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कर्नाटक : हुलियार घुमंतू जनजाति के घर बारिश से हुए तबाह, पुनर्वास की लड़ाई जारी

कर्नाटक में घुमंतू समुदाय के लोग 14 वर्षों से भूमि अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। इस साल हद से ज़्यादा बारिश के कारण उनके घर उजड़ गए हैं।
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क्षतिग्रस्त घर बारिश से हुई तबाही की गवाही दे रहे हैं।

अक्टूबर में हद से ज़्यादा बारिश के चलते हुलियार आदिवासी समुदायों के घर नष्ट हो गए थे जो कर्नाटक का टुमकुर जिले में रहते हैं अब यह खानाबदोश समुदाय पुनर्वास और भूमि के अधिकार के लिए दर-दर भटक रहा है। अक्टूबर में 21 दिनों तक चले आंदोलन के बाद, सरकार ने उनसे वादा किया था कि बारिश बंद होने के तुरंत बाद उनके घरों में की मुरम्मत का काम शुरू हो जाएगा।लेकिन दो महीने बीत जाने के बाद भी काम आगे नहीं बढ़ा है। वे अब आंदोलन को नए पड़ाव में ले जाने पर विचार कर रहे हैं। 2018 में, टुमकुर उपायुक्त (डीसी) ने खानाबदोश समुदायों के लिए हुलियार में 1.35 एकड़ जमीन आवंटित की थी और बाद में, 34 परिवारों को हक्कू पत्र (भूमि अनुदान प्रमाण पत्र) आवंटित किए थे। हालांकि इनमें से 60 अलेमारी (खानाबदोश जनजाति) परिवारों के घर बाढ़ में नष्ट हो गए थे।

इस साल रिकॉर्ड बारिश के कारण पूरे कर्नाटक में जल का जमाव हो गया था। टुमकुर में भी बारिश ने कहर बरपाया है। हुलियार में अलेमारी समुदायों ने हुलियार झील के एक हिस्से पर खुद के घरों का निर्माण किया था जो 40 वर्षों से सूखा पड़ा था। वे जानते थे कि यह झील का एक हिस्सा है लेकिन उनका मानना था कि यह अब हमेशा सूखा ही रहेगा। हालांकि चालीस साल बाद अभूतपूर्व बेताहाशा बारिश की घटना इसी साल सितंबर में हुई। मूसलाधार बारिश से पूरी झील तेजी से भर गई और लोगों के घरों में पानी घुसने लगा। कुछ ही दिनों में मकान टूटने लगे। उनका अनुमान है कि बाढ़ में 180 घर नष्ट हुए हैं, जिनमें से 60 घर अलेमारी समुदायों के हैं। 

48 वर्षीय सन्ना लक्ष्मक्का, कोरमा समुदाय के नेताओं में से एक हैं। वे अपने जीवन यापन के लिए हेयर पिन, चूड़ियाँ और इसी तरह का सामान बेचती है। न्यूज़क्लिक से बात करते हुए उन्होंने कहा, "एक बार जब हमारे घरों के अंदर पानी भरना शुरू हुआ, तो हमने डिप्टी तहसीलदार के कार्यालय के बाहर विरोध शुरू कर दिया। हम अपनी खुद की जमीन चाहते थे, वह भी सुरक्षित जगह पर। विरोध प्रदर्शन 2 अक्टूबर को गांधी जयंती पर शुरू हुआ था। मूसलाधार बारिश के बावजूद हम तिरपाल के नीचे बैठे रहे और दिन-रात विरोध जारी रखा। कुछ ही दिनों में जलस्तर बढ़ने लगा और मकान गिरने लगे। 21 दिनों के विरोध के बाद, सरकारी अधिकारी आए और हमसे आंदोलन वापस लेने का अनुरोध किया। उन्होंने एक सप्ताह में हमारे घरों पर काम शुरू करने का वादा किया। हमें जमीन का एक टुकड़ा आवंटित किया गया था। वे बालू लेकर आए और जेसीबी से इलाके को समतल करने का प्रयास किया। हालांकि, दो दिनों के बाद वह काम भी बंद हो गया।

