलने वाले तमाम भत्ते भी रोक दिए गए जिम महंगाई भत्ता, बच्चों की शिक्षा के लिए मिलने वाला भत्ता आदि शामिल हैं। जब प्रशासन से बारे में बात की गई तो उन्होंने कहा की कार्यकारी काउंसिल की बैठक होने के बाद तमाम भत्ते बाहर कर दिए जाएंगे। जब कार्यकारी काउंसिल की बैठक हुई तो उसने यह फैसला लिया गया कि लग्जरीज़ को छोड़कर तमाम भत्ते बहाल कर दिए जाएं लेकिन फैसल के अनुसार उसके बाद कोई भी भत्ते बहाल नहीं किए गए और कार्यकारी काउंसिल के ख़िलाफ़ भी वरज़ी की गई और जून 2023 के वेतन में रोगी देखभाल भत्ता Patient Care Allowance (PCA) भी रोक दिया गया। "

बता दें कि अस्थाई कर्मचारियों की ओर से बार-बार प्रशासन से बातचीत की कोशिश की गई लेकिन प्रशासन की ओर से उन्हें अनदेखा किया जाता रहा। कर्मचारियों का कहना है, "तमाम दस्तावेज़ भी हमारे ही पक्ष में हैं चाहे वह फाइनेंशियल काउंसिल हो या फिर कार्यकारी काउंसिल की जबकि यूनिवर्सिटी प्रशासन के पास वेतन वृद्धि एक्सटेंशन वर्तमान भत्ते रोकने का कोई प्रमाण नहीं है ना ही इस मामले में कोई सरकारी आदेश आया है। मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के रेहान बताते हैं कि कार्यकारी काउंसिल की ओर से इस मामले को लेकर एक समिति भी गठित की गई थी। समिति से यह कहा गया था उच्च न्यायालय के उमा देवी फैसले की रोशनी में कि जो अस्थाई कर्मचारी 10 साल से ज्यादा अपनी सेवाएं दे चुके हैं उन्हें स्क्रीनिंग समिति के द्वारा स्थायी कर दिया जाए। समिति ने अपनी रिपोर्ट यूनिवर्सिटी प्रशासन को भेज दी जिसे प्रशासन की ओर से कुछ माह के लिए ऐसे ही रख दिया गया ताकि इस रिपोर्ट के अनुसार अस्थाई कर्मचारियों की सूची जिन्हें स्थाई करना था वह ऐसे ही पड़ी रह जाए।"

अपनी मांगों को लेकर यह कर्मचारियों ने घोषित समय के लिए धरने की घोषणा कर दी है। 9 नवंबर 2023 को इन कर्मचारियों की ओर से विश्वविद्यालय परिसर में बड़े स्तर पर एक विशाल धरना किया गया जिसमें आपातकाल सेवाओं को बंद कर दिया गया था। कर्मचारियों का कहना है कि आने वाले समय में पर उनकी मांगे प्रशासन की ओर से पूरी नहीं की गई तो वे दफा आपातकाल सेवाओं के साथ-साथ डाइनिंग हॉल, मेडिकल सेवाएं ओपीडी जैसी अन्य सेवाओं का बायकॉट करेंगें। 

एक अन्य कर्मचारी नज़र हैदर, जो लोवर डिवीजन क्लर्क हैं, वे हमसे बात करते हुए कहते हैं कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में काफी लंबे समय से नॉन टीचिंग स्टाफ के लिए अस्थाई मामला या जिसे एडहॉकिज़्म कह लीजिए, चल रहा है। इसी के साथ दैनिक वेतनभोगी का भी एक प्रावधान था जिसके तहत यह किया जाता था कि जो कर्मचारी दैनिक वेतनभोगी पर काम कर रहे होते थे और किसी कारण अस्थाई कर्मचारियों की कोई जगह खाली हो जाती थी तो उनकी जगह पर ज्येष्ठता के आधार पर दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को अस्थाई कर दिया जाता था और इस तरह वे भी रेगुलर कर्मचारियों में शामिल हो जाते थे। इसके बाद एमटीएस (मल्टी टास्किंग स्टाफ) के लिए यह मामला था कि एक या दो साल की सेवा के बाद उनके विभाग अध्यक्ष की सिफ़ारिश पर उनकी पुष्टि कर दी जाती थी। लेकिन एलडीसी (लोवर डिवीजन क्लर्क) के लिए यह होता था कि उनकी 5 साल की अस्थाई सेवा के बाद उन्हें स्क्रीनिंग प्रक्रिया के द्वारा स्थायी किया जाता था। यह प्रक्रिया हमेशा से चलती आ रही थी। लेकिन समस्या तब होने लगी जब विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इस प्रक्रिया को समय पर नहीं किया जाने लगा। नज़र आगे बताते हैं कि यूनिवर्सिटी प्रशासन एमटीएस के मामले में 1 या 2 साल के बजाए 5-6 साल और एलडीसी के मामले में लगभग 8 से 10 साल तक का समय लगने लगा और इतना बीत जाने के बाद भी प्रशासन को हमारी समस्याओं के बारे में कोई चिंता ही नहीं होती थी। जब 2006 में सर्वोच्च न्यायालय की ओर से उमा देवी मामले में फैसला सुनाया जाता है और सरकार की ओर से तक़रीबन 2014 में यूनिवर्सिटी को नोटिस दिया जाता है कि अब तक जो प्रक्रिया अस्थाई कर्मचारियों के मामले में चल रही थी वे अब नहीं चलेगी बल्कि उमा देवी फैसला की रोशनी में तमाम प्रक्रियाएं की जाएगीं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने 2015 में उमा देवी फैसले को अडॉप्ट किया लेकिन उस समय एमटीएस के वे  कर्मचारी जिनको 10-12 साल या उससे भी अधिक समय अस्थाई सेवाओं में रहते हो चुका था उनकी संख्या लगभग 500-600 हो गई थी। लेकिन प्रशासन की ओर से इन कर्मचारियों को स्थाई किए बगैर उमा देवी फैसले को अडॉप्ट कर लिया गया और उन कर्मचारियों को अनदेखा कर दिया। जबकि होना यह चाहिए था कि प्रशासन की ओर से पहले उन कर्मचारियों  की समस्याओं का कोई उचित समाधान किया जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

