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ब्रिक्स के विस्तार का अर्थ क्या है?

ऐसा लगता है कि सदस्यता देने लिए छह देशों का चुनाव 22 ऐसे देशों की सूची में से किया गया है, जो ब्रिक्स में शामिल होने के लिए उत्सुक थे।
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ब्रिक्स देशों के जोहन्सबर्ग शिखर सम्मेलन में तय किया गया कि इस ग्रुप का, मूल पांच सदस्यों--ब्राजील, रूस, भारत, चीन तथा दक्षिण अफ्रीका--से आगे विस्तार किया जाए और इसमें छह और देशों को शामिल कर लिया जाए। ये देश हैं--अर्जेंटीना, मिस्र, ईरान, इथियोपिया, साऊदी अरब और यूनाइटेड अरब अमीरात।

क्या यह सिर्फ महत्व पाने की आकांक्षा है?

ऐसा लगता है कि सदस्यता देने लिए इन छह देशों का चुनाव 22 ऐसे देशों की सूची में से किया गया है, जो ब्रिक्स में शामिल होने के लिए उत्सुक थे। इतना ही नहीं, दक्षिण अफ्रीका में, जो कि इस समय ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाले हुए है, सरकारी सूत्रों ने यह बताया है कि पूरे 40 देशों की इस ग्रुप में शामिल होने में दिलचस्पी थी। इससे स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि ब्रिक्स अचानक, दुनिया भर में इतना लोकप्रिय क्यों हो गया है?

बहुत से लोग ब्रिक्स को कुछ ऐसे देशों की ओर से, जो साम्राज्यवादी देशों की ‘‘ऊंची मेज’’ से दूर रखे गए हैं, इसकी कोशिश के तौर पर देखते आए हैं कि अपना जोर दिखाएं तथा वैश्विक मामलों में कहीं उल्लेखनीय भूमिका अदा करें, जोकि उस भूमिका के अनुरूप होगी, जिसके अपने विचार से ये देश हकदार हैं। लेकिन, ब्रिक्स एक बहुत ही भिन्नतापूर्ण समूह है। इसके सदस्यों में से रूस और चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य हैं, जिन्हें वैसे भी वीटो की शक्ति हासिल है। इनमें से एक देश इस समय ‘‘ऊंची मेज’’ पर बैठने वाले देशों के साथ युद्घ में लगा हुआ है और दूसरे को उनके ‘मुख्य दुश्मन’ के रूप में बदनाम किया जा रहा है। इसलिए, इन देशों के ‘बहिष्कृत’ महसूस करने का तो सवाल ही नहीं उठता है। रही बात ब्रिक्स के बाकी सदस्यों की तो, एक ग्रुपिंग के तौर पर तो ब्रिक्स ने अपनी स्थापना के बाद से अब तक, किसी भी विश्व परिस्थिति में कोई कुंजीभूत भूमिका अदा की नहीं है। इसलिए, ब्रिक्स के इन बचे हुए सदस्यों को भी महज वैश्विक मामलों में एक कहीं बड़ी भूमिका के आकांक्षियों के रूप में शायद ही देखा जा सकता है क्योंकि उनकी ऐसी आकांक्षा होती तो उन्होंने कहीं ज्यादा सकर्मक भूमिका दिखाई होती। इसी प्रकार, इतने सारे देशों के ब्रिक्स में शामिल होने के लिए उत्सुक होने के पीछे एक यही मंतव्य नहीं हो सकता है कि अपने लिए कहीं ज्यादा महत्व हासिल किया जाए।

विश्व पूंजीवादी संकट और मौजूदा संस्थाओं की अपर्याप्तता

इसके ऊपर से, इस तरह की व्याख्या के साथ समस्या यह है कि यह वर्तमान विश्व परिस्थिति के पीछे मौजूद राजनीतिक-अर्थव्यवस्था से पूरी तरह से अनजान है, जबकि इस परिस्थिति की पहचान विश्व पूंजीवाद को आर्थिक संकट से होती है और यह ऐसा संकट है जिसे अनुदारपंथी तथा सत्ता-अधिष्ठान से जुड़े अर्थशास्त्री तक एक ‘चौतरफा आर्थिक गतिरोध’ (सेकुलर स्टेग्नेशन) कह रहे हैं।

