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देश भर में स्कीम वर्कर्स के अस्तित्व पर मोदी सरकार के हमलों के ख़िलाफ़ एकजुट संघर्ष की शुरूआत

हरियाणा समेत जिन राज्यों में भी भाजपा सरकारें हैं, वहां स्कीम वर्कर्स पर काफ़ी दमन किया जा रहा है। यूपी में भी हड़ताल की तैयारी चल रही है।
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गोदी मिडिया के न्यूज़-सेंसर के बावजूद अन्य माध्यमों से आ रही ख़बरों में मोदी सरकार के मजदूर-स्कीम वर्कर विरोधी रवैये के ख़िलाफ़ आज पूरे देश में स्कीम वर्कर्स आन्दोलन कर रहें हैं। बिहार में आशाकर्मियों की 32 दिनों की सफल हड़ताल के बाद राज्य सरकार ने तो कुछ मांगें मान लीं। लेकिन मौजूदा केंद्र सरकार के साथ साथ हरियाणा समेत जिन राज्यों में भी भाजपा सरकारें हैं, वहां काफ़ी दमन ढाया जा रहा है। यूपी में भी हड़ताल की तैयारी चल रही है।

इसी क्रम में 9-10 सितम्बर ‘स्कीम वर्कर फेडरेशन’ के आह्वान पर बिहार कि राजधानी पटना में राष्ट्रिय सम्मलेन में देश भर के विभिन्न राज्यों से पहुंचे स्कीम वर्करों के जुटान ने इनके सवालों को एक बार फिर से मजबूत स्वर दिया है।

चर्चित वामपंथी मजदूर-कर्मचारी नेता कॉमरेड योजेश्वर गोप नगर (पटना) के कॉमरेड रामेश्वर सिंह सभागार (गेट पब्लिक लाइब्रेरी, गर्दनीबाग) और सरस्वती देवी-नज़मा ख़ातून मंच पर आयोजित हुए इस सम्मेलन में 500 से भी अधिक स्कीम वर्कर्स प्रतिनिधियों ने भाग लिया। जिसमें महाराष्ट्र, असम, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, दिल्ली, ओड़िसा, उत्तर प्रदेश, झारखण्ड व बिहार समेत कई अन्य राज्यों के स्कीम वर्कर शामिल हुए।

“आशा, रसोईया, आंगनबाड़ी व ममता समेत सभी स्कीम वर्करों को सरकारी कर्मचारी का दर्ज़ा दो तथा मोदी सरकार जुमलेबाज़ी बंद करो, स्कीम वर्करों को उनका हक़ और सम्मान दो!” के केन्द्रीय मांग को लेकर यह सम्मलेन हुआ। 

सम्मेलन में प्रस्तुत मसविदा रिपोर्ट के माध्यम से मोदी सरकार द्वारा स्कीम वर्करों के अस्तित्व को ही समाप्त कर देने का सवाल काफी प्रमुखता से उठाया गया। साथ ही देश और राज्यों में कार्यरत सभी प्रकार के स्कीम वर्करों व उनकी दयनीय स्थितियों का आंकड़ावार ब्यौरा देते हुए उनके सभी बुनियादी मांगों को भी विशेष रेखांकित किया गया कि- 