नज़र का आरोप है कि यूनिवर्सिटी प्रशासन ने उमा देवी फैसले की रोशनी में कोई प्रक्रिया ही नहीं की बल्कि उस फैसले को लागू ही नहीं किया। और तो और स्टैंडिंग काउंसिल द्वारा अदालत में झूठा एफिडेविट भी लगा दिया गया कि हमने उमा देवी फैसले को लागू कर दिया है। जबकि अस्थाई कर्मचारियों में अधिकतर संख्या उन लोगों की है जिनकी आयु तकरीबन 40 से ऊपर है, कई तो ऐसे हैं जो अब रिटायरमेंट को पहुंच चुके हैं। लेकिन अब तक इस मामले का कोई समाधान होता नहीं दिखाई दे रहा है। हमें आए दिन यह डर सताता है कि आज शायद कोई हमें नौकरी से निकाल देगा, अगर ऐसा हुआ तो हम कहां जाएंगे? इसलिए हम यह मांग कर रहे हैं जी जल्द से जल्द हमें एक्सटेंशन दिया जाए और प्रक्रिया के तहत स्थाई किया जाए।

बता दें कि कुछ अन्य कर्मचारियों ने हमें यह बताया कि यह तमाम समस्याओं के बाद अब तक हमारा जो माहाना वेतन था वे तो दिया ही जा रहा था। लेकिन इस साल नियुक्त किए गए नए रजिस्ट्रार मोहम्मद इमरान जब आए तो उन्होंने आदेश दिया कि अस्थाई कर्मचारियों का वेतन जो अब तक रजिस्टर नंबर 36 से दी जा रहा था वह गलत है अब  इनका वेतन रजिस्टर नंबर 31 से दिया जाएगा। कर्मचारियों का कहना है कि रजिस्टर नंबर 31 और 36 के बारे में उन्होंने इससे पहले कभी नहीं सुना लेकिन रजिस्ट्रार के आदेश के बाद जब छानबीन की गई तो यह मालूम हुआ कि 31 नंबर रजिस्टर संविदात्मक सेवाओं के कर्मचारियों के लिए है उनके लिए नहीं। कर्मचारियों ने यह भी सवाल उठाया की अगर यह गलत वेतन दिया जा रहा था तो इस बात का होश आज इतने सालों बाद अचानक कैसे आ गया? इतने सालों से सरकार हमें वेतन दे रही है अगर वेतन गलत दिया जा रहा होता तो बहुत पहले ही सरकार की ओर से इस पर रोक लगा दी जाती।

इन कर्मचारियों की मांगे हैं कि उमा देवी फैसले की रोशनी में भीम के तहत इन्हें स्थाई किया जाए साथ ही साथ वेतन वृद्धि बढ़ाई जाए और कर्मचारियों को मिलने वाले तमाम भत्ते दोबारा बहाल किए जाएं। 

इस मामले पर विश्वविद्यालय प्रशासन से उनका पक्ष जानने के लिए हमने जनसंपर्क विभाग विभाग से संपर्क किया। जहां हमसे यह कहा गया कि जनसंपर्क अधिकारी उमर पीरज़ादा से बात की जाए वह इस मामले में बात करने के लिए अधिकृत हैं, हमने लगातार दो दिनों तक जनसंपर्क अधिकारी से संपर्क का प्रयास किया लेकिन उन्होंने हमारे फोन का कोई जवाब नहीं दिया और हमने इस मामले को लेकर उन्हें ईमेल भी की जिसका अब तक कोई जवाब नहीं दिया गया है। 

फिर हमारी बात यूनिवर्सिटी प्रॉक्टर डॉ वसीम अली से हुई, उन्होंने हमें जानकारी देते हुए बताया, "इस समय यूनिवर्सिटी में तक़रीबन 1388 अस्थाई कर्मचारी हैं जो अपनी मांगों को लेकर काफ़ी दिनों से धरने पर हैं। डॉ वसीम आगे बताते हैं कि फिलहाल यह मामला विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने प्राथमिक चर्चा में है। इस मामले को लेकर कुलपति से भी लगातार चर्चा जारी है। बहुत जल्द इस मामले पर कर्मचारियों से बातचीत द्वारा इसका हल निकालने की कोशिश की जाएगी।  वे आगे कहते हैं कि हमारा क्षेत्राधिकार विश्वविद्यालय परिसर में क़ानून व्यवस्था को बनाए रखना है लेकिन पूछना के अनुसार आने वाले दिनों में यह कर्मचारी बड़े धरने का आयोजन कर सकते हैं और यूनिवर्सिटी में इन दिनों परीक्षाएं भी चल रही हैं और परीक्षाओं के दौरान अगर धरना होता है और तमाम सेवाएं ठप हो जाती हैं तो उसे समय व्यवस्था बनाए रखना हमारे लिए बहुत मुश्किल हो जाएगा। हमें इन कर्मचारियों से पूरी सहानुभूति है और हम चाहते हैं कि जल्द ही बातचीत द्वारा मिलकर समस्याओं का समाधान किया जाए।"

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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