संकट की परिस्थिति में, पुरानी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं, पूरी तरह से अपर्याप्त नजर आती हैं और ऐसा लगता है कि साम्राज्यवादी देश इन हालात का सामना करने के लिए, पहले से मौजूद संस्थाओं में फेरबदल करने या उनमें तब्दीली करने या नयी संस्थागत खोजें करने में पूरी तरह से असमर्थ ही हैं। इस संदर्भ में ब्रिक्स एक ऐसी नयी खोज नजर आता है, जिससे उम्मीद बंधती है।

दूसरे शब्दों में ब्रिक्स की लोकप्रियता इस संकट की ही अभिव्यक्ति है, अब तक कायम रही साम्राज्यवादी व्यवस्था के संकट से निपट सकने में विश्वास की कमी की अभिव्यक्ति है। यह ब्रिक्स को एक ‘‘साम्राज्यवाद-विरोधी’’ ग्रुपिंग नहीं बना सकता है। इसमें शामिल कुछ देश बेशक साम्राज्यवाद-विरोधी हैं, लेकिन मिस्र, इथियोपिया, साऊदी अरब तथा यूएई के मामले में किसी तरह से यह नहीं कहा जा कसता है कि वे ब्रिक्स में शामिल होकर, साम्राज्यवाद के खिलाफ बगावत कर रहे हैं। पर साम्राज्यवाद-विरोधी नहीं होते हुए भी वे एक संभावनापूर्ण वैकल्पिक ग्रुपिंग की ओर देख रहे हैं, जो उनके ख्याल से उन्हें आने वाले समय में महत्वपूर्ण मदद मुहैया करा सकती है।

ब्रिक्स देशों की तीन अलग-अलग श्रेणियां

अब जो विस्तारित ब्रिक्स सामने है, उसमें तीन अलग-अलग प्रकार के देश हैं (ये श्रेणियां परस्पर अपवर्जी नहीं हैं): इनमें ऐसे देश हैं जिनके खिलाफ साम्राज्यवाद ने इकतरफा ‘पाबंदियां’ लगायी हैं या दंडात्मक संरक्षणात्मक कदम थोपे हैं; तेल तथा प्राकृतिक गैस उत्पादक देश हैं; और ऐसे देश हैं जो पहले ही मौजूदा विश्व संकट के बीच कठिनाइयां झेल रहे हैं या आने वाले दिनों में कठिनाइयां झेलने जा रहे हैं। चीन, रूस तथा ईरान, पहली श्रेणी के उदाहरण हैं। रूस, ईरान, साऊदी अरब तथा यूएई, दूसरी श्रेणी के प्रतिनिधि हैं। और मिश्र, इथियोपिया, अर्जेंटीना तीसरी श्रेणी में हैं और भारत व ब्राजील भी उन्मुक्त होते हुए संकट को लेकर चिंतित हैं और वैकल्पिक व्यवस्था के लिए उत्सुक हैं।

उन देशों के लिए जो इकतरफा साम्राज्यवादी पाबंदियों के शिकार हैं, जो सुरक्षा परिषद तक की किसी अनुमति के बिना ही उन पर थोप दी गयी हैं, ब्रिक्स संभावित रूप से ऐसी व्यवस्था मुहैया कराता है, जिसके सहारे वे इन पाबंदियों को धता बता सकते हैं। इस अर्थ में ईरान का ब्रिक्स में शामिल किया जाना शायद, जोहन्सबर्ग शिखर सम्मेलन में उठाए गए दूसरे किसी भी कदम से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

ईरान को सिर्फ कड़ी पाबंदियों का ही निशाना नहीं बनाया गया है बल्कि वह ऐसा पहला देश था, जिसे विकसित दुनिया के बैंकों में जमा अपने विदेशी मुद्रा संचित कोष तक पहुंच से भी रोक दिया गया, जो कि साफ तौर पर पूंजीवादी व्यवस्था के उन नियमों का उल्लंघन था, जो खुद पूंजीवादी देशों ने तैयार किए थे। उसके बाद से, अंतर्राष्ट्रीय ‘लूटमार’ की ऐसी हरकतें काफी आम-फहम हो गयी हैं और यूक्रेन युद्घ की पृष्ठभूमि में रूस इस तरह की लूटमार का ताजातरीन शिकार हुआ है। रूस को भी विदेशी बैंकों में जमा अपने संचित विदेशी मुद्रा कोष तक पहुंच से रोक दिया गया। ब्रिक्स में शामिल होना इन पाबंदियों के शिकार देशों को उस दुश्चक्र से बाहर निकलने में समर्थ बनाता है, जिसमें साम्राज्यवाद उन्हें फंसा कर रखना चाहता है।