आज देश के स्कीम वर्करों के पास खोने के लिए, अपनी ग़ुलामी के सिवाय कुछ भी नहीं है। मोदी सरकार दशकों से चल रही सभी बुनियादी सरकारी योजनाओं को कमज़ोर कर ख़त्म कर देने में लगी हुई है। गरीबों-आम लोगों के जीवनयापन की मदद के लिए बनी योजनाओं को “रेवड़ी बांटना” करार देकर इनका बजटीय आबंटन हर साल घटाते जा रही है। इनमें काम कर रहे लाखों स्कीम वर्करों को हटाकर निजी कंपनियों व एनजीओ के हाथों में सौंप रही है। जिसका मतलब साफ़ है कि वह स्कीम वर्करों को श्रमिक का दर्ज़ा और सम्मानजनक वेतन देने इत्यादि की सभी सिफारिशों ( जो पिछले कई भारतीय श्रम सम्मेलनों ने की है) को अब नहीं लागू करनेवाली है। उलटे मजदूर विरोधी चार श्रम कोड लाकर स्कीम वर्करों को अपनी यूनियन बनाने के संवैधानिक अधिकार से भी वंचित कर रही है। दूसरी ओर, ऐसे सभी बुनियादी सवालों से ध्यान हटाकर श्रमिकों की एकता तोड़ने के लिए “हिन्दू-मुस्लमान राजनीति” के जरिये नफ़रत-विभाजन के उन्मादी-सांप्रदायिक साजिशों को लगातार हमलावर बनाती जा रही है। इसलिए 2024 के आम चुनाव में इस सरकार को हटाना, देश के आम जनों के साथ- साथ व्यापक श्रमिक मजदूरों के हित के लिए सबसे ज़रूरी हो गया है। 

बहस सत्र में स्कीम वर्करों की यातनामय स्थितियों को उठाया गया कि- वर्तमान समय में राष्ट्रिय स्वास्थ्य योजना, मध्यान भोजन योजना तथा समेकित बाल विकास योजना जैसी कई सरकारी योजनायें चल रहीं हैं। जिनमें ज़मीनी रूप से सक्रीय एक करोड़ से भी अधिक की संख्या में आशा फैसिलिटेटर कर्मी, विद्यालय रसोईया, आंगनबाड़ी सेविका-सहायिका इत्यादि स्कीमकर्मी ग़ुलामी की अवस्था में काम करने को विवश हैं। जिन्हें न्यूनतम मजदूरी मिलाना तो दूर, इनकी हाड़ तोड़ मिहनत का उचित मानदेय भी नियमित नहीं दिया जाता है। पुरे दिन 8 से 12 घंटे से भी अधिक समय तक खटवाकर भी एक श्रमिक का दर्ज़ा ने देकर, सिर्फ़ स्वयंसेवी या स्वैच्छिक सामाजिक कार्यकर्त्ता कह कर निपटा दिया जाता है। मोदी सरकार के “रामराज्य” में आधुनिक गुलामी भरी “नियोजन-मजदूरी व्यवस्था” शायद ही दुनिया में कहीं और चल रही है। 

बहस सत्र में 30 से भी अधिक प्रतिनिधियों ने अपने अपने राज्य व कार्यक्षेत्र की दुर्दशापूर्ण स्थितियों की चर्चा करते हुए तीखा आक्रोश व्यक्त किया कि- स्कीम वर्करों के दुःख और पीड़ा की कोई सीमा नहीं रह गयी है। दिन रात की कड़ी मिहनत के बाद भी समय से पैसा नहीं मिलता है। हमारे वेतन मद के थोड़े से पैसों को भी सरकार के मंर्त्री-नौकरशाह व इनका तंत्र अक्सर हड़प लेते हैं। अत्याचार के खिलाफ ज़रा सा भी आवाज़ उठानेवालों को सीधा काम से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।          

सरकार और विभागीय अधिकारीयों की नज़र में तो हमें कहीं से भी इंसान न समझकर गुलामों जैसा सलूक किया जाना आम चलन बना हुआ है। मोदी सरकार की बेलगाम मंहगाई ने तो हमारी कमर ही तोड़कर रख दी है। उस पर से हमें इतना कम पैसा दिया जा रहा है कि इससे हम परिवार को दो जून का खाना खिलाएं या बच्चों को पढ़ाएं? दिन रात ये सारे सवाल हमें चैन से सोने नहीं देते हैं।  

