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उत्तर को दक्षिण से भिड़ा कर आग से खेल रही है भाजपा 

तमिलनाडु में बिहार के मज़दूरों को बंधक बनाने, मारपीट करने और उनकी हत्या कर देने की अफ़वाहें जितने सुनियोजित तरीक़े से मीडिया और सोशल मीडिया मे फैलाई गईं, वह कोई मामूली घटना नहीं है।
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फ़ोटो साभार: IANS

भारतीय जनता पार्टी ने कई बार यह साबित किया है कि वह चुनाव जीतने के लिए कुछ भी कर सकती है। इस सिलसिले में वह धार्मिक और सांप्रदायिक विभाजनकारी मुद्दे तो उठाती ही रहती है। इन्हीं मुद्दों के सहारे उसने केंद्र सहित कई राज्यों में सत्ता हासिल की है। अब उसी सत्ता को बरकरार रखने यानी आगामी लोकसभा चुनाव जीतने के लिए वह भाषाई विवाद पैदा करने, क्षेत्रीय अस्मिताओं का अपमान करने और राष्ट्रीय एकता को संकट में डालने जैसे मुद्दे उठाने से भी बाज नहीं आ रही है। पिछले एक साल से वह लगातार किसी न किसी बहाने तमिलनाडु को निशाना बनाते हुए उसे शेष भारत खास कर उत्तर भारत यानी हिंदी पट्टी के खिलाफ बताने में जुटी है। ताजा मामला तमिलनाडु में बिहार के प्रवासी मजदूरों पर हिंसक हमले की अफवाहें फैलाने का है। 

तमिलनाडु में बिहार के मजदूरों को बंधक बनाने, मारपीट करने और उनकी हत्या कर देने की अफवाहें जितने सुनियोजित तरीके से मीडिया और सोशल मीडिया मे फैलाई गईं, वह कोई मामूली घटना नहीं है। यह नहीं माना जा सकता है कि किसी एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों के एक समूह ने गलती से या शरारतपूर्ण तरीके से इस तरह की खबरें फैलाईं। यह पूरी तरह से संगठित और सोचा समझा मामला है, जिसका फौरी मकसद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी द्रविड़ मुनैत्र कड़गम यानी डीएमके को देश के हिंदी भाषी इलाकों में विलेन बनाना है। बिहारी मजदूरों पर अत्याचार के बहाने तमिलनाडु की जनता और वहां की सरकार को हिंदी और उत्तर भारतीयों का विरोधी ठहराने का प्रयास किया जा रहा है। इसका दूरगामी मकसद भी है, जिसकी एक झलक बिहार में दिखी, जब भाजपा ने स्टालिन के समारोह में शामिल होने को लेकर तेजस्वी यादव को निशाना बनाया। 

गौरतलब है कि एक मार्च को स्टालिन के 70वें जन्मदिन के कार्यक्रम में तेजस्वी शामिल हुए थे। वहां स्टालिन से राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका निभाने को कहा गया, जिससे यह संदेश निकला कि स्टालिन विपक्ष को एकजुट कर सकते हैं। उसी समय तमिलनाडु में बिहारी मजदूरों पर हमले की खबरें वायरल हुईं। पुरानी और दूसरे राज्यों की वीडियो पोस्ट करके बताया गया कि एक दर्जन बिहारी मजदूरों की हत्या हिंदी बोलने के कारण कर दी गई है। सोशल मीडिया में वायरल हो रहे वीडियो की पुष्टि किए बगैर हिंदी के कई बड़े अखबारों और टीवी चैनलों ने इसकी खबर चलाई। पटना के अखबारों में कई दिन तक लीड खबर बनी। भाजपा ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और तेजस्वी पर हमला किया। दबाव में नीतीश को चार सदस्यों की एक टीम भेजनी पड़ी जांच के लिए। जांच में पता चला कि सब कुछ फर्जी था। इससे पहले किसी फर्जी खबर को लेकर इतने व्यवस्थित तरीके से अभियान नहीं चला था। जाहिर है पहले ही स्टालिन और उनकी सरकार की साख खराब करने का अभियान शुरू हो गया ताकि उनके साथ हिंदी पट्टी के नेता जुड़े तो इसे मुद्दा बनाया जा सके।