हुलियार झील में घर पूरी तरह से डूबे नज़र आ रहे हैं

उन्होने बताया कि जब वे बाढ़ में डूबे घरों से अपना समान निकालने की कोशिश कर रहे थे तो वे घायल हो गई थी। “जब मैं अपना सामान लेने के लिए अपने घर में दाखिल हुई, तो मुझे एक साँप ने काट लिया। मुझे पाँच दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। अब हम मदद के लिए समुदाय के अन्य लोगों पर निर्भर हैं। एक घर में तीन परिवार रह रहे हैं। जब मैं हुलियार आई थी तब मैं बच्ची थी। मेरे पिता छोटी-मोटी चीज़ें बेचते थे। हमने झील के पास शेड बनाए थे। झील का यह किनारा हमेशा सूखा पड़ा रहता था। हमारे पास रहने के लिए कोई अन्य जगह नहीं थी, इसलिए हमने अंततः इसी जगह घर बनाने का निर्णय लिया। इस साल बारिश के कारण बाढ़ आई, जिससे हमारे घर तबाह हो गए।'

अलेमारी खानाबदोश जनजातियों/जातियों का एक वर्गीकरण है। 121 जातियाँ इसमें आती हैं, जैसे हांडी जोगी, कोरमा, सिलेक्यथा, और अन्य। वे एक साथ रहते हैं और एक दूसरे की मदद करते हैं। वे कई भाषाएँ बोलते हैं, लेकिन परिवारों के इस विशेष समूह के बीच कुलुवा भाषा एक आम मातृभाषा लगती है। 60 परिवारों में से 34 परिवारों को जमीन के लिए हक्कू पत्र मिले। शेष भूमि अनुदान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वे चाहेंगे कि उन सभी को एक ही जगह पर भूमि आवंटित की जाए ताकि वे एक साथ रह सकें।

न्यूज़क्लिक ने चिक्कानायकनहल्ली के तहसीलदार तेजस्विनी से संपर्क किया। न्यूज़क्लिक से फोन पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि, "मैंने 1.35 एकड़ के क्षेत्र की पहचान की है और अलेमारी परिवारों को हक्कू पत्र आवंटित किए हैं। भूमि विकास कार्य लंबित पड़ा है। यह काम पंचायती राज इंजीनियरिंग विभाग (PRED) द्वारा किया जाना है।

तहसीलदार ने भूमि आवंटन में अपने योगदान का दावा किया, जिसका आवंटन टुमकुर डीसी द्वारा 2018 में किया गया था। हालांकि, अन्य 26 परिवारों ने भूमि अनुदान प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया है, जो अभी तक स्वीकृत नहीं हुआ है।

तालुक के समाज कल्याण अधिकारी दिनेश ने न्यूज़क्लिक को बताया कि, "भूमि साइटों को चिह्नित नहीं किया गया है। सर्वे का काम बाकी है। साइट अलॉट होने के बाद हम उनके लिए घर भी बनाएंगे। मुझे सिर्फ यह सत्यापित करने की जरूरत है कि भूखंड उनके नाम पर पंजीकृत हैं या नहीं। आवास निर्माण के लिए राशि अम्बेडकर अभिवृद्धि निगम को भेजी जा चुकी है। भूखंडों को विकसित करने के लिए उन्हें इंजीनियर के साथ समन्वय करने की जरूरत है।

