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जी-20 : अमेरिका-रूस संबंधों में आई कड़वाहट के बीच क्या यूक्रेन पर कोई संयुक्त घोषणा संभव है? 

जी-20 शिखर वार्ता के घोषणापत्र में यूक्रेन पर कुछ समझौते वाले फ़ॉर्मूले पर अभी भी बातचीत हो सकती है।
jai shankar

जो कोई भी रूसी राजनीति को लंबे समय से देख कर रहा है उन्हें पता होगा कि रूसी-अमेरिकी टकराव की दिशा का सबसे अच्छा आकलन उन षडयंत्रों से किया जा सकता है, जो अक्सर अस्पष्ट होते हैं और उन पर किसी का ध्यान भी नहीं जाता है, रंगभूमि से दूर जहां ग्लैडीएटर तलवारें भांजते हैं। इसलिए, यूक्रेन संकट पर दो रास्ते तलाशने की जरूरत है।

जिसमें एक तो पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन से इतर जकार्ता में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और भारत के विदेश मंत्री एस॰ जयशंकर के बीच मुलाकात का होना है और दूसरी तरह अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन का कीव में अघोषित आगमन। दोनों घटनाएं बुधवार को हुईं। पिछले 48 घंटों के दौरान जकार्ता, कीव, मॉस्को और वाशिंगटन के बीच साइबर ट्रैफिक काफी भारी रहा होगा।

जयशंकर के साथ लावरोव की बैठक के बाद रूस की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि दोनों मंत्रियों ने “द्विपक्षीय संबंधों और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के सबसे महत्वपूर्ण मसलों पर विचारों का आदान-प्रदान किया… मुख्य रूप से संयुक्त राष्ट्र के साथ-साथ एससीओ के भीतर बहुपक्षीय प्रारूपों में समन्वय बढ़ाने की पारस्परिक इच्छा जताई गई है औए साथ ही ब्रिक्स और जी-20 पर जोर दिया गया।”

जाहिर है, जिस चीज के लिए बैठक की जरूरत पड़ी वह यूक्रेन को लेकर जी-20 घोषणापत्र की एक फॉर्मूलेशन तैयार करना है और भारत इसकी बड़ी तीव्र कोशिश कर रहा है, यदि ऐसा हो जाता है तो नरेंद्र मोदी सरकार की यह एक कूटनीतिक जीत हो सकती है।  

पिछले सप्ताह, लावरोव ने चेतावनी दी थी कि "यदि हमारी स्थिति को ध्यान में नहीं रखा गया तो सभी सदस्यों [जी-20] की ओर से कोई सामान्य  घोषणा जारी नहीं की जाएगी।" लेकिन जयशंकर को पता होगा कि रूसी कूटनीति का एक सिद्धांत है, "कभी न मत कहो"।

ऐसा तो नहीं लगता है कि रविवार को जी-20 के समापन पर, मॉस्को मोदी के ट्रॉफी थामने में कोई रोड़ा अटकाएगा। राष्ट्रपति जोए बाइडेन के नजरिए से भी, एक सफल मोदी इंडो-पैसिफिक में अधिक प्रभावी भागीदार बन सकता है।

वास्तव में, व्हाइट हाउस की घोषणा में कहा गया है कि “नई दिल्ली में रहते हुए, राष्ट्रपति बाइडेन जी-20 के लिए प्रधान मंत्री मोदी के नेतृत्व की भी सराहना करेंगे और आर्थिक सहयोग के प्रमुख मंच के रूप में जी-20 के प्रति अमेरिकी प्रतिबद्धता की पुष्टि भी करेंगे, जिसमें 2026 में इसकी मेजबानी भी शामिल है। ”

यूक्रेन पर समझौता वाले फॉर्मूले पर अभी भी कुछ बातचीत हो सकती है। यदि ऐसा है, तो इसके पैरामीटर इस बात का संकेतक होंगे कि मॉस्को और वाशिंगटन किस हद तक अपने संबंधित हितों और अपेक्षाओं को पूरा करने के इच्छुक हैं।

इस बीच, 6 सितंबर को, ब्लिंकन कीव की बिल्कुल असामान्य यात्रा पर निकल पड़े। उनके भीतर कोई गुस्सा नहीं था। उन्होंने रूस को एक बार भी धमकी नहीं दी या यूक्रेनी धरती से पुतिन का मज़ाक नहीं उड़ाया। न ही ब्लिंकन ने कीव के जवाबी हमले के लिए ज्यादा उत्साह दिखाया।

