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मध्य प्रदेश: आशा कार्यकर्ताओं के संघर्ष की बड़ी जीत, 25 निष्कासित आशाएं होंगी बहाल!

महाकुंभ के दौरान मुख्यमंत्री से मिलने पहुंची इन कार्यकत्रियों को कथित तौर पर पुलिसिया कार्रवाई का सामना करना पड़ था, जिसके बाद इन्हें इनके काम से निष्कासित कर दिया गया था।
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मध्य प्रदेश में आशा कार्यकर्ताओं के संघर्ष के आगे आखिरकार शिवराज सिंह चौहान सरकार बैकफुट पर नज़र आ रही है। एक ओर आशाओं की महापंचायत में सरकार ने उन्हें मानदेय वृद्धि समेत कई अन्य उपहार दिए तो वहीं अब सीएम साहब का काफिला रोक कर प्रदर्शन करने वाली निष्कासित आशाओं के बहाली का आदेश भी सरकार ने जारी कर दिया है। इसे मध्य प्रदेश आशा- ऊषा सहयोगिनी श्रमिक संघ अपनी बड़ी जीत के तौर पर देख रहा है।

बता दें कि मंगलवार, पांच सितंबर को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन मध्य प्रदेश द्वारा जारी एक आदेश में कहा गया है कि "माह जून 2023 में जिला ग्वालियर की 25 शहरी व ग्रामीण आशाओं को आपराधिक प्रकरण दर्ज होने के कारण जिला स्वास्थ्य समिति द्वारा आशा के कार्य से हटा दिया गया था, इन समस्त 25 आशाओं को पुन: सेवा में लिया जाएगा।" इस आदेश को आशाओं के संघर्ष की जीत मानी जा रही है।

ज्ञात हो कि बीते 16 अप्रैल को प्रशासन के आश्वासन के बाद मुख्यमंत्री से मिलने उनके कार्यक्रम में पहुंची इन कार्यकत्रियों को कथित तौर पर पुलिसिया कार्यवाही का सामना करना पड़ था। इन कार्यकत्रियों का कहना था कि ग्वालियर के अंबेडकर महाकुंभ में घंटों शांतिपूर्ण रूप से धूप में बैठने के बाद भी जब इन्हें सीएम से नहीं मिलने दिया गया, तो मज़बूरन इन लोगों को चक्का जाम करना पड़ा, जिसके बाद कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया था। इतना ही नहीं अधिकारियों द्वारा सीएम के आदेश पर इनके बीते 6 महीने के रिकॉर्ड्स भी चेक करने के लिए मंगवाए गए थे।

इसे भी पढ़ें: मध्य प्रदेश : सीएम शिवराज से मिलने पहुंचीं आशा कार्यकर्ताओं पर मुकदमा, बोलीं-सरकार की करनी और कथनी में अंतर

संघर्ष की बड़ी जीत

मध्य प्रदेश आशा- ऊषा सहयोगिनी श्रमिक संघ की प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मी कौरव ने न्यूज़क्लिक को बताया कि ये उनके संघर्ष की जीत है, जो चौतरफा दबाव के चलते सरकार को 25 आशा कर्मियों की बहाली का आदेश जारी करना पड़ा है। हालांकि ये जीत इतनी भी आसान नहीं रही, इसके लिए आशाओं ने लगातार सरकार से गुहार लगाते हुए धरना-प्रदर्शन किए, शासन-प्रशासन को ज्ञापन सौंपे और सरकार की ना-नुकुर के बाद भी महापंचायत आयोजित की और मुख्यमंत्री के समक्ष इस मुद्दे को उठाया।

लक्ष्मी कहती हैं कि 29 जुलाई को हुई आशा महापंचायत से पहले कई बार इन कार्यक्रम को कैंसल किया गया। उस दिन भी विषम परिस्थितियां ही रहीं बावजूद इसके आशाओं ने भारी संख्या में पहुंच कर मुख्यमंत्री को कार्यक्रम में पहुंचने पर विवश कर दिया। जिसके बाद मंच से आशा कार्यकर्ताओं के लिए कई घोषणाएं हुईं लेकिन निष्कासित आशाओं की बहाली की कोई बात नहीं हुई, जो सभी की प्रमुख मांग थी। जब मुख्यमंत्री मंच से जाने लगे तो आशा बहनों ने उन्हें रोक कर इस बात के लिए आग्रह किया और तब जाकर उन्होंने 50 हज़ार आशाओं के सामने इस बहाली की मंच से घोषणा की। इसके बाद भी अधिकारियों ने लंबा समय लगा दिया इस पर अमल करने में। लेकिन अंत भला तो सब भला।