उधर तेल तथा प्राकृतिक गैस उत्पादक देश यह देख रहे हैं कि विश्व मंदी के चलते, उनके उत्पादों के दाम गिरते जा रहे हैं और वे भी घटी हुई मांग के सामने अपने उत्पाद को ही घटाने के जरिए, अपने उत्पादों के दाम थामे रखने की कोशिश करते रहे हैं। उन्होंने ऐसा अमेरिका की साफ तौर पर जतायी जा रही मर्जी के खिलाफ किया है। वास्तव में एक मौके पर तो अमेरिका ने, खुद बाइडेन समेत अपने अनेक दूतों को साऊदी अरब तक इसका आग्रह करने भेजा था कि वह तब होने ही वाली ओपेक प्लस की बैठक तेल उत्पाद में कटौती की पेशकश का विरोध करे। लेकिन, अमेरिका का दबाव काम नहीं आया। उसके बाद से और भी मौके आए हैं जब ओपेक प्लस ने उत्पाद में कटौतियों का एलान किया है। अगर तेल उत्पादकों को भविष्य में पर्याप्त स्वायत्तता चाहिए, जिससे अमेरिका की मर्जी को दरकिनार करके अपने उत्पाद की मात्रा तय कर सकें, तो उनके लिए अमेरिका के प्रति विरोधी हुए बिना ही, इकलौते अमेरिका पर ही निर्भरता से हटकर, अपने संबंधों को बहुविध बनाना जरूरी लगता है। उनके लिए ब्रिक्स में शामिल होना, अपने संबंधों के ऐसे बहुविधकरण का एक उपाय है।

आर्थिक संकट से चिंतित देश

देशों के तीसरे समूह के लिए, जिसमें मिस्र, अर्जेंटीना तथा इथियोपिया आते हैं, जो गंभीर रूप से बीमार अर्थव्यवस्थाएं हैं और ब्राजील, भारत तथा दक्षिण अफ्रीका भी इसमें आते हैं, जिनकी अर्थव्यवस्थाएं दिक्कत में तो हैं, लेकिन उतनी गंभीरता से संकट की शिकार नहीं हैं, ब्रिक्स का आकर्षण किसी और चीज में ही है। उनके लिए ब्रिक्स का आकर्षण स्थानीय मुद्रा में व्यापार की संभावना में है, जो डॉलर को धता बताकर चल सकेगा। ब्राजील और चीन ने हाल ही में स्थानीय मुद्रा में व्यापार का ऐसा समझौता किया है और ऐसा ही समझौता भारत तथा यूएई ने किया है। और ब्रिक्स के देशों के बीच आने वाले दिनों में और ज्यादा ऐसी ही व्यवस्थाएं स्वीकृत होने की संभावना है। और यह ब्रिक्स में शामिल होने के लिए एक बड़ा आकर्षण है।

इस तरह की व्यवस्था को अपनाने वाले देशों की बीच मुद्राओं का सापेक्ष मूल्य तयशुदा होता है और उनके बीच व्यापार में डॉलर की न तो हिसाब-किताब की इकाई के रूप में जरूरत होती है और न संचरण के माध्यम के रूप में। इस तरह की व्यवस्थाएं, प्रभावी तरीके से इन देशों के बीच संचरण के माध्यम की उपलब्धता को बढ़ा देती हैं और इस तरह के संवर्धन को संबंधित देशों के ही अपने निर्णय का नतीजा बनाती हैं (जिससे वे अपनी मुद्रा आपूर्ति मर्जी के हिसाब से बढ़ा सकते हैं)। यह उनके बीच व्यापार को सुगम बनाता है क्योंकि उसके लिए अब डॉलर की तंगी, किसी सीमा का काम नहीं करती है।

