बढ़ती ग़रीबी: पूंजीवाद, रोज़गार और इतिहास
अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध और उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में जब ब्रिटेन में औद्योगिक पूंजीवाद का विकास हो रहा था, मशीन से बने मालों ने बहुत से दस्ताकार उत्पादकों की जगह छीन ली थी। इसने लुड्डाइट आंदोलन को जन्म दिया, जो मशीनें लाए जाने का विरोधी था। बेरोजगारी बढ़ने के साथ, गरीबी के सापेक्ष्य आकार में बढ़ोतरी हो गयी, जैसा कि एरिक हाब्सबाम ने एक अन्य इतिहासकार, आरएम हार्टवेल से एक बहस में तर्क दिया था। लेकिन, बाद में उन्नीसवीं सदी के दौरान हालात में सुधार हो गया। घोर गरीबी की मारी आबादी का अनुपात बढ़ना रुक गया और वास्तव में नीचे आ गया और ऐसा ही बेरोजगारी की मारी श्रम शक्ति के अनुपात के मामले में भी हुआ।
ब्रिटेन के इस अनुभव का अक्सर पूंजीवाद की एक अंतर्निहित विशेषता के रूप में ही सामान्यीकरण कर दिया जाता है, कि हो सकता है कि शुरुआत में इससे गरीबी तथा बेरोजगारी बढ़े, लेकिन अंतत: औद्योगिक पूंजीवाद उन्हें नीचे ले आता है और इससे सबके ही जीवन स्तर में आम सुधार होता है, फिर चाहे इसमें आय की असमानता शुरूआत के समय के मुकाबले बढ़ ही क्यों न जाती हो।
यह धारणा कि पूंजीवाद के विकास से अंतत: अनिवार्य रूप से रोजगार में सुधार आता है तथा गरीबी घट जाती है, इतनी ज्यादा व्यापक रूप से फैली हुई है कि आम बेरोजगारी तथा घोर गरीबी के शिकार हरेक देश के लिए एक रामबाण उपाय यही सुझाया जाता है कि अपने यहां निवेश करने के लिए पूंजीपतियों को आकर्षित करे। और ठीक यही उपचार, भारतीय संघ में हरेक राज्य को भी सुझाया जाता है। यह करीब-करीब एक मानक मंत्र ही बन गया है कि, ‘अगर तुम्हारे यहां गरीबी है, तो पूंजी को और बड़ी रियायतें दो, ताकि उसे लुभाकर अपने यहां ला सको और वह तुम्हें गरीबी से ऊपर उठा सके।’
बहरहाल, इस धारणा के पीछे कोई सैद्धांतिक आधार तो खैर नहीं ही है, इसके अलावा यह इतिहास में वास्तव में जो कुछ हुआ था, उसके पूरी तरह से गलत समझे जाने को दिखाता है। अगर यह बस एक बार के लिए एक नयी मशीन लाए जाने का ही मामला होता, तब तो जब तक पूंजी स्टॉक के संचय की रफ्तार ऊंची बनी रहती और उसमें शिथिलता नहीं आती, तब तक तो यह यह सच होता कि मशीन के लाए जाने में शुरुआत में जो बेरोजगारी होती, आगे चलकर न सिर्फ उस कमी की भरपाई हो जाती बल्कि इस भरपाई से फालतू रोजगार भी पैदा हो जाता। लेकिन, औद्योगिक पूंजीवाद की पहचान तो अनवरत प्रक्रिया तथा उत्पाद नवाचारों या नयी खोजों से होती है। इसके कारण, श्रम के प्रतिस्थापन की प्रक्रिया तो लगातार ही चलती जाती है। ऐसी स्थिति में इसका कोई कारण ही नहीं बनता है कि पूंजीवाद से पैदा होने वाली बेरोजगारी, अपरिहार्य रूप से गायब हो जाए।
संक्षेप में यह कि यह मानने को कोई सैद्धांतिक कारण है ही नहीं कि पूंजीवाद से अंतत: बेरोजगारी मिट जाएगी।
ब्रिटेन आरंभिक अनुभव के तीन कारण