सम्मलेन का उद्घाटन करते हुए भाकपा माले के राष्ट्रिय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने मोदी सरकार पर आरोप लगते हुए कहा कि- आज देश में कानून होने के बावजूद महिला मजदूरों को सम्मान-सुरक्षा और बराबरी का अधिकार नहीं दिया जा रहा है। मोदी राज में महिला मजदूर आज कहीं भी अपने कार्यस्थल पर सुरक्षित नहीं रह गयीं हैं। इन्हें महिला और मजदूर होने के कारण दोहरी मार का सामना करना पड़ रहा है। ये महिला मजदूर क्या, देश की ख्यात महिला पहलवानों से लेकर मणिपुर तक की घटनाएं दिखा रहीं हैं कि कैसे मोदी राज में महिलाओं पर बर्बरता का होना आम परिघटना बना दी गयी है। जिसके ख़िलाफ़ आज सभी को पूरी एकजुटता के साथ ऐसी विनाशकारी सरकार को हटाने की जारी निर्णायक जंग में शामिल होकर मजबूती देने की ज़रूरत है। 

सम्मेलन को संबोधित करते हुए एक्टू के राष्ट्रिय अध्यक्ष वी शंकर ने कहा कि मोदी सर्कार ने आम मजदूरों के साथ साथ सभी स्कीम वर्करों के पेट पर लात मारा है, विश्वासघात किया है। देश के करोड़ों करोड़ मजदूर अब ऐसी सरकार को कत्तई बर्दाश्त नहीं करेंगे। देश के मजदूर आन्दोलन को एक नयी ताक़त और ऊर्जा दे रहे स्कीम वर्करों के जुझारू आन्दोलन का गर्मजोशी भरा अभिनन्दन करते हुए कहा कि एक्टू इनके आन्दोलन को अपनी पूरी ताक़त से साथ देगा। 

सम्मेलन को ऐपवा कि राष्ट्रिय माहासचिव मीना तिवारी व एक्टू के राष्ट्रिय महासचिव राजीव डिम्बरी के अलावे बिहार आशा-आन्दोलन के साथ सदन से लेकर सड़कों में साथ देनेवाले भाकपा माले बिहार विधायक दल नेता महबूब आलम तथा सचेतक सत्यदेव राम समेत कई वरिष्ठ नेताओं ने भी संबोधित किया। 

सम्मेलन ने सर्वसम्मति से 45 सदस्यीय राष्ट्रिय कार्यकारिणी का चुनाव कर सरोज चौबे को सम्मानित अध्यक्ष, गीता मंडल को राष्ट्रिय अध्यक्ष व शशि यादव को राष्ट्रिय महासचिव निर्वाचित किया। 13 सदस्यीय पदाधिकारियों में बिहार के अलावे दिल्ली, असम, ओड़िसा, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश व झारखण्ड के आन्दोलनकारी प्रतिनिधियों का भी चुनाव किया गया। 

सम्मेलन द्वारा 8 सूत्री राजनितिक प्रस्ताव पारित कर- यूपी व हरियाणा में जारी आशा आन्दोलन का सक्रिय समर्थन किया गया। मोदी सरकार द्वारा थोपे गए चार श्रम कोड की वापसी की मांग के साथ साथ देश के सभी स्कीम वर्करों व मजदूरों की मांगों को लेकर आगामी अक्टूबर से दिसंबर माह तक राष्ट्रव्यापी सघन अभियान चलाने तथा राष्ट्रिय हड़ताल की घोषणा की गयी। संयुक्त किसान मोर्चा और प्लेटफॉर्म ऑफ़ संयुक्त ट्रेड यूनियंस के संयुक्त आह्वान पर 26-29 नवम्बर को दिल्ली में आयोजित होनेवाले ‘महापड़ाव’ को सफल बनाने के साथ साथ मजदूर व स्कीम वर्कर्स विरोधी मोदी सरकार को 2024 में सबक सिखाने का आह्वान किया गया। 

सम्मेलन में जन संस्कृति मंच पटना के कलाकरों ने जनगीतकार शंकर शैलेन्द्र लिखित मजदूर आन्दोलन के गीतों की प्रस्तुति से अपनी एकजुटता प्रदर्शित की। वहीँ महाराष्ट्र, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल व झारखण्ड समेत बिहार की लड़ाकू महिला प्रतिनिधियों द्वारा पुरे उमंग के साथ प्रस्तुत अपने आन्दोलन के गीतों के समूह गायन ने नया जोश भर दिया।            

(लेखक झारखंड के स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार निजी हैं।)

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