बल्कि, उनका ध्यान युद्ध की भयानकता के कारण मानवीय पीड़ा, युद्ध के बाद लोकतंत्र के रूप में यूक्रेन की रिकवरी और इसकी अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण पर था। ब्लिंकन ने बार-बार कहा कि वे बाइडेन के निर्देश पर यह यात्रा कर रहे हैं। राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की की उपस्थिति में ब्लिंकन ने कहा:

“संयुक्त राज्य अमेरिका इस बात के लिए प्रतिबद्ध हैं कि हम आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना जारी रखेंगे। और राष्ट्रपति बाइडेन ने मुझसे यहां आने के लिए कहा, ताकि  हम अपने समर्थन की पुष्टि कर सकें, और यह सुनिश्चित कर सकें कि हम जो प्रयास कर रहे हैं उसे अधिकतम कर रहे हैं और अन्य देश यूक्रेन की जवाबी कार्रवाई की तत्काल चुनौती के साथ-साथ उसकी मदद के लिए दीर्घकालिक प्रयास कर रहे हैं। भविष्य के लिए एक ऐसी ताकत का निर्माण करें जो भविष्य में होने वाली किसी भी आक्रामकता को रोक सके और उसका उसका बचाव कर सके, साथ ही आपके साथ काम कर सके और आपका समर्थन भी कर सके क्योंकि आप अपने लोकतंत्र को मजबूत करने, अपनी अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के महत्वपूर्ण कार्य में लगे हुए हैं।''

व्यंगतमक शब्द, लेकिन क्रीमिया को आज़ाद कराने, लड़ाई को रूसी खेमे में ले जाने या रूस को उसके कब्जे वाले इलाकों को खाली करने के लिए मजबूर करने और केवल ताकत के बल पर रूस के साथ बातचीत की पेशकश की कोई शेखी बघारने वाली बात नहीं सुनने को मिली। यूक्रेन के विदेश मंत्री दिमित्रो कुलेबा ने ब्लिंकेन के साथ हुई संयुक्त प्रेस वार्ता में दावा किया कि उनके बीच अमरीका की तरफ से कीव को लंबी दूरी के रॉकेट, एटीएसीएमएस प्रदान करने पर "ठोस" चर्चा हुई है। लेकिन ब्लिंकन ने इस विषय को दरकिनार कर दिया।

ब्लिंकन की यात्रा के बारे में सबसे असामान्य बात यह थी कि यह दूसरे दिन तक चली। यह पहली बार होगा जब ब्लिंकन ने यूक्रेन में एक रात बिताई। कुलेबा, ज़ेलेंस्की और प्रधानमंत्री डेनिस शमिगल से मिलने के पहले दिन ब्लिंकन का कार्यक्रम काफी व्यस्त था, लेकिन दूसरे दिन [7 सितंबर] का यात्रा कार्यक्रम खुला छोड़ दिया गया था। जाहिर है, वे कीव कुछ गंभीर चर्चाओं के लिए आये थे।

संभवतः, अब जब यूक्रेनी जवाबी हमला अपने राजनीतिक-सैन्य उद्देश्यों को पूरा करने में विफल रहा है, तो बाइडेन को मास्को और कीव के बीच शांति वार्ता शुरू करने में दिलचस्पी हो सकती है, और छद्म युद्ध के लिए अमेरिका और यूरोप में समर्थन कम होने के चिंताजनक संकेत भी हैं, जबकि आक्रामक रूस यूक्रेन की सेना पर करारा हमला भी कर सकता है। रूसी और पश्चिमी, दोनों का अनुमान है कि कीव के "जवाबी हमले" शुरू होने के बाद से पिछले 3 महीनों में लगभग 65-70,000 यूक्रेनी सैनिक मारे गए हैं।

इस बीच, एक दिलचस्प संयोग में, 6 सितंबर को यूक्रेन की संसद वेरखोव्ना राडा ने एलेक्सी रेजनिकोव की जगह रुस्तम उमेरोव को नए रक्षा मंत्री के रूप में नियुक्त करने को मंजूरी दे दी है। उज़्बेकिस्तान (यूएसएसआर) में पैदा हुए एक क्रीमियन टार्टर, उमेरोव की कोई पिछली सैन्य पृष्ठभूमि नहीं है। लेकिन ज़ेलेंस्की उन पर भरोसा करते हैं और वे अमेरिकियों को स्वीकार्य भी हैं।

उमेरोव में जो बात अलग है वह यह है कि वे पिछले साल मार्च में इस्तांबुल में रूस के साथ शांति वार्ता में एक प्रमुख वार्ताकार थे, जिसके परिणामस्वरूप वास्तव में एक सहमति वाला दस्तावेज तैयार हुआ था (जिसमें से ज़ेलेंस्की बाद में एंग्लो-अमेरिकी दबाव में पीछे हट गए थे।) फिर से, उन्होंने बातचीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और वे ब्लैक सी ग्रेन इनिशिएटिव (यूक्रेन और रूस के बीच तथाकथित अनाज सौदा) जो पिछले साल जुलाई में इस्तांबुल में चालू हुआ था के मुख्य वार्ताकार थे। ये हवा में उड़ने वाले तिनके हैं जिन पर विधिवत ध्यान दिया जाना चाहिए।