ऐतिहासिक रूप से भी इसका पूंजीवाद की किसी अंतर्निहित प्रवृत्ति से कोई संबंध नहीं है कि शुरुआत में इससे जो बेरोजगारी पैदा हुई थी, जिस पर लुड्डाइट इतने ज्यादा खफा थे, उसका बाद में शमन हो गया। ऐसा ब्रिटेन में उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में हुआ था, जिसके तीन बिल्कुल स्पष्ट नजर आने वाले कारण थे।
पहला था, ब्रिटेन से (और महाद्वीपीय यूरोप से) श्वेत नौबस्तियों वाले कम ठंडे इलाकों की ओर बड़ी संख्या में लोगों का उत्प्रवासन।
अर्थशास्त्री डब्ल्यू आर्थर लेविस ने ध्यान दिलाया था कि जिसे ‘दीर्घ 19वीं सदी’ कहा जाता है (जिसमें पहले विश्व युद्ध तक का दौर शामिल कर लिया जाता है) उसके दौरान, पूरे पांच करोड़ यूरोपीयों ने कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड तथा दक्षिण अफ्रीका की ओर पलायन किया था।
इन इलाकों में इन यूरोपीयों ने स्थानीय मूलवासियों को उनकी जमीनों से खदेड़ दिया, उन्हें सुरक्षित क्षेत्रों के बाड़ों में बंद कर दिया और खुद ज्यादातर खेतिहर बनकर बस गए।
इस उत्प्रवास का पैमाना इतना बड़ा था कि अकेले ब्रिटेन में ही, 1814 से 1914 के बीच, उसकी आबादी में प्राकृतिक सालाना बढ़ोतरी का करीब-करीब आधा हिस्सा, वास्तव में इन ‘नये इलाकों’ के लिए पलायन कर गया था। इसने ब्रिटेन में बेरोजगारी के परिमाण में बहुत ही उल्लेखनीय पैमाने पर कम कर दी।
इसमें योग देने वाला दूसरा कारक, उपनिवेशवाद का दूसरा उदाहरण था। हमारा इशारा इन नई बसाहट के उपनिवेशों (कॉलोनीज़ ऑफ सैटलमेंट) से भिन्न, जीत कर हासिल किए उपनिवेशों की ओर है। पूरी उन्नीसवीं सदी के दौरान और खासतौर पर उसके उत्तरार्द्ध में, मशीन से निर्मित उत्पादों का भारत जैसे विजय कर हासिल किए गए उपनिवेशों में निर्यात किया जा रहा था। इन उपनिवेशों में ये पूंजीवादी उत्पाद, ‘निरुद्योगीकरण’ के नाम से जानी गयी प्रक्रिया के जरिए, स्थानीय पूर्व-पूंजीवादी उत्पादकों को प्रतिस्थापित कर रहे थे। इसका अर्थ यह था कि ये मशीन से उत्पादित माल अब ब्रिटेन में तो बेरोजगारी पैदा नहीं कर रहे थे (क्योंकि उनका निर्यात अब उपनिवेशों में किया जा रहा था), उल्टे उत्पादन में बढ़ोतरी के माध्यम से ब्रिटेन में घरेलू बेरोजगारी में कुछ कमी जरूर कर रहे थे।
इन दो कारकों के अलावा एक तीसरा कारक और था। तीसरा कारक यह था कि शुरुआती चरणों में खुद मशीनों का उत्पादन भी बहुत ही श्रम सघन हुआ करता था। (इसी से मार्क्स की यह धारणा बनी हो सकती है कि पूंजी का आवयविक गठन--सी/ वी--प्रौद्योगिकी की प्रगति के जरिए हमेशा ही बढ़ोतरी पर रहेगा।) इसलिए, हालांकि मशीन-उत्पादित माल जीवित श्रम का एक हिस्सा प्रतिस्थापित कर रहे थे, आंशिक रूस से इसकी भरपाई इस तथ्य से हो जाती थी कि खुद मशीन के निर्माण में भी काफी श्रम को खपा लिया जाता था।
बहरहाल, इन तीनों कारकों का, पूंजीवाद की किसी अंतर्निहित प्रवृत्ति से कोई लेना-देना नहीं था। पहले दो कारकों का संबंध सीधे-सीधे उपनिवेशवाद से था। यहां तक कि आखिरी यानी तीसरा कारक भी, जिसका संबंध खुद मशीन निर्माण के श्रम सघन होने से था, एक संयोग भर था; यह न तो पूंजीवाद की कोई अनिवार्य विशेषता था और न ही हमेशा के लिए सच था।