दरअसल केंद्र की भाजपा सरकार की ओर से तमिलनाडु को बदनाम करने या उसकी अस्मिता को चुनौती देने और भाषा के सवाल पर तमिलनाडु सहित अन्य दक्षिणी राज्यों को उकसाने का सिलसिला पिछले एक साल से चल रहा है। कुछ दिनों पहले तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि की ओर से तमिलनाडु के नाम को लेकर उठाया गया सवाल भी भाजपा और केंद्र सरकार की इसी राजनीति का हिस्सा है।

आमतौर पर भाजपा की विरोधी पार्टियों के शासन वाले सूबों के राज्यपाल अपनी उटपटांग हरकतों की वजह से अक्सर चर्चा में रहते हैं। वे अपने सूबे की सरकार के कामकाज में अनावश्यक दखलंदाजी करते हैं, उनमें रोड़े अटकाते हैं या सरकार के कामकाज पर विपक्षी नेता की तरह सार्वजनिक तौर पर टीका-टिप्पणी करते हैं, लेकिन राज्य के सांस्कृतिक, सामाजिक या ऐतिहासिक मामलों में नहीं बोलते हैं। ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों में सबसे पहले घुसपैठ करते हुए जो काम थोडे समय पहले महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल भगत सिह कोश्यारी ने किया था, वही काम तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने किया। कोश्यारी ने छत्रपति शिवाजी पर अनर्गल टिप्पणी की थी, तो आरएन रवि ने एक कार्यक्रम में भाषण देते हुए 'तमिलनाडु’ नाम पर ही आपत्ति उठा दी और कहा कि तमिलनाडु के बजाय इस राज्य का नाम 'तमिझगम’ ज्यादा उपयुक्त है। 

गौरतलब है कि आमतौर पर 'नाडु’ का मतलब भौगोलिक सीमा होता है लेकिन तमिलनाडु में इसका अर्थ देश या राष्ट्र राज्य के रूप में लिया जाता है। राज्यपाल रवि ने जिस 'तमिझगम’ का जिक्र किया उसका शाब्दिक अर्थ होता है- 'तमिल लोगों का निवास’। राज्यपाल ने सिर्फ राज्य के नाम पर ही आपत्ति नहीं उठाई, बल्कि यह भी कहा कि पूरे देश में जो स्वीकार्य होता है, उसे मानने से तमिलनाडु इनकार कर देता है और यह एक रिवाज जैसा बन गया है। उन्होंने कहा कि यहां यह नैरेटिव गढ़ने का प्रयास भी होता है कि तमिलनाडु देश का हिस्सा नहीं है। वे यहीं नहीं रूके, उन्होंने यह भी कहा कि तमिलनाडु में काफी झूठा और गलत साहित्य लिखा गया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि राज्यपाल की यह बातें सीधे तौर पर तमिल अस्मिता को चुनौती थी।

लेकिन सवाल है कि उत्तर भारत के रहने वाले एक राज्यपाल को एक दक्षिण भारतीय राज्य के नाम पर क्यों आपत्ति करनी चाहिए? तमिलनाडु का नाम पिछले साठ साल से स्वीकार्य है और कभी किसी को इस पर आपत्ति नही हुई है। भले ही 'नाडु’ का अर्थ देश या एक अलग भौगोलिक सीमा बताने वाला हो लेकिन इससे तमिलनाडु की इस स्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह भारत का अविभाज्य हिस्सा है। तमाम उप राष्ट्रीयता, अलग संस्कृति और भाषा के विवाद के बावजूद तमिलनाडु से अलगाव की आवाज नहीं उठी है। उसकी तमिल अस्मिता वैसी ही है, जैसे महाराष्ट्र की मराठी, पश्चिम बंगाल की बांग्ला, ओड़िशा की ओड़िया या गुजरात की गुजराती अस्मिता है। इसलिए नाडु शब्द के शाब्दिक अर्थ को लेकर तमिलनाडु का नाम बदल कर तमिझगम करने का राज्यपाल का सुझाव पूरी तरह से अतार्किक और अप्रासंगिक था।

