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ब्लिंकन का अरब दुनिया का दौरा सस्ती कूटनीति के ज़रिये उन्हें लुभाने की कोशिश करना है

अरब मानस में यह बात घर कर चुकी है कि फ़िलिस्तीन समस्या के स्थायी और अंतिम समाधान को अनिश्चित काल तक टाला नहीं जा सकता है।
Mohammed bin Salman
सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (दाएं) ने 8 जनवरी, 2023 को अलऊला में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन से मुलाकात की।

संयुक्त राज्य अमेरिका ने 22 दिसंबर, 2023 को, गज़ा पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के खिलाफ़ वीटो का इस्तेमाल किए बिना पारित होने देने से भले ही कोई उम्मीद जगी हो, लेकिन इसने युद्धविराम के आहवन को रोक दिया - यह कुछ ओर नहीं बल्कि स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय अलगाव था जिसका सामना वाशिंगटन और तेल अवीव कर रहे हैं जो अनिवार्य रूप से इज़राइल के आगे बढ़ने के विकल्पों को प्रभावित करेगा।

हालाँकि, विरोधाभासी रुझान भी नज़र आ रहे हैं। इज़राइल ने गज़ा से अपने कुछ सैन्य बलों की वापसी का आदेश देकर नए साल की शुरुआत की, लेकिन आईडीएफ के प्रवक्ता डैनियल हगारी ने इस बात पर जोर दिया कि युद्ध 2024 में भी जारी रहेगा और इस वापसी को इजरायल की सेनाओं के नवीनीकरण और सेना के नए संगठन के अनुरूप बताया। 

नए साल की पूर्व संध्या पर बोलते हुए, हगारी ने कहा, “आज रात, 2024 शुरू हो रहा है और हमारे लक्ष्यों को हासिल करने के लिए एक लंबे युद्ध की जरूरत है, और हम उसी के अनुसार खुद को तैयार कर रहे हैं। हमारे पास भंडार, अर्थव्यवस्था, परिवारों और पुनः आपूर्ति के साथ-साथ युद्ध और प्रशिक्षण की निरंतरता को ध्यान में रखते हुए अपनी तैनाती का प्रबंधन करने की एक स्मार्ट योजना है।

हगारी का अस्पष्ट संकेत कि सेना ने उत्तरी गज़ा में बड़ी लड़ाई समाप्त कर ली है, इस दावे का समर्थन था कि सेनाएं उत्तरी गज़ा में "उपलब्धि को मजबूत करना जारी रखेंगी", इजरायल-गज़ा सीमा बाड़ के साथ सुरक्षा को मजबूत करेंगी और मध्य और दक्षिणी इलाके पर ध्यान केंद्रित करेंगी।

गुरुवार को इजरायली रक्षा मंत्री योव गैलेंट ने भी कम तीव्र सैन्य अभियानों में लाए गए बदलाव की योजना पेश की। मंत्री के कार्यालय ने एक बयान में कहा कि, "गज़ा पट्टी के उत्तरी क्षेत्र में, हम जमीन पर सैन्य उपलब्धियों के अनुसार एक नए युद्ध वाले दृष्टिकोण में बदलाव करेंगे।" लेकिन गैलेंट ने कहा कि, "यह तब तक जारी रहेगा जब तक जरूरी समझा जाएगा।" गैलेंट की योजना के अनुसार, गज़ा में युद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक कि सभी बंधकों को रिहा नहीं कर दिया जाता और शेष सैन्य खतरों को निष्प्रभावी नहीं कर दिया जाता।

मूल रूप से, हागारी की टिप्पणी और गैलेंट की योजना को अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन के संकेत के रूप में देखा जा सकता है, जिनके तुर्की, जॉर्डन, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के दौरे के बाद इस सप्ताह के अंत में इज़राइल में आने की उम्मीद है। साथ ही, हाल के दिनों में इज़राइल ने भी कई आक्रामक गतिविधियों के चलते  तनाव बढ़ा दिया है।

इजराइल और हिजबुल्लाह के बीच सीमा पार लड़ाई एक बार फिर बढ़ गई है। इसके अलावा, पिछले सप्ताह बेरूत के हिज़्बुल्लाह के गढ़ में हमास के शीर्ष राजनीतिक नेता सालेह अल-अरौरी की लक्षित हत्या; दमिश्क के उपनगरीय इलाके में एक वरिष्ठ आईआरजीसी कमांडर और चार अन्य की हत्या; करमान (ईरान) में आतंकवादी हमले; हिज़्बुल्लाह की कुलीन राडवान सेना के कमांडर की हत्या; - पिछले हफ्ते की ये सभी घटनाएं किसी न किसी तरह से इजरायली खुफिया जानकारी के लिए जिम्मेदार हैं।