इसका अर्थ यह हुआ कि यूरोप में पूंजीवादी उद्योग के विकास से आम तौर पर जो नतीजा निकाल लिया जाता है, उसकी कोई वैधता ही नहीं है। यह धारणा गलत है कि पूंजीवादी उत्पादन के विकास के क्रम में चाहे जितनी संक्रमणकालीन समस्याएं क्यों नहीं आयें और उसके लाभों का आबादी के बीच बंटवारा चाहे कितना ही असमानतापूर्ण क्यों न हो, यह अनिवार्यत: और अपरिहार्य रूप से सभी के भौतिक जीवन में बेहतरी लाता है। सच्चाई यह है कि यूरोप में जो कुछ हुआ, उसे उस दौर के विशेष संदर्भ ने ही संभव बनाया था। इसे पूंजीवाद के विकास का अपरिहार्य नतीजा नहीं माना जा सकता है।
आज पूंजीवाद विकास का विरोधी हो गया है
वास्तव में हम इससे और आगे भी जा सकते हैं। आज का पूंजीवाद ‘‘विकास’’ के एजेंडा के खिलाफ खड़ा हो गया है। कुछ आंकड़ों पर नजर डाल लेते हैं। 2010-20 के दशक के दौरान विश्व जीडीपी की सालाना वृद्धि दर, 2.6 फीसद रही थी, जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद के दशकों में सबसे निचली वृद्धि दर थी। विश्व श्रम उत्पादकता की वृद्धि दर, जो दशक के पूर्वार्द्ध में 1.8 फीसद थी, उत्तरार्द्ध में घटकर 1.4 फीसद ही रह गयी थी। इसलिए, हम पूरे दशक का औसत 1.6 फीसद मान सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि विश्व अर्थव्यवस्था में रोजगार की वृद्धि दर, जो उक्त दो आंकड़ों के अंतर के बराबर होगी, इस पूरे दशक के दौरान 1 फीसद सालाना के करीब रही होगी। लेकिन, इसी दौरान श्रम शक्ति में बढ़ोतरी की सालाना दर 1 से 1.5 फीसद के बीच रही थी। इसका अर्थ यह हुआ कि इस दशक के दौरान कुल वैश्विक श्रम शक्ति में बेरोजगारी का सापेक्ष आकार, बढ़ रहा था। अगर हम विश्व अर्थव्यवस्था को समग्रता में देखें तो इसका अर्थ यह हुआ कि नव-उदारवाद के महामारी-पूर्व के दशक के दौरान बेरोजगारी की दर बढ़ रही थी।
नव-उदारवादी पूंजीवाद में, जोकि पूंजीवाद का ताजातरीन चरण है, जीडीपी की वृद्धि दर में एक सुस्ती आती है। ऐसा एक तो इसलिए होता है क्योंकि यह पूंजीवादी विकास, असमानता को बढ़ा रहा होता है।
दूसरे, ऐसा इसलिए भी होता है कि नव-उदारवादी पूंजीवाद के अंतर्गत, केन्सवादी कदमों के जरिए वृद्धि दर को ऊपर उठाने के लिए, राज्य के हस्तक्षेप के लिए दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। इसलिए, नव-उदारवादी पूंजीवाद का अर्थ अनिवार्यत: यह होता है कि रोजगार वृद्धि भी सुस्त पड़ती है और वैश्विक श्रम शक्ति में वृद्धि की दर से नीचे भी चली जाती है। इस तरह, बेरोजगारों की फौज के सापेक्ष आकार में बढ़ोतरी, समकालीन नव-उदारवादी पूंजीवाद के अंतर्गत देखने को मिलने वाला एक तथ्य भर नहीं है बल्कि यह उसके साथ अनिवार्य रूप से लगा हुआ आता है।
सफलता के अपवाद दूसरों की क़ीमत पर