राज्यपाल रवि ने न सिर्फ तमिलनाडु का नाम बदल कर तमिझगम करने की बात कही, बल्कि पोंगल के मौके पर राजभवन से भेजे गए निमंत्रण में उन्होंने खुद को 'तमिझगम का राज्यपाल’ लिखा। सवाल है कि कोई राज्यपाल कैसे किसी राज्य का नाम बदल सकता है? लेकिन उन्होंने बदल दिया और उसका असर भी दिखा। राज्य की दोनों प्रमुख तमिल पार्टियों- डीएमके और अन्ना डीएमके ने राज्यपाल के बयान पर नाराजगी जताई और तीव्र विरोध किया। सत्तारूढ़ डीएमके ने तो राज्यपाल रवि पर तमिल अस्मिता का अपमान करने का आरोप लगाते हुए उन्हें राज्यपाल पद से हटाने की मांग भी की। विधानसभा में भी डीएमके और उसकी सहयोगी पार्टियों कांग्रेस, सीपीएम और एमडीएमके ने राज्यपाल के खिलाफ नारे लगाए और ट्विटर पर भी 'गेट आउट रवि’ भी ट्रेंड कराया गया। 

राज्यपाल द्वारा छेड़े गए इस विवाद के बाद तमिलनाडु में बाहरी और खास कर हिंदी भाषी लोगों का विरोध बढ़ने लगा है। राज्य सरकार ने भी हर नौकरी में तमिल भाषा की अनिवार्यता लागू कर दी है। हर नौकरी के लिए तमिल भाषा में न्यूनतम पासिंग मार्क्स अनिवार्य होगा। ऐसे में अगर गैर तमिल लोगों का विरोध बढ़ेगा तो स्वाभाविक रूप से हिंदी भाषी क्षेत्र में भी प्रतिक्रिया होगी। यही भाजपा चाहती भी है।

सवाल है कि क्या भाजपा तमिलनाडु और दक्षिण के अन्य राज्यों में अपने लिए कोई संभावना नहीं देख रही है और इसलिए वह उसके नाम और उसके इतिहास, भूगोल का सवाल उठा कर पूरा देश बनाम तमिलनाडु का विवाद खड़ा कर रही है? इसके अलावा कोई और कारण नहीं हो सकता। राज्यपाल रवि बिहार के रहने वाले हैं। वे इतिहासकार या पुरातत्ववेत्ता नहीं है, बल्कि भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी रहे हैं। इसलिए उन्होंने बिना किसी प्रसंग या संदर्भ के अनायास जो विवाद खड़ा किया है उसके गहरे राजनीतिक निहितार्थ हैं।

इससे पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी भाषा संबंधी अपने बयानों के जरिए भाजपा के राजनीतिक इरादों की झलक दिखला चुके हैं। पिछले साल अप्रैल में उन्होंने संसदीय राजभाषा समिति की बैठक में 'एक राष्ट्र-एक भाषा’ की बात करते हुए उन्होंने कहा था कि हिंदी को देश की एकता का एक महत्वपूर्ण आधार बनाने का समय आ गया है। उन्होंने गैर हिंदी भाषी राज्यों को हिंदी सीखने की नसीहत देते हुए कहा था कि अलग-अलग राज्यों के लोगों को अंग्रेजी के बजाय हिंदी में बात करना चाहिए। लेकिन यह कहते हुए अमित शाह यह भूल गए कि देश की आजादी के बाद राज्यों का पुनर्गठन भाषायी आधार पर ही हुआ था। 