बदले में, इन घटनाओं ने हाल ही में इस आशंका को फिर से बढ़ा दिया है कि इज़राइल-हमास युद्ध एक व्यापक संघर्ष में बदल सकता है। इससे पहले मंगलवार को, हिज़बुल्लाह के उप नेता नईम क़ासिम ने एक टेलीविज़न भाषण में कहा कि उनका समूह लेबनान से युद्ध  नहीं बढ़ाना चाहता था, "लेकिन अगर इज़राइल आगे बढ़ता है, तो इज़राइल को रोकने के लिए जरूरी जवाब दिया जाना जरूरी है।"

इजरायली व्यवहार के पैटर्न को विभिन्न कोणों से समझने की जरूरत है। यह एक अविश्वसनीय रूप से जटिल मैट्रिक्स है। सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गज़ा में अब तक इजरायली ऑपरेशन विफल रहा है। इसने दुनिया भर की राय को, विशेष रूप से ग्लोबल साउथ को इजरायल के खिलाफ कर दिया है – गज़ा में युद्ध अपराधों पर अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में दक्षिण अफ्रीका की याचिका इसका सबसे बड़ा सबूत है - जबकि इजरायली सेना हमास को खत्म करने अपने एजेंडे में असफल रही है।

तेल अवीव गज़ा युद्ध में अपने किसी भी घोषित लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाया है, जो हमास का विनाश या हमास को निरस्त्र करना और गज़ा में फ़िलिस्तीनियों द्वारा बंदियों की रिहाई कराना शामिल है। इससे तेल अवीव में सुरक्षा और सैन्य महकमा भारी दबाव में आ गया है, जिसकी प्रतिष्ठा 7 अक्टूबर के हमले के बाद गंभीर रूप से खराब हो गई है।

दूसरी ओर, गज़ा ऑपरेशन में इजरायली सैनिकों को हुई भारी क्षति पर पर्दा डाला गया है। करमान आतंकवादी हमला और सालेह अल-अरौरी की हत्या वास्तव में उच्च स्तर की हताशा को दर्शाती है।

राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो, सुरक्षा और सैन्य महकमा और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (जिनका राजनीतिक भविष्य एक धागे से लटका हुआ है) और उनके साथ गठबंधन करने वाली अति-दक्षिणपंथी फासीवादी ताकतों के हित मिलते हैं, और युद्ध को बढ़ाने में इनके हित जुड़े हुए हैं।

इजराइल पर दबाव बनाने में सक्षम एकमात्र बाहरी ताकत निस्संदेह अमेरिकी प्रशासन है। लेकिन कांग्रेस पर इज़राइल लॉबी के नियंत्रण और उसे बनाने या नष्ट करने की इसकी निर्बाध क्षमता को देखते हुए, राष्ट्रपति बाइडेन से इज़राइल के सामने 'लाल रेखा' खींचने की उम्मीद करना बहुत अधिक हो जाएगा - यानी, यह मानते हुए भी कि उनके पास ऐसा करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति है – लेकिन बहुत ज्यादा उम्मीद इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि इज़राइल लॉबी में अमेरिकी राजनेताओं के करियर को बर्बाद करने की भी क्षमता है। 

वाशिंगटन ने इज़रायली सैन्य अभियान की तीव्रता में कोई बदलाव नहीं किया है। दूसरी ओर, अमेरिका ने हाल ही में इजरायल को 10,000 टन हथियार भेजे हैं। वास्तव में, यह कोई संयोग नहीं हो सकता है कि 7 अक्टूबर के बाद से इस इलाके में ब्लिंकन की हर यात्रा के दौरान, खासतौर पर क्रूर इजरायली हमले हुए हैं। वास्तव में, अमेरिका मोटे तौर पर इजरायली नीति और विशेष रूप से हमास के विनाश की प्रतिबद्धता के समर्थन में है।