उमेरोव की नियुक्ति के एक दिन बाद यानि 7 सितंबर को, तुर्की रक्षा मंत्रालय ने अंकारा में घोषणा की: "हम रूस और यूक्रेन के बीच होने वाली घटनाओं पर बारीकी से निगरानी रख  रहे हैं, जो हमारे इलाके और पूरी दुनिया की सुरक्षा को गंभीर रूप से खतरे में डाल रही है।  हम युद्धविराम और शांति सुनिश्चित करने में सक्रिय और सहायक भूमिका निभाने के साथ-साथ मानवीय संकट को कम करने में व्यापक समर्थन देने को तैयार हैं।  

फिर, 7 सितंबर को, ज़ापोरोज़े इलाके के कार्यवाहक गवर्नर येवगेनी बालिट्स्की (क्रेमलिन द्वारा नियुक्त व्यक्ति) ने अचानक टीएएसएस रूसी न्यूज एजेंसी को बताया कि रूस और यूक्रेन को एक तटस्थ मंच की जरूरत है जहां दोनों देश कैदियों की अदला-बदली सहित आपसी मुद्दों के व्यावहारिक समाधान पर बातचीत कर सकें, जो काम करेगा। हालांकि विशेष सैन्य अभियान जारी है। बालिट्स्की, रूस-यूक्रेन वार्ता की वर्तमान संभावना के बारे में टीएएसएस के एक तीखे सवाल का जवाब दे रहे थे। उन्होंने आगे कहा कि:

“कहीं न कहीं एक बातचीत का मंच होना चाहिए – या तो विदेश मंत्रालयों के स्तर पर, या फिर अन्य मध्यस्थ देशों के स्तर पर होना चाहिए। ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो दुर्भाग्य से, बातचीत की प्रक्रिया से दूर हो गए हैं। वे वस्तुनिष्ठ और व्यावहारिक तरीके से मुद्दे से निपटने में सक्षम हैं, हालांकि, कहीं न कहीं एक टेबल होनी चाहिए जहां अधिकृत प्रतिनिधि बातचीत कर सकें। इससे युद्ध अपराध से जुड़े क़ैदियों की अदला-बदली वाले मुद्दों को हल किया जा सकेगा, या, उदाहरण के लिए, परमाणु ऊर्जा संयंत्रों पर बमबारी पर रोक का मुद्दा हल किया जा सकता है। इससे सभी को लाभ होगा, यहां तक कि युद्ध के समय में भी, चाहे यह कितना भी निंदनीय लगे।

“तो, किसी भी स्थिति में कोई न कोई मंच होना ही चाहिए। इससे अधिक व्यापक वार्ता की शुरुआत हो सकती है। और इसके परिणामस्वरूप कुछ हल निकल सकता है। और, शायद, हम राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित कार्य को शांतिपूर्ण ढंग से हल करने में सक्षम होंगे।

बालिट्स्की, मेलिटोपोल के एक अनुभवी यूक्रेनी राजनेता हैं, जो एक सैन्य परिवार से हैं, जो  सोवियत सेना में थे, और 2004 में राजनीति में प्रवेश करने के बाद से यूक्रेनी संसद में दो बार सांसद रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है, उन्होंने क्रेमलिन के निर्देशों पर बात की थी।

वैसे, पुतिन ने दो हफ्ते पहले बालिट्स्की से क्रेमलिन में मुलाकात की थी। बालिट्स्की की  टिप्पणी के साथ सावधानी से छेड़छाड़ करते हुए ब्लिंकन और उनके यूक्रेनी मेजबान यह संदेश देने से नहीं चूके होंगे कि मॉस्को बातचीत के लिए खुला है।

भले ही रूसी-अमेरिकी संबंधों की जमी हुई झील पर दरार पड़ने की आवाजें सुनाई दे रही हैं, जो इस दृश्य को मंत्रमुग्ध कर देता है, कि बाइडेन और रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव दोनों रविवार को जी-20 शिखर सम्मेलन में आने के लिए दिल्ली पहुंच रहे हैं।

एम.के॰ भद्रकुमार एक पूर्व राजनयिक हैं। वे उज़्बेकिस्तान और तुर्की में भारत के राजदूत रह चुके हैं। व्यक्त विचार निजी हैं। 

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें।

Ice Cracking Sounds on Frozen Lake of US-Russia Relations

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