बहरहाल, यह तो आधी समस्या का ही समाधान करता है। इसके अलावा जरूरत इसकी है कि इस तरह के देशों के बीच के भुगतान संतुलन का निपटारा, व्यापार बचत वाले देश द्वारा व्यापार घाटे वाले देश से माल व सेवाओं की खरीद के जरिए किया जाए और अगर यह फौरन न भी हो सके तब भी, कम से कम एक अर्से में तो यह किया ही जाए। दूसरे शब्दों में, स्थानीय मुद्रा में व्यापार विश्व अर्थव्यवस्था में तरलता का परिमाण तो बढ़ाता है, लेकिन इस तरह की व्यवस्था को अपनाने वाले देशों के बीच व्यापार से पैदा होने वाली, विदेशी ऋण की समस्या को हल नहीं करता है।

साम्राज्यवाद-विरोधी नहीं पर सकारात्मक

जब ब्रिक्स ऐसी द्विपक्षीय व्यापार व्यवस्थाओं को प्रोत्साहन देगा, जहां भुगतान संतुलनों का भी निपटारा, व्यापार घाटे वाले देश पर विदेशी ऋण चढ़ाने के जरिए नहीं करके, उससे और ज्यादा माल खरीदने के जरिए किया जा रहा होगा, तब वह विश्व अर्थव्यवस्था के संचालन में सुधार लाने में उल्लेखनीय योगदान कर रहा होगा। तभी वह साम्राज्यवादी प्रभुत्ववाली विश्व आर्थिक व्यवस्था का एक वास्तविक विकल्प पेश कर रहा होगा।

ब्रिक्स बैंक की नयी निदेशक, ब्राजील की पूर्व-राष्ट्रपति, डिल्मा रूस्सोफ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस बैंक का ऋण निपटारों या ऋण सर्विसिंग के लिए ऋण देने का कोई इरादा नहीं है। वह न तो आम तौर पर तीसरी दुनिया के देशों को ऐसे ऋण देने जा रहा है और न अपने सदस्य देशों को। इसलिए, उसकी गतिविधियों से न तो तीसरी दुनिया के देशों की इस तरह के ऋण लेने के लिए, आइएमएफ के दरवाजे खटखटाने की जरूरत कम होगी और न उसके द्वारा थोपी जाने वाली ‘तंगहस्ती’ से उन पर पडऩे वाली तकलीफें कम होंगी। फिर भी वह स्थानीय-मुद्रा व्यापार का विस्तार करने के लिए और तीसरी दुनिया के देशों को ढांचागत ऋण देने के लिए भी उत्सुक हैं, जिससे साम्राज्यवाद के बोलबाले वाली संस्थाओं का शिकंजा कुछ हद तक ढील तो होगा ही।

ब्रिक्स के सदस्य देशों में वामपंथी हलकों में इस पर काफी बहस हुई है कि साम्राज्यवाद के लिए ब्रिक्स का ठीक-ठीक क्या अर्थ है। कुछ यह तर्क देते हैं कि यह साम्राज्यवाद-विरोधी तो है, लेकिन पूंजीवाद-विरोधी नहीं है। लेकिन, ब्रिक्स को साम्राज्यवाद-विरोधी कहना भी चीजों का बहुत ही बढ़ा-चढ़ाकर रखना है। एक ऐसी ग्रुपिंग को जिसमें मोदी, एमबीएस (साऊदी अरब) तथा सिसी (मिस्र) जैसे नेता हों, साम्राज्यवाद-विरोधी तो नहीं ही कहा जा सकता है। फिर भी यह ब्रिक्स विश्व अर्थव्यवस्था पर साम्राज्यवादी संस्थाओं के इजारेदाराना शिकंजे को, कम से कम एक हद तक ढीला जरूर करता है और यह निश्चित रूप से एक सकारात्मक घटना-विकास है। यह अपने आप में साम्राज्यवाद पर एक प्रहार तो नहीं है, लेकिन यह एक ऐसी स्थिति जरूर बनाता है, जो दुनिया के मेहनतकशों के लिए, साम्राज्यवाद के खिलाफ एक प्रहार करने के लिए कहीं अनुकूल होगी। 

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें।

BRICS Expansion: Reshaping Global Alliances

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