दक्षिण के राज्यों में हिंदी थोपने की कोशिशों का 1960 के दशक में भी तीव्र विरोध हुआ था और शाह के इस बयान पर भी पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और कर्नाटक की ओर से तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा गया था कि हिंदी थोपने का यह प्रयास देश की अखंडता और बहुलवाद के खिलाफ है। कहने की आवश्यकता नहीं कि 'एक राष्ट्र-एक भाषा’ का फितूर देश के लिए आत्मघाती हो सकता है। पांच दशक पहले पाकिस्तान से टूट कर बांग्लादेश के अस्तित्व में आने के मूल में यही भाषायी अस्मिता का मुद्दा था। 

तीन साल पहले जब केंद्र नागरिकता संशोधन कानून बनाया था तो उसमें तमिलों को उस कानून के दायरे से बाहर रखा था। केंद्र सरकार का यह फैसला भी तमिलों को अपमानित करने और उनमें अलगाव पैदा करने वाला था। इस फैसले पर भाजपा की सहयोगी अन्ना डीएमके ने भी गहरा असंतोष जताया था।

गौरतलब है कि भाजपा ने हाल के वर्षों में तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए कई कवायदें की हैं, लेकिन वे कारगर नहीं रहीं। इस सिलसिले में उसने केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु की चार विशिष्ट हस्तियों को राज्यसभा में मनोनीत कराया, जिसका कोई खास फायदा मिलता नहीं दिखता। इसी सिलसिले में तमिलनाडु में अपनी सहयोगी अन्ना एडीएमके के दो धडों में से एक को अपने में मिलाने की उसकी कोशिश भी कामयाब नहीं हो पाई। इसलिए ऐसा लग रहा है कि तमिलनाडु में अपनी पैठ बढ़ाने में सफल नहीं हो पा रही भाजपा अब तमिलनाडु के नाम पर विवाद खड़ा करने के दांव से दक्षिण बनाम उत्तर का मुद्दा बनाना चाहती है। दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में भी उसके पास खोने को कुछ नहीं है। केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और पुदुचेरी में वह हाशिए की पार्टी है। तेलंगाना में वह मुख्य विपक्षी दल बनने के लिए संघर्ष कर रही है। कर्नाटक में जहां उसकी सरकार है, वहां भी उसकी स्थिति ठीक नहीं है। इसलिए लगता यही है कि भाजपा तमिलनाडु सहित अन्य दक्षिणी राज्यों में अपने लिए कोई संभावना न देख हिंदी भाषी प्रदेशों में बड़ी जीत हासिल करने की राजनीति कर रही है। यह आग से खेलने जैसा है क्योंकि इससे उत्तर और दक्षिण भारत का अलगाव बढ़ेगा।

इस सिलसिले में यह नहीं भूलना चाहिए कि अभी पिछले दिनों तेलुगू फिल्म आरआरआर ने अपने गाने के लिए गोल्डन ग्लोब अवार्ड जीता तो फिल्म के निर्देशक एसएस राजामौली ने कहा, ''यह बॉलीवुड की फिल्म नहीं है, यह तेलुगू की फिल्म है, जहां से मैं आता हूं।’’ उनकी यह टिप्पणी सामान्य नहीं है। यह अलग अस्मिता को ताकतवर तरीके से सामने लाने की शुरुआत है। अर्थव्यवस्था, जनसंख्या, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, टैक्स में हिस्सेदारी जैसे मुद्दों को लेकर दक्षिण के राज्य पहले ही नाराज हैं और अलग समूह बना रहे हैं। अब उनकी संस्कृति और अस्मिता को नाहक चुनौती दी जा रही है। इससे हो सकता है कि हिदी भाषी क्षेत्रों में भाजपा को फायदा हो जाए लेकिन देश में विभाजन बहुत बढ़ जाएगा।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। व्यक्त विचार निजी हैं।)

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