इसलिए, इलाके में युद्ध को फैलने से रोकने में बाइडेन की रुचि सीमित हो गई है, अन्यथा प्रत्यक्ष अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप जरूरी नहीं होगा। अमेरिकी बयानबाजी और कूटनीतिक रुख का उद्देश्य मुख्य रूप से इलाके में अपने पूर्व सहयोगियों के साथ वाशिंगटन के संबंधों में नुकसान को नियंत्रण करना है।

निस्संदेह, ब्लिंकन का मिशन सस्ती कूटनीतिक से जुड़ा है - अर्थात, इलाकाई देशों को एक ही पृष्ठ पर लाना कि इज़राइल एक अस्तित्वगत के संकट का सामना कर रहा है। लेकिन इसमें इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया कि इलाके में आमूल-चूल बदलाव आ गाया है।

वर्तमान संकट में जो बात वास्तव में अलग है वह यह है कि अरब दुनिया असहाय फिलिस्तीनियों - 'जानवरों' जैसा कि इजरायली राजनेता उनका वर्णन करते हैं, इजरायल के बर्बर व्यवहार से बेहद चिंतित है और नाराज हैं। 

अरब मानस इस बात से आश्वस्त है कि फ़िलिस्तीन समस्या का स्थायी अंतिम समाधान अनिश्चित काल तक स्थगित नहीं किया जा सकता है। सऊदी अरब के लिए भी बुनियादी तौर पर कुछ बदलाव आया है, जिसका दशकों से इज़राइल के साथ गुप्त संबंध था और वह उसके साथ औपचारिक संबंध स्थापित करने की ओर बढ़ रहा था।

एक सऊदी बयान में कहा गया है कि सोमवार को अल 'उला में ब्लिंकन का स्वागत करते हुए, क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने "सैन्य अभियानों को रोकने, मानवीय सहायता कार्रवाई को तेज करने और स्थिरता बहाल करने और शांति प्रक्रिया के लिए हालात तैयार करने के लिए काम करने के महत्व पर जोर दिया जो यह सुनिश्चित कर सके कि फ़िलिस्तीनी लोग अपने वैध अधिकार हासिल कर सकें और न्यायसंगत और स्थायी शांति हासिल कर सकें। सऊदी का बयान अमेरिकी विदेश विभाग के बयान से बिल्कुल अलग है।

दिलचस्प बात यह है कि सऊदी दैनिक अशरक अल-अवसत में ब्लिंकन की आगामी यात्रा पर केंद्रित एक लेख में कई मुद्दों पर रियाद और वाशिंगटन के बीच बुनियादी मतभेदों पर रोशनी डाली गई है – गज़ा में युद्धविराम ("केवल एक मानवीय संघर्ष विराम या कैदियों की अदला-बदली नहीं, बल्कि एक व्यापक युद्ध-विराम होना चाहिए"); लाल सागर की सुरक्षा ("लाल सागर में सुरक्षा की जिम्मेदारी पहले तटवर्ती देशों की है, और संयुक्त राष्ट्र-अंतर्राष्ट्रीय जिम्मेदारी दूसरे स्थान पर आती है"); "युद्ध का दायरा बढ़ाने" के लिए इज़राइल को दोषी ठहराना; इसलिए इस बिंदु पर "युद्धोत्तर चरण के बारे में बात करना" निरर्थक है।

लेख एक उदास नोट पर समाप्त होता है: "यदि अमेरिकी प्रशासन चाहता है कि ब्लिंकन की सऊदी अरब और इलाके की यात्रा सफल हो, और यदि वह इलाके में अपनी साझेदारी बनाए रखना चाहता है, और मध्य पूर्व में शांति के प्रायोजक के रूप में अपनी भूमिका को संरक्षित करना चाहता है, तो ऐसे समय में जब वाशिंगटन के प्रति शत्रुतापूर्ण अंतर्राष्ट्रीय ताकतें इस इलाके में पैर जमाने की कोशिश कर रही हैं, उसे तटस्थता की नीति का अनुसरण करना चाहिए, और आगामी अमेरिकी चुनावों में इलाके के हितों और भविष्य को एक कार्ड के रूप में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसे बीमारी से निपटना चाहिए न कि लक्षण से, जैसा कि यह अभी कर रहा है।”

एम॰के॰ भद्रकुमार एक पूर्व राजनयिक हैं। वे उज्बेकिस्तान और तुर्की में भारत के राजदूत रह चुके हैं। व्यक्त  विचार निजी हैं। 

साभार: इंडियन पंचलाइन

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