अलेमारी बुदकट्टू महासभा

हुलियार में खानाबदोश समुदायों का प्रतिनिधित्व अलेमारी बुदकट्टू महासभा (खानाबदोश जनजातियों का संगठन) नामक एक संगठन द्वारा किया जा रहा है। उनका नेतृत्व उनके जिला अध्यक्ष हंडीजोगी राजन्ना कर रहे हैं। संगठन की शुरुआत बडगा जंगम समुदाय के सदस्य डॉ बाला गुरुमूर्ति ने की थी। वह अपने समुदाय के पहले पीएचडी धारक थे। उन्होंने कर्नाटक में खानाबदोश समुदायों के बीच जागरूकता बढ़ाने के लिए 2004 में संगठन शुरू किया था। डॉ. गुरुमूर्ति ने कई कॉलेजों में लेक्चरर के रूप में काम किया है और कर्नाटक में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) अलेमारी कोशा (अलेमारी सेल) की स्थापना में भी मदद की है। उन्होंने राज्य में विभिन्न खानाबदोश समुदायों के बारे में मानवशास्त्रीय अध्ययन प्रकाशित किए हैं। उनका कहना है कि कर्नाटक में 121 जातियां हैं जो अलेमारी वर्गीकरण का हिस्सा हैं।

अलेमारी बुडकट्टू महासभा के हांडी जोगी राजन्ना (सफेद टोपी पहने) के नेतृत्व में अक्टूबर में विरोध प्रदर्शन का नज़ारा 

हांडी जोगी राजन्ना हुलियार भूमि संघर्ष के पीछे की प्रेरक शक्ति हैं। समुदाय के प्रति प्रतिबद्ध और भावुक कहे जाने वाले इस व्यक्ति ने अक्टूबर की बारिश में अपना घर भी खो दिया था। हालाँकि, वे 14 वर्षों से अपने समुदाय के भूमि अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। जब भी आन्दोलन होता है, वादे तो किए जाते हैं, लेकिन पूरे नहीं होते हैं। ये समुदाय कई पीढ़ियों से भूमिहीन हैं और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के भीतर जीविकोपार्जन करते हैं। इस समुदाय के बहुत कम सदस्यों ने एसएसएलसी (10वीं कक्षा) पूरी की है।

कुलुवा भाषा के बारे में पूछे जाने पर, गुरुमूर्ति ने न्यूज़क्लिक को बताया कि, "यह कोरामा और कोराचा द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। मैं 2018 तक इस भाषा के बारे में नहीं जानता था तब-जब मैं समुदाय के कुछ नेताओं से मिला था। वे विमुक्त जनजातियां (डीएनटी) हैं।” अलेमारिस का कहना है कि कुलुवा भाषा तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ का मिश्रण है। लैंग्वेज एटलस 2011 में कुलुवा भाषा का उल्लेख नहीं है। यह स्पष्ट नहीं है कि जनगणना करने वालों ने इस भाषा के अस्तित्व को रिकॉर्ड किया है या नहीं। गुरुमूर्ति का कहना है कि कोरमा समुदाय पर कुछ मानवशास्त्रीय अध्ययन बेंगलुरु के डॉ बीआर अंबेडकर शोध संस्थान में उपलब्ध हैं।

स्वास्थ्य संबंधित मुद्दे 

लोलक्षम्मा (55) अलेमारी समूह का हिस्सा थीं जो विरोध कर रही थी। अक्टूबर में बारिश में कुछ दिन बिताने के बाद वह बीमार पड़ गई। वह एचआईवी पोजिटिव हैं। कुछ ही दिनों में उनके शरीर ने काम करना बंद कर दिया। वे कई वर्षों से अपनी एचआईवी बीमारी के बारे में जानती थी लेकिन बिना किसी समस्या के काम करने में सक्षम थी। लेकिन अक्टूबर में उनका शरीर खराब होना शुरू हो गया। वर्तमान में, वे अपने दम पर चलने में असमर्थ है। यदि उनके पास बिस्तर होता, तो वह बिस्तर पर पड़ी रहती। अब वह फर्श पर एक चटाई पर लेटी रहती हैं। वे वर्तमान में अपने भाई और उसकी पत्नी के साथ रहती है। डॉक्टरों ने उनकी हालत देखी और परिवार को बताया कि उसके पास केवल छह महीने बचे हैं। उन्होंने परिवार को दस्ताने और मास्क भी दिए और उसे नहलाने और खिलाते वक़्त इन्हें पहनने का निर्देश भी दिया है।

एचआईवी एड्स से पीड़ित लोलक्षम्मा खुद बैठने में भी असमर्थ हैं।

उसकी भाभी एक फैक्ट्री में दिहाड़ी पर काम करती थी। चूंकि उसने लोलक्ष्मा की मदद करने की जिम्मेदारी ली है, इसलिए वह काम पर नहीं जा पा रही है। कमाई का नुकसान परिवार पर एक और बोझ बन गया है और उसके छोटे बच्चे स्कूल भी जाते हैं।

परिवार अब अस्थायी तंबुओं में शरणार्थियों की तरह रहते हैं। उन्हें पानी लाने के लिए रोजाना तीन किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। जब उन्होंने सरकारी अधिकारियों से अपने निवास स्थान (अस्थायी टेंट) में पानी उपलब्ध कराने के लिए कहा, तो उन्हें 10,000 रुपए की रिश्वत देने को कहा गया। 

स्कूल में भेदभाव

30 वर्षीय सन्नम्मा, हेलवा समुदाय से आती हैं, जो अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) सूची में शामिल है। वह उस भेदभाव के बारे में बताती हैं जिसका उनके दो बच्चों को स्कूल में सामना करना पड़ता है। उसने न्यूज़क्लिक को बताया कि, "हमारा काम घंटी लेकर शहर में घूमना और भीख मांगना था। अब, वे महिलाओं को सौंदर्य से जुड़ी चीज़ें बेचती हैं। मैंने अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजा है। लेकिन शिक्षक मेरे बच्चों की उपेक्षा करते हैं। उन्हें कुछ भी नहीं सिखाया जाता है। वे लिखने या सीखने के लिए नहीं बने हैं। मैं अपने बच्चों को एक आवासीय विद्यालय में स्थानांतरित करने पर विचार कर रही हूं।”

सन्नम्मा अपने घायल पति और बच्चों के साथ।

“हमारा समुदाय देश भर में घूमता था, हम अब तक कभी एक जगह नहीं बसे। हम हुलियार में 35 साल से हैं लेकिन हमारे पास कभी भी कोई जमीन नहीं रही थी। मैं विरोध प्रदर्शनों में बैठकर-बैठकर थक गई हूं। मैं जब विरोध में जाती हूँ तो कमाई का नुकसान होता है। मेरे पति काम पर जाने के दौरान बाइक से दुर्घटनाग्रस्त हो गए थे। उनके सिर में चोट आई है। वे काम करने में भी असमर्थ है। इस बार, मुझे राशन नहीं मिला क्योंकि राशन की दुकान पर मेरे अंगूठे का निशान (बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण) का मिलान नहीं हुआ था। वे कहती हैं कि, हम बहुत सारी कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं, और हमारे लिए बोलने वाला कोई नहीं है।” 

डॉ. गुरुमूर्ति ने उल्लेख किया कि हेलवा समुदाय के सदस्य वंशावली गाते हुए घंटा बजाते हुए शहर में घूमते थे। वे गांव के पारंपरिक रिकॉर्ड के रखवाले थे।

यह समूह यह सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष कर रहा है ताकि उन सभी 60 परिवारों को हक्कू पत्र दिए जाएं। 26 परिवारों का भूमि अनुदान लंबित पड़ा है। वे कुछ सबसे कमजोर लोग हैं जो प्रतिदिन लगभग 100-200 रुपये कमाते हैं। भूमि अधिकार यह सुनिश्चित करेगा कि वे एक सम्मानित जीवन जी सके।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें।

Huliyar Nomadic Tribes Fight for Resettlement After Rain Destroys Homes

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