बेशक, इसका अर्थ यह नहीं है कि जो भी देश बेरोजगारी तथा गरीबी से उबरने के लिए, पूंजीवादी रामबाण दवा को अपनाएंगे, सब के सब अनिवार्य रूप से विफल ही होंगे। इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि इस पूंजीवादी रामबाण उपचार के जरिए, इन समस्याओं पर काबू पाने में जो भी देश सफल होंगे, वास्तव में अन्य देशों की कीमत पर ही सफल हो रहे होंगे। विकास के पूंजीवादी रास्ते पर चलते हुए, सभी देशों का अपनी जनता के बहुमत की बदहाली को दूर करने के अर्थ में ‘‘विकास’’ की ओर बढ़ना, असंभव है। वास्तव में इसका उल्टा ही सच है और चूंकि बेरोजगारों की फौज का सापेक्ष आकार ही गरीबी को तय करने वाला एक बड़ा कारक होता है, आज के समय में पूंजीवाद के रास्ते पर चला जाना अनिवार्य रूप से समग्रता में विश्व अर्थव्यवस्था में शुद्ध गरीबी को बढ़ाने का काम करता है। विश्व बैंक जैसी संस्थाओं की बौद्धिक हाथ की सफाई यहां साफ हो जाती है। इस तथ्य के आधार पर कि कुछ देश पूंजीवादी विकास के रास्ते पर चलकर गरीबी का अपना बोझ उतारने में कामयाब हुए हैं, वे यह बताने लगते हैं कि सभी देश ऐसा कर सकते हैं, जबकि विश्व अर्थव्यवस्था के उपलब्ध आंकड़े ऐसा संभव होने का सीधे-सीधे खंडन करते हैं। सच्चाई यह है कि जो भी देश इस तरह से अपनी गरीबी का बोझ उतार पाते हैं, दूसरे देशों को और गहरी गरीबी में धकेलने के जरिए ही ऐसा कर पाते हैं।
सच्चाई यह है कि ऐसे छोटे-छोटे देश, जिनके यहां बेरोजगारों की कुल संख्या थोड़ी ही है और जो विकसित दुनिया से उत्पादक निवेशों को अपने यहां पुनर्स्थापन के लिए लुभा सकते हैं, पूंजीवाद के रास्ते पर चलकर अपने यहां गरीबी दूर करने में और ‘‘विकास’’ लाने में कामयाब तो हो सकते हैं। लेकिन, उनका मामला अपवाद ही माना जाएगा, जो सामान्य स्थिति को नहीं दिखाता है बल्कि उससे ठीक उल्टी बात साबित करता है।
वैकल्पिक रास्ता ज़रूरी है
जो बात समग्रता में विश्व अर्थव्यवस्था के संबंध में सच है, वही भारत जैसे देशों के बारे में सच है, जहां श्रम की विशाल बेरोजगार सेनाएं मौजूद हैं, जो कि औपनिवेशिक दौर की विरासत है और इस सुरक्षित श्रम का विशाल हिस्सा खासतौर पर देश के विशाल कृषि क्षेत्र में छुपा हुआ है। ऐसी अर्थव्यवस्थाओं के संबंध में यह कल्पना करना कि वे पूंजीवादी विकास के रास्ते पर चलकर अपनी गरीबी तथा पिछड़ेपन से उबर सकती हैं, बेतुकेपन की पराकाष्ठा है। नव-उदारवादी हमला शुरू होने से पहले के दौर में हमारे देश में इस बात को अच्छी तरह से समझा जाता था। लेकिन, पिछले कुछ दशकों में पूंजीवाद को इतने जतन से यहां ‘‘बेचा गया’’ है कि यह सरल सी सच्चाई आंखों से ओझल हो गयी है। जितनी जल्दी लोग इस तरह के विभ्रमों से बरी हो जाएंगे और विकास का एक ऐसा वैकल्पिक रास्ता अपनाने की जरूरत को पहचानेंगे, जो घरेलू बाजार पर आधारित हो (और इसलिए कृषि के सतत विकास पर टिका हुआ हो); जो पूंजी की सीमा पार आवाजाही पर नियंत्रण लगाए और पूंजीपतियों की ‘निवेश हड़तालों’ की काट करने के लिए, सार्वजनिक क्षेत्र का उपयोग करे; मानवता के लिए उतना ही बेहतर होगा।
(लेखक दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र में प्रोफ़ेसर एमेरिटस हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)
अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें–
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