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मानदेय वृद्धि और नियमितीकरण को लेकर हड़ताल, प्रदर्शन और अनशन

बता दें कि मानदेय वृद्धि और नियमितीकरण समेत अन्य मांगों को लेकर प्रदेशभर में आशा- ऊषा कार्यकर्ताओं ने इस साल कई धरने और हड़ताल किए। इन कार्यकर्ताओं का ये संघर्ष बीते लंबे समय से जारी था और इन प्रदर्शनकारियों का कहना था कि साल 2021 में जारी आश्वासन के बावजूद अब तक सरकार ने इस ओर कोई पहल नहीं की है, न ही अब तक सरकार का कोई प्रतिनिधि या नेता इन आंदोलनरत कार्यकत्रियों से मिलने आया है। इनका आरोप ये भी था कि चुनावी साल में सरकार महिलाओं के नाम पर तमाम वोट तो हासिल करना चाहती है, लेकिन मेहनतकश महिलाओं को उनकी कमाई नहीं देना चाहती।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक साल 2021 में जब आशा और ऊषा कार्यकर्ताओं ने राजधानी भोपाल में बड़ा प्रदर्शन किया था, तब उन्हें ये सरकारी आश्वासन दिया गया था कि जल्द ही प्रदेश की हर आशा को 10 हजार रुपये और पर्यवेक्षकों को 15 हजार रुपये का मानदेय निर्धारित कर दिया जाएगा। लेकिन अब दो साल बाद जब चुनाव सर पर हैं, तो शिवराज सरकार के पिटारे से इन आशाओं के लिए मात्र 6 हज़ार निकले हैं। जिससे इन आशा कार्यकर्ताओं को राहत तो मिली है, लेकिन पूरी संतुष्टि नहीं।

आशा ऊषा सहयोगिनी श्रमिक संघ के अनुसार आशाओं को कड़ी मेहनत के बावजूद अब तक बेहद कम 2,000 रुपये मानदेय पर गुजारा करना पड़ रहा था। 24 जून 2021 को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की निदेशक आशा कार्यकर्ताओं को प्रति माह 10,000 रुपये के मानदेय का प्रस्ताव देने और राज्य सरकार और यूनियनों को इस प्रस्ताव के भेजे जाने पर सहमत हुई थीं। उन्होंने इस शर्त पर सहयोगियों के मानदेय में बढ़ोतरी किये जाने का भी वादा किया था कि उनके कार्य दिवस 25 दिन से बढ़ाकर 30 दिन कर दिए जायेंगे। उन्होंने ड्यूटी के दौरान कोविड-19 के कारण मरने वाली आशा कार्यकर्ताओं के परिवारों को 50 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का भी वादा किया था। लेकिन बीते दो साल में इस पर सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। इस साल चुनावी गहमागहमी के बीच आशा कार्यकर्ताओं के कड़े विरोध के आगे सरकार ने इन्हें बीमा और रिटार्यमेंट की अवधी बढ़ाने जैसी कुछ सौगात जरूर दी हैं।

आशाओं की अहम भूमिका

ध्यान रहे कि साल 2018 से पहले ये सभी कार्यकर्ता केवल 1,000 रुपये मासिक पारिश्रमिक लेती थीं। इस मासिक मानदेय के अलावा इन्हें जननी सुरक्षा योजना, गृह आधारित नवजात शिशु देखभाल (HBNC), आदि जैसे अतिरिक्त कार्यों के आधार पर प्रोत्साहन राशि मिलती है। सरकारी खबरों के मुताबिक आशा कार्यकर्ताओं को महामारी के दौरान किये गये उनके सभी कार्यों के लिए उनके इस मासिक मानदेय 2,000 रुपये के अलावा उन्हें 1,000 रुपये की मामूली राशि का भी भुगतान किया गया है।

ज्ञात हो कि साल 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत स्वास्थ्य सुविधाओं को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से आशा कार्यकर्ताओं की भर्ती की जाती है। वहीं सहयोगिनी की भूमिका आशा कार्यकर्ताओं की निगरानी और उनका मार्गदर्शन करना है। इनकी ज़िम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग को आशा कार्यकर्ताओं के किये गये कार्यों की प्रगति की रिपोर्ट करने की भी होती है। ऐसे में आशा-ऊषा कार्यकर्ता सरकार की योजनाओं को आम जन तक पहुंचाने में अहम कड़ी का काम करती